निराला की काव्यभाषा // डॉ. संतोष रामचंद्र आडे

SHARE:

निराला की काव्यभाषा डॉ. संतोष रामचंद्र आडे संत रामदास महाविद्यालय, घनसावंगी जि. जालना adesr08@gmail.com भूमिका निराला जी लगातार भाषा से जल...

निराला की काव्यभाषा

image

डॉ. संतोष रामचंद्र आडे

संत रामदास महाविद्यालय,

घनसावंगी जि. जालना

adesr08@gmail.com

भूमिका

निराला जी लगातार भाषा से जलते रहे उन्होंने भाषा को अनुभूति से जोडा शब्द की आत्मा से तादात्म्य स्थापित किया। उनके काव्य प्रयोगों की विविधता और मौलिकता ने अनेक काव्य आयाम को जन्म दिया और एकही स्तर पर विविध भाषा प्रयोग कर सके। भाषा के प्रति कितनी उत्सुकता, जिज्ञासा सर्जनात्मक काकी आदमी शक्ती हीच कवी मी पाई जाती है उतनी अन्य किसी। छायावादी कवि में नहीं। निराला जी के शब्दों की कुल जीवनी शक्ति से अपने संवेदना का तादात्म्य बनाकर सार्थक शब्दों की खोज उन्हें पूरी तरह से रचना में उतार लाते हैं। भाव के आवेग के साथ उनका पूरा जीवन घुल मिल जाता है और जो काव्य रचना होती है वह निराला की पूरी जीवन शक्ति का संश्लेष जाती है। भाव के अनुसार भाषा और लय का निर्वाह करने वाले निराला प्रचंड प्राण शक्ति, दुर्दमनीय जिजीविषा तथा सूक्ष्म संवेदन के कवि है। रे मनुष्य और सृष्टि के मूल तक जाकर रस ग्रहण करते हैं और भिक्षुक विधवा तोड़ती पत्थर जैसी रचनाओं द्वारा अपने भावों का मार्जन करते हैं। निराला जी संवेदना को लेकर भाषा से जुड़ते हैं वह मानवीय अस्तित्व को उसकी सघनता और जटिलता में उदगीर्ण करने वाली होती है। इस प्रकार आत्म संघर्ष की मन स्थितियों के जितने आवर्त निराला में दिखाई देते हैं उतने अन्य किसी कवि में देखने को नहीं मिलती। इसलिए उनकी काव्य भाषा छायावादी कवियों में सबसे अलग रूप से प्रमुखता से उभर कर आती है।

जीवन में जहां विरोधाभास है , वहां काव्य की विरोधाभासों से अछूता रह सका और जीवन के विरोधाभासों का बदला निराला के काव्य में विरोधाभासों का स्रजन कर लिया। कुछ बेतुके अटपटे और विचित्र से लगने वाले शब्द प्रयोगों में भी गहरी भाव संकुल का भीतरी तादात्म्य और अंतरिक साम्य में होता है। जहां शब्दों की यथार्थ ऑर्गन अनुभूति के साथ शब्द पूरी सत्ता के साथ मौजूद रहता है क्योंकि छायावाद की दृष्टि अंतरंग होने के कारण वहां समस्त हो और एक दूसरे पर अवलंबित होकर अंतरिक की व्यंजना करते हैं। मुकुटधर पांडे के अनुसार “ यह अंतरंग दृष्टि ही छायावाद की विचित्र प्रकाशन आरती का मूल है उसमें किसी दृश्य का जो का त्यों चित्र उतारा जाता है। पर शब्द ऐसे वेगों वाले प्रयुक्त किए जाते हैं कि भाषा उड़ती हुई जान पड़ती है।”8 भाषा की संगति और गहनता देखने के लिए एक विशेष दृष्टि चाहिए जो चमत्कारिकता से दूर मूल में बैठती हो। निराला जी की रचनाओं में भीतर का उद्वेग शब्दों की लयात्मकता में इस प्रकार घुल-मिल गया है कि वहां अलग से किसी चमत्कारिकता का प्रदर्शन नहीं होता और रचना एकान्विती द्वारा अर्थबोध देती हुई अपने आवर्त खोलती है।

प्रारंभिक काव्य में जिस प्रकार की भाव और शिल्पा की विविधता दृष्टिगत होती है वैसी ही विविधता का रंग अंतिम चरणों में भी दिखाई देता है। इस तरह निराला ने काव्य भाषा को मुक्त पर एक ऐसी भाषा का प्रणयन किया है जो अनुभूति के स्तर की है। उन्होंने भाषा में शब्दों के लिए नए संयोजन, छंद के नए-नए प्रयोग, शब्दों की उचित संगति आदि के साथ पुरानी लीक से हटकर शब्दों और वाक्यों के संबंधों की आधारशिला को नए सिरे से रखा है और शब्द तथा लड़की टकरा हट द्वारा अर्थ निष्पत्ति के लिए नए आयाम उद्घाटित किया है। वे किसी भी भाव अथवा भाषिक शब्दों से परहेज नहीं करती। हिंदी के स्वभाव अनुकूल ले में ढाल कर उन्हें नई भाषिक व्यंजना प्रदान करना निराला का स्वभाव है जो हिंदी की अभिव्यंजना समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। जहां कहीं भी निराला को अनुरूप अभिव्यंजना दिखी चाहे वह धातुज रूप में हो अथवा ‘ठेठ’ ग्रामीण शब्दों में’ झट से उसे हिंदी में ले आए और हिंदी को नए सौंदर्य से मंडित कर हिंदी का शब्द भंडार और उसकी व्यंजना शक्ति को भर दिया। “ निराला की भाषा के विविध स्त्रोत एक ओर संस्कृत कवि जयदेव है तो दूसरी ओर तुलसीदास और तीसरी और रविंद्र है निराला ने अपने श्रंगार इक काव्य में जयदेव की सामासिक पदावली एकाएक सीमा तक अनुसरण किया है। यह शायरी वास्तव में उनके वीर रस के काव्य में और विशेषकर राम की शक्ति पूजा और तुलसीदास में मुखर है”।12  इस प्रकार की शैली ‘बुद्ध के प्रति’ रचना में तथा परवर्ती काव्य में कुछ गीतों में भी दिखाई देती है इस प्रकार विभिन्न दिशाओं में अपनी प्रतिभा के सुमन सौरभ उदगीर्ण करते हुए निराला निरंतर विकास करके गए हैं।

तत्सम शब्दावली

समस्त छायावादी कवियों में विशेषता निराला ने तत्सम शब्दावली का प्रयोग बहुलता से किया। इसका मुख्य कारण कोमल कांत पदावली की रचना और उदात्त गंभीर भावों की अभिव्यक्ति का समाहार करना था। फलस्वरूप कवि अपने कृत्य को तीव्रता से निष्पादित करता हुआ पाठक के समक्ष उदात्त चित्र खींच पाता है

“”विजन-वन-वल्लरी पर

सोती थी सुहाग भरी -स्नेहा- सपना- मग्न

अमल- कोमल -तनु तरुणी- जूही की कली”15

यह भाषा की 1 जनता ने चित्र को तो स्पष्ट किया है साथ में जूही की कली की कोमलता का भी एहसास करा दिया वह शक्ति है निराला की भाषा में राम की शक्ति पूजा और तुलसीदास तत्सम बहुल रचनाएं है चीन के भाषा संगठन को हम तुलसीदास की विनय पत्रिका में भाषा सौष्ठव से जोड़कर देखे तो यह हद तक साम्य पाएंगे। निराला ने सामाजिक पदावली में अन्य कवियों की तरह केवल श्रंगार और मधुर भाव की ही अभिव्यक्ति नहीं की वरन् पुरुषों को भी अभिव्यक्त पर उन्होंने भाषा की सामर्थ को आगे बढ़ाया है।

इन प्रयोगों का अर्थ पुरानी पद्धति द्वारा लगाए जाने पर ए असंप्राकृत जान पड़ेगी क्योंकि हिंदी क्रिया द्वारा निराला ने शब्दों को नई अर्थवता प्रदान की है। संस्कृत की ध्वनि रंजना के कारण तत्सम शब्दावली में समास ओं का प्रयोग भी बहुत था से हुआ है। उनकी समाज योजना संक्षिप्त में विशाल था कि द्योतक है। इस गुण के कारण एक-एक शब्द अर्थ खंड की तरह अभाषित होता है। इस प्रकार निराला अपनी काव्य रचना हेतु संस्कृत की शब्दावली का सहारा लेकर नई भाषा रचते हैं किंतु पूर्णत: उसकी अनु करता बनकर नहीं बल्कि आवश्यकता के महत्व को पहचानते हैं।

देशज शब्द

दरअसल कुछ भी नजर आए ऐसी होती है जिन्हें सहज रूप में देशज शब्द ही व्यक्त कर पाते हैं। वहां वितरित होने के लिए अनिवार्य हो जाते हैं इस अनिवार्यता को ही प्रमुख मानते हुए निराला बेला ,नए पत्ते, आराधना आदि संग्रहों में इन शब्दों का खूब प्रयोग करते हैं और सफलता से करते हैं। ऐसे स्थलों पर जहां देशज शब्दों का प्रयोग हुआ है वहां भाषा का प्रवाह एक विलक्षन संयोजन पैदा करता है। किन शब्दों का प्रयोग निराला ने इस कलात्मकता से किया है कि वह गहरे अर्थ से भर उठे हैं इस प्रकार के शब्द रचना में अन्य शब्दों के साथ अद्भुत सामने रखते हुए पूर्णत: खप जाते हैं। “ रे तद्भव या देशज होने से भले ही इतने प्रतिष्ठित ना हो जितने कुछ तत्सम है ।फिर भी ज्यादा पाठक सरस रचनाओं में जैसी शब्दावली चाहते हैं उसमें भी खप जाते हैं। के विपरित ऐसे बहुत से शब्द है जो व्यवहार में आते हैं किंतु जिन्हें कविता में खपाना बहुत मुश्किल है। मधुर पदावली में तो वे खपते ही नहीं, जहां कर्कश प्रभाव उत्पन्न करता हो, वहां भी उन्हें जमाने में कठिनाई होगी।”23 पारस्परिक तालमेल से निष्पन्न निराला की जन-पदीय शब्द अपना अलग अलग ही महत्व रखते हैं । बल्कि इस तरह के प्रयोग निराला काव्य को एक नई बन जाना तथा काव्य सौष्ठव प्रदान करते हैं।

यदि वह भाव प्रसंग को पूर्ण रूप से व्यक्त करता है तो निराला उस शब्द के प्रयोग से ही हिचकीचाएंगे नहीं। क्योंकि वह भाव व्यंजकता पर अधिक महत्व देते हैं।

अरबी फारसी शब्द प्रयोग

निराला हिंदी और उर्दू दोनों को एक ही भाषा के दो रूप मानते हैं। चयन में आए इस कथन से की” उर्दू फारसी की चिरकाल पड़ोस पर रहने की वजह, दिल्ली की सरहद की जबान पर असर पड़ा उसे कोई दिल्ली निवासी या उसका पक्ष देने वाला भक्ति की सहज प्रेरणा से भविष्य राष्ट्रभाषा का सार्वभौमिक रूप भले ही डालें परंतु कोई साहित्य निगरानी के लिए जब हिंदी का साहित्य भंडार डोलता है तब ग्रंथ महोदधि के निकले रत्नों में से एक तिहाई बंगोंपसागर की ओर एक तिहाई अरब समुद्र के गुजरात और महाराष्ट्र उपकुल की चुनी हुई दिखते है। इस प्रकार अरबी फारसी शब्दों का मिश्रित रूप उर्दू का प्रयोग अनामिका, परिमल, गीतिका, तुलसीदास में तो हुआ ही है परवर्ती कृतियों में भी यह प्रयोग अधिक दिखाई देता है। खासकर कुकुरमुत्ता बेला नई पत्ते में उनकी प्रवृत्ति और अधिक रही है। अनामिका में नजर, बंदो, नायाब, बदबू ,जहान, परवाहा, खबर, मकबरे दिल जैसे कितने ही अरबी फारसी शब्द प्रयुक्त होते हैं। निष्कर्ष इन शब्द प्रयोगों द्वारा निराला ने काव्य भाषा को एक नया तेवर प्रदान किया है जो खासकर हिंदी को समृद्ध करने और भाषा को काव्य अभिजात्य से मुक्ति दिलाने की दृष्टि से किया गया है। निराला की यहां कोई भी शब्द काव्य के लिए परी तत्व नहीं होता। बशर्ते वह भावपूर्ण अभिव्यक्ति करने में समर्थ हो यही कारण है कि निराला के काव्य में जहां एक और तत्सम शब्दावली का प्रयोग हुआ है वहीं दूसरी और देश तथा अरबी फारसी शब्द में प्रयुक्त होते हैं जो कवि की विराट प्रतिभा के जिंदा है आचार्य नंददुलारे वाजपेई ने ठीक ही लिखा है कि” कवि की महान प्रतिभा अज्ञात स्थलों के शब्दों का चयन कर लेती है और उसे अपने विषय अनुसार प्रयुक्त करती है।”30

अंग्रेजी शब्द प्रयोग

निराला ने चैन में लिखा है संसार की हर भाषा स्वाधीन चाल से ही चलकर और भिन्न भिन्न भाषा से ही शब्द लेकर अपना भंडार भर्ती है। हिंदी की अभिव्यंजना शक्ति की समृद्धि में भी भिन्न-भिन्न भाषाओं की नेमी का सहयोग रहा है। हिंदी के इस्तेमाल से भाषा में विविधता आई है और भावव्यंजकता बड़ी है। अंग्रेजी बांग्ला उर्दू या किसी भी उन्नत भाषा की और हिंदी की रुचि का होना उसकी प्राथमिक उन्नति के लिए अत्यंत आवश्यकत था। इसके बिना उसकी संकीर्ण शब्द भंडार की पूर्ति असंभव थी। उसका सामाजिक जीवन भी कितना उन्नत नहीं है कि उसका चित्र एक-दूसरे उन्नत सामाजिक क्षेत्र की क्षमता कर सकें।

निराला की पूर्ववर्ती काव्य में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग बहुत अल्प है। किंतु परवर्ती का विशेषकर कुकुरमुत्ता में ऐसे शब्दों का प्रयोग बहुलता से हुआ है। इसका एक मुख्य कारण व्यंग्य की तीव्रता और कक्षक हो अधिक संप्रेषण बनाना है कुछ स्थानों पर तो यह शब्द व्यंग्य की प्रतिनिधि रूप में प्रयुक्त किए गए हैं कुकुरमुत्ता में केपीटलिस्ट कॉस्मोपॉलिटन मेट्रोपॉलिटन फ्रॉड रोमांस क्लाइमैक्स प्रोगेसिव पिरामिड विक्टोरिया मेमोरियल पीटर्स पोयट्री प्रोज स्पेशलिस्ट स्टीमबोर्ड, पोस्ट लिरिक्स डिप्थीरिया अआदि कितने ही अंग्रेजी शब्द प्रयुक्त हुए हैं। ऐसे स्थानों पर जहां अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग हुआ है वहां भी भाषा अभी पूर्ण और व्यंजन की तीव्रता लिए दिखाई पड़ती है।

नवीन शब्द प्रयोग

निराला ने कभी ध्वन्यात्मकता का आधार लेकर तो कभी तुम सामने पर और कभी संख्या विशेषताओं को जोड़कर अनेक मौलिक शब्दों की रचना की है। हरीआई, कलीआई, आदमी आदि शब्द प्रयोग को को मौलिक शब्द का प्रयोग ही कहेंगे। इस तरह के शब्द प्रयोग अन्य काव्य संग्रह में भी आए हैं दुख के समय पर अनेक नवीन शब्दों का सृजन भी निराला ने किया है “कुछ नए शब्द जो भाव परिणीति की सहायता से अद्भुत हुए हैं तलमल, नंम्र मुखी, वालहक, लुप्त मधु संकुल चकचौंधी आदि शब्द है। कुछ शब्द प्रयोगों में अनावश्यक क्रियाएं छोड़ दी गई है परिचित क्रिया पदों पर स्वराघात देकर उनमें नई व्यंजना और अर्थवता भरने का प्रयास किया गया है”37 एक प्रयोग कवियों की परिष्कृत अभिरुचि और आधुनिक साहित्य सौंदर्य चेतना की प्रति सजगता के फलस्वरूप पन्ना हुए हैं जैसा कि डॉक्टर नाम और सिंह लिखते हैं कि” भाऊ की समुचित अभिव्यंजना के लिए भाषा को समर्थ बनाने रतलामी छायावादी कवियों को कभी-कभी नए शब्द भी करनी पड़ी निसंदेह यह शब्द संस्कृत की प्रकृति प्रत्यय के आधार पर ही चले गए परंतु ऊपर से तत्सम प्रतीत होते हुए भी वस्तुतः आधुनिक है।”38

संगीतात्मक शब्दावली

निराला शब्दों को उस छोर पर जाकर पकड़ते हैं जहां उसके भीतर सघन स्वर कवि के मोहन संगीत को ध्वनित कर सके यही कारण है कि उनकी भाषा में ध्वन्यात्मकता तथा संगीतात्मकता अधिक पाई जाती है। जैसा कि रामविलास शर्मा ने लिखा है - “ छंद की गति में हेरफेर करने वाले निराला धनिक प्रवाह से कविता के अर्थ को निखारते और पुष्ट करते हैं”43 बादल राग जागो फिर एक बार इस प्रकार की नई रचनाएं है ध्वनि प्रवाह की भंगिमा ओ द्वारा क्रियाओं को भी किस प्रकार चित्रित करते हैं

झुक -झुक ,तन तन फिर झूम- झूम हंस-हंस झकोर

चीर -परिचित चित्रवन, दाल सहज मुखड़ा मरोर

भर मुर्हुमुहर तन-गंध विमल बोली बेला 44

संगीत शास्त्र के मर्मज्ञ होने के कारण संगीतीक शब्दावली का प्रयोग उन्होंने खुब किया। कई रचनाओं में इस प्रकार के शब्द प्रयोग देखे जा सकते हैं वर दे वीणावादिनी वर दे में इन शब्दों की नई गति लय और ताल दृष्टव्य है।

शब्दों के अंत संगीत को महत्व प्रदान करते हुए उसमें निहित नाद सौंदर्य को साकार करने की प्रवृत्ति और भी अधिक दिखाई देती है निराला सभी स्वर संगीत और कभी व्यंजन संगीत द्वारा चित्र को मूर्त करते है।

“झूम-झूम मृदु गरज गरज घनघोर

राग- अमर! अम्बर में भर निज रोर”

वास्तव में शब्दों के अर्थ से जो चित्र बनते हैं उन से मिलते जुलते चित्र निराला ध्वनि से बनाते हैं47  इस प्रकार उनके काव्य में ध्वन्यात्मक संगीतात्मक का उत्कर्ष सहज ही देखा जा सकता है। इसी से भाषा विकसित होती है “ कोई भी उच्चरित शब्द किसी न किसी तरह का नैरंतर्य माँगता है। उसे विभिन्न तरीके से जारी रखा जा सकता है, तार्किक ध्वन्यात्मकता, व्याकरणात्मक या तुख से, यही वह रास्ता है जिससे भाषा विकसित होती है”।48

निष्कर्ष

कभी-कभी वे किसी शब्द की प्रति अआशक्त भी हुए हैं और उसे बार-बार मैं अर्थों में दोहराते चले गए है। हर संग्रह में उनकी यह आशक्ति नवीन शब्दों के प्रति रही है जिसे हम उनकी भाव परिणीति और वैचारिक सूझ- बूज ही कहेंगे। परिमल में मौन शब्द का प्रयोग बार-बार लक्ष्य किया जा सकता है और अर्चना में प्रयुक्त नील तथा नयाना शब्द की आवृत्ति कवि दृष्टि की अनंतता का बोल देती है। इस प्रकार गीत गूंज में ज्योति के साथ साथ शाम शब्द की आवृत्ति भी अनेक बार हुई है। एक रचना श्याम विराजे में पंद्रह पंक्तियों में बीस बार शाम शब्द का प्रयोग अर्थ व्यंजना का मनोरम उदाहरण है। यह रचना शब्दों के प्रति निराला की सजगता विकसित चेतना और पांडित्य का उद्घाटन करती है। “ निराला के शब्द अनेक प्रकार की है क्योंकि उनमें प्रवृत्ति बहुलता है। उनकी पदावली विराटता का बोध कराती है कहीं विद्रोह का और कहीं गुढता का”51 कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि भाषा की सजगता और विविधता जितनी निराला के काव्य में उपलब्ध है उतनी ना केवल अन्य छायावादी कवियों में बल्कि किसी भी आधुनिक कवि में संभव पूर्ण दिखाई नहीं देती इसलिए निराला के काव्य में भाषा के अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं।

संदर्भ

1. मुकुटधर पांडे, छायावाद एंव् अन्य श्रेष्ठ निबंध

2. आचार्य नंददुलारे वाजपेयी: कवि निराला

3. निराला :परिमल

4. रामविलास शर्मा :निराला की साहित्य साधना

5. आचार्य नंददुलारे वाजपेयी: कवि निराला

6. डॉ केदारनाथ सिंह आधुनिक हिंदी कविता में बिंब विधान

7. नामवर सिंह :छायावाद

8. रामविलास शर्मा निराला की साहित्य साधना भाग 2

9. निराला: गीतिका

10. रामविलास शर्मा निराला की साहित्य साधना भाग 2

11. जोसेफ व्रड्रस्की (अनुवादित प्रभात त्रिपाठी) पूर्वाग्रह संयुक्तांक 12

12. नामवर सिंह छायावाद

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: निराला की काव्यभाषा // डॉ. संतोष रामचंद्र आडे
निराला की काव्यभाषा // डॉ. संतोष रामचंद्र आडे
https://lh3.googleusercontent.com/-1Nsc3gNEhSM/XB4AT4Sk0wI/AAAAAAABF-c/wSfHUzLCzgotKieSKlQ8CHL6bnO3oMErgCHMYCw/image_thumb?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-1Nsc3gNEhSM/XB4AT4Sk0wI/AAAAAAABF-c/wSfHUzLCzgotKieSKlQ8CHL6bnO3oMErgCHMYCw/s72-c/image_thumb?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2018/12/blog-post_96.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2018/12/blog-post_96.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content