नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

बीता समय - विनोद सिल्ला की 11 कविताएँ

image

1.

बीता समय

ये सच है
आदि काल में
धर्म नहीं थे
अंधविश्वास-आडंबर
और भ्रम नहीं थे
तब मानव के
आत्मघाती कर्म नहीं थे
जाति-मजहब
नस्ल व वर्ण नहीं थे
रहा होगा तब
वास्तव में
स्वर्णिम युग
वो बीता समय
क्या वापिस
नहीं आ सकता

-विनोद सिल्ला©

2.

चुनाव

देखा
चुनाव का दौर
प्रचार का शोर
लगा हुआ
एड़ी-चोटी का जोर
किसी को बेचा
किसी को खरीदा
शह-मात का खेल
शेर-बकरी का मेल
किसी को रिझाया
किसी को लुभाया
बेले पापड़
हर तिकड़म लड़ाया
साम-दाम
दंड-भेद
सब आजमाया
किसी को हंसाया
किसी को रुलाया
मात्र चुनाव जीतकर
हराम का
खाने के लिए

-विनोद सिल्ला©

3.

सिरदर्द

कुछ एक
लेकर आते हैं
धरती पर
अपने साथ सिरदर्द

जो भी उनके
आता है संपर्क में
दे जाते हैं उसे
सिरदर्द

उनके लिए
सब उत्सव-पर्व
हैं बेकार

उत्सव-पर्व भी
मनाते हैं
सिरदर्द में ही

सिरदर्द है उनका
परमोधर्म
कितना अच्छा होता
गर होता
उनका नाम सिरदर्द

-विनोद सिल्ला©

4.

सवाल-जवाब

रेलवे स्टेशन पर
बौद्धी वृक्ष के नीचे
चबूतरे पर
लेटी है एक वृद्धा
सिरहाना बनाए
अपनी पोटली का

यह पोटली ही है
उसका समूचा संसार
जाने क्यों छोड़ दिया
उसने अपना परिवार
या छोड़ दिया उसे
परिवार ने
पुत्र-पुत्रवधु भी होंगे
हाथों की चूड़ियां
बता रही थीं
पति भी होगा संसार में
अनेक उठे सवाल
अनेक सूझे जवाब
और मेरी ट्रेन
चल पड़ी

-विनोद सिल्ला©

5.

तिरंगा यात्रा

आज थी
तिरंगा यात्रा
उन हाथों ने
थामा हुआ था तिरंगा
सिर्फ और सिर्फ वोटार्थ
वरना ताउम्र वो
करते रहे उपेक्षा
राष्ट्रध्वज की
जिनकी मुंडेर पर
फरकती रही
नफरतों की ध्वजा
तरसती रही
उनकी मुंडेर
राष्ट्रध्वज को सदा
निकाल रहे हैं वो
आज तिरंगा यात्रा
सिर्फ वोटार्थ

-विनोद सिल्ला©

6.

सर्वव्यापक

लोग
बोलते हैं तो
स्वार्थवश
बोलना छोड़ते हैं तो
स्वार्थवश

स्वार्थपरता
शह-मात
तिकड़मबाज़ी
षड़यंत्र
के अतिरिक्त
कहीं और कुछ है
तो मुझे बताना
ऊब गया हूँ
इन सबसे
चाहता हूँ निजात पाना
चाहता हूँ पार पाना
इन सबसे
लेकिन ये हैं
सर्वव्यापक

-विनोद सिल्ला©

7.

मापदंड

रख दी गिरवी
नैतिकता
अपने अल्प लाभार्थ
नहीं चूकते
वतन को
बड़ा नुकसान
पहुंचाने से

काट रहे हैं
उसी डाल को
जिस पर बैठे हैं
होकर अनभिज्ञ
संभावित खतरों से

इतने आत्मघाती
नहीं होते कदापि
अन्य प्राणी
फिर भी कहलाते हैं
स्वयंभू सभ्य

सभ्यता के मापदंड
हो गए विलुप्त
आपाधापी की
धकमपेल में

-विनोद सिल्ला©

8.

कतार में

वो है आमजन
जब भी देखो
मिलता है कतार में
कभी रेलवे की
टिकट खिड़की पर
कभी राशन की
सरकारी दुकान पर
कभी गैस-एजेंसी की
कतार में
कभी मंदिर में
माथा टेकने के लिए
कभी मठाधीशों के
चरण छूने के लिए
दिखता है कतार में
ताउम्र नहीं तोड़ पाता
लम्बी कतारें
क्योंकि जब
लगा था मतदाताओं की
कतार में
तब नहीं था
होशो-हवास में

-विनोद सिल्ला©

9.

श्रमिक

उस श्रमिक का
चोटी से चला पसीना
तय करके सफर
पूरे बदन का
पहुंचा एड़ी तक
मिले चंद रुपए

उसकी मेहनत पर
किसी ने
दलाली कमाई
किसी ने
आढ़त कमाई
चमकीले चेहरों ने
की मसहूरी
चला लाखों का व्यापार
श्रमिक रहा
जस का तस
दब गया बन कर
अर्थव्यवस्था की
नींव की ईंट

-विनोद सिल्ला©

10.

हुनरमंद

उनकी बातें
थीं मनमोहक
एक-एक शब्द
था कर्णप्रिय
उसने वही कहा
जो चाहते थे
श्रोतागण सुनना
नहीं था उसे
भले-बुरे से सरोकार

बड़े हुनरमंद हैं वो
मोड़ लेते हैं
अपने-आपको
हवा के
रुख के अनुसार

-विनोद सिल्ला©

11.

परिवर्तन

मन के द्वार
देती हैं दस्तक
बार-बार
गमी व खुशी
चिन्ता व बेफिक्री
कभी हो जाता है
मन भारी
मानो पड़ा है इस पर
कई मण भार
कभी हो जाता है
फूल के माफिक
हल्का-फुल्का
तरो-ताजा
बदलती रहती है
मनोस्थिति
हुआ प्रतीत
कुछ भी नहीं है स्थाई
जीवन में

परिवर्तन है
प्रकृति का
अभिन्न अंग

-विनोद सिल्ला©




परिचय

नाम - विनोद सिल्ला
शिक्षा - एम. ए. (इतिहास) , बी. एड.
जन्मतिथि -  24/05/1977
संप्रति - राजकीय विद्यालय में शिक्षक

प्रकाशित पुस्तकें-

1. जाने कब होएगी भोर (काव्यसंग्रह)
2. खो गया है आदमी (काव्यसंग्रह)
3. मैं पीड़ा हूँ (काव्यसंग्रह)
4. यह कैसा सूर्योदय (काव्यसंग्रह)


संपादित पुस्तकें

1. प्रकृति के शब्द शिल्पी : रूप देवगुण (काव्यसंग्रह)
2. मीलों जाना है (काव्यसंग्रह)
3. दुखिया का दुख (काव्यसंग्रह)


सम्मान

1. डॉ. भीम राव अम्बेडकर राष्ट्रीय फैलोशिप अवार्ड 2011
2. लॉर्ड बुद्धा राष्ट्रीय फैलोशिप अवार्ड 2012
3. ज्योति बा फुले राष्ट्रीय फैलोशिप अवार्ड 2013
4. लाला कली राम स्मृति साहित्य सम्मान 2015
5. प्रजातंत्र का स्तंभ गौरव सम्मान 2018
6. रक्तदान के क्षेत्र में 'अमर उजाला' समाचार-पत्र द्वारा जून 2018

पता :-

विनोद सिल्ला

गीता कॉलोनी, नजदीक धर्मशाला
डांगरा रोड़, टोहाना
जिला फतेहाबाद (हरियाणा)

पिन कोड-125120

1 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.