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गांधी का सन्देश // पीयूषा श्रीवास्तव

गांधी जी का भावी पीढी के लिए क्या सन्देश था ? आज के भारत के लिए वह कितना महत्वपूर्ण है ? अगले माह से हम गांधी जी की एक-सौ-पचावीं वर्षगाँठ मनाएंगे ऐसे में ये प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो उठते हैं| एक बार जब गांधी जी से भावी पीढी की लिए प्रत्यक्षत: उनका सन्देश जानना चाहा गया तो उन्होंने अपने जीवन को ही अपना सन्देश बताया था। वे अपने जीवन को सत्य के प्रयोग के तौर पर देखते थे, और वे सत्य तक पहुँचने के लिए सत्य मार्ग का ही अनुसरण करने की वकालत करते थे। उनके अनुसार सत्य जैसे नैतिक मूल्य मानव स्वभाव के सहज सद्गुण हैं जिन्हें व्यक्ति अपने आचरण में उतार सकता है। व्यक्ति से समाज तक एकसूत्रता है, अत: नैतिक मूल्य सामाजिक आचरण में न उतारे जा सकें यह संभव ही नहीं है।

गांधी जी ने आर्थिक, राजनैतिक और धार्मिक क्षेत्रों में सत्य की खोज की और उसी राह पर चलने का प्रयास और आग्रह किया।

गांधी जी के समय औद्योगिकं क्रान्ति की शुरूआत हो चुकी थी। इससे एक नई सभ्यता का जन्म हुआ जिसे पाश्चात्य सभ्यता कह सकते हैं। गांधी जी ने महसूस किया की आधुनिक भारत उसी सभ्यता का अनुकरण कर रहा है। यह सभ्यता शारीरिक-भौतिक सुख किस प्रकार प्राप्त किया जाए सिर्फ इसी प्रयत्न में संलग्न है। सारी तकनीकें, मशीनें, मानव-बुद्धि -इसी कार्य में लगी हैं। इसमें नैतिकता या धर्म की कोई बात ही नहीं है।

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बड़े बड़े कल-कारखाने, गगन-चुम्बी इमारतें, विशाल शस्त्र-भंडारों का परस्पर इतना घनिष्ट सम्बन्ध है कि वे एक दूसरे के बिना टिक नहीं सकते। कल कारखाने कच्चे माल के क्षेत्र पर आधिपत्य ज़माना चाहते हैं और तैयार मार्ग के लिए बाज़ार ढूँढ़ते हैं। यह अत्यधिक भौतिकता, स्वार्थ और संकुचित राष्ट्रीयता तथा, यहाँ तक कि, युद्ध के लिए तक मार्ग प्रशस्त करना है। प्रथम और द्वितीय विश्व-युद्ध इसी का परिणाम था। गांधी जी ने नोट किया कि युद्ध में विजयी होने के लिए “किसी भी झूठ और छल-कपट को त्याज्य नहीं समझा गया। एक राष्ट्र के पक्षधरों ने दूसरे राष्ट्र पर गंदे से गंदे आरोप लगाए और जवाब में दूसरे राष्ट्र ने और ज्यादह ज़हर उगला। किसी भी तरह के ज़ुल्म से परहेज़ नहीं किया गया। शत्रु के विनाश के लिए कोई हथकंडा निकृष्ट नहीं माना गया। कल के मित्र एक क्षण में ही शत्रु बन गए। न किसी तरह का सम्मान सुरक्षित रहा और न कोई चीज़ बच सकी।” गांधी जी कहते हैं कि हम सब आर्थिक दीवालिएपन के ही नहीं, बल्कि नैतिक दीवालियेपन के भी शिकार बन गए।

ऐसे समय में भारत का सत्य और अहिंसा पर आधारित स्वतंत्रता संग्राम विश्व के लिए आशा का सन्देश है। यह युद्ध का एक नैतिक विकल्प हो सकता है। स्पर्धा और पशु-बल त्याग कर मानव जाति के कल्याण, भ्रातृभाव और एकता को अपनाने की आवश्यकता है। युद्ध तभी समाप्त हो सकते हैं। गांधी जी ने आध्यात्मि कता और आत्म-बल से अहिंसक प्रतिरोध द्वारा भारत का स्वतंत्रता संग्राम लड़ा। वे कहते हैं, जिस तरह हम स्वयं लुटना नहीं चाहते उसी तरह किसी से अपने देश को लुटवाना भी नहीं चाहते। हमें तो स्वराज द्वारा जगत के हित में साधना करनी है। यह लड़ाई निरंतर चलनी चाहिए। यह भारतीय सभ्यता के जीवन-मरण का प्रश्न है।

गांधी जी चरखे को अहिंसा और सत्याग्रह का प्रतीक कहते थे। चरखे ने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। यह स्वावलंबन का द्योतक है। भोजन, कपड़ा और मकान मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताएं हैं जो पूरी होनी चाहिए। यह् शरीर-श्रम के बिना संभव नहीं है। जो बिना शरीर-श्रम किए इन आवश्यकताओं का उपभोग करता है वह वस्तुत: दूसरे का शोषण करता है। स्वेच्छा से शरीर-श्रम करना विश्व शान्ति के सन्देश को प्रसारित करना है। चरखा या खादी-वृत्ति इसीलिए विश्व-शान्ति का सन्देश देती है। स्वेच्छा से गरीबी अपनाकर या ऐसे सामान उपयोग न कर जो जन-साधारण को उपलब्ध नहीं हैं हम एक सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करते हैं। भाईचारे और एकता की भावना विकसित करते है । आत्म-बल बढ़ता है, मिलकर विकास करने की शक्ति उत्पन्न होती है। आदमी लालच की गलाकाट स्पर्धा से मुक्त होता है।

गांधी जी कल-कारखानों, विज्ञान की उन्नति को नकारते नहीं हैं, लेकिन चाहते हैं कि वे मानवीय मूल्यों से ऊपर न हों। मिल-मालिक की भावना सिर्फ पैसा कमाने की न हो। अपनी ज़रूरतों से ज्यादह पैसा न कमाया जाए। उसने जो भी अधिक पैसा कमाया है उसे वह ज़रूरतमंदों पर स्वेच्छा से खर्च करे। सभी संपन्न व्यक्ति ट्रस्टीशिप का सिद्धांत अपनाएं। अर्थात, उन्होंने जो पैसा समाज के सहयोग से प्राप्त किया है उसे समाज के हित में लगाएं। अपने मौज-शौक में खर्च न करें। चरखा पैसे के विकेंद्रीकरण का भी प्रतीक है। पैसे के एक जगह होने पर उसके दुरुपयोग की संभावना अधिक रहती है।

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गांधी जी वर्त्तमान संसदीय व्यवस्था से भी संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने उसकी कड़े शब्दों में आलोचना की है; उसे बाँझ और बेसवा तक कह डाला। ब्रिटिश पार्लियामेंट का चित्र खींचते हुए वे कहते हैं कि पार्लियामेंट के मेंबर दिखावटी और स्वार्थी होते हैं। सब अपना मतलब साधने की सोचते हैं। सिर्फ डर के कारण ही पार्लियामेंट कुछ काम कर पाती है। ब्रिटिश पार्लियामेंट महज़ प्रजा का एक खिलौना है और वह खिलौना प्रजा को भारी खर्चे में डालता है। पार्लियामेंट बेसवा है क्योंकि उसका कोई मालिक नहीं है। उसका कोई एक मालिक हो भी नहीं सकता। जो मालिक बनता है जैसे, प्रधानमंत्री, उसे अपना दल कैसे जीते इसी की लड़ाई रहती है। पार्लियामेंट सही काम कैसे करे, इसका वह बहुत कम विचार करता है। हम ध्यान से देखें तो अपनी संसद का भी आज यही हाल है। क्या इसी सभ्यता को हम प्राप्त करना चाहते हैं ? निस्संदेह नहीं।

अहिंसा पर आधारित सभ्यता का आधार, गांधी जी के अनुसार स्वावलंब या ग्राम-स्वराज्य है। स्वावलंबी गाँव जो दूसरों की मदद कर सकें, वे ही ग्राम-स्वराज की स्थापना करेंगे। इनका प्रबंध ग्राम पंचायत करेगी। वर्तमान में दस-पांच शहर, गावों को चूसकर जो मालामाल हो रहे हैं, उनपर रोक लगेगी। गाँव की सच्ची सेवा करने से ही सच्चे स्वराज की स्थापना हो पाएगी।

गांधी जी हर रोज़ सुबह-शाम सामूहिक प्रार्थना सभा करते थे। उनका मानना था कि हम सत्य मार्ग पर चल सकें इसलिए प्रार्थना आवश्यक है। उनका प्रिय भजन, “वैष्णव जन तो तेने कहिए जो पीड़ पराई जाने रे” यह बताता है कि हम सत्य मार्ग पर कैसे चलें।

गांधी जी ने हमें सर्वथा उपयुक्त कार्य करने के लिए एक जंतर दिया। सूत्र यह है कि कोई भी कार्य करने से पहले हम यह सोचें, क्या इससे उस दरिद्रतम व्यक्ति का कुछ भला हो सकेगा जो कभी हमारे अनुभव में आया है। यदि उत्तर ‘हाँ’ में है तो आप सही कार्य कर रहे हैं। दरिद्रतम व्यक्ति की भलाई में ही सबकी भलाई निहित है। किसी व्यक्ति का शोषण करके संपन्न हो जाना मानवीय सभ्यता नहीं है।

मानवी सभ्यता का विकास अहिंसात्मक रहा है। पहले मनुष्य घूंसे का जवाब घूंसे से देता था, बाद में जिओ और जीने का सिद्धांत विकसित हुआ। पर गांधी जी के अनुसार सच्चा अहिंसक वह है जो सत्य के लिए अपने प्राणों की भी बाजी लगा देता है और सत्य के मार्ग पर आने वाली बाधाओं का अहिंसक प्रतिकार करत है।

गांधी जी का कहना था कि हम जब भी दूसरों की भलाई का काम करें तो अपने इष्ट का स्मरण करें। यदि राम हमारे इष्ट हैं और हम अपना सारा जीवन राममय कर लें। समाज का हर व्यक्ति जब ऐसा हो जाएगा तो रामराज्य अपने आप आ जाएगा। उनकी वसुधैव-कुटुम्भकम की भावना इसी में निहित है। यही शान्ति का सन्देश उनका परिपूरित सन्देश है।

गांधी जी ने आधुकिकता की चकाचौंध के पीछे की कड़वी सच्चाई ढोल के पोल की तरह खोली है। आधुनिक भारत ही नहीं आधुनिक विश्व को भी उनके सन्देश की आवश्यकता है। सरोजनी नायडू के शब्दों में,

“आइए, हम उनके व्यक्तित्व के ओज, उनके साहस के शौर्य और उनके चरित्र की महानता उनसे ग्रहण करें .. क्या हम संसार को गांधी जी का परिपूरित सन्देश नहीं देंगे ?”

ज़ाहिर है, यह सन्देश हम सभी अवश्य ही देना चाहेंगे।


----(श्रीमती) पीयूषा श्रीवास्तव 

१/१ सर्कुलर रोड, इलाहाबाद

आलेख 7067492611354375857

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