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संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर-हिंडा” का अंक ८ “नीम का पेड़” लेखक - दिनेश चन्द्र पुरोहित

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संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर-हिंडा” का अंक ८ “नीम का पेड़” लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित “शिव कुमारजी, कैसी रही..?” “क्या कहना चाहत...

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संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर-हिंडा” का अंक ८

“नीम का पेड़”

लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

“शिव कुमारजी, कैसी रही..?”

“क्या कहना चाहते हो, आनंद कुमार? मैंने किसी का, क्या बिगाड़ा है?”

“हुज़ूर, कल करेले भेजे थे ना, आपके घर? जनाब, ख़ूब मेहनत करके उगाये थे करेले।” आनद कुमार ने अपने मुंह में पान की गिलोरी ठूंसकर, शिव कुमार से कहा “सोचा, इस करेले की पहली किश्त आपको चखाऊँ।”

“क्यों नहीं भेजोगे, भाई? एक तो है तुम्हारे करेले, ऊपर से नीम चढ़े..?” सुर्ती को होंठ के नीचे दबाकर, शिव कुमार बोले “यार, भेजते तो गुलाब हलुए वाले की दुकान गुलाब हलुआ मंगवाकर भेजते।”

“ख़ाक भेजूं गुलाब हलुआ, मधुमेह का रोग आपने अलग से पाल रखा है..बड़े जतन से...” तपाक से आनंद कुमार बोल उठे।

“हम नहीं खाते तो क्या हो गया, आनंद कुमार? कम से कम, हमारी श्रीमतिजी और बच्चे तो अरोगते। अहा..” कहते-कहते, अंगड़ाई लेते हुए शिव कुमार ने अपनी विशाल काया का पूरा वज़न कुर्सी पर डाल दिया। मगर, यह क्या? कुर्सी चरमराकर टूट गयी, और साहब नीचे आकर क्या गिरे? उन्होंने हाय-तोबा मचाकर, कार्यालय को सर पर उठा लिया। कुर्सी क्या टूटी, मानों शिवजी का धनुष टूट गया हो..? उसके टूटने की आवाज़ सुनकर, दफ़्तर का चपरासी द्वारका प्रसाद ज़ोर से कूका “लो चलो, आज़ एक कुर्सी शहीद हो गयी....न जाने अब इस कार्यालय की, और कितनी कुर्सियां टूटेगी..?”

clip_image003करेला एक तो वैसे ही कड़वा, और ऊपर वह नीम चढ़ा..और, वह भी हमारे आनंद कुमारजी के हाथों उगाया हुआ...? ऐसे करेले पाने के नसीब, बिरले को ही मिलते हैं। वैसे भी ऐसे लोगों की इस ख़िलकत में कोई कमी नहीं, जो अफ़सरों को ख़ुश करने के लिए पाली का गुलाब हलुआ छोड़ आगरे का पेठा उठा लाते हैं। इनसे तो हमारे आनंद कुमार, अच्छे इंसान ठहरे। जो अफ़सर को ख़ुश करने के लिए, करेले रुपी पकवान का भोग लगाकर अफ़सर की अनुकम्पा प्राप्त करते हैं। करेले का गुण-गान करते आनंद कुमार ने जतला दिया कि ‘उनके भेजे गए करेले, डायबिटीज की राम बाण औषधि है..बेचारे शिव कुमार ने कभी कह दिया था “खाने का शौक रहा न पीने का, अब तो डायबिटीज [मधुमेह] ने आ घेरा।” फिर क्या? करेले भेजकर उस दिन से आनंद कुमार ने रट लगा दी, जब भी साहब से उनकी मुलाक़ात होती और आनंद कुमार बोल उठते “साहब, कैसी रही?’ इस तकिया-कलाम को सुनते-सुनते बेचारे शिव कुमार उकता गए, और आख़िर उन्होंने सोच ही लिया कि “यार की यारी और उसकी उधारी खोटी।” अब तो इनका क़र्ज़ उतारना ही होगा। सौभाग्य से शिव कुमारजी को आख़िर मौक़ा मिल ही गया, एक दिन। इनको मिला, आदर्श विद्या मंदिर स्कूल से भोज का निमंत्रण। फिर क्या? उसे पाकर, वे आनंद कुमार से बोल उठे “भाई आनंद कुमार, तूने हमारी बहुत सेवा की, करेले खिला-खिलाकर। अब है मेरी बारी, अब तुम चलो आनंद कुमार..तुम्हें आदर्श विद्या मंदिर स्कूल के भोज का खाना खिलाएंगे..भरपेट लापसी खाना, वहां बैठकर। मैं तो ठहरा, डायबिटीज का मरीज़..वहां क्या खा पाऊंगा?” सुनकर, आनंद कुमार का मन मयूर नाच उठा। अब तो साहब को खिलाये गए, घर के नीम चढ़े करेले काम आये। अब सोहबत मिलेगी हमें, साहब के साथ रहने की। अब तो, हमारी चांदी ही चांदी। आदर्श विद्या मंदिर के भोज में दिखेंगे हम ही हम, साहब के पास। हमें साहब के चरणों में पाकर, विभाग के अध्यापक भाइयों को बोधीसत्व का ज्ञान हो जाएगा कि ‘चलो मिलो इनसे, ये हैं हमारे मिनी ई.एम. साहब शिव कुमारजी शर्मा के पी.ए. आनंद कुमारजी। ये ख़ुश तो हमारे मिनी ई.एम. साहब शिव कुमारजी भी ख़ुश..तो, फिर क्या? इनकी पूंछ पकड़कर क्यों न तबादला रुपी वेतरणी पार कर ली जाए।’ इस गूढ़ ज्ञान से, हर अध्यापक भाई लाभान्वित होगा। अत: नीम चढ़ा करेला ही, हर असाध्य काम की कुंजी है।

आनंद कुमार ने उस भोज में भर-पेट भोजन किया, फिर उन्होंने अपने पेट पर हाथ रखा और सोचा कि ‘अभी भी, पेट में जगह शेष है।’ फिर क्या? झट पान की डिबिया खोली, और एक पान की गिलोरी बाहर निकालकर झट अपने मुंह में ठूंसी। फिर, चल दिए कार्यालय की तरफ़। कार्यालय के गेट पर देखा, कटा नीम का पेड़..? जिसे रोज़ पानी पिलाकर उन्होंने इतना बड़ा किया कि, ‘वह गेट से आने-जाने वाले लोगों से, उनका नाम पूछने लगा ..?’ नाम पूछने से हमारा मफ़हूम है कि, आगंतुक अगर देखकर न चले तो इससे टकराने की संभावना सौ फीसदी बन जाया करती। संभालकर आगे नहीं बढ़े तो, इस पेड़ से टक्कर लगना जायज़ है। यह टक्कर इंसान को लगे या सरकारी जीप को, मगर टक्कर तो लगेगी ही..तभी उन्हें याद आया कि, ‘यह कमबख़्त श्योपत सिंह कई बार गेट पूरा न खुलने की शिकायत, उनसे क्यों कर रहा था?’ उनके दिल में विचार उठने लगा कि, “अरे, रामा पीर। इसी कमीने ने, मेरे नीम के पेड़ को कटवाया होगा..? हाय रामा पीर, यह क्या कर डाला, इसने? पूरा पेड़ ही कटवा डाला राम..राम। जो डाल रुकावट डाल रही थी, उसे ही कटवाता..मूर्ख।” मगर जब उनकी निग़ाह उस कटे पेड़ की लकड़ी पर गिरी, तो उनको याद आया कि अभी उन्हें समाज सेवक की तरह सामुदायिक भवन का दरवाज़ा बनवाना है। अब उनको यह मुफ़्त की लकड़ी, अच्छी लगने लगी। मगर रतन लाल की बात सुनकर, उनकी आशा पर घड़ो पानी गिर गया। रतन लाल चाय की केन्टीन वाले से कह रहा था कि, “भय्या ज़रा लोरी का प्रबंध करना, मैंने नीलामी में नीम की लकड़ी ख़रीदी है..उसे घर ले जाना है।” सुनते ही जनाब की भृकुटियां तन गयी, और दिल में विचार उठा “ऐसा कौन चूहा इस दफ़्तर में पैदा हो गया है, जो हमारी सत्ता को दे रहा है चुनौती? कहीं मेरी इस लंका में, कोई विभीषण पैदा हो गया..क्या? ऐसा कौन है, जिसने इस विभीषण को शरण देने का दुस्साहस किया है? आज़-तक, ऐसा नहीं हुआ..?” बस, फिर क्या? आनंद कुमार झट दफ़्तर में दाख़िल होकर, पोर्च में बैठे चपरासियों पर भड़क उठे “बताओ कमबख़्तों। मेरे इस प्यारे-प्यारे नीम के पेड़ को, किसने काटा..?” चारों तरफ़ श्मसान सी शान्ति छा गयी, मगर शोले न भड़क सके। तब बेचारे चुप-चाप बैठ गए अपनी सीट पर..मुंह लटकाए। और शिव कुमारजी को याद करने लगे कि, ‘यदि अभी वे यहाँ होते, तो मामला कुछ और बन जाता। हम उस लंका के विभीषण को, रंगे हाथ पकड़ लेते।”

कहते हैं भक्त के याद करने पर, स्वयं नारायण प्रकट हो गए..ऐसा गीता प्रेस गोरखपुर प्रेस द्वारा मुद्रित ‘सुख सागर’ नामक ग्रन्थ में, लिखा है। उसी तरह शिव कुमारजी स्वयं अपने शागिर्द के स्मरण करते ही, वहां अवतरित हो गए। जिस तरह गजराज के स्मरण करने पर, स्वयं चार भुजा नारायण प्रगट हो गए थे, उस काल रूपी मगरमच्छ से उसे बचाने के लिए..!

“क्यों मुंह लटकाए पड़े हो, किसके माईत मर गए?” होंठ के नीचे सुर्ती दबाते हुए, शिव कुमार बोल उठे ”पीछा नहीं छोड़ते हो, यार? बुला देते हो, बार-बार। अभी हज़ारों क्या लाखों रुपयों की खान का काम, छोड़ आया तुम्हारे लिए। अब बोल प्यारे आनंद, काहे चुप बैठ गया? बता, क्या समस्या आन पड़ी..?”

शिव कुमारजी को सदृश पाकर आनंद कुमार का मुख ख़िल उठा, मानों समुन्द्र-मंथन के बाद सुर-असुरों ने नारायण के मोहनी स्वरूप देखने का सौभाग्य प्राप्त कर लिया हो..? शिव कुमारजी को कुर्सी पर बैठाकर, वे उनके कान के पास मुंह ले जाकर फुसफुसाते रहे। इस तरह उन्होंने शिव कुमार को, दफ़्तर में घटित हुई घटना के बारे में जानकारी दे दी। साथ में इधर-उधर कनखियों से देखकर, तसल्ली भी कर ली – कहीं ड्राइवर श्योपत सिंह, उनकी वार्ता को न सुन लें?

clip_image003[1] “आपने, क्या किया? ऐसे बैठे रहे तो, कल ये नालायक चपरासी तुम्हारी लंगोट उतारकर ले जायेंगे..भाई आनंद कुमार।” शिव कुमार बोले।

“अब आपका ही आसरा है, बुरे दिनों में बराबर आपने मेरा साथ दिया है..अब मालिक ..” आनंद कुमार हाथ जोड़कर बोले “मुफ़्त की लकड़ी हाथ आ रही थी, और इस लकड़ी से सामुदायिक भवन के दरवाज़े बन जाते। मगर श्योपत सिंह नाम का कौआ, मुंह में आ रहे निवाले को छीनकर उड़ गया। अब हुज़ूर मात्र दरवाज़े की लकड़ी के लिए, न मालुम किस-किस से चन्दा मांगना पड़ेगा?”

“हम बैठे हैं ना, तू फ़िक्र मत कर..अब पहले यह बता ‘किसकी उपस्थिति में, यह नीम का पेड़ कटा?” शिव कुमार बोले।

शिव कुमारजी ने सारी बातें हृदयगम कर, अपने क़दम बढ़ा दिए ज़िला शिक्षा अधिकारी के कमरे की तरफ़। कुछ देर बाद, साहब के कमरे की घंटी बज उठी। साहब के कमरे के बाहर, एक बेंच रखी थी। जिस पर बैठा मोहना जमादार ने घंटी सुनी, मगर सुनते ही वह नालायक उठा नहीं..बस, झट लबों के बीच में दबी सुलगती बीड़ी को बाहर निकालकर हाथ में थाम ली। फिर अपने पहलू में बैठे जमादार अलाउद्दीन को, टिल्ला देते हुए कहा “जा रे, अलाउद्दीन। साहब बुला रहे हैं।” मगर, अलाउद्दीन कहाँ उठने वाला? निकट स्टूल पर बैठी चपरासिन कमला बाई को, उसने हुक्म दे डाला “बाईजी जाओ, साहब बुला रहे हैं।” फिर क्या? कमला बाई ने सोचा, ‘पास में और कोई चपरासी दिखाई दे गया, तो वह उसे साहब के पास जाने का हुक्म सुना देगी।’ मगर, वहां और कोई चपरासी होता तो कमला बाई उसे भेजती...साहब के कमरे के अन्दर...? तभी घंटी की तेज़ आवाज़ सुनायी दी, बेचारी कमला बाई को दौड़ते हुए जाना पड़ा....साहब के कमरे की ओर।

“कब से घंटी बज रही है, कहाँ मर गए सभी चपरासी?” बड़े साहब के बगल में बैठे शिव कुमारजी, ने डांट पिलाते हुए कमला बाई से कहा। वे चाहते थे, साहब की घंटी सुनकर ख़ुद श्योपत सिंह यहां आये? मगर, श्योपत सिंह आयेगा क्यों? वह ठहरा, जागीरदार। जिसके घर पर चार-चार हागड़ी काम करते हो, वह घंटी सुनकर कैसे आएगा। वह तो ख़ुद पैसों वाला ठहरा, इन चपरासियों जैसे आदमियों को अपने घर पर नौकर रखने वाला? यहाँ तो ज़िला शिक्षा अधिकारी के आलावा और किसी भी अधिकारी द्वारा गाड़ी मंगवाने पर, वह तीन बार ज़वाब भेज देता कि ‘ड्राइवर साहब गाड़ी में हवा भराने गये हैं, ड्राइवर साहब गाड़ी में डीज़ल भरवाने गये हैं या फिर चक्के का पंचर निकलवाने..!’ इस तरह उसकी ज़ेब में गाड़ी न ले जाने के, कई शासकीय पैबंद पड़े रहते थे।

इस दफ़्तर में हर-पल घटित होने वाली घटना की जानकारी रखने वाला श्योपत सिंह, पाली के मशहूर सी.आई.डी. खींव सिंह से कम नहीं। वह तो इस वक़्त खाज़िन हरी प्रसाद के कमरे की खिड़की के पास लगी पत्थर की बेंच पर लेटा आराम कर रहा था, आँखे बंद होने के बाद भी उसके ज्ञान चक्षु खुले थे। जो दफ़्तर के लोगों की, गतिविधियों पर बराबर ध्यान दे रहे थे। तभी द्वारका प्रसाद कमरे में दाख़िल हुआ, और बोला “जागीरदारों, जाओ साहब के पास। जाकर अपना पक्ष प्रस्तुत कर दीजिये, ना तो शिव कुमारजी खोद देंगे आपकी क़ब्र।”

“बहुत देखे है रे, ऐसे...अब तू सुन ले, हमारी क़ब्र वही खोद सकता है..जिसके पास होगा, डेड फुट का क़लेज़ा।” आँखें खोलकर श्योपत सिंह ने, झट दे मारा ज़वाबी गोला और चल दिए...!

दफ़्तर का गलियारा पार करते हुए, उसकी मुलाक़ात हो गयी अतिरिक्त ज़िला शिक्षा अधिकारी प्रेम पालजी से। वे इसे देखकर, कहने लगे “श्योपत, मैंने सारा मामला सुलझा दिया। अब तुझे बड़े साहब के कमरे में जाने की कोई ज़रूरत नहीं। साहब से कह दिया है, मैंने...कि, यह शातिर लोगों की शिकायत है – जिन्होंने मुफ़्त में, नीम की लकड़ी पार करने मंसूबा बना रखा था। बस उसी वक़्त तुम जा पहुंचे वहां, और सरकारी बोली से ऊपर ‘तीन सौ एक’ की बोली रतन कुमार से बोलाकर, पानी फेर दिया इनके मंसूबे पर।

प्रेम पालजी ने भौंओ पर चढ़े ऐनक को निकालकर, उसके ग्लास रुमाल से साफ़ किए...फिर, वे श्योपत सिंह से बोले “कह दिया मैंने आगे कि, ‘वे चाहे तो इससे ऊपर की बोली बोल देवे, जो ऊँची बोली बोलेगा उसे रतन लाल को नीम की कटाई करने की मज़दूरी पच्चास रुपये अलग से देने होंगे।’ यह सुनकर, शिव कुमारजी का मुंह इतना सा हो गया। क्या कहूं, तूझे? कोई तैयार नहीं हुआ, आगे बोली बोलने।”

“जीतो रहो, मालिक। बस, आपकी हम पर कृपा रहे। और, हमारा गाड़ा गुड़ाकता रहे बेफ़िक्र।” श्योपत सिंह ने ख़ुश होकर कहा। इस प्रकार प्रेम पालजी की ख़ुशामद करके श्योपत सिंह चल दिए, दफ़्तर के बाहर..चाय की केन्टीन पर। वहां स्टूल पर बैठा, रतन लाल मुंह से सुड़क-सुड़क की आवाज़ निकालता चाय पी रहा था, जैसे ही उसने श्योपत सिंह को देखा..वह झट उसको सम्मान देते हुए, स्टूल से उठकर खड़ा हो गया।

“बैठ रतन, सब ठीक हो जाएगा। अब ला सिगरेट, फिर खोलता हूँ ख़बरों का पिटारा।” पास पड़े स्टूल पर बैठता हुआ, श्योपत सिंह बोला। रतन कुमार ने झट, रेड एंड वाइट किस्म की सिगरेट का पैकेट और माचिस की डिबिया उसके हाथ में थमा दी। फिर श्योपत सिंह ने सिगरेट सिलागाकर, एक लंबा कश खींचा...फिर फ्ल्मि स्टाइल से डाइलोग बोला “देख रतन, यह धुए का बादल कतनी देर ठहरता है रे..? बस तेरा लंकेश भी इतना ही, हमारे सामने...”

“जागीरदारों, आख़िर मामला है क्या? आप इनसे क्यों उलझते हैं? पहले इनको छेड़ते हैं, फिर देते है इनको मात..बाद में कर देते हैं इनको माफ़। आख़िर, माज़रा क्या है?” रतन लाल बची हुई चाय का अंतिम घूँट पीकर बोला।

“दुनिया बड़ी ज़ालिम है रे, रतन। तरह-तरह के हथकंडे अपनाने पड़ते हैं, जीने के लिए। न तो ये ज़ालिम, कब मसलकर रख दे हमें।” सिगरेट का एक लंबा कश खींचकर, श्योपत सिंह ने धुए के छल्ले बनाते हुए कहा “मुझे तो भय्या, मज़हाक़ करना पसंद है। सामने वाला इसे पसंद ना करे और खीज़ जाए, तो उसे मैं और छेड़ता हूँ...बस, हमारी तो यही अदा है। अरे रतन, पेट में पाप रखने से यह ज़िंदगी काटनी मुश्किल हो जाती है। भय्या, यह ज़िंदगी दो दिन की..बस, इसे हंसते-हंसते गुज़ारो।” सुनकर रतन को कुछ पल तो ऐसा लगा कि, उसके सामने श्योपत सिंह नहीं बल्कि सुपर हीरो राजेश खन्ना की आत्मा बोल रही है।

सिगरेट के जलते-जलते, उसका अंतिम छोर आ गया – श्योपत संह ने उस बचे टुकड़े को, ख़ाकदान में डाल दिया। फिर रतन लाल के कंधे पर हाथ रखकर, कहने लगा “रतन, अब चलता हूँ। लंका नगरी के लंकेश को भी देखना है, यार। देखता हूँ, आज़ फेंके गए दिव्य अस्त्र ने क्या कमाल कर दिखाया? चलकर, देखते हैं।”

श्योपत सिंह के जाने के बाद रतन के बगल में बैठा अध्यापक शिव चरण चाय का ख़ाली कप नीचे रखता हुआ, रतन से बोला “जनाब क्या बात है, जागीरदारों का मिज़ाज़ ठीक तो है?”

रतन लाल मुस्कराकर, उससे बोला “गुरु, चपरासी और ड्राइवर की पोस्ट क्या होती है? सबकी नज़र में दो टके की....जानते हो, गुरु? दो टके की पोस्ट वाले कभी-कभी बड़े अफ़सरों को डाल देते है, चक्कर में।” शिव चरण उसकी बात सुनकर, अवाक होकर उसका मुंह देखता रह गया। और इधर, रतन कुमार ने क़दम बढ़ा दिए.. दफ़्तर में दाख़िल होने के लिए। श्योपत सिंह जैसे ही पोर्च में दाख़िल हुआ, और उसे आनंद कुमार वहां सीट पर बैठे दिखाई नहीं दिए। उनकी सीट ख़ाली थी, और उधर बेंच पर बैठी कमला बाई एक आगंतुक मास्टर से कह रही थी “जनाब आप तशरीफ़ आवरी होवें, हेड साहब अभी लघु-शंका निवारण के लिए गए ही हैं। फ़िक्र कीजिये मत, वे आ ही रहे हैं।” फिर क्या? अब श्योपत सिंह का यहाँ रुकने का कोई सवाल नहीं, जनाब चल दिए युरीनल की तरफ़..जहां युरीनल के सामने टेबल पर चक्रांकित की मशीन के पास खड़ा द्वारका प्रसाद, बड़बड़ा रहा था “बैंगन हो तो आनंद कुमारजी का, नहीं तो बैंगन नहीं..होगी कोई मूंगफली..!”

“क्या बक रहा है, मुर्गे? ठहर तो...” युरीनल से बाहर निकलते हुए आनंद कुमार ने उसका बड़बड़ाना सुनकर, तल्ख़ आवाज़ में कहा।

“नहीं हुज़ूर, मैं आपकी शान में ऐसी गुस्ताख़ी नहीं कर सकता। मैं तो हुज़ूर आपके चरणों का दास हूँ, मैं तो बेचारा आपके बगीचे में लगे बैंगन की शान में कशीदे पढ़ रहा था। क्या लम्बे-लम्बे बैंगन हैं...” कातर स्वर में, द्वारका प्रसाद बोला।

“चुप रह, बहुत ज़्यादा बकवास करता है? जा, काम कर अपना। इतना कहकर, आनंद कुमार वहां से चल दिए। फिर उधार ली हुई कार्यालय अधीक्षक की कुर्सी पर बैठकर, सोचने लगे “मेरी लंका की चारदीवारी क्यों हिल रही है? जो लोग मुझे देखते ही चूहे बनकर, दुबक जाते थे अपने बिलों में। आज़ वे ही अपने बिलों से बाहर निकलकर, कुत्तों की तरह भौंकने लगे? ऐसा लगता है यह द्वारका रुपी चूहा, लंका में सुरंग बनाकर उसे खोखली करता जा रहा है..?” इस तरह सोचते-सोचते, बेचारे आनंद कुमार खिन्न नज़र आने लगे। उनको खिन्न देखकर, मोहना जमादार बीड़ी का आख़िरी कश खींचकर बोला “सारा खेल चौपट हो गया...जल गया रोम।”

सका कथन सुनकर, आनंद कुमार आपे से बाहर होकर उसे फ़टकारते हुए बोले “तब, तू क्या करता रहा? बंशी बजा रहा था, क्या? कमबख़्त...अपने आपको रोमियो समझता है, रोम का?”

“हुज़ूर, यह रोमियो बीड़ी पीता रहा।” मुस्कराता हुआ मोहना बोला “आज के रोम में, बंशी है कहाँ? बीड़ी ज़रूर है, वही बीड़ी पीता रहा। हुज़ूर, आप फ़िक्र न करें। हुज़ूर अब इस दफ़्तर के नीम को छोड़िये, आप कहे तो आपके बगीचे में लगे शानदार नीम के पेड़ को काटकर, उसकी लकड़ी आपके सामने पेश कर दूं?” ज़राफ़त से, मोहना बोला।

“नासपीटे, तू मेरा नीम काटेगा? तेरी यह हिम्मत? कमबख़्त, तूने मेरे बगीचे के आलू खाए, बैंगन खाए और रतालू का भोग लगाया..फिर भी तेरा पेट भरा नहीं? अब तू मेरे नीम को, बुरी नज़र से देखता है? चल अब तूझे खिलाऊंगा, चटनी नीम की पत्तियों की..समझा, कमबख़्त?” आनंद कुमार क्रोधित होकर, बोले।

“नीम की पत्तियों की चटनी, आपको मुबारक। हम तो ठहरे..” मोहने ने अपना अंगूठा मुंह तक ले जाकर, कहा “रोज़ दारु की बोतल पीने वाले। शायद, यह बात आपको याद आ जाए तो...भंग का गोला चढ़ाने के बाद..? तब उस्ताद, मेरे लिए भी दारु की एक बोतल की व्यवस्था कर दीजिये। फिर क्या? उस्ताद और शागिर्द दोनों साथ बैठेंगे, आप पीयेंगे भंग और मैं चढ़ाऊँगा दारू..अपनी हलक में।” वाक पटु मोहना बोला, अब वह उनसे डरने वाला कहाँ? दारु के नशे में उसने यह ज़वाब दे मारा, आख़िर उसका क्या गया? नीम की लकड़ी, उसे घर ले जानी नहीं। बोतल दारु की मिलती होती, तो बात अलग थी। मुफ़्त की लकड़ी पाने के आतुर आदमी जाने, उसको क्या? उसे लकड़ी ले जानी नहीं, तो फिर वह क्यों अपनी दिलचस्पी दिखलाता? वह अब्दुला तो था नहीं, जो बेगानों की शादी में नाचता फिरे। कई देखे उसने, इस पोस्ट पर कई आदमी आये और चले गए। अब उसको बोधिसत्व का ज्ञान हो आया कि, “आज़कल जिसकी चवन्नी चलती है, उसी से लोग सम्बन्ध बनाए रखते हैं”....इस व्यवहारिक बात को समझता हुआ, मोहना चल दिया बाहर। अब उसको कटे नीम के खड्डे को, समतल जो करना था।

तभी टेलिफ़ोन की घंटी बज उठी। आनंद कुमार ने सोचा कि, ‘शायद यह फ़ोन, उनके जान-पहचान के किसी ज़रूरतमंद अध्यापक का होगा?’ यह सोचकर, वे तपाक से उठे और जा घुसे स्टेनो राजेन्द्र कुमार राका के कमरे में। मगर उनके आने के पहले वहां बैठे राजेंद्र कुमार ने फ़ोन का चोगा उठा लिया, और वे फ़ोन पर कह रहे थे “हेलो। सुन लिया भाई, इस दफ़्तर में आनंद कुमार नाम के कोई कार्यालय अधीक्षक नहीं है। कृपया, फ़ोन रख दीजिये।” इतना कहकर, राजेंद्र कुमार ने चोगा क्रेडिल पर रख दिया।

“यह क्या? फ़ोन कैसे रख दिया? मैं यहाँ खड़ा हूँ, ना..? क्या, आपको नज़र नहीं आ रहा हूँ?” आनंद कुमार गुस्से में बोले।

“हुज़ूर, हमने सत्य ही कहा है, इस तरह आपने भी एक बार फ़ोन पर ऐसे ही कहा था कि, ‘इस दफ़्तर में कोई राजेंद्र कुमार राका नाम के पी.ए. नहीं है’ याद आया, आपको? इस तरह आपने भी मेरी तरह सौ फीसदी सत्य कहा था..हुज़ूर, हम पी.ए. कहाँ? हम तो स्टेनो हैं ना? इसी तरह आप भी कार्यालय अधीक्षक नहीं, कार्यालय सहायक ज़रूर हैं।” इतना कहकर, राजेन्द्र कुमार राका टंकण कार्य करने में व्यस्त हो गए। फिर क्या? बेचारे आनंद कुमार मुंह लटकाए, आकर बैठ गए वापस..कार्यालय अधीक्षक की कुर्सी पर, जिस पर बैठने का उनको कोई हक़ नहीं था। इस कुर्सी पर पहले पीरा राम कार्यालय अधीक्षक बैठा करते थे, मगर उनके सेवा निवृत होने के बाद यह पद विभाग द्वारा भरा नहीं गया। तब से इस ख़ाली सीट पर, आनंद कुमार ने अपना क़ब्ज़ा जमा लिया। इसमें उनकी कोई ग़लती नहीं, यह तो इंसान की फ़ितरत है वह हमेशा सत्ता के नज़दीक रहने की कोशिश करता रहा है। इस कुर्सी पर बैठकर दफ़्तर के बाबूओं पर हकूमत चलाई जा सकती है, यहाँ बैठकर हाज़री रजिस्टर, यात्रा रजिस्टर, मूवमेंट रजिस्टर वगैरा रजिस्टरों पर इनका नियंत्रण बना रहता है। यही कारण है, यह कुर्सी सत्ता का अहसास कराती है। उसी सत्ता से कार्यालय रूपी लंका नगरी पर शासन कर, लंकेश कहलाने का अपना अलग महत्त्व होता है। कुछ रोज़ पहले राजेन्द्र कुमार के किसी रिश्तेदार का फ़ोन आया था, उस वक़्त राजेंद्र कुमार युरीनल गए थे..लघु-शंका का निवारण करने के लिए। पीछे से हमारे लंकेश महोदय ने फ़ोन का चोगा उठा लिया। उन्होंने सुना कि, “जनाब, कार्यालय के राजेंद्र कुमारजी पी.ए. साहब आये होंगे..? आये हो तो, आप उनको बुला दीजिये।” सुनकर, आनंद कुमार ने फ़ोन पर कह दिया “अरे जनाब, इस दफ़्तर में राजेन्द्र कुमार नाम के कोई पी.ए. नहीं है।” फिर युरीनल से लौटते राजेंद्र कुमार को अलग से कह दिया, कि “आप तो स्टेनो हैं, पी.ए. तो है नहीं। राजेंद्र नाम के पी.ए. का फ़ोन आया था, हमने यह कहकर फ़ोन रख दिया कि इस दफ़्तर में राजेंद्र कुमार नाम के कोई पी.ए. नहीं है।” उस वक़्त तो राजेंद्र कुमार कुछ बोले नहीं, और सोच लिया कि ‘हमारा भी वक़्त आएगा, तब..” और अब रामा पीर की कृपा clip_image004 से, मौक़ा आया और राजेंद्र कुमार ने मार दिया नहले पर देहला। कहते हैं ‘सौ सुनार की, और एक लुहार की।’ वक़्त बीतता गया, पोर्च की दीवार पर लगी घड़ी ने दिन के तीन बजने का संकेत दिया। डाक ख़ाने से जो डाक आयी थी, वह डाक राजेंद्र कुमार की टेबल पर रखी थी। ज़िला शिक्षा अधिकारी के हुक्म से, राजेंद्र कुमार को डाक खोलकर उस पर मार्किंग करनी थी। ताकि, डाक सम्बंधित लिपिकों के पास भेजी जा सके। ऐसे वक़्त श्योपत सिंह का वहां हाज़िर होना, कोई नयी बात नहीं। जैसे ही निदेशालय बीकानेर की डाक खुली, और उसे देखकर राजेंद्र कुमार आश्चर्य चकित होकर बोले “जागीरदारों कमाल हो गया, बेचारे आनंद कुमार ने ने माँगा कार्यालय अधीक्षक का उपवेतन। मगर, मिल गयी लताड़ ‘बिना अनुमति लिए किसको बैठाया है, कार्यालय अधीक्षक के पद पर? तत्काल उन्हें कार्यमुक्त करके वहां भेजा जाय जहां कार्यालय सहायक का पद रिक्त हो। भविष्य में इस कार्यालय की अनुमति लिए बैगर, किसी भी पद के विरुद्ध किसी का वेतन उठाया न जाय।’ अब बोलो, जागीरदारों। क्या किया जाय? छोड़ दिया जाय, या मार दिया जाय? बोलो, इनके साथ क्या सलूक किया जाय?”

अरे छोडो, पी.ए. साहब। रहने दिया जाय, कहीं से उठा लेंगे इनका वेतन। बहुत सबक मिल गया अब-तक, इनको। आख़िर, हमें भी तो खिलौना चाहिए..खेलने के लिए। जनाब आनंद कुमार चले गए तो, हम किसके साथ खेलेंगे? फिर दफ़्तर के दूसरे गेट के पास लगा है नीम का पेड़, उसको भी तो कटवाना हैं...करेंगे खेल, हो जाएगा हमारा टाइम पास। आख़िर, ड्राइवरों का टाइम पास का साधन यही है...नीम का पेड़।” इतना कहकर, श्योपत सिंह दफ़्तर के गेट की तरफ़ चल दिए।

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रचनाकार: संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर-हिंडा” का अंक ८ “नीम का पेड़” लेखक - दिनेश चन्द्र पुरोहित
संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर-हिंडा” का अंक ८ “नीम का पेड़” लेखक - दिनेश चन्द्र पुरोहित
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