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दृष्टिकोण - समलैंगिकता : एक नई सोच - हिमांशु जोनवाल

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''समलैंगिकता को अपराध न मानते हुए प्राकृतिक माना जाए'' हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी इससे सहमति जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने म...

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''समलैंगिकता को अपराध न मानते हुए प्राकृतिक माना जाए'' हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी इससे सहमति जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि समलैंगिक सम्बन्ध अपनाना कोई अपराध नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक रचना है। प्रकृति द्वारा रची गयी एक मानवीय रचना है जिसका बहिष्कार हम नहीं कर सकते हैं। हम अपने तर्क वितर्क से इसको अपने अनुकूल बनाना चाहते हैं लेकिन मानवीय व्यवहार सभी से समानता का हकदार है। समलैंगिकता वाले मनुष्यों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। इनको भी अपने हिसाब से, अपने तरीके से जीने का अधिकार मिलना चाहिए और सामान्य नागरिक के अधिकार प्राप्त होने चाहिए। जब संविधान ने 18 उम्र को बालिग मानकर अपने मुताबिक लाइफ पार्टनर चुनने का अधिकार दिया है तो इनको समान सेक्स के प्रति इतनी बाधाएं क्यों ? ये मानवीय संरचना किसी इंसान के बस की बात नहीं है बल्कि संसार के नियमों के मुताबिक चलता आ रहा चलन है। लेकिन इन्हें आपसी सहमति से बन्धनों में न बन्धने देना या उस पर रोक या पाबन्दी लगा देना उचित नहीं है।

जिस प्रकार सामान्य पुरूष या महिला अपनी कामनाओं पर नियन्त्रण नहीं रख सकते, तो फिर इनको क्यों अपनी पसंद के अनुसार या मनवांछित चुनने का अधिकार नहीं है? लेकिन इसके उलट कई अपवाद देखने को मिल जाएंगे। यदि समलैंगिक सम्बन्ध आपसी सहमति के आधार पर न हो तो समाज को गलत दृष्टिकोण देते हैं, गलत सन्देश देते हैं।

समलैंगिकता दो लोगों के मध्य प्यार और उसके प्रति अपनत्व की भावना व्यक्त करने का एक तरीका है। जिस प्रकार सामान्य मनुष्यों में प्रवृत्ति होती है उसी तरह यह उन्हें भी प्रकृति की ओर से दिया गया लक्षण है। क़ुदरत ने उनकी प्रकृति ही ऐसी बनाई है तो हम कौन है जो उनकी इस प्रवृत्ति को छीन लें।

वर्तमान में हम देख रहे हैं कि जिसको सही परवरिश ना मिली हो, वे गलत रास्तों पर ज्यादा जाते देखे जाते हैं। परवरिश सही भी हो तो भी मार्ग के कई मोड़ उनको नकारात्मकता की तरफ ज्यादा आकर्षित करते है। आप खुद ही देख लीजिए, गलत कामों में ही हमें सुकून मिलता है फिर चाहे उसमें कितना ही समय और पैसा बर्बाद क्यों ना होता रहे।

समाज चाहे भी तो समलैंगिकता वाले स्त्री पुरूषों की प्रवृत्ति को नहीं बदल सकता। अधिकांश में ये प्रवृत्ति जन्मजात है, लेकिन कई बार यह प्रवृत्ति मनुष्य में जन्मजात न होकर परिस्थितियों पर निर्भर होती है। उसे आमतौर पर ये लगने लगता है कि उसे अपने विपरीत लिंगी इंसान से खतरा है जिसे वो भांपकर या डरकर उससे होने वाली समस्या से निजात पाने के लिए कई बार इस मार्ग में अपने आप को सुरक्षित महसूस करती/करता है उदाहरणतः जिस प्रकार एक लड़की ने स्वयं को समाज की आलोचना झेलते हुए कई औरतों को देखा है या फिर उन पर होने वाले अत्याचारों को भी समझकर वे ये फैसला लेती है या उनमें स्वयं ही उस इंसान के प्रति धारणा बन जाती है कि ये उसके लिए सुरक्षित नहीं है। यही प्रवृत्ति कई बार पुरूष जन में भी आम होती है वे अपनी पौरूष क्षमता पर हावी नहीं होना चाहते या बचपन से ही उन्हें किसी महिला या लड़की का व्यवहार अपेक्षाकृत व्याकुल करने वाला लगा हो जिससे उन्हें और परिवार जन को उस व्याकुलता का सामना करना पड़ा हो, जिससे समलैंगिकता उनमें प्रत्यक्ष ही देखने को मिल जाएगी।

जिन्हें सेक्स और उससे मिलने वाली उत्तेजनाओं से वंचित रहना पड़ा हो उनके अन्दर ये प्रवृत्ति प्राकृतिक हो सकती है। जो उम्र के साथ नजर आने लगने लगती है। इसकी ना कोई दवा होती है और ना कोई उपचार। इसका बदलाव स्वयं भी हो सकता है अथवा प्रयास करने से भी, यह मनोवृत्ति पर निर्भर है।

समाज का एक वर्ग समलैंगिकता से परिचित है समलैंगिकता का पहलू उस दर्पण के समान है जो सामने है मगर उस सच्चाई को जानते हुए भी उसे अब तक आसानी से कानून के ड़र से स्वीकार नहीं किया जाता था।

समलिंगियों में सामान्य लोगों से कोई शारीरिक भिन्नता नहीं होती, तथा प्रकृति से वे लोग हम ही में से कुछ एक होते हैं। जो उन्हें इस बात से बार-बार अवगत कराते रहते हैं कि उनमें कोई दोष है। मानवीय प्रकृति ना किसी गुणसूत्र से आती है ना ही किसी के स्पर्श करने से, ये जन्मजात होती है जो उम्र के बढ़ने के साथ-साथ नजर आती है। समाज संस्कृति को आधार बनाकर सच्चाई से पीछे भागता है जबकि जिस आधार से ये बातें पनपती है उसको निराधार कराने में हमारी अहम भूमिका होती है।

लोग समाज के भय से उनको तिरछी नजरों से देखते है या घर से बाहर या दूर भेज देते है लेकिन अब संविधान उन्हें एकता सूत्र में बांध दिया है तो हम कौन होते है उसे तोड़ने वाले।

सकारात्मक पहलूः

समलैंगिकता सेक्स से सबसे बडा सकारात्मक पहलू तो जनंसख्या नियन्त्रण होगा।

अपने अधिकारों की निजता में रहते हुए समलिंगी स्त्री और पुरूष किसी और विपरीत सेक्स के साथ जोरी नहीं करेंगे, देखा जाता है कि परिवार वाले उन्हें ऐसा करने के लिए विवश करते हैं।

अपनी कामुक भावनाओं की पूर्ति अपने समलिंगी स्त्री या पुरूष के साथ कर सकते हैं। इससे किसी तरह का जबरन प्रयास या किसी के प्रति मानहानि की दशा उत्पन्न नहीं होगी।

कई स्त्री और पुरूषों में ये बात अमूमन होती हैं कि वे समलैंगिक के प्रति समान भाव रखते हैं। वे उनकी हर जरूरत को पूरी करते हुए उन्हें समानता का अवसर भी देते हैं। प्रागैतिहासिक समय से ही समलैंगिकता को केवल मान्यता ही नहीं दी गयी बल्कि खजुराहों जैसे मन्दिरों में समलैंगिक संबंधों को कलात्मक रूप उतारा भी गया है। यह समाज की कुरीतियों पर नियंत्रण में सहायक भी है।

लेस्बियन, गे, या समलिंगी सेक्स को प्राथमिकता देने से उनकी सोच को नया आयाम मिलेगा। दोनों का एक दूसरे के प्रति आकर्षण उनके जीवन को नयी ऊर्जा दे सकता है। उन्हें किसी बाध्यता से मुक्त रखा जा सकता है।

अगर कोई स्त्री बच्चा न चाहकर यौन कामना चाहती है तो उसकी इस कामना में उसकी समलिंगी सहयोगी हो सकती है। पुरूष भी इन्हीं तरीके से अपने घर.-परिवार या अपनी सहयोगी से दूर होकर समलिंगी सेक्स कर सकता है। लेकिन वर्तमान समय में कंडोम तथा अन्य गर्भ निरोधक साधनों से अनचाहे गर्भाधान से पूरी तरह सुरक्षा पा ली गयी है। फिर पुरूष या स्त्री किसी भी अपने पार्टनर के साथ सम्बन्ध बना सकते है बिना किसी सहायता के।

विषमलिंगी द्वारा भी अपने साथी की अनुपस्थिति में समलिंगी से यौन करना, विश्वसनीयता को बनाये रखता है। इसके साथ ही अपनी साथी की अनुपस्थिति में रोमांस के लिए भी समलैंगिकता को अपना सकते हैं।

इसके अलावा जो लोग ऐसे संबंध पसंद करते है वे अनाथ बच्चों को गोद लेकर जनंसख्या नियंत्रण में अहम भूमिका निभा सकते हैं। अनाथ बच्चों को गोद लेकर समाज में मानवता का परिचय और युवा पीढ़ी को नयी दिशा दे सकते हैं।

कई बार एलजीबीटी समुदाय को अपने विरूद्ध समस्याओं और यातनाओं का सामना करना पड़ता हैं जिससे उनकी इच्छाएं पूरी तरह शान्त नहीं हो पाती, और वे जबरन यौनाचार का प्रयास कर सकते है, तो इससे अच्छा है कि उनको होमो सेक्सुअल ही रहने दें अपने पथ पर सक्रिय रहने दें, उनके हाथ इस प्रवृत्ति की यातना देकर बांधने से उनकी भविष्य की उन्नति रूक सकती है।

हर व्यक्ति अपने सेक्सुअल पार्टनर को देखकर खुद उसे चुनता है तो समलिंगी को भी इसका अधिकार मिलना उचित है। वो विपरीत लिंग वालों से सन्तुष्ट ना होकर समलिंगी से सन्तुष्ट होते हैं तो इसमें उनकी पूरी सहमति होगी और किसी तरह की जबरदस्ती नहीं होगी।

कुदरत ने इनकी प्रकृति को सामान्य से अलग तो बनाया, लेकिन इनको अकेला नहीं होने दिया, कुछ लोग इनकी प्रवृत्ति से मेल खाते हुए इनको स्वीकार करने वाले भी हैं। ये प्रवृत्ति कुछ जानवरों में भी पायी जाती है जिससे उन्हें अपने साथ या अपनी प्रवृत्ति को तलाशने का मौका मिलता है, तो ये तो मनुष्य ही है इनको भी अपने व्यक्तित्व साबित करने का मौका मिलना ही चाहिए। सिर्फ इसलिए नहीं कि ये समलैंगिक है बल्कि ये उस परिस्थिति में भी सामान्य है, जिससे उनकी मनोकामना शान्त होती हैं ।

शरीर भी उन यौन क्रियाओं को शान्त करता है। कई पुरूष भी आवेश में आकर या अपनी दुश्मनी का बदला किसी रेप या मर्डर में निकालते हैं।

लेकिन वे अपनी उत्तेजना सहमति से किसी समलैंगिक साथी से शान्त करके जबरन रेप जैसे समस्या से निजात पा सकते हैं।

इस सकारात्मक पहलू को देखते हुए उन्हें न्यायालय के इस फैसले से नया जोश मिलेगा और उनको किसी खुले आसमान में सांस लेने का मौका मिलेगा।

उनमें लोगों की कड़ी नजरों से बचने का हक सरकार ने दिया है। जो लोग इसके पक्ष में है वे इस बात का पूरा समर्थन करेंगे कि इनको पूरा हक मिले। साथ ही जो लोग इसके पक्ष में नहीं हैं वे भी इसका विरोध नहीं कर सकेंगे।

न्यायालय ने इस बात पर ध्यान दिया कि इनसे परिचित होने के बाद आम जनता का रवैया इनके प्रति अपमानजनक वाला होता है कोई अपने किसी बच्चे को या स्वयं माता-पिता भी उनके समक्ष उपस्थित नहीं होते। समाज उनको इस प्रवृत्ति के साथ स्वीकार नहीं करता उनको नीची और अनुचित प्रवृत्ति वाले मनुष्य की संज्ञा दे दी जाती है, इसीलिए कोर्ट ने उनके प्रति नरम रूख अपनाते हुए उन्हें अधिकार दिलाया।

यहां तक कि कई शिक्षा के मंदिरों को भी इससे फर्क पड़ता था और वे इससे पल्ला झाड़ लेते थे उनका कहना था कि इनके रहन सहन से असल में कई लोग प्रभावित हो सकते हैं, जो अपने किसी खास को इस संगत से दूर रखना चाहते है।

लेकिन अब यह सिद्ध हो गया है कि ये कोई वायरस नहीं जो फैलता है यह तो मानवीय प्रवृत्ति है या प्रकृति प्रदत्त है जो जन्म से ही होती है अथवा परिस्थिति जन्य होती है।

समलैंगिकता अपनाने से बहुत से धार्मिक संगठन भी इस पर आपत्ति जताते थे। अब कोई समाज इनको अपराध भरी निगाहों से नहीं देखेगा।

एलजीबीटी समुदायों में शादी होने पर चाहते हुए भी वो वंश वृद्धि नहीं कर सकते इसके लिए उनको अनाथ बच्चों को गोद लेना होगा।

एलजीबीटी समुदायों को पहले तिरछी नजरों से देखा जाता था लेकिन उनको भी सुप्रीम कोर्ट ने अधिकार देकर समान नागरिकता की श्रेणी में रखा है।

समाज में इस फैसले की कद्र होगी सरकार ने 377 हटाते हुए कई सीमाएं आज भी बांधे रखी हैं जिसमें जबरन यौन शोषण आज भी अवैध माना जाता है तो इसका बहिष्कार भी खुले आम कर सकते हैं। क्यों कि अन्ततः सम्मान तो सहमति का ही किया गया है।

भारत देश आज भी कई सामाजिक टुकडों में बंटा है जो सरकार के नियमों का उल्लंघन करते हुए अपना सामाजिक वर्चस्व कायम रखना चाहते हैं लेकिन एलजीबीटी समुदाय भी अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग करते हुए अपना पक्ष रख सकता है।

नकारात्मक पहलूः

इस फैसले के निश्चित ही कुछ नकारात्मक परिणाम भी हो सकते हैं यदि इसे उचित परिप्रेक्ष्य में न समझा जाए।

समाज में वर्षों तक स्त्री-पुरूष के यौन संबंधों को ही सही माना जाता रहा है और लोग इन्हीं से भली भांति रूबरू है, और उन्हें लगता है कि ऐसे संबंधों से ही अपने समाज को एक अच्छी संतान युक्त उज्ज्वल भविष्य दिया जा सकता है।

न्यायालय के फैसले के बावजूद समाज के कुछ वर्ग इसे अब भी अपराध ही मानते हैं और इसे आज भी गिरी नजर से देखते हैं।

कुछ लोगों की धारणा हैं कि समलैंगिकता में अक्सर वायरस जनित रोगों का खतरा रहता है या फिर इसमें सेक्स खिलौनों के प्रयोग से यौन बीमारियों का खतरे की संभावना बनी रहती है। समलैंगिकता में अधिक सन्तुष्टि के लिए अनाल सेक्स या गुदा मैथुन का सहारा ज्यादा लिया जाता है।

अन्त में यह कहा जा सकता है कि कोर्ट का यह फैसला समाज के हित में ही है और इससे हाशिये के समाज को भी मुख्य धारा में आने का अवसर प्राप्त होगा।

प्रत्येक व्यक्ति का रहन-सहन अलग-अलग होता हैं लेकिन वो दिखने में एक-से हैं। तो हम उनके बारे में धारणा नहीं बना सकते कि वह किस हद का हैं किस जात का हैं या किस समुदाय से है, क्यों कि आधुनिक समाज में यौन संबंध अपनी निजता को बनाये रखकर ही निभाने का संकेत माननीय न्यायालय ने दिया है।

एलजीबीटी के बारे में भी कई लोगों की मानसिकता इस प्रकार की है कि उनकी प्रवृत्ति के कारण उनको समाज से परे किया जाए, लेकिन सच ये है कि वे भी हवा और पानी पर ही निर्भर हैं जैसे हम हैं उनकी कुदरती बनावट हमसे मेल खाती है। वे हमसे दूर नहीं हैं बल्कि हमारी रूग्ण मानसिकता हमें ऐसा करने पर मजबूर करती है।

सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकों को सामान्य समझकर आत्मविश्वास से सिर उठाकर जीना सिखा दिया जहां कहीं उनमें इस बात को लेकर संकोच होता था कि उनका ये संबंध अनुचित है वहीं अब सहमति से किया गया समलैंगिक संबंध उनमें नयापन तथा उनके रिश्तों में आत्मीयता ला सकेगा।

- हिमांशु जोनवाल

785, बरकत नगर टोंक फाटक,

जयपुर (राज.) 302015

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रचनाकार: दृष्टिकोण - समलैंगिकता : एक नई सोच - हिमांशु जोनवाल
दृष्टिकोण - समलैंगिकता : एक नई सोच - हिमांशु जोनवाल
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