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एक रोचक आलेख– मोबाइल महिमा - डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

उन दिनों मोबाइल नया नया प्रचलन में आया था। कुछ ही लोगों के पास था। जिनके पास था वे उसे दिखाने के लिए अपने कमरे से निकल कर वरांडे में बात करते थे। सुबह के समय सैर करते वक्त तो मोबाइल से बात करना एक रिवाज सा बन गया था। यह रिवाज आज भी कायम है। टहलते वक्त अक्सर आपको ऐसा लग सकता है कि आपके पीछे कोई दो लोग बात का रहे है। आप जिज्ञासावश पीछे मुड़कर देखते हैं तो बजाय दो के, एक ही व्यक्ति, अपने मोबाइल पर बात करते हुए पाते है।

मोबाइल की फितरत ही ऐसी है कि वह आपको अकेला नहीं रहने देता। मोबाइल से आप किसी को भी कभी भी बुला सकते हैं। साक्षात प्रकट हुए बिना ही व्यक्ति आपसे बात करने लगेगा। वह आपको अकेले नहीं रहने देगा। आपके एकांत और एकाकीपन को पूर्ण-ग्रहण लगाता है मोबाइल।

क्या आपको यह नहीं लगता की “मोबाइल” एक मिसनोमर है। शब्दार्थ के अनुसार मोबाइल वह है जो अचल न होकर चल हो, गतिशील हो, चंचल और परिवर्तनशील हो। लेकिन हम़ारा यह मोबाइल न तो स्वयं चल सकता है और न ही इसमें अपने आप कोई परिवर्तन हो सकता है। फिर भी कहलाता ‘मोबाइल’ है ! मोबाइल यानि जो अचल न हो। चल-फिर सके। जो ‘मूव’ कर सके। चलता फिरता रहे। “रंगी को नारंगी कहते - माल को कहते खोया हैं; गढ़ी हुई को उ(ओ)खड़ी कहते - चलता वाहन गाड़ी है !” भला नाम में क्या धरा ही। “यथा नाम तथा गुण” वाली कहावत तो शायद ही कभी चरितार्थ होती हो ! तो फिर मोबाइल से ही हम असंभव अपेक्षाएं क्यों पालें?

मेरे एक मित्र हैं। चित्रकार हैं। उनपर मोबाइल का भूत कुछ ऐसा चढ़ा कि उन्होंने अपने कुछ चित्र अलगनी पर टांग दिए। वहां वे हवा के साथ हिलने-डुलने लगे। जब मैंने पूछा, आपने ये चित्र ऐसे टांग क्यों रखे है? बोले, टांगने के बाद ये मोबाइल-चित्र बन गए है !

पहले कहा जाता था ‘समय बिताने के लिए शुरू करो कुछ काम – शुरू करो अन्ताक्षरी लेकर हरिं का नाम’। आज हम सभी को जब समय बिताना होता है या जब हम फुरसत में होते हैं, मोबाइल लेकर बैठ जाते हैं तथा सोशल मीडिया पर कमेन्ट करने लग जाते है। चाहे घर हो या आफिस हम मोबाइल से नज़र नहीं हटाते। उससे चिपके ही रहते हैं, भले ही गर्दन ही क्यों न दुखने लगे। एक रिपोर्ट के अनुसार मोबाइल इस्तेमाल करने वाले प्रतिदिन दो से चार घंटे मोबाइल पर ही रहते हैं। यह भी एक तरह की लत है, बीमारी है। इसे ‘मोबाइल-सिंड्रोम’ कहा जा सकता है। इसमें कई तरह की समस्याएँ होने की आशंका रहती है। आजकल कितने ही लोग इस रोग से ग्रसित हैं। इसका असर कंधे और मांसपेशियों पर तो पड़ता ही है, हमारे मूड और व्यवहार पर भी पड़ता है। चेहरे पर झुर्रियां आना और चेहरे की चमक गायब हो जाना, सर दर्द, स्मरण शक्ति का कम होना तथा पीठ का दर्द तो आम बात है ही, विशेषज्ञों का कहना है मोबाइल के अधिक और लगातार इस्तेमाल से हम ‘डिप्रेशन’ के भी शिकार हो सकते हैं। मोबाइल जहां वक्त काटने की एक नायाब ‘दवा’ है वहीं यह ‘दर्द’ दिए बिना भी नहीं रहता। मोबाइल दवा और दर्द दोनों को साथ साथ निभाता दिखाई देता है। मगर यह साथ “तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना” जैसा नहीं है।

मोबाइल एक उपकरण है, औज़ार है। मोबाइल दारू-की-सी लत हैं। मोबाइल कान का आभूषण है। जब चाहो लगा लो जब चाहो हटा लो। मोबाइल ज़िंदगी का रस-रंग, जीवन की हलचल है। मोबाइल है तो ज़िंदगी का आनंद दूना है, मोबाइल नहीं तो जीवन सूना है। जड़ और जीवन में यही तो अंतर है। जड़ अचल है। जीवन चल है, मोबाइल है।

-डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

प्रयागराज - २११००१

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