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कहानी - दरिंदगी - वन्दना पुणतांबेकर "वंदन"

मेरी जिंदगी की वह काली रात आज भी मुझे अच्छे से याद है।

जब हम इस शहर में नये, नये आये थे। हम लोग तब कितने खुश थे। विशाल और संयम दोनों को मानो यह शहर सपनों की तरह लगता था। हम कभी महानगर में नहीं रहे थे। छोटे शहर से अचानक महानगर की चकाचौंध हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। बड़े-बड़े मॉल, रेस्टोरेंट, भव्य इमारतें न जाने क्या,क्या ।

हम तीनों काफी खुश थे। विशाल का कम्पनी में प्रमोशन हुआ था। महानगर की बड़ी कम्पनी में आना उसे भी सुखद अनुभूति दे रहा था। संयम का अभी फोर्थ क्लास में एडमिशन करवाया था। अब कुछ किसी सपने की तरह लग रहा था। हम तीनों बहुत खुश थे।

वीनी उस रात के ख्यालों में ऐसे खो गई। जैसे सब कुछ अभी अभी हुआ हो।

हेलो.....,हेलो विशाल आज आप घर जल्दी आ जाना...?

"क्यों क्या बात है। मुझे तो शाम की फ्लाइट से पूना जाना है। आज सम्भव नहीं है। देर हो जाएगी।

"नहीं..."नहीं आज संयम का बर्थडे है। और हमारी यहाँ किसी से पहचान भी नहीं है। हम आज की शाम संयम के साथ किसी बड़े मॉल में जाकर मनायेंगे । वह खुश हो जायेगा। प्लीज़ मना मत करना।

"नहीं विनी आज पॉसिबल नहीं हैं। तुम्ही मैनेज कर लेना,एक अर्जेन्ट मीटिंग है । में अकेले इस शहर में संयम को लेकर नहीं जाऊँगी। आप कल चले जाना,में कुछ नहीं जानती कहकर विनी ने फोन रख दिया।

आज कैसा रहा ,बर्थडे स्पेशल डे तुम्हारा संयम के घर आते ही विनी ने पूछा...,"मॉम बड़ा मजा आया...,"ओके आज हम मॉल जायेंगे वहाँ खूब एन्जॉय करेगे..,

"रियली मॉम..,"यस रियली।

दो बज चुके थे। विनी आज बहुत खुश थी। तभी फोन की घंटी बजी, विशाल का फोन था।

हेलो ,"आज नहीं हो पायेगा,हम इस विकेंड संयम का बर्थडे सेलिब्रेट करेंगे,काम जरूरी है ,वीनी यदि यह मीटिंग अटेन्ड कर ली,और कंपनी को ये, प्रोजेक्ट फाइल पसंद आ गई तो, तुम्हारे पति देव का प्रमोशन पक्का है, डियर ऐसे मौके जिन्दगीं में बार-बार नहीं आते....,प्लीज़ मैनेज यू। ,

"नो,मैंने संयम को बोल दिया है, वह भी आपका इंतजार कर रहा है,कहते हुए विनी ने फोन पटक दिया।

ठीक पांच बजे डोर बेल बजी। विनी ने गेट खोला तो, विशाल हाथ में केक लिये खडा था।

विनी की खुशी का ठिकाना ना रहा। "आज आप हमारी फिरकी ले रहे थे क्या...?

" यह बात नहीं है। आज तुम्हारे दिल की मुराद पूरी हो गई,अब यह मीटिंग मंडे को है। किसी कारण से निरस्त हो गई हैं।

चलो केक काट लो। आज की शाम आपके ओर संयम के नाम कहकर हँसते हुए। संयम को गोद

में उठा लिया। तीनों ने मिलकर केक काटा ,सारे पिक्स फेसबुक, व्हाट्सएप पर सेंड की, अपनी जिंदगी की खुशियां विनी ने सब के साथ शेयर की। हजारों ब्लेसिंग आने लगे। आज विनी को मानो पंख लग गए थे।

तीनों इस रंगीन दुनियॉ की चकाचोंध देखने निकल पड़े।

आज उनके इकलौते बेटे का जन्मदिन था। विनी ने पहली बार इतना बड़ा भव्य मॉल देखा था।

उन्होंने मॉल घुमा, शॉपिंग की आज दुनियॉ की सारी खुशी उनके दामन मे थी।

गेम झोन में काफी शोरगुल था। तभी विशाल ने देखा कि उसका फ़ोन बज रहा था। उसने विनी को कहा..,"मेरा अर्जेन्ट कॉल है..,में बाहर जाकर बात करता हूं।

। वह बाहर बात कर रहा था। तभी संयम को वॉशरूम जाना था। विनी उसे लेकर वॉशरूम गई। कि अचानक बाहर गोलियों की आवाजें सुनाई देने लगी। चीख पुकार सुनकर विनी घबरा गई। वह वॉशरूम से बाहर आना चाह रही थी। लेकिन वह खुल नहीं रहा था।

वह काफी घबरा गई थी। उसने पहले कभी ऐसी आवाजें नहीं सुनी थी। अचानक लाईट चली गई। वह संयम को लेकर बाहर आना चाह रही थी। लेकिन दरवाजा नहीं खुल रहा था। तभी दरवाजा खुला ,एक आदमी अंदर आया। बोला,"मैडम मॉल में आतंकी हमला हुआ है। अभी बाहर मत जाओ यही पर छुपी रहो,नहीं तो बेमौत मारी जाओगी। विनी कुछ समझ पाती इसके पहले ही संयम उसका हाथ छूटकर बाहर निकल गया। विनी भी उसके पीछे भागना चाह रही थी। कि उस आदमी ने विनी का हाथ पकड़कर उसे रोक लिया।

बोला, बाहर मारी जाओगी । "लेकिन मेरा बेटा और पति बाहर है ,में यहाँ नहीं रुक सकती,छोड़ो मेरा हाथ घबराते हुए उसने उस आदमी से कहां। अपना हाथ छुटाकर जैसे ही विनी बाहर आई तो उसकी रूह कांप गई बाहर लाशें बिखरी पड़ी थी। विशाल और संयम उसे कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे। चारों ओर घना अंधेरा था। समझ नहीं आ रहा था। कि वह किधर जाय। तभी गोलियों की आवाजें आने लगी। किसी के कदमों की आहट उसे अपनी ओर आते सुनाई दी। दो बड़े साये उसी की ओर आ रहे थे। हाथों में बड़ी सी बंदूकें थी। वह घबराकर उसी वॉशरूम में धुस गई। जहाँ वह आदमी बंद था। घबराहट से उसकी साँसे तेज होती जा रही थी। जुबा खामोश थी। आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। तभी उन दो सायों ने वॉशरूम का दरवाजा खोला। और चेक किया उन्हें कोई दिखाई नहीं दिया। वह दोनों वापस चले गए। शायद अंधेरे की वजह से कुछ देख नहीं सके। विनी को समझ नहीं आया कि वह उन्हें क्यों नहीं देख सके। उसका मन जोर-जोर से रोने को कर रहा था। मगर वह रो भी नहीं पा रही थी। अभी,अभी पूरा मॉल लोगों की चहल-पहल से भरा था। वहाँ लाखों बल्बों की रोशनी ओर अब अचानक अंधेरा उसने फिर से दरवाजा खोलने की कोशिश की मगर नाकाम रही।

घबराहट की वजह से विनी को चक्कर आ गए वह वही बैठे,बैठे बेहोश हो गई। इस काली रात के सन्नाटे में सिर्फ गोलियों की आवाजें ओर चीख पुकार ही सुनाई दे रही थी। वह शख्स भी वही मौजूद था। जहाँ विनी बेहोश पड़ी थी। अलसुबह हो चुकी थी। चारों ओर पुलिस की गाड़ी के हार्न ओर शोर सुनाई दे रहा था। विनी को होश आया वह बदहवास सी चीख पड़ी,"मेरा संयम ओर विशाल कहा है..?,। देखा तो वॉशरूम में कोई नहीं था। वह आदमी जा चुका था। विनी डरते ,लड़खड़ाते कदमों से बाहर निकली । चारों ओर हजारों पुलिस वाले ओर एम्बुलेंस की आवाजों से विनी का सर चकराने लगा । बाहर चारों तरफ लाशें बिखरी पड़ी थी। अचानक उसका पैर किसी लाश से टकराया तो वह अपना संतुलन खोकर गिर गई । देखा तो संयम का शरीर खून से लथपथ पड़ा हुआ था। वह फिर से बेहोश हो गई। करीब आघे घण्टे बाद महिला पुलिस ने विनी को चेक किया। विनी को फिर से होश आया। वह संयम को देखकर अपना संयम खो चुकी थी। वही दहाड़े मार कर रोने लगी। पलक झपकते ही उसकी खुशियां बेनूर हो गई थी। महिला पुलिस ने पूछा आप यहाँ कैसे ? यहाँ बहुत ही कम लोग जीवित बचे हैं। वह उठी और सभी लाशों में विशाल को खोजने लगी। इतना मातम भरा माहौल उसके रोंगटे खड़े कर रहा था। रात में चमक रही फ्लोरिंग अब अपना रंग बदल चुकी थी,खून से सन गई थी। तभी एक कम्पाउंडर पास आया।

बोला,"आप का कोई मर गया है क्या ? उसकी इस अभद्र भाषा से वह चिड़चिड़ा उठी। तभी वहां माईक पर बताया गया। कि घायलों को पास के अस्पताल ले जाया गया है।

नया शहर था। विनी इस शहर के बारे में कुछ भी नहीं जानती थी। वह अस्पताल का पता पूछने लगी। क्योंकि उसे वहां विशाल कही दिखाई नहीं दिया। वह उस कम्पाउंडर के पीछे, पीछे भागी ओर एम्बुलेंस में चढ़ने लगी। तो वह बोला,"मैडम यह घायलों के ले जाने के लिये है, आपके लिए नहीं। वह बदहवास सी खड़ी रही, समझ नहीं आ रहा था। कि क्या करे। जोरों से रोने का मन कर रहा था । पर वह रो भी ना सकी।

तभी सामने एक कार आकर रुकी, खिड़की के शीशे नीचे का वह व्यक्ति बोला,"चलिये मैडम मैं भी वही जा रहा हूँ। देखा तो वही व्यक्ति था। जो पूरी रात विनी के साथ वॉशरूम में था। विनी बिना विचार किये उसकी गाड़ी में बैठ गई। अस्पताल आकर उसने हर एक शख्स को ध्यान से देखा। तो उसे विशाल घायल अवस्था में पलंग पर पड़ा था। उसके पास जाकर वह जोर,जोर से रोने लगी। वह शख्स बोला,"शुक्र है, आपके पति जिंदा हैं। मैं तो अपना पूरा परिवार खो चुका हूं। पत्नी और दोनों बेटियां खो चुका हूं।

ओर फफक कर रोने लगा। विनी ने अपने आप को सम्भाल वह आदमी बोला में आपकी हर तरह से मदद करने को तैयार हूं। अब मेरा इस दुनियॉ में कोई नहीं है।

अंजान शहर में विनी को थोड़ी राहत महसूस हुई। वह अजनबी अब विनी का विश्वास जीत चुका था। उसने पूरी तरह विनी की मदद की ,विशाल अपना एक पैर गवा चुका था। विकलांगता के साथ घर आ गया था। वह आदमी उसका हालचाल पूछने अक्सर आ जाया करता।

अचानक हुई इन परिस्थितियों ने वीनी को भी विकलांग बना दिया था। संयम छोड़कर जा चुका था।

विशाल की विकलांगता के चलते हमेशा विनी को उस शक्स से मदद लेनी पड़ती। वह शख्स अब विनी का हमदर्द बन चुका था।

विनी उस पर पूरी तरह भरोसा करने लगी थी।

एक दिन अचानक विशाल की हालत बिगड़ गई और वह चल बसा। इस हादसे को विनी बर्दाश्त ना कर सकी।

इस शहर में अब उस शख्स के अलावा विनी का कोई नहीं था। उसने इस शहर को छोड़ने का निर्णय लिया। सब कुछ बेचकर वह पुनः अपने पुराने शहर जाना चाह रही थी। इस काम में वह उस शख्स की मदद लेना चाह रही थी। उसने भी उसकी पूरी मदद की। जिस रात विनी अपने पुराने शहर आने वाली थी। उस शाम वह शख्स सारे रुपये लेकर उसके पास आया और बोला,"क्या में आपको आपके नाम से बुला सकता हु।

विनी को उस शख्स का इस कदर पास आना अच्छा नहीं लगा। वह विनी के अकेलापन का फायदा उठाना चाह रहा था। विनी ने सारे रुपयों का हिसाब मांगा तो कहने लगा।

"मैडम आपकी इतनी मदद की है,मेहनताना तो बनता ही हैं। विनी घबरा गई और अपनी आबरू बचाने के चक्कर में उस शख्स को ताला खींच कर मार दिया। वह वही गिर पड़ा। वह घबरा गई, क्योंकि उस शख्स को लोगों ने अक्सर आते देखा था।

उसने सारे रुपये पर्स में डाले और टैक्सी पकड़ कर स्टेशन पहुंची।

उसे पता ही नहीं चला कि वह शख्स मर गया या जिंदा था।

वह ट्रेन में बैठ गई और ट्रेन चल पड़ी। इस महानगर की वह काली रात उसकी जिंदगी के उजियारे को हमेशा के लिए लील चुकी है। अब उसके पास कुछ भी नहीं बचा था। शहर की दरिंदगी पर उसे नफरत हो रही थी। इंसानियत तो कही खो सी गई थी। हर व्यक्ति अपने जरुरत के मुताबिक इंसान से रिश्ता जोड़ता है।

उसका इंसानियत से विश्वास उठ चुका था। समझ नहीं आ रहा था। कि वह कहाँ जाय क्या करे। इसी विचार में उसे कब नींद लग गई उसे पता ही नहीं चला। वह जब सुबह उठी तो उसका रुपयों वाला बेग गायब हो चुका था। वह उसका एक आखरी सहारा थोड़ा पैसा था। अब वह भी खो चुकी थी।

कल जो अपने नसीब पर गर्व करती थी। आज वह उसी नसीब को कोस रही थी।

स्टेशन से बाहर आकर अपने पुराने घर की ओर वह पैदल ही चल पड़ी। पैसे चोरी हो गए थे। सब कुछ उस महानगर ने छीन लिया था।

तभी सामने से एक बाइक सवार युवा लड़का जो उम्र में उससे छोटा था। पास आकर बोला,"आपको कहा जाना है। में छोड़ देता हूं, इस कदर पैदल मत चलिये। अब बचा ही क्या था। जो लूट ले। यही सोचकर विनी उसकी बाइक पर बैठ अपने पुराने घर की चल पड़ी। थके कदमों से वह अपनी गली में चल पड़ी। उसने पड़ोसियों को सारे हालत के बारे में बताया। तो उन सबका नजरिया उसके प्रति बदल चुका था।

लेकिन वक़्त बदलते देर नहीं लगती। वह लड़का राहुल हमेशा उसकी मदद करता। राहुल ने उसे अपनी ही कम्पनी में नौकरी दिलवा दी। वह अपना जीवन यापन करने लगी।

राहुल उसकी जिंदगी में एक सच्चा हमदर्द बनकर आया था।

उन दोनों का रिश्ता एक सच्चा ओर पवित्र दोस्ती का था। मगर समाज उनके इस रिश्ते को बुरी नजर से देखता था। वह समाज की इतनी क्रूर और घिनौनी तसवीर देख चुकी थी। उसने समाज की परवाह किये बिना राहुल से दोस्ती निभाती रही। क्योंकि कि वह इस समाज की दरिंदगी को अच्छी तरह समझ चुकी थी। अब वह उस काली रात को याद कर दुखी नहीं होना चाहती थी। क्योंकि अब उसकी जिंदगी में एक नई सुबह की रोशनी उसे राहुल के रूप में मिल चुकी थी।

वन्दना पुणतांबेकर "वंदन"

इंदौर

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