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व्यंग्य // अपने अपने चाँद // सुरेन्द्र वर्मा

एक चाँद आसमान में चमकता है। ज़ाहिर है, वह हमारा, आपका सभी का चाँद है। लेकिन वह हम सबसे बहुत दूर है। बस हम उसे देखते हैं और खुश हो लेते हैं। बच्चों का तो वह चन्दा मामा ही बन जाता है। रात में वह हमारी धरती पर अपनी चांदनी बिखेरता है, और धरती चमक उठती है।

किसी शायर ने शायद ठीक ही कहा है, तुम सुन्दर हो इसलिए कि मैंने तुमसे प्यार किया है। यही बात चाँद के लिए भी कही जा सकती है क्योंकि

चाँद का हुस्न भी ज़मीन से है चाँद पर चांदनी नहीं होती

चाँद घटता-बढ़ता रहता है। पूनों का चाँद बड़ा तो होता है, अच्छा भी लगता है; पर वह धीरे धीरे घटते हुए अमावस्या तक पहुँच जाता है। इस मायने में द्विज का चाँद पूनो के चाँद से बेहतर है। वह जब तक पूरा आकार ग्रहण न कर ले बढ़ता ही जाता है।

चाँद कभी कृत्रिम नहीं होता। पूनो के ‘दिन’ ठहरे पानी में जो चाँद दिखाई देता है वह भी चाँद का ही अक्स होता है। कृत्रिम वह भी नहीं है। चाँद क्योंकि सूर्य से अपनी रोशनी ग्रहण करता है इसलिए सूर्य की अपेक्षा उसका प्रकाश थोड़ा कम होता है। लेकिन चाँद की खूबी भी यही है। सूर्य को देखने में हमारी आँखें चौंधिया जाती हैं। चाँद देखने में कोई कठिनाई नहीं होती।

बेशक चाँद की रोशनी इतनी नहीं होती कि रात में देखने के लिए हमें अतिरिक्त प्रकाश की आवश्यकता ही न पड़े। इसीलिए, पूर्णमासी हो तो भी, सडकों पर हमें स्ट्रीट लाइट्स जलाने पड़ती हैं। हमारे पड़ोसी देश चीन को यह बात बहुत नागवार गुज़रती है, खलती भी है। पर क्यूंकि चाँद की रोशनी में तो इजाफा किया नहीं जा सकता सो उसने तय किया है कि वह अब एक ऐसा कृत्रिम चाँद बना के रहेगा जो असली चाँद से कई गुना अधिक प्रकाश दे सके। उसे उम्मीद है कि वह ऐसा चाँद २०२२ तक तैयार कर लेगा। हमारा यह पड़ोसी देश, चीन, अंतरिक्ष में जो कृत्रिम चाँद लांच करने आ रहा है, वह, उम्मीद की जा रही है कि किसी भी बड़े से बड़े शहर को रोशन कर सकने में सक्षम होगा। इस चाँद का प्रकाश असली चाँद के प्रकाश से आठ गुना ज्यादह होगा और ऐसे में स्ट्रीट लाइट्स की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। इस कृत्रिम चाँद में शीशे से बने उपग्रह होंगे जिनसे टकरा कर सूर्य की किरणें धरती तक पहुंचेंगीं। यह चाँद रात को दिन में बदल देगा।

लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल स्ट्रीट लाइट्स की समस्या हो हल करने के लिए यह ज़रूरी है कि रात को रात ही न रहने दिया जाए और उसे भी ‘दिन’ बना दिया जाए ? फिर तो स्ट्रीट लाइट्स ही नहीं, ऐसे में हम सभी रोशनी देने वाली चीजों को तिलांजलि दे देंगे। फिर न तो दीयों की आवश्कता रहेगी न मोमबत्तियों की। बिजली के बल्ब भी बेकार हो जाएंगे। जब रात ही नहीं होगी तो भला दिन के आँगन में इनका क्या काम है ? आदमी की आदत है कि मच्छर को मारने के लिए कभी कभी बंदूक का इस्तेमाल करने लगता है। सिर्फ एक अपनी दुनिया को ख़त्म करने के लिए ऐसी अनेक दुनियाओं को ख़त्म करने के लिए अटोमिक हथियार लिए वही तो बैठा है न।

लेकिन आने दो; इस कृत्रिम चाँद को भी आने दो। इसके आने से हमारी भाषा में नए नए मुहावरे पैदा होंगे। अभी तक हम “मुझे चाँद चाहिए”,”चाँद का मुंह टेंडा है” आदि जैसी रचनाएं करते थे। किसी सुन्दर चहरे को देखकर उसे चाँद सा चेहरा कहते थे। अब हम किसी खूबसूरत बनावटी इंसान को “कृत्रिम चाँद का चेहरा” कहा करेंगे। लिखने वाले अब “क्या रखा है चाँद में, मुझे कृत्रिम चाँद ही चाहिए” शीर्षक से उपन्यास लिखेंगे। चीन अपने व्यापार को बढ़ाएगा और कुछ इस तरह के विज्ञापन देने लगेगा –“अपने शहर को जगमगाओ, कृत्रिम चाँद ले लो; चाँद से आठ-गुना बेहतर चाँद ले लो।” अब चन्दा मामा नहीं रहेगा। चन्द्रमा बिकाऊ हो जाएगा।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड, प्रयागराज – २११००१

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