370010869858007
Loading...

नया साल आया - संध्या चतुर्वेदी की कविताएँ

संध्या चतुर्वेदी

नया साल  आया
खुशियां अपार लाया।।

बड़ों का आशीष
छोटो को प्यार,

मिलकर बजाये साज।
ऐसे मनाये नववर्ष आज।

ना रहे कोई दुःखी
सब के घर आये खुशी।

भूखा ना कोई सोये,
अबला ना कोई रोये।।

रहे समृद्धि और खुशहाली
आली नववर्ष आली।।

हो देश की खूब तरक्की।
आगे बढे मिले प्रगति।।

हर दिल में प्यार बढ़े
नफरत का बीज मिटे।

लोगों को नई राह मिले।
सब के चेहरे खूब खिले।।


---

सर्दी की सर्द रातों में
जो गर्म अहसास दे
उसी को प्यार कहते हैं।
जब कोहरा घना छाया हो
गमों का और उस की
एक मुस्कान से मन
में नई स्फूर्ति आ जायें,
उसी को प्यार कहते हैं।
रोये अगर वो अपने
आँसुओं को छिपा कर और
आँखे तुम्हारी छलक जाये ,
उसी को इजहार कहते हैं।।
दूर कभी जब मन उदास हो
उस का और अहसास तुम्हें हो जाये,
इसी को प्यार कहते हैं।।
जब भी कोई मधुर संगीत
  सुनाई दे कानों में और
दिल पर उसी का नाम आ जायें,
इसी को प्यार कहते हैं।।
हो मशरूफ तुम अपने ही कामों में
  और पैगाम उस का आ जायें,
लगता हैं कुछ ज्यादा ही बिजी हो आज,
  इसी को प्यार कहते हैं।
रूठ कर तुम बैठो और वो बोले
रूठ कर अच्छी नहीं लगती,
मुझे तो मुस्कुराती ही जंचती हो।
इसी की प्यार कहते हैं।।
प्यार को जब प्यार से
प्यार हो जाये,खुशी चौगनी
जब यार हो जाये।
ना दिन का भान हो,
ना रात की खबर लगें।
इसी को प्यार कहते हैं।।


--

एक दीवाली ऐसी भी।


दीवाली खुशियों का त्योहार है।
चलो सब मिल दीप जलाओ
गरीब कुम्हार का घर में भी
थोड़ी सी खुशियां दे आओ।

दिल से सारे बैर भुलाओ।
दुश्मन को भी हँस के गले लगाओ।
कोशिश करो कि अंधियारा दूर हो।
द्वेष और ईर्ष्या मिट जाये दिलों से।

सारे कष्ट दूर हो जीवन से।
ना हो कोई कष्ट काया का
ना हो कोई दुःखी माया का
हिलमिल के सारे त्यौहार मनाओ।

चलो आज सब  मंगल गाओ।
नयी ताजा मिष्ठान बनाओ।
योगी जी राम का अभिषेक करेंगे।
अयोध्या नगरी सज रही है।
सरयू किनारे दीप जल रहे।

हो इस बार प्रदूषण मुक्त दीवाली
हम सब मिल कर प्रयत्न कर रहे।
ना हो ज्यादा ध्वनि प्रदूषण।
ना हो ज्यादा वायु दूषित।

स्वच्छ और सुंदरता का
हो चारों ओर आव्हान।।

-----------


नन्ही सी जान हूँ मैं
माँ तेरा ही अंश
तेरी ही पहचान हूँ मैं

ना देख मुझे यूँ घृणित नजरों से
तेरे प्यार का ही परिणाम हूँ मैं
ना फैंक मुझे यूँ तू कूड़े में

नहीं करुँगी परेशान तुझे मैं
रहने दे आँचल की छाँव में
मत मार मुझे तू कोख में

जननी है तू जन्म तो दे
मजबूर नहीं तू इतना भी
अपने वंश की नहीं तो
अंश की तो ले जिम्मेदारी।

बोझ नही बनूंगी माँ मैं तुझ पर
करुँगी पूरी हर जिम्मेवारी
नहीं झुकने दूँगी सर तेरा मैं
हँस कर सारे दर्द सहूँगी।।

माँ मैं भी तेरा ऊँचा नाम करुँगी।।
---.


तेज रेत सी तपती हूँ मैं,

एक कतरा पानी का जो मिल जाये।
ये अगन प्यासे दिल की जो बुझ जाये।
 
हो तुम मेरी जलती हुयी काया के सागर।
इस रेत से जलती हुए बदन को

दो बूँद पिला जाना।
है प्रणय निवेदन की

तुम एक बार तो
मिलने आ जाना।

देख रही हूँ रास्ता कब से
दिल की प्यास बुझा जाना।

सागर की तरह तुम मुझ को
खुद में समा जाना।

नहीं चाहती हूँ मैं कोई
अस्तित्व हो मेरा तेरे बिन।

तुम बन के सागर रेत में मिल जाना।

हो जाएगी जन्मो की तलाश पूरी,
मिट जाएगी प्यास ये पूरी।।

--


नाम-संध्या चतुर्वेदी
निवासी- मथुरा
शिक्षा -स्नातक
साहित्यिक हिंदी
लेखन -दो साल से विभिन्न अखबारों, पुस्तकों पत्रिकाओं में प्रकाशन।
तीन सांझा संकलन प्रकाशित हो चुकी हैं।
सांझा सँग्रह शीघ्र आने वाला है।

कविता 7310767378702151232

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

emo-but-icon

मुख्यपृष्ठ item

कुछ और दिलचस्प रचनाएँ

फ़ेसबुक में पसंद करें

---प्रायोजक---

---***---

ब्लॉग आर्काइव