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चुभ रहे हैं आज भी // कविताएँ // गौतम गोविन्द

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कविता न०- 1.

।। चुभ रहे हैं आज भी।। 

अपनों ने दिए जख्म कुछ , चुभ रहें हैं - आज भी।
है शान्त कुछ , बंद कोने में,
और कुछ तड़प रहे हैं - आज भी।
अपनों ने दिए जख्म...
कुछ को तो अश्कों ने सम्भाले,
कुछ और , शायद , मचल रहें हैं - आज भी।
अपनों ने दिए जख्म...
ये तोहफ़ा , है अपनों का,
दिखाऊं कैसे , किसी को,
छुपा है कई शिकवे , दिल में मेरे - आज भी।
अपनों ने दिए जख्म...
खामोश हूँ , देख के फितरत उनका,
मेरे दिल में शोले , जल रहें हैं - आज भी।
अपनों ने दिए जख्म...
उन्हें क्या? मेरे गमों से मतलब,
दबा है दर्द कितना , दिल में मेरे - आज भी।
अपनों ने दिए जख्म...


                        - गौतम गोविन्द
                  

कविता न०-2.

बनना है कुछ तो, बनाए रख आत्मबल।
डर मत किसी से, तू बस एक काम कर,
बनाए रख "आत्मबल" बनाए रख "आत्मबल"।
कौन हरा सकता है तुझे, भला,
गर खायी है, कसम मर मिटने का।
वक्त भी देता, साथ उसका,
जो ठान लिया कुछ कर दिखाने का।
करना है कुछ, तो बस एक काम कर।
बनाए रख "आत्मबल" बनाए रख "आत्मबल"।
सोने नहीं देती सपना, जिसे,
उसे भला, क्या 'निशा' सुलाएगी।
जो डटा है बनने को 'कुन्दन'
'पावक' उसे, क्या जलाएगी।
उठता रहा जो, खाकर बार-बार ठोकर,
भर के 'जूनून' चला वही, मंजिल की राह पड़।
बढना है गर तुझे, तो बढाए रख आत्मबल।
बनाए रख "आत्मबल" बनाए रख "आत्मबल"।
ठोकरें है 'गुरू' तेरा, तो दुनिया क्या सिखाएगा,
उठा है 'धुआँ' राख से, वह आसमां तक, जाएगा।
'मंजिल' है आसान, रख तू दिल में हौसला,
भटक मत, डगर पे बस तू चलता जा।
पाना है मंजिल तुझे, तू ' एक ' काम कर,
बनाए रख "आत्मबल" बनाए रख "आत्मबल"।
बढ़ता जा तू , 'अविचल' होकर, डरना नहीं 'तूफानों' से।
भरे पड़े  हैं "इतिहास के पन्ने", ऐसे "वीर-महानों" से।
'है दम' तो बढ़के आगे, तू हुंकार भर,
होगी तेरी "मुट्ठी में दुनियां" बस तू ये काम कर।
बनाए रख "आत्मबल" बनाए रख "आत्मबल"।
                         - गौतम गोविन्द

कविता न०-3.

है परेशान क्यों?
ऐ मेरे दिल,
लेकर किसी की याद को।
कल तक थी महफिल यहां,
आज तड़प रहा साथ को।
करना वफा किसी से,
है नहीं मुनासिब यहां।
करते है सिद्ध लोग ,
बस यहां अपने स्वार्थ को।
है परेशान क्यों........
जीवन एक पथ है ,
और है तू इसका पथिक।
थक गया? बस!
         अरे!
ये तो पहली चढ़ाव है।
माना पथ है थोड़ा विकट,
और अन्जाना पड़ाव है।
इस पार भले हो धूप,
            मगर,
उस पार तो ठंडी छांव है।
क्यों कोस रहा तू हार को,
           चल आगे,
भर तू अपने हूंकार को।
है परेशान क्यों........
ये तो सिर्फ कांटें हैं जीवन के,
चलना है तुझे अंगारों पे।
यूं ही नहीं खिलते चमन,
जीवन में प्यार के।
रहना नहीं तुझे मूक बनके,
बूलन्द कर तू अपनी आवाज को।
है परेशान क्यों........
कहीं देखा है?
रुकते हुए भला कभी,
नदियों के बहाव को।
हासिल कर बढ़के,
जीवन के हर्षो-उल्लास को।
है परेशान क्यों........

कविता न०-4.

बयां करूं क्या दिले हाल अपना,
बस चोट खाये हुए हैं।
अपनों की भरी महफिल में,
गले तन्हाई लगाये हुए हैं।
बयां करूं क्या दिल.....
फिकर मत करो यारों,
ये तो खुदा का मंजर है।
जुबां पे सरगम हाथों में खंजर है।
तारीफ करुं मैं किसकी,
किसकी शिकायत करूं।
बारी-बारी से सबसे
आजमाएं हुये हैं।
बयां करूं क्या दिल.....
तोड़ा किसी ने दिल अपना,
किसी ने मरहम लगाया।
सबने खेलने का यहां,
भरसक कोशिश है दिखाया।
खिलौना बना हूँ,
मैं यहां अपनों के मेले में।
जी भर के खेला सबने,
कोई मेले में कोई अकेले में।
गिला नहीं किसी से,
रंग हसीं का लगाये हुए है।
बयां करूं क्या दिल.....
रूपये-पैसों की बनी ये दुनिया,
जज्बातों का यहां कोई मोल नहीं।
ए खुदा, गजब तेरी दुनिया
इसका कोई जोड़ नहीं।
बन्दे मांगते है तुम्हीं से,
तुम्हीं को चढ़ाते हैं।
लगी है होड़ रिश्वत कि ,
यहां हरेक दफ्तर में।
न जाने मुझे हुआ है क्या ,
बेगानों को अपना बनाए हुए हैं।
बयां करूं क्या दिल.....
- गौतम गोविन्द

कविता न०-5.

सबसे छुपा कर,
होकर सबसे तन्हा।
दबा रखा था,
दिल के इक कोने में-
वह कुछ सपना।
कितनी ख्वाहिश होगी,
दिल में उसके।
जाने कितने रंगो से,
सजाये होंगे वो सपने।
भला कौन है?
जो टाल सका अनहोनी को।
जो उससे टल जाती?
टूट पड़ा पहाड़ जैसे,
दुःखों का एक साथ।
टूट गये उसके
सारे सपने।
कितनी खुशियाँ थी -
जीवन में उसके,
बिखर गये सब।
बचा रखा था जो कुछ,
वह लूट गये सब।
कितनी तकलीफ
हुई होगी उसे।
जब आया होगा,
हवा को चीर के कानों में
उसके वह शब्द।
जो नहीं सोचा था,
कभी उसने।
खिसक गया होगा,
जमीं पैरों तल्ले से।
लगी तो होगी जरूर,
उसे जोड़ों कि प्यास।
झट से बैठ गया होगा,
सर पे हाथ रख कर वह।
सोचता तो होगा,
काश मिलता मुझे भी-
किसी का साथ।
बहुत दिया धोखा,
जमाने ने उसको।
वक्त भी रूठा हुआ उससे,
पड़ा था एक कोने में।
लहु-लुहान थी,
उसकी आत्मा।
पड़ अटूट था-
विश्वास उसका,
जो जीवित था अब तक।
और साथ था ही कौन?
अरे कहाँ!
मानने वाला था वह।
गिरता फिर उठता,
था लड़खड़ाता-
पड़ चला जा रहा था।
सजा रखा था,

वर्षों से जो तमन्ना-
वो थकने कहां देती थी उसे।
लेकिन कब तक?
आखिर थक गया,
वह चलते-चलते।
सह नहीं सका और बोझ,
वह जिम्मेदारी का।
धराशायी हो गया,
वह धरा पड़।
नहीं आएगा अब वह,
वापस यहाँ तड़पने।
चला गया दूर बहुत दूर,
मौत के आगोश में।
                    - गौतम गोविन्द।
             

कविता न०-6.

अकेले बैठे-बैठे
मन में
अकेलापन छा जाता है।
तब
कुछ खास
आभास होता है।
जिस्म पड़ जैसे
हवा का झोंका छेड़ रहा हो।
जैसे प्रकृति
अपने पास आने का
इशारा कर रहा हो।
हिला-हिला कर हाथ अपना
इंद्रिय झंकृत हो रही है।
वर्षों बाद
शान्ति,खुशी,
और
अपनापन
महसूस कर रहा हूँ।
पड़ सता रहा है,
वह वृक्ष,
वो पत्ते,
वो नदी,और वह किनारा।
जहां घंटों बातें होती,
अकेले।
याद आने लगी अपना गाँव,
वो गली,
वो मन्दिर,
और वह बरगद पुराना।
हां अच्छा लगता था,
बैठना अकेला।
खो गया सब,
बची शेष बस यादें,
आह!
तरुवर की ठंढी छाया
मीठा पानी,
दृश्य,
अति प्यारा।
कोई चले,ना चले
पड़ चलता है वक्त
अपने रफ्तार से।
हम कहां आ गये?
गाड़ी कि रफ्तार से।
पिछे, छूट गई,
वो, लहलहाते खेत,
सुहानी हवा,
गंगा का निर्मल जल।
कहां गया?
हमारा बीता कल।
कूदते-फांगते,
हवा को चीरते
आ गया ये,
चकाचौंध,
भयावह पल।
आह!
वो सुहाना पल,
बीता हुआ कल।
                - गौतम गोविन्द।

कविता न०-7

ढ़ूंढ़ता रहा हूँ मैं,वो बीते पल।
वो मस्तियाँ,वो बचपन।
सफर था सुहाना,थी मदहोशियाँ।
ना कोई मंजिल,ना कोई गम।
ढूँढ़ता रहा हूँ मैं....
सासों से बन्धी,थी वो यारियां।
लड़ते-झगड़ते,पड़ कभी होती ना दूरियां।
थे साथ हम,बन हम सफर।
कहां गये वो जाने चमन।
ढूँढ़ता रहा हूँ मैं....
पलके,बिछाए रखा हूँ अपना।
रैनों में,मिलने का आता है सपना।
खफा है अभी भी,वो शायद।
तड़पता है फिर भी,मेरा पागल मन।
ढूँढ़ता रहा हूँ मैं....
                    - गौतम गोविन्द

कविता न०-8.

ओ पैसेवाले,

      पैसे पे,

  न गुमान कर।

पैसा-पैसा,पैसा,

ये माया का जाल है।

पैसा है पर देख तू,

फिर भी कंगाल है।

पैसे का खजाना तेरा,

रखे-रखे सड़ जाएगा।

   पड़ किसी का

दो वक्त कट जाएगा।

भगवान ने दिया पैसा तुझे,

     नेक काम कर।

     जग में अमर तू,

    अपना नाम कर।

      ओ पैसेवाले,

          पैसे पे,

      न गुमान कर।

                 - गौतम गोविन्द

कविता न०-9.

देखा है, करीब से तुझे...
ए जिन्दगी बदलते हुए।
जो साथ चले कभी...
उन लम्हों को देखा है, फिसलते हुए।
डरता हूँ ,फिसल ना जाऊँ कहीं,
अन्धेरी राहों में यूं बढ़ते हुए।
देखी है बहुत हमने,
वक्त की मार चलते हुए।
देखा है करीब से तुझे...
ए जिन्दगी बदलते हुए
ना चांद बदले ना तारें बदलें,
पर बदल गये वो...
जो थे कभी साथ, चलते मेरे।
कांप उठता है मेरा रूह देख कर,
किसी का घर उजड़ते हुए।
देखा है करीब से तुझे...
ए जिन्दगी बदलते हुए।
मैं रहूँ ...ना रहूँ ....
दिलों से जुड़ा तेरा याद रहे।
यादे हटे नहीं दिलों से कभी,
सदा नया कोई पैगाम रहे।
हमेशा से ही रहा है,
अरमानों की चिता जलते हुए।
देखा है करीब से तुझे...
ए जिन्दगी बदलते हुए।
कहीँ चूक ना हो जाये मुझसे,
आ सम्भाल अब मुझको आकर।
कैसे चूकाये एहसान उनका,
जो पकड़े हैं हाथ कभी आकर।
खायी है बहुत ठोकरें,
राहों में , मैने चलते हुए ।
देखा है करीब से तुझे...
ए जिन्दगी बदलते हुए ।
कैसे भुलाएं उनको,

जो हंसते हैं मेरे ख्यालों पर।

इस तरह बिखर गये मेरे अरमां कि-

क्या सोचूं, अपने हालातों पर।

कैसे भुलाएं गमें दास्तां,

छप गया जो नाजुक,दिल के दीवारों पर ..

यूँ ही बीत गये वक्त,

दिलों में गम छिपाते हुए।

बस जल रहा हूं मैं,
बदलते हालातों में मिलते हुए।
देखा है करीब से तुझे...
ए जिन्दगी बदलते हुए ।
- गौतम गोविन्द

कविता न०-10.

मन बावरा,
तेरी याद में,मन बावरा।
लागे न जियरा कहीं,
तड़पे तेरे याद में।
मन बावरा....
वैरी पिया मोरी रंग दे चुनरिया।
मुझे भाये न कोई दूजा रंग रे।
तोहे ना देखूं पिया,जिया हो जाए तंग रे।
मन बावरा....
मेरी अखियां ढ़ूढ़ं रही है,
अपने पिया  का मुखड़ा।
सौतन की बातें दिल को बेधे ।
रे जाने कौन पीड़ पराई।
मन बावरा....
                - गौतम गोविन्द

कविता न०-11.

औरों कि खातिर यूं
      तन्हां अपनो में,
      रोता रहा हूँ मैं।
औरों को जोड़ते-जोड़ते
बस,खुद टूटता गया हूं मैं।
चाहे होली हो या दशहरा,
    या फिर दिवाली हो,
        तो क्या।
रातों को तन्हां अक्सर,
आसूँ बहाता रहा हूँ मैं।
औरों की खातिर यू्ं ......
माना था,जिसको अपना
हो न सका वो अपना।
दिल का अरमां अक्सर टूटा,
   पड़ मुझे,कोई गम नहीं।
         अब तो
अपनों का भी ना रहा,
      मुझपे यकीं।
खिलाई है जीने की कसमें,
    इसलिए जिन्दा,
       रहा हूं मैं।
औरों की खातिर यू्ं ......
कितना गहरा जख्म,
       है दिल में,
कैसे दिखाऊँ उसे।
      जब कभी,
लगती है उसको,
    तो क्यों?टिस
    उठता है मुझे।
कहते हैं लोग यहां,
शराबी हूँ मैं बड़ा।
पड़,क्या पता उन्हें?
जख्म भरने के लिए
   पीता रहा हूँ मैं।
औरों की खातिर यू्ं ......
        कौन है?
जिसको सुनाऊं दिले हाल अपना।
       अब तो
सब कुछ लगता बस,
    था एक सपना।
बरसात का मौसम
         पर,
   लगी है आग,
   सीने में इतना।
      चिंगारी,
भड़कती है और अंगारों पे,
जलता रहा हूँ मैं।
औरों की खातिर यू्ं ......
      शायद
यही करम अपना,
      चलना,
बस काटों पे चलना।
नहीं है कोई पूछने वाला,
    क्या हुआ
    कैसे हुआ।
दिल टूटने कि आवाज,
    होती नहीं
शायद इसलिए,
       टूट कर
बिखरता गया हूँ मैं।
औरों की खातिर यू्ं ......
       नहीं है,
कुछ गिला किसी से।
    ना शिकवा,
   बचा है अब।
       खैर,
क्या कहूँ किसी से,
दिल नादान है जब।
हुई हो भूल गर कोई तो,
माफ करना यारों।
खुशी के महफिल में,
अक्सर आसूँ ,
बहाता रहा हूँ मैं।
औरों की खातिर यू्ं ......
क्यों कहा,कैसे कहा,
ये मुझे पता नहीं।
कब कहा,क्या कहा,
ये मुझे पता नहीं।
         मैं तो,
बस हकिकत बयां,
    किया था उसे।
तब से चुप रहने का,
बहाना ढ़ूंढ़ता रहा हूँ मैं।
औरों की खातिर यू्ं ......

     


गौतम गोविन्द

           ग्राम-पोस्ट - ठेंगहा, थाना- सकतपुर,

          जिला- दरभंगा,(बिहार)


G. Govind

कविता 1582685927199224548

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