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हास्य-व्यंग्य // आदर्श-संबंधों के शॉर्ट-टर्म पाठ्यक्रम // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

विश्व-विद्यालयों को जब से आत्म निर्भर होने के लिए आदेश मिलें हैं, वे सभी तभी से उन उपायों की खोज करने लगे हैं जो उनके लिए कमाई का ज़रिया बन सकें। हाल ही ने राजधानी में स्थित एक विश्व-विद्यालय ने एक ऐसा क्रांतिकारी कदम उठाया है जिसका अनुकरण, मुझे लगाता है, अब सभी शिक्षण-संस्थाएं शीघ्र ही करना शुरू कर देंगी।

प्रदेश की राजधानी के इस विश्व-विद्यालय ने एक बिलकुल नया पाठ्यक्रम आरम्भ करने की घोषणा की है, यह पाठ्यक्रम है, आदर्श बहू का पाठ्यक्रम। क्या आपको एक संस्कारी बहू चाहिए ? विश्वविद्यालय ने एक शॉर्ट टर्म कोर्स आदर्श बहू ‘तैयार’ करने के लिए किया है। वि. वि, का मानना है कि यह कोर्स महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक पाइलट प्रोजक्ट होगा। तीन महीने का यह कोर्स अगले अकादमिक सत्र से आरम्भ होने जा रहा है। इसका मकसद है लड़कियों को ससुराल में अपने नए माहौल में खुद को आसानी से समायोजित करने के लिए शिक्षित करना, ताकि वे परिवार को जोड़ कर रख सकें। इस पाठ्यक्रम में मनोविज्ञान, समाजशास्त्र और शिक्षा से जुड़े मुद्दों का भी समावेश किया जाएगा। साथ ही माता-पिता से फीड-बैक भी लिया जाएगा। यह कोर्स तीन महीने का होगा और इसकी अच्छी-खासी फीस होगी। और हो भी क्यों न। हम देख रहे हैं कि आज छोटी छोटी बातों पर बहुओं के कारण झगड़े हो रहे हैं और परिवार में फूट पड़ रही है। इससे बचने के लिए यदि लड़कियों को प्रशिक्षित किया जा सके तो यह सौदा मंहगा नहीं है।

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हमारा देश वाद-विवाद प्रिय है। आप कोई कदम उठाएं उसमें अडंगा डालने वाले आपको न चाहते हुए भी मिल ही जाएंगे। इसी प्रकार कुछ ऐसे भी मिल जाएंगे जो न चाहते हुए भी आपके प्रयत्न की तारीफ़ किए बगैर नहीं रहेंगे। यही सब इस आदर्श बहू पाठ्यक्रम के सिलसिले में भी हो रहा है। लेकिन किसी भी विश्वविद्यालय को इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए औए अकादमिक खोल में मुंह छिपाए रहने की बजाय समाजोन्मुख हो जाना चाहिए। उन्हें इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए की उनका खुद का विश्व-विद्यालय आदर्श है या नहीं लेकिन समाज और उससे जुड़े संबंधों को आदर्श बनाने की तरफ ध्यान देना चाहिए। मुझे लगता है अब शीघ्र ही कई विश्व-विद्यालय इसी प्रकार के कई अन्य पाठ्यक्रम तैयार करने में तत्परता दिखाना शुरू कर देंगे।

हम सब जानते हैं कि हर ‘सास’ एक आदर्श ‘बहू’ चाहती है। लेकिन हर बहू भी तो एक आदर्श सास चाहती है। अगर आप में से कोई महिला सास बनने जा रही है तो उसे अविलम्ब, बल्कि पहले से ही, उस नए, आदर्श सास वाले, कोर्स में प्रवेश के लिए, जो अभी बना नहीं है, आवेदन कर देना चाहिए। यह आपको एक ‘आदर्श सास’ बनाने में आपकी मदद करेगा।

पर आदर्श बहू या आदर्श सास तक ही क्यों सीमित रहा जाए, अन्य कई दूसरे रिश्तों को भी आदर्श बनाने में विश्वविद्यालय, इसी प्रकार के पाठ्यक्रमों द्वारा आपकी मदद कर सकते हैं। जैसे एक कोर्स आदर्श दामाद का, एक कोर्स आदर्श ननद का, एक कोर्स आदर्श साले का, एक कोर्स आदर्श साली का, एक कोर्स आदर्श सलहज का, एक कोर्स आदर्श देवर का, एक कोर्स आदर्श ननदोई का... इत्यादि भी बनाए जा सकते हैं। इन पाठ्यक्रमों से समाज में समरसता निर्मित होगी और केवल स्त्री सशक्तिकरण ही नहीं होगा, जैसा कि आदर्श बहू के पाठ्यक्रम के लिए दावा किया गया है, बल्कि पूरे समाज का इनमें हित निहित होगा।

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इन शॉर्ट-टर्म, कोर्सेस से विश्व-विद्यालयों को अतिरिक्त वित्तीय लाभ तो होगा ही, समाज को कुल मिलाकर आदर्श बनाने में भी सहायता मिलेगी। विश्व-विद्यालय जो अभी तक किसी अपने ही अकादमिक ‘आइवरी टावर’ में बंद रहते थे, उन्हें खुली हवा मिलेगी और वे अपने सामाजिक दायित्व का भी निर्वहन कर सकेंगे और स्वयं भी इस प्रकार आदर्श विश्व-विद्यालय बन जाएंगें। अधिकारीगण इस दिशा में जितनी जल्दी सचेत हो सकें उतना ही समाज के लिए कल्याणकर होगा।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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