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संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर-हिंडा” का अंक २१, ‘तू डाल-डाल, और मैं पात-पात।’ लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक

“डोलर-हिंडा” का अंक २१,

‘तू डाल-डाल, और मैं पात-पात।’


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लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

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पाख़ाने का दरवाज़ा अभी खोला ही नहीं था ललित दवे ने, और तब-तक बाबू गरज़न सिंह गरज़ उठे “लघु-शंका पर नियंत्रण रख ललित, बार-बार क्यों जाता है मूतने इस पाख़ाने में..उल्लू की दुम, तू जानता नहीं..?”

सुनकर बेचारा ललित घबरा गया, और हाज़िर हो गया बाबू गरज़न सिंह के दरबार में। और हाथ जोड़कर, कह उठा “हुक्म दीजिये, मेरे आका। कहीं मुझसे, कोई ग़लती तो न हो गयी?”

“यह क्या है..? नाथी का बाड़ा? जब मर्ज़ी आयी, खोल दिया पाख़ाने का दरवाज़ा..? साले दरवाज़ा खुला छोड़कर बदबू भर देता है इस संस्थापन शाखा में?” फटकारते हुए बाबू गरज़न सिंह आगे कहते गए “तुम जैसे बदतमिजों के कारण ख़र्चा बढ़ गया है मेरा, एक हफ़्ते में पांच-पांच पैकेट चन्दन और गुलाब की अगरबत्तियों लाकर फूंकता हूँ....तब कहीं जाकर यह बदबू कुछ कम होती है, और सहजता से बैठ पाता हूँ।”

“अब जाऊं, सरकार..दाख़िल हो जाऊं?” ललित सहमत हुआ, बोला।

“कहाँ दाख़िल होगा, खोलू मेरा पिछवाड़ा?” बाबू गरज़न सिंह दहाड़ते हुए, बोले।

“नहीं हुज़ूर, हम ख़ुद ही दाख़िल हो जायेंगे..आप काहे तक़लीफ़ उठाते हैं?” ललित नरमाई से बोला। जिसे सुनकर, बाबू गरज़न सिंह को हंसी आ गयी। फिर उन्होंने बगल में रखी कुर्सी आगे खिसकाई, और उससे कहा “यहाँ बैठ जा, गधे। थोडा सीरियस बन..ले अब, थोड़ी काम की बात कर लेते हैं।”

ललित कुर्सी पर बैठ गया, और बोला “फ़रमाइए जनाब, इस बन्दे के लिए क्या हुक्म है?”

“सुन ले, ललित...कान खोलकर। यह दफ़्तर चलेगा तो मेरी इच्छा से, मेरी ख़िलाफ़त की तो मर्दूद तेरा यह थोबड़ा है ना..बिल्कुल साबुत न रहेगा। देख लिया, इस तुर्रम खां घसीटा राम की मैंने क्या गत बनायी..याद है? अब सुन..” एक पर्ची पर किसी प्राइवेट स्कूल का नाम लिखकर उसे पर्ची थमाई, फिर आगे बोले गरज़न सिंह “इस प्राइवेट स्कूल की फ़ाइल अभी मुझे दे देना लाकर, कल मैं बड़े साहब के साथ इस स्कूल के निरीक्षण में जा रहा हूँ। समझे, प्यारे लाल?”

भोला सा मुंह बनाए ललित उनका चेहरा देखता रहा, मन में सोचने लगा “वाह भाई, वाह। यह मान्यता का चार्ज हमारा, काम करें हम..और निरीक्षण में जाए बाबू गरज़न सिंह..? क्या ज़माना आ गया, दूध गरम करें हम और मलाई अरोग जाए बाबू गरज़न सिंह? जनाबे आली ने चार दिन क्या साहब के आगे-पीछे रहकर अपनी पूंछ हिला दी, और अपने-आपको समझ बैठे... जलालुद्दीन मोहम्मद शहंशाह अकबर के नवरत्न, राजा टोडर मल? और जनाब टोडर मल के दरबार में ये दफ़्तर के बाबू बन गए हैं, हज़ूरिया दरबार के मुंह झुकाए खोजे। इन नाज़रों में इतनी हिम्मत नहीं कि, बाबू गरज़न सिंह की तानाशाही के खिलाफ़ कुछ बोले...अरे ललित ये तो हैं छक्के, जो क्रिकेट के मैदान में पवेलियन से बिना रन बनाए आउट हो जाया करते हैं। क्या फर्क़ पड़ता है, इनको आइना दिखाने से? कोई असर नहीं। लगता है, वशीकरण मन्त्र सिद्ध करके इन पर डोरा फेर दिया है...इस बाबू गरज़न सिंह ने..!”

आख़िर ललित उठा, मगर उसे जाने कौन देता? झट उसे रोककर, बाबू गरज़न सिंह बोले “कहाँ चल दिए, जनाब?

“दाख़िल होने, कहो तो...” ललित मुस्कराकर, बोल उठा।

“पहले ज़वाब दे, माता के दीने। कब भेज रहा है, तू फ़ाइल?” बाबू गरज़न सिंह की, कड़कती आवाज़ गूंज़ उठी।

“मेरे बाप...भेज दूंगा, अब तो जाने दो ना, आप कहो तो अब यहीं बैठ जाऊं नाड़ा खोलकर?” ललित परेशान होकर, बोला।

“फूट यहाँ से, फूटे कनस्तर। गन्दगी करेगा, नालायक..तो कान पकड़कर पूरे दफ़्तर में पोचा लगवाऊंगा, समझा प्यारे लाल?” बाबू गरज़न सिंह बोले।

उनकी बात अनसुनी करके ललित तो चला गया, पाख़ाने की ओर। दरवाज़ा खोलते ही सामने महेश को खड़ा पाया, जो सामने लगी ज़ाली से नीचे भैंस के तबेले पर अपनी निग़ाहें गढ़ाए खड़ा था। उस तबेले में गोबर बीन रही एक ख़ूबसूरत युवती की ख़ूबसूरती को देखता हुआ, वह अपनी आँखें ठंडी कर रहा था।

“क्या कर रहा है, भैंस के ताऊ? मुझसे यह कहकर गया कि, बाबू गरज़न के पास जा रहा है..टाइप करने? मगर तू तो यहाँ खड़ा ले रहा है, आई-टोनिक? अब मुझे लगता है, तूने ही बाबू गरज़न सिंह के कान में फूंक मारी है...मान्यता दिलाने की निरीक्षण फ़ाइल मंगवाने की?” इतना कहकर, ललित ने झट एक धोल उसके पिछवाड़े पर जमाया।

“मार दिया रे, मार दिया रे।” धोल खाकर, महेश चीख़ उठा। उसकी चीत्कार सुनकर, नीचे तबेले में खड़ी भैंस भड़क उठी। और पास बैठी गोबर बीन रही उस युवती के पिछवाड़े पर, अपने सींगों का वार कर बैठी। झट वह युवती घबराकर उठी, मगर वह उठते वक़्त अपने बदन का बेलेंस संभाल न पायी। जिसके कारण वह लड़खड़ाकर ओंधे मुंह गिर पड़ी, और उसका मुंह भैंस के गोबर से भरी तगारी में जा घुसा। इस मंज़र देखकर, वे दोनों खिलखिलाकर हंस पड़े।

लेखा शाखा में ग़मगीन बैठे घसीटा रामजी ने अपनी ज़ेब से डायरी बाहर निकाली, डायरी में रखी अपने उस्ताद पेढ़ीवाल साहब की तस्वीर बाहर निकालकर वे उसे निहारने लगे। दुःख से भरे शब्द, उनके लबों से बाहर निकल आए “उस्तादजी। माफ़ करना, यह आपका शागिर्द इस दफ़्तर-ए-जंग में हार गया..बट्टा लगा दिया, आपके नाम पर। माफ़ कीजिये, उस्ताद। अब मुझे अगली लड़ाई लड़नी होगी, उस्ताद..बस आप मुझमें वह शक्ति दीजिये, जिससे मैं इस बाबू गरज़न सिंह और पुष्कर नारायण शर्मा से बदला लेकर आपका नाम रौशन कर सकूं। क्या करूँ, उस्ताद? आपकी हर सलाह को मानता हुआ, हर मेटर को ऑफिस-नोट पर लाकर ही मैंने कार्यवाही की है...चाहे उस मेटर पर अधिकारी यस करे या नो, उससे कोई मतलब नहीं रखा उस्ताद। आपकी सलाह पर बार-बार उस मेटर को घसीटा है, ठोका है पीटा है..जितना भी दम था, वैसा ही किया जैसे आपने कहा था। मगर सफ़लता हमारे क़दम चूमने के स्थान पर, उस कुंजड़े गरज़न सिंह के क़दमों को चूमने लगी। अरे उस्ताद, आपसे कैसे कहूं? हमारे बदनसीब भाग्य में, सफ़लता कहाँ लिखी हुई..? आपने ही कहा था, जल्दी काम कर दोगे तो ऐरे-गैरे नत्थू सरीखे चढ़ जायेंगे तुम पर। उस्ताद मैंने ऐसे ही किया, मगर इस गरज़न सिंह नाम के चूहे ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा।”

“अरे साहब, आप उस्ताद को याद करके उनकी आत्मा को मत दुखाओ। सलाह तो हम भी दे सकते हैं, वह भी आपको मुफ़्त में। जनाब, हमें विधि शाखा में बैठाया भी इसीलिए, कि आप जैसे महापुरुषों को सलाह देकर आपकी ख़िदमत कर सकें।” मास्टर जुगती राम बोहरा के निलंबन की फ़ाइल उनकी टेबल पर रखते हुए, बाबू सुदर्शन आगे बोले “साहब, मैं तो अभी इधर से गुज़र रहा था, सोचा कि ‘चलो, साहब से इस अध्यापक के निलंबन काल के भुगतान के मुद्दे पर...चर्चा कर ली जाय।’ मगर, हमें कहाँ मालुम..आप जैसे महान बाहुबली बड़े-बड़े तुर्रम खां को घसीटने वाले लेखाकार घसीटा रामजी यानी शिव रामजी प्रजापत, गरज़न सिंह नाम के छोटे से चूहे मात खाकर आप इतना टूट गए?” घसीटा रामजी ने बाबू सुदर्शन का व्यंग-भरा डायलोग सुना, और उनके लबों पर शरारती मुस्कान पाकर वे बेचारे खीज उठे, और कहने लगे “काहे मज़हाक़ उड़ाते हो, पी.ए. साहब..? वैसे हम कमज़ोर नहीं हैं, बस इतना ही समझो कि यह समय का फेर है।”

“तभी तो कहता हूँ, उस्ताद। ‘जो सुख चाहे जीव का तो चमचा बनकर जी, बिल्ली को ऊंट कहे तो हांजी-हांजी कह।’ समझे साहेब, दुनिया की यही रीत है। न तो लोगों को घसीटते-घसीटते, कहीं आप ख़ुद इतना मत घिस जाना...कि, लोग आपको असतित्वहीन न समझ बैठे..? न तो फिर, जमाओ दफ़्तर में ऐसी जोड़ी...जिससे आपको, दफ़्तर की अन्य हस्तियों का साथ मिलता रहे।” बाबू सुदर्शन कहते गए “या फिर यह करो, आती है मक्खनबाजी..? तो भय्या, मस्का मारते रहो।” यह डाइलोग बोलते हुए सुदर्शन बाबू ने अपनी हथेली पर उंगली इस माफिक चलायी, मानों वे ब्रेड पर मक्खन लगा रहे हो..?

“मैं हूँ शिव राम प्रजापत, लोग मुझे कहते हैं ‘घसीटा राम’ यानी बड़े-बड़े तुर्रम खां को घसीटकर छठी का दूध पिलाने वाला। और मैं, समझौता करता फिरूं इन लोगों से? वाह...! क्या फ़रमाया, पी.ए. साहब ने? हुजूरे आला, यह तो आपकी अदा है अन्दर घुसने की। ख़ूब घुसो..ख़ूब घुसो...” घसीटा राम ने अन्दर घुसने का इशारा करने के लिए, अपनी हथेली को झटका मारकर आगे लेते हुए यह डाइलोग बोल डाला।

उन्होंने जोश में आकर जैसे ही झटका मारकर, अपनी हथेली आगे ली..और उनकी कोहनी की करारी मार जा लगी सीट से उठने वाले बाबू अनिल सोनी पर। कोहनी की मार लगते ही, बेचारा अनिल इस दर्द को बर्दाश्त नहीं कर पाया और वह ज़ोर से चीख़ उठा “मारी रे...मारी रे..ज़ोर से।”

“दर्द तो नहीं हुआ रे, नहीं तो एक दफ़े और मारूं?” घसीटा राम हंसकर, ज़ोर से बोल पड़े। वास्तव में हुआ यों, बेचारा अनिल सेवाभिलेख बाहर निकालने के लिए उठ ही रहा था, तभी घसीटा राम की कोहनी ज़ोर से आ लगी अनिल की बटक [पिछवाड़े पर] पर। उसके यों चीख़ने से, वहां आस-पास बैठे बाबू और अध्यापक ठहाका लगाकर हंसने लगे। बेचारा अनिल, शर्म के मारे लाल-लाल हो गया। वह बेचारा, इतना ही बोल पाया “और, कितनी बार मारोगे?” फिर, ढेर सारी सर्विस बुकें अलमारी से बाहर निकालकर टेबल पर रख दी...अध्यापकों की मेडिकल और पी.एल. छुट्टियों के, स्वीकृति आदेश तैयार करने। फिर, आगे कहता गया “अब, और क्या करोगे?” बेचारा अनिल दर्द से कराह उठा, फिर अपनी चोट को सहलाता रहा। उसे चोट सहलाते देखकर, वहां बैठे बाबूओं और अध्यापकों की हंसी रुक न सकी। वे इतना ज़ोर से हँसे कि, उन बेचारों के पेट के बल खुलने लगे। सहसा, उनकी हंसी का किल्लोर जा गिरा..बाबू ओम प्रकाश के कानों में। वह सामान्य शाखा का बाबू ओम प्रकाश इस हंसी के किल्लोर को सुनकर झेंप गया, उस बेचारे को शक होने लगा कि ‘कोई उसके कारनामों पर नज़र तो न गड़ाये बैठा हो?’ वास्तव में सामने बैठे सज्जन से रुपये लेने के लिए, ओम प्रकाश अपना हाथ टेबल के नीचे से सरका रहा था। उसका यह हाथ, हंसी का किल्लोर सुनकर रुक गया। उसे वहम हो गया, उसे ऐसा करते हुए किसी ने ज़रूर देखा होगा..? फिर जांच-पड़ताल करता हुआ, वह इधर-उधर देखने लगा...उसे लेखाकार महोदय के पहलू में बैठे बाबू सुदर्शन पर, बैठे-बैठे गुस्सा आने लगा। बाबू सुदर्शन की कार्टून बनाने की आदत से, वह वाकिफ़ था। जिनकी यही ख़राब आदत थी, वे लोगों की गतिविधियों को मद्दे-नज़र रखकर, उन पर सटीक कार्टून बना देते, और फिर दफ़्तर के महारथियों को कार्टून दिखलाकर वाही-वाही लूटा करते। अब बाबू सुदर्शन को घसीटा राम के पास बैठा देखकर, उसका शक हक़ीक़त में बदल गया। उसके दिमाग़ में यह विचार कोंधने लगा कि, ‘ज़रूर बाबू सुदर्शन ने उसके ऊपर कार्टून बनाया है, और अब वे उस कार्टून को घसीटा राम और वहाँ बैठे महानुभवों को दिखला रहे हैं..? शायद यही कारण रहा होगा, वहां बैठे महानुभव इस कार्टून को देखकर इतने ज़ोर से हंसते जा रहे हैं? शायद उस कार्टून में उन्होंने यह ज़रूर दिखाया होगा कि, किस तरह टी.सी. सत्यापन करवाने वाले आगंतुकों को उसके द्वारा सरे-आम मूंडा जाता है? उसे पूरा शक था, वह ज़रूर सुदर्शन बाबू की गीद-दृष्टि का कोपभाजन बन गया है?’

“सेठ साहब, अब आप तीन बजे आना..अभी दफ़्तर का माहौल अच्छा नहीं।” बेबसी से, ओम प्रकाश बोल पड़ा।

“माहौल छोखो नै भूंडो, थू जाणे भाया। म्हने कांई मुतळब..? पैसा दे रियो हूँ मेहनताना रा, कांम तौ थनै करणो पड़सी। [माहौल अच्छा है या ख़राब, वह तू जाने भाई। मुझे क्या करना? पैसे दे रहा हूँ मेहनताने के, काम तो तुझको करना ही होगा।]” मुंबई से आये हुए, सेठ साहब बोले।

“सेठ साहब, क्यूं म्हारी टोपी उतारो हौ सा..? आप बुज़ुर्ग हौ, दुनियादारी देखी हौ...ठेकेदारी में आप कांम कीकर निकळावो? आ बात आप जाणतां ई हुवोला? [सेठ साहब, आप मेरी इज़्ज़त सरे-आम क्यों नीलाम करने में जुटे हो? यह बात आप जानते ही होंगे कि, ठेकेदारी में आप काम कैसे निकलवाते हैं?]” ओम प्रकाश बोला।

“भाया सौ फीसदी जाणू..जद इज़ पांच मिरची बड़ा अर पांच चाय लावण रौ हुकम दिया पछै इज़, अठै बैठो हूं। [भाई, शत प्रतिशत जानता हूं..तब ही पांच मिर्ची-बड़ा और पांच चाय लाने का हुक्म देकर ही, फिर यहाँ बैठा हूं।]” सेठ साहब बोले।

अब क्या करता, बेचारा ओम प्रकाश..? उसने सोच लिया “अब जो होगा, जो देखा जाएगा।” झट टी.सी. रजिस्टर बाहर निकालकर, सेठ साहब का काम करना शुरू किया। सेठ साहब ने झट अपनी ज़ेब से बीस रुपये बाहर निकालकर, उसकी टेबल की दराज़ में रख दिए। ओम प्रकाश के लबों पर मुस्कान छा गयी, क्योंकि उसने सेठ साहब को दराज़ में रुपये रखते देख लिया था। वह अपनी सफ़ाई पेश करता हुआ, सेठ साहब से बोला “क्या करूँ, सेठ साहब? मज़बूरी है। यह सरकार हमें देती नहीं स्टेशनरी..और ऊपर से काम के बोझ अलग से लाद देती है। बिना स्टेशनरी, हम काम कैसे करें? फिर क्या? अहमदिया की टोपी मेमूदिये के सर और मेमूदिये की टोपी अहमदिये के सर रखनी पड़ती है, हुज़ूर। माफ़ी चाहता हूँ हुज़ूर, आपको तक़लीफ़ दी।” रजिस्टर में इन्द्राज करता हुआ, ओम प्रकाश बोला।

मगर यह एलिमेंटरी का होल तो ऐसा कबूतर ख़ाना ठहरा, जहां यहां की बात वहां और वहां की बात यहाँ आराम से सुनायी देती है। इस तरह ओम प्रकाश का डाइलोग सुनकर संस्थापन शाखा के बाबू गरज़न सिंह ठहाके लगाकर हंस पड़े, और ज़ोर से उन्होंने सेठ साहब से कहा “सेठ साहब, अपनी अंटी ढ़ीली कर दीजिये, हुज़ूर। अगर नंबर दो नंबर की कमाई से कुछ बाहर निकाल लोगे, तब भी कोई कमी आयेगी नहीं आपके। आप तो समझदार हैं, गोस्वामी तुलसी दासजी की ने क्या कहा? वह आप जानते ही हैं..‘चिड़ी चोंच भर ले गयी, नदी न घटियों नीर।’ समझे, आप?”

“नदी को मारो, गोली। बाबूजी सागर लूट ल्यो..आयकर वालों ने रेड मारकर। इस बात को चार रोज़ हो गए..इन आयकर वालों की नानी मरे, बरबाद कर डाला मुझे।” बाबू गरज़न सिंह से इतना कहकर, सेठ साहब ने उठते हुए ओम प्रकाश से आगे कहा “ठीक है, बाबू साहब। बराबर शाम को चार बजे आ जाऊंगा, बस आप टी.सी. तैयार रखना।” इतना कहकर सेठ साहब रुख़्सत हो गए, मगर भूल गए रेड एंड वाइट सिगरेट का पैकेट वापस ज़ेब में रखना। वह पैकेट, ओम प्रकाश की टेबल पर पड़ा रह गया।

तांक-झांक महकमें के उस्ताद रमेश की निग़ाह उस पर जा गिरी, उसे देखते ही उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहा। वह सोच बैठा “वाह उस्ताद। आज़ तो हमारी क़िस्मत अच्छी है, अब हम चाय की चुस्कियां लेते हुए रेड एंड वाइट सिगरेट के धुए के गुब्बार छोड़ेंगे। इस करमज़ली बीड़ी की बदबू से तो अब दिल भर गया।” इतना सोचकर, वह लपक पड़ा सिगरेट का पैकेट मारने। मन में यह भी भय छा रहा था, कहीं घीसू लालजी की नज़र इस पैकेट पर गिर गयी..तो हाथ आती चिड़िया भी, हो जायेगी उड़न-छू। फिर क्या? झट वह ओम प्रकाश के निकट चला गया, और कहने लगा “ओमजी, आप फटे बस्ते क्यों वापरते हैं? आप कहें तो, इन फटे बस्तों को स्टोर में जमा करा दूं..? और फिर इसके एवज़ में, नए बस्ते ला दूं?” मस्कागिरी करता हुआ, रमेश बोल पड़ा।

“मांगता हूँ तब तो तू लाकर मुझे देता नहीं, आज़ क्या सूरज पश्चिम में उदय हुआ क्या?” बाबू ओम प्रकाश ने, ज़वाब दिया।

“ऐसा मत कहिये ओमजी, आप हुक्म दें तो अभी मैं नए बस्तों के ढेर लगा दूं आपके लिए। आपकी परसनल्टी के आगे ये बस्ते क्या चीज़ है, हुज़ूर? हुज़ूर मैं तो आपके उस डायलोग पर फ़िदा हो गया, क्या मारा आपने वह डायलोग उस सेठ को? ‘साले आ जाते हैं दफ़्तर में, बिना दफ़्तर का क़ायदा जाने?’ समझे, हुज़ूर?” रमेश बोला, उसका हर अल्फ़ाज़ मक्खनबाजी में डूबा था। फिर ओम प्रकाश की अलमारी से पुराने बस्ते बाहर निकालता हुआ, आगे कहने लगा “ये सारे बस्ते फटे पड़े हैं, इन बस्तों को स्टोर में जमा करवाकर नए बस्ते ले आता हूँ। आप भी क्या याद रखेंगे, मुझे? बस हुज़ूर, आपकी मेहरबानी हम जैसे ग़रीबों पर बनी रहे।” यह कहकर, रमेश ने ओम प्रकाश को मक्खन के पहाड़ पर चढ़ा दिया। बाबू ओम प्रकाश भी, सोच में डूब गया ‘आज़ के ज़माने में ऐसे चपरासी कहाँ मिलते हैं...जो बिना मांगे, स्टोर से वांछित सामग्री ले आयें? और जो दफ़्तर के अफ़सरों और तुर्रम खां बाबूओं को छोड़कर, नव-नियुक्त बाबूओं का ख़्याल रखते हों..?’

सेठजी का जिक्र करके रमेश ने बाबू ओम प्रकाश की छाती गर्व से इस तरह फूला दी कि, वह अपने बर्ताव को सही समझने लगा। वह समझ गया ‘अगर इस तरह ऐरे-गैरे सरीखों को लिफ्ट देता गया, तो उसे बाबू कहेगा कौन? सच्च यही है अपना उल्लू सीधा करने के बाद, सेठ का काम हाथों-हाथ न करके उसने बाबू का धर्म निभाया है।’ इस तरह ओम प्रकाश अपने-आपको सही बाबू मानने लगा, क्योंकि वह भी अन्य बाबू लोगों की तरह काम हाथो-हाथ न करने के उसूल पर चला है। अब लोगों की बात उसे सही लगने लगी कि, बाबूओं के बारे में उनकी राय बिल्कुल सही है....‘अगर चार-पांच चक्कर काम के लिए न कटवा दिया जाय, तो क्या इज़्ज़त रहेगी हम लोगों की? लोग यही कहेंगे कि, यह साला बाबू नहीं घसियारा है जो हरेक का काम फोगट में जल्दी कर देता है।’

इस तरह बाबू ओम प्रकाश, रमेश द्वारा बिछाए गए झूठी तारीफ़ों के ज़ाल में फंसकर इस तरह झकड़ लिया गया कि, वह बिल्कुल भी जान न पाया ‘इसके पीछे, इस रमेश की क्या मंशा रही होगी?’ इधर रमेश इन्हें धता बताकर, बस्तों के साथ सिगरेट का पैकेट भी हड़प गया..जिसकी ओम प्रकाश को बिल्कुल भी भनक न लगी।

आयकर से आये नोटिस ने सेठ साहब का सुख-चैन छीन लिया, बेचारे बिल्कुल भूल गए कि ‘उनको लगभग तीन बजे एलिमेंटरी दफ़्तर आकर, बच्चे की सत्यापित टी.सी. उन्हें ले जानी है।’ दफ़्तर से वापस आने के बाद, उन्होंने बचा हुआ वक़्त कर सलाहकार के दफ़्तर में बिता दिया। अगले दिन, वे हवाई बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़ने लगे..उस वक़्त बेचारे सेठ साहब के दिल में मची थी, उथल-पुथल। वे सीढ़ियां चढ़ते हुए यही सोच रहे थे कि, ‘यह टी.सी. सत्यापन का काम करने वाला बाबू ओम प्रकाश, अपनी सीट पर मिलेगा या नहीं? अगर, नहीं मिला तो..? सारी ग़लती, किसकी? छोरे का दाख़िला, मुंबई की स्कूल में करवाने की बात उसने सोची ही क्यों? न कराया होता तो, आज़ इस दफ़्तर के चक्कर तो न लगाने पड़ते? अब यह टी.सी. सत्यापन की बीमारी, मेरे सर पर आ गयी। अब यह कार्य करूँ, या अपने धंधे की तरफ़ अपना ध्यान दूं? तौबा तौबा, मेरी अक्ल मारी गयी, जो इस लुगाई की बात मानकर छोरे का दाख़िला मुंबई की स्कूल में करवाने की बात सोची? बेचारी मेरी मां ने कितनी दफ़े कहा मुझे कि, ‘इस बच्चे को यही रहने दो, इसकी सारी जिम्मेदारी मेरी। इसके यहाँ रहने से, मेरा दिल भी लग जायेगा..’ मगर हाय री मेरी फूटी क़िस्मत, लुगाई के बहकावे में आकर, मैंने छोरे की टी.सी. कटवाई..और, अब यह देण?”

इस तरह हवाई बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़ रहे सेठ साहब, देण-देण अल्फ़ाज़ बार-बार बड़बड़ा रहे थे। तभी सेठ साहब को लगा, किसी ने उनके कंधे पर हाथ रखा है। नाक-भौं की कमानी को सही करके उन्होंने सामने देखा, सामने खड़ा था चपरासी कैलाश बाबू सैन। उसने अपनी शक्ल और सूरत ऐसी बना रखी कि, वह दफ़्तर का चपरासी कम मगर मुंबई का कमीशन एजेंट ज़्यादा ही लग रहा था। वह सेठ साहब के कंधे से अपना हाथ हटाकर उन्हें बहकाता हुआ, यों बोल पड़ा “सेठ साहब। यहाँ आकर आपने, अपना वक़्त क्यों जाया किया? जानते नहीं, टी.सी. सत्यापन का चार्ज नारायण बाबू का है...और वे आज़, अवकाश पर हैं?” कैलाश बाबू सैन ने इतना कहकर, उस शिकार को वहां तड़फ़ता छोड़ दिया। फिर हवाई बिल्डिंग की सीढ़ियां उतरकर, वह चला गया..उसका मंतव्य था, वापस आकर इससे सेटिंग करके, वह अपना काम ज़रूर बना लेगा। मगर यहाँ तो कैलाश बाबू सैन की बात सुनकर सेठ साहब के हाथ के तोते उड़ गए, वे सोचने लगे “वाह री क़िस्मत..फिर कल मैं ओम प्रकाश के पास क्या कर रहा था, क्या वह साला फर्ज़ी निकला? यह चार्ज तो नारायण बाबू के पास, और वे आज़ छुट्टी पर, अब टी,सी. सत्यापन का काम करेगा कौन? दाख़िले की लास्ट डेट नज़दीक, अब तो छोरे की क़िस्मत मारी गयी..अब तो उसका एडमिशन गया तेल लेने।”

सीढ़ियों के मोड़ पर बैठा रमेश सिगरेट के धुए निकाल रहा था, उसने वहां बैठे-बैठे कैलाश बाबू सैन की कही बात सुन ली..फिर क्या? उसने सिगरेट का अंतिम कश लिया, और सिगरेट के बचे हुए सुलग रहे टुकड़े को नीचे गिरा दिया। जो सीधा आकर, नीचे आराम फ़रमा रहे भंडारी [कुत्ते] के बालों में जा गिरा। जैसे ही सुलगते टुकड़े से भंडारी की चमड़ी जलने लगी, और वह बेचारा उस जलन को बर्दाश्त कैसे कर पाता? झट पूंछ दबाये वह भंडारी, भौंकता हुआ सेठ साहब के पास से गुज़रा। और गुज़रते-गुज़रते उनकी धोती से अपना बदन रगड़ता हुआ, ख़ाल के बालों में चिपके हुए सुलगते सिगरेट के टुकडे को छुड़ाकर वह नौ दो ग्यारह हो गया। उस कुत्ते से बेचारे सेठ साहब इतना डर गए कि, उनकी धोती खुलती-खुलती रह गयी।

“सेठ साहब, मुज़रो सा। कुत्ते से क्या डरते हो, मालिक? ये कुत्ते तो इन सीढियों पर ऐसे ही पड़े रहते हैं, रोज़। खैर छोड़िये, इस बात को। बताइये, कैसे पधारे आप? कल काम नहीं हुआ, क्या?” रमेश ने अपनापन जतलाते हुए, सेठ साहब से कहा।

“छोरा। तू मुझसे मज़हाक़ कर रहा है, जानता है मैं तेरे बाप की उम्र का हूँ? कल तूने फर्ज़ी आदमी से मिला दिया, अब देण हो गयी मेरे।” सेठ साहब ने नाराज़ होते हुए, कहा।

“एक बात कहूं, आप ज़रा अपना कान इधर लाइए।” रमेश ने कहा “बात सीक्रेट है..”

“ले भाया, सिगरेट..यही चाहिए तूझे..?” ज़ेब से सिगरेट का पैकेट बाहर निकालते हुए, सेठ साहब बोले।

“सेठ साहब सिगरेट नहीं, सीक्रेट यानी गोपनीय बात।” सेठ साहब के कान के पास मुंह ले जाकर, रमेश बोला। फिर उसने उस सिगरेट के पैकेट से तीन-चार सिगरेटें बाहर निकालकर, पैकेट उनको वापस थमा दिया।”

“यूं कह भाया, क्या लेगा तू सीक्रेट के लिए..सिगरेटें तो तूने मार ली, अब और तूझे क्या चाहिए?” सेठ साहब बोले।

“मालिक, बस एक कप चाय।” इतना कहकर, उसने अपनी आँखें इधर-उधर घुमाई..उसे वहम था कहीं बाबू गरज़न सिंह या ओ.ए. घीसू लालजी उसे सेटिंग करते न देख ले?

फिर क्या? सीढ़ियां चढ़ते आ रहे भंवर को बीच में ही रोक दिया सेठ साहब ने, फिर उसे एक कप चाय के पैसे देकर चाय से भरा प्याला रमेश को थमा दिया। रमेश आराम से बड़ी सीढ़ी पर बैठकर, चाय की चुस्कियां लेता रहा। चाय पी लेने के बाद, उसने ख़ाली कप नीचे रखा। फिर, वह सेठ साहब से बोला “चलिए, सेठ साहब। पहले ज़र्दे की फाकी लगा ली जाय।” इतना कहकर, रमेश ने ज़ेब से पेसी बाहर निकालकर हथेली पर ज़र्दा और चूना फैलाया। फिर उस मिश्रण को अंगूठे से मसलकर, उसने सुर्ती तैयार कर डाली। इसके बाद, दूसरे हाथ से उस पर लगाई थप्पी। फिर क्या? खंक फ़ैली, और जिसने सेठ साहब के नासा-छिद्र खोल डाले। अब तो बेचारे सेठ साहब, तड़ा-तड़ छींकें खाने लगे। आख़िर बेचारे सेठ साहब कमीज़ की ज़ेब से रुमाल बाहर निकाला, और अपना नाक सिनककर साफ़ किया। बेचारे सेठ साहब की यह बुरी हालत देखकर, रमेश को रहम आने का...कोई सवाल नहीं..? वह तो झट उन पर तंज़ कसता हुआ, कहने लगा “अरे सेठ साहब, ज़र्दे और चूने से ही डर गए? जनाब चूना तो अब लगेगा, सीक्रेट बताने के बाद।”

अब वह सेठ साहब को एलिमेंटरी के होल में ले आया, और बाबू ओम प्रकाश की तरफ़ उंगली का इशारा करता हुआ, कहने लगा “जाओ, बाबू ओम प्रकाश के पास। नारायण बाबू की अलमारी और टेबल की दराज़ की चाबी, उनके पास है। बोल देना, ‘स्टेशनरी का ख़र्च और दे दूंगा..आप हमारा काम आज़ ही कर दीजिये...’ बस इतना ही कहना है, आपको। काम हो जाने के बाद, इस बन्दे को भूल मत जाना।” रमेश बोला।

“ठोकिरा। यह तो वही कल वाले साहब है, अब सोच ले पहले..काम फर्ज़ी नहीं होना चाहिए। न तो तेरी इज़्ज़त की बख़िया यहीं उधेड़ दूंगा, समझा?” इतना कहकर, सेठ साहब ने ओम प्रकाश की सीट की तरफ़ अपने क़दम बढ़ा दिए।

रमेश ने दीवार पर ज़र्दे की पीक थूकी, फिर दफ़्तर के दरवाज़े के पास रखे स्टूल पर आकर बैठ गया। और फिर तांक-झाँक करता हुआ हाल में बैठे हर बाबू और अधिकारी की गतिविधियां देखने लगा कि, कौन क्या कर रहा है?

आज़ रमेश के पास कोई काम न रहा, इस तांक-झांक के अलावा। डाक ले जाने का काम, बाकी रहा नहीं..क्योंकि, कैलाश बाबू सुबह १० बजे ही, डाक लेकर चला गया। अब तो वह शाम को ही अपने दर्शन देगा, जब दफ़्तर बंद होने का वक़्त हो जाएगा। इस नेमा राम को तो वैसे ही लेखा शाखा को सौंप दिया गया था....फिर क्या? शेष रही तीन महिला चपरासी, जिन्हें शहर की स्कूलों से डेपुटेशन पर इस दफ़्तर में बुलाया गया था। ये तीनों महिलाएं, सबको पानी पिलाने का काम कर रही थी। स्कूलों में वेकेशन चलने के कारण, ये महिला चपरासी स्कूल न जाकर घर पर आराम फ़रमाया करती थी..इसलिए इनको दफ़्तर में डेपुटेशन पर लगा दिया गया, ताकि वे छुट्टियों में बराबर ड्यूटी देती रहे। इस तरह ये महिलाएं दफ़्तर के दूसरे काम भी करती थी, जैसे दस्तावेज़ों की फोटोस्टेट बाज़ार से करवाकर लाना, नीचे चाय की दुकान से चाय लाना वगैरा। तब रमेश के हिस्से में ऐसा कोई काम नहीं रहा, जिसे वह करता रहे। यही कारण रहा, वह यहाँ बैठा-बैठा तांक-झांक करता जा रहा था।

रमेश के लिए अच्छा हुआ, आज़ नारायण सिंह छुट्टी पर रह गए। हमारे रमेश भाई को तो शौक ठहरा, बाबू बनकर इतराने का ..? फिर क्या? थोड़ी देर बाद, आकर जम गए उनकी सीट पर। फिर लगे, टेबल की दराज़ संभालने। मगर, यह क्या? उस दराज़ में तो डाक भेजने का एक भी सर्विस-पोस्टेज स्टाम्प नज़र नहीं आया, रमेश को? वह बेचारा निराश होकर, विचार करने लगा “वाह रे, मुच्छड़..? इतना भी भरोसा नहीं, मुझ पर? सारे स्टाम्प लोक में रखकर चला गया, कमबख़्त..? ठीक है, ठीक है..अब कह देंगे घीसू लालजी से ‘हुज़ूर, बिना स्टाम्प डाक नहीं निकलती।’ अच्छा है, अब तो बीड़ी पीकर मस्त हो जायेंगे..मुझे इस दुनिया का क्या करना? दुनिया जाएँ, भाड़ में। हम तो बीड़ी ही पियेंगे, बैठकर।”

अभी तो उसकी ज़ेब में तीन सिगरेटें बची हुई थी, धुआ निकालने के लिए..मगर बीड़ी, तो बीड़ी होती है..! जो अल्प वेतन भोगी चपरासियों के लिए, वक़्त गुजारने का साधन होती है। यह आम बात है..हर जगह बैठकर हमारे चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी इसका सेवन नहीं करते, क्योंकि ऐसी-वैसी जगहों पर बैठकर बीड़ी पीना..इनकी तोहिन है। असल बात यह थी कि, उनको भय रहता था, कहीं कोई बाबू या ओ.ए. साहब वहां न आ जाए और उनके धूम्रपान में अवरोध पैदा न कर दे..? इस व्यवधान के आने की पूरी गुंजाइश होने के कारण इनको तो ऐसा स्थान चाहिए, जहां चार चपरासी मिलकर बैठेंगे और बैठे-बैठे चाय-पकोड़ों का लुत्फ़ उठाते हुए बीड़ी के धूम्र-पान का मज़ा भी उठा पाएंगे..और साथ में हफ्वात हांकते हुए अपना वक़्त भी बिताते जायेंगे। इन दिनों डी.ई.ओ. मेडम ओमवती सक्सेना लम्बे चिकित्सा-अवकाश पर चल रही थी, इस कारण उनका कमरा इन चपरासियों के लिए वक़्त गुज़ारने का स्थान बन गया। वैसे तो ओमवती सक्सेना से हवाई बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़ी नहीं जाती। अत: ये चपरासी लोग तो इस कमरे को पहले से ही, टाइम-पास का कमरा बना चुके थे।

तभी नेमाराम रमेश के पास से गुज़रा, उस पर निगाह गिरते ही रमेश ने उसे अपने पास बुलाकर कहा “नेमा। कहाँ जा रहा है, ठोकिरे?”

“देखता नहीं, कहाँ जाऊंगा..आख़िर? चाय लाने, और कहाँ? जानता नहीं, उस पाडे [भैंस के बच्चे की गाली] राजेंद्र सिंह को? साला बाबू गरज़न सिंह के पास दिन-भर बैठा-बैठा, चाय-नमकीन मंगवाता रहता है।” नेमा राम बोला।

“चाय तो तू भी पीता है ना, सड़प-सड़प करता हुआ? पेट-भर नमकीन खप-खप करता ठोकता है, साला..फिर तूझे किस बात की तक़लीफ़?” रमेश ने, चिढ़ाने के लहज़े से उसे कहा।

“यह बात नहीं है, बात यह है..यह पाडा है, बड़ा स्वार्थी। जिससे मतलब निकले, उसी को खिलाता-पिलाता है..हरामखोर..? देखो यार, गरज़नजी के मना करने के बावज़ूद उनके लिए चाय-नमकीन मंगवाता रहता है..और, गरज़ करके ज़बरदस्ती उनको खिलाता-पिलाता है। और देख रमेश, हमारे साहब घसीटा रामजी के लिए कुछ नहीं मंगवाता..यह इसकी, कैसी बेरुख़ी?” नेमा राम ने, झट अपने दिल की बात कह दी।

“तू और तेरा साहब घसीटा राम जाये, तेल लेने। साले तेरा साहब है भी इसी लायक..कोई उसकी क़द्र न करे। साले में अच्छे गुण होते तो यह इन्सान, मेरी तनख़्वाह का लफड़ा पैदा नहीं करता...” ज़र्दे की पीक कचरादान में थूककर, रमेश बोला। उसके दिल में घसीटा राम के प्रति इतनी घृणा पैदा हो गयी..कि, अपने दिल में उनको गालियां देने लगा। उनको गालियों का गुलदस्ता भेंट करता हुआ अपने होंठों में ही कह रहा था “यह साला घसीटा राम समझता नहीं, दफ़्तर की मर्यादा...? कई ऐसे मेटर भी होते हैं, जिनको गोपनीय कहते हैं..उनको गुप्त रखा जाता है।” फिर क्या? सोचता-सोचता वह विचारों की दुनिया में खो गया, और उसके मानस-पटल पर वे वाकये चित्र-पट की तरह सामने आने लगे जो बता रहे थे, ‘इस घसीटा राम ने उसके साथ, क्या किया?’

बस, बात हुई भी ऐसी..तबादलों के मौसम में एक दिन बाबू गरज़न सिंह का हुक्म तामिल करता हुआ रमेश, अध्यापकों के तबादलों की फ़ेहरिस्त [सूचि] चक्रांकित कर रहा था। उस वक़्त यह चक्रांकित करने की मशीन, लेखा शाखा में रखी हुई थी। रमेश को लिस्ट चक्रांकित करते देखकर, घसीटा राम ने उससे चक्रांकित की गयी एक प्रति मांग ली। मगर रमेश गरज़न सिंह की बिना अनुमति, उनको तबादले की प्रति कैसे दे सकता था? देना तो दूर रहा, वह तो उस लिस्ट को पढ़ने के लिए दिखला भी नहीं सकता था। आख़िर, रमेश ठहरा ख़ास प्यादा बाबू गरज़न सिंह का, वह कैसे उनके हुक्म की अवहेलना कर सकता था? प्रति न मिलने से घसीटा राम उससे नाराज़ हो गए, और उन्होंने अपने दिल में गाँठ बाँध ली “इस साले रमेश को छठी का दूध न पिला दिया, तो मैं उस्ताद पेढ़ीवाल साहब का शागिर्द न कहलाऊंगा।” ईश्वर सभी की सुनते हैं, एक दिन घसीटा राम को बदला लेने का मौक़ा मिल गया। बात यह हुई कि, कार्यालय बज़ट में एक चपरासी का बज़ट कम आया। उस आदेश की पालना में उनको, किसी एक चपरासी का वेतन रोकना था..! तब बदले की फ़िराक में बैठे घसीटा राम ने, रमेश का वेतन बिल किसी ऐसी ग्रामीण मिडल स्कूल से बनवाया जहां एक चपरासी का पद ख़ाली था। इस तरह भुगतान उठाने के बाद, उसे इस दफ़्तर से कार्य मुक्त करके उस स्कूल में भेजने की कार्यवाही कर डाली। मगर उनका ठहरा, दुर्भाग्य। बाबू गरज़न सिंह को अपने जासूसों से यह ख़बर कार्यवाही करने के पहले ही मिल गयी कि, घसीटा राम अब क्या करने जा रहे हैं? अत: वक़्त के पहले चेतकर बाबू गरज़न सिंह, निदेशालय बीकानेर चले गए। फिर क्या? हाथो-हाथ इस दफ़्तर में, रमेश के लिए स्वीकृत पद और बज़ट लेकर आ गए। बीकानेर से वापस आते ही उस आदेश को घसीटा राम के मुंह पर मारकर, रमेश का वेतन इसी कार्यालय से उठाने की उन्होंने कार्यवाही कर डाली। बेचारे घसीटा राम की बुरी स्थिति ऐसी हो गयी..उन्हें लगने लगा ‘वे खिसियानी बिल्ली बन गए हैं, और खम्भे को नोचते जा रहे हैं..?’ इसके बाद तो उनको दफ़्तर के हर चपरासी में, बाबू गरज़न सिंह की छायाँ नज़र आने लगी। बस अब उनके दिमाग़ में एक यही बात समा गयी, बस अब बदला लेना है..बदला लेना है। जिसके लिए, उनको दफ़्तर का हर कार्य रोकना पड़े? वेतन विपत्रों और अन्य विपत्रों पर अड़ंगा लगाते हुए, जांच कर्ता के हस्ताक्षर करने उन्होंने बंद कर दिए। उनका सोचना यही था, ‘वक़्त पर अध्यापकों को वेतन और अन्य विपत्रों का भुगतान नहीं मिलेगा तो, अध्यापक समुदाय नाराज़ होकर बवाल ज़रूर खड़ा करेंगे। तब, पुष्कर नारायणजी तो क्या? सभी बाबू और ओ.ए. साहब भी उनके सामने सरेंडर हो जायेंगे, इस तरह काम करवाने के लिए वे सब आयेंगे हमारे पास। इस तरह एक दफ़े तो, इस गरज़न सिंह को आइना दिखलाने का मौक़ा मेरे हाथ लग जाएगा।’

मगर यहाँ तो पुष्कर नारायण निकले, बड़े चालाक। झट उन्होंने विपत्रों में लगी आहरण एवं वितरण अधिकारी की कोड नंबर वाली मोहर के नीचे खाज़िन महेश कुमार शर्मा से लघु-हस्ताक्षर करवा डाले। फिर मोहर के ऊपर आहरण एवं वितरण अधिकारी के तौर पर, उन्होंने अपने हस्ताक्षर कर डाले। फिर, कोषागार बिल भेजकर उन बिलों को पारित करवा दिया। इस तरह कहीं भी, लेखाकार घसीटा राम के हस्ताक्षरों की ज़रूरत नहीं पड़ी। विपत्रों का भुगतान अध्यापकों को मिल गया, बेचारे घसीटा राम का यह वार ख़ाली गया। अब घसीटा राम ने डाल दिए हथियार, बस, फिर क्या? ‘कान्हा तो भोला है, देण नहीं करनी..दुनिया में जैसा चलता है, चलने दो।’ इस कहावत की पालना करते हुए घसीटा राम, चुप बैठ गए अनुकूल वक़्त की प्रतीक्षा में।

तभी रमेश को, अपने सर में दर्द महसूस हुआ..उसे लगा किसी ने उसके सर पर डंडे से प्रहार किया है? वह दर्द को बर्दाश्त न कर पाया, और ख्यालों की दुनिया को छोड़कर वह वर्तमान में लौट आया। आखें खोलकर, सामने नेमा राम को देखा...जो उसके सर पर एक ठोल मार चुका था, और वह अगला एक और ठोल मारने वाला था। अपनी ओर आते उसके हाथ को, झट उसने पकड़ा। फिर, बोला “क्या करता है रे, मूर्ख?”

“तब तू साला बोलता क्यों नहीं, कब से तुझसे पूछता जा रहा हूँ..बोल क्यों रोका, मुझे?” नेमा राम बोला।

“अब तू यों कर, भंवर को तीन कप चाय ज़्यादा भेजने का कह देना। फिर क्या? इस साले पाडे राजेंद्र के खाते से, हिसाब हो जाएगा। समझा, प्यारे चमन लाल?” मुस्कराता हुआ, रमेश नेमा राम से बोला।

“और, कुछ?” नेमा राम ने, एक बार और पूछ लिया।

“और क्या? तू भी आ जाना डी.ई.ओ. मेडम के कमरे में। वैसे भी तू जानता ही है, यह मेडम कभी इस कमरे में बैठती नहीं, वह हवाई बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़ नहीं सकती। तब तो प्यारे, यह तो अपुन चपरासी लोगों का कमरा बन गया है..हफ्वात हांकने का। और तूझे मालूम नहीं, अभी बाबू गरज़न सिंहजी और राजेंद्र सिंह इसी कमरे में बैठे शतरंज खेल रहे है। आख़िर चाय तो तूझे, उस कमरे में ही लानी है। समझ गया, मेरे चमन लाल?” नेमा राम को समझाता हुआ, रमेश बोला।

नेमा राम चाय लाने चला गया। उसके जाने के बाद, रमेश डी.ई.ओ. मेडम के कमरे में चला आया। उसे आते देखकर, बाबू गरज़न सिंह शतरंज के मोहरों को चलाते हुए रमेश से बोले “देख रमेश। यह है घसीटा राम का बादशाह और यह ऊंट है मास्टर राम रतन बोहरा, ठीक है...अब तू समझ गया, ना? देख यह ऊंट तिरछी चाल चलकर, कैसे घसीटा राम के बादशाह के सामने आता है? बोल प्यारे लाल, यह शह तूझे कैसी लगी?” बाबू गरज़न सिंह ने ऊंट का मोहरा उठाकर, घसीटा राम के बादशाह के सामने रखा और आगे बोले “बीकानेर गया था, इस ऊंट की नाक में नकेल डालने का प्रबंध कर आया प्यारे। तूझे ध्यान है, माध्यमिक शिक्षा दफ़्तर के शिव कुमारजी शर्मा के आगे-पीछे यह ऊंट चक्कर काटता रहता है, और इधर इस घसीटे के आका भी यही शिव कुमारजी ही हैं। इधर इनका शागिर्द आनंद कुमार भी कोई कम नहीं, इनकी मस्कागिरी करने में। अब ये साले हमारे इस दफ़्तर में आये हैं, शतरंज बिछाने। इन सालों दूसरे दफ़्तर वालों को मैं ऐसी मात दूंगा, ये बेचारे हो जायेंगे चारों खाना चित्त। अजी ये दुनिया वाले साले कुछ भी करें, क्या कर सकते हैं इस बाबू गरज़न सिंह यानी ज्ञान चंद अग्रवाल का..? आख़िर हम ठहरे विलेनों के किंग ‘आशुतोष राणा’ के हमशक्ल..जिसे सपने में भी, पराजय कभी अपना मुंह न दिखाती। सभी लोग जानते हैं, मुझे। मैं क्या हूँ? ‘तू डाल-डाल, और मैं पात-पात।’ रमेश, समझा प्यारे? यही है, मेरी शतरंज की चाल।”

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पाठकों।

अभी आपने पुस्तक “डोलर-हिंडा” का अंक २१ “तू डाल-डाल, और मैं पात-पात” पढ़ा होगा? अब आप समझ गए होंगे, एलिमेंटरी दफ़्तर के तेज़-तरार शातिर सियासती शतरंज के कुशल खिलाड़ी बाबू गरज़न सिंह यानी ज्ञान चंद अग्रवाल की अदा को? अगर आपको यह अंक पसंद आया हो तो, आप ज़रूर अपनी प्रतिक्रिया मेरे ई मेल पर भेजें। अब इस अंक के बाद, अंक २२ “धोबी-पाट” आपके पढ़ने के लिए शीघ्र ही प्रस्तुत किया जा रहा है। आशा है आप अंक २२ “धोबी-पाट” को ज़रूर पढेंगे, और सीनियर डिप्टी सोहन लालजी सोनी और कनिष्ठ लिपिक ललित कुमार दवे के किरदारों के बारे में अपनी प्रतिक्रिया प्रगट करते हुए मुझे ज़रूर अवगत करेंगे....कि, यह अंक आपको कैसा लगा?

दिनेश चन्द्र पुरोहित [लेखक – पुस्तक ‘डोलर-हिंडा’] जोधपुर, शनिवार, 9 फरवरी 2019

ई मेल dineshchandrapurohit2@gmail.com और dineshchandrapurohit2018@gmail.com

संस्मरण 6434226938072477395

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