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'बिन पानी सब सून' की अनसुनी के बढ़ते खतरे ! डॉ.चन्द्रकुमार जैन

आज दुनिया पानी की समस्याओं के रूबरू है। दिन-प्रतिदिन विकट होते जा रहे जल संकट से मुक्ति की पुकार सब तरफ सुनी जा सकती है। पानी पर बात करने तो सभी तैयार हैं, किन्तु आश्चर्य है कि पानी बचाने और उसका सही प्रबंधन करने के प्रश्न पर सीधी भागीदारी की बात जब आती है तब लोग किनारा कर जाते हैं !

सब जानते हैं कि जल जीवन का पर्याय है, पर उसी जल के जीवन के लिए सार्थक हस्तक्षेप से जी चुराने की आदत से बाज़ नहीं आते हैं। हम मानते हैं जरूर कि जल के बिना जीवन की कल्पना अधूरी है, हम जानते हैं कि जल हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका इस्तेमाल करते वक्त हम यह भूल जाते हैं कि बेतरतीब इस्तेमाल का बेइन्तिहां हक़ हमें किसी ने नहीं दिया है। हम जल का दोहन करना तो जानते  है, किन्तु उसके संरक्षण में हमारी रूचि जवाब देने लगती है। हम यह भी जानते हैं कि कुछ घंटे या कुछ दिनों तक भूखे तो रहा जा सकता सकता है, पर पानी पिए बगैर कुछ दिनों के बाद जीना भी मुमकिन नहीं है। फिर भी, अफ़सोस की बात है कि हम जल से जग के नाते की उपेक्षा करने के आदी हो गए हैं।


अब समय की मांग है कि जल संसाधनों के प्रबंधन को हमें निजी जीवन ही नहीं, सामाजिक सरोकार से जोड़कर आगे कदम बढ़ाना चाहिए तथा इसके लिए स्थायी तरीके खोजना चाहिए. वहीं स्थायी जल प्रबंधन की रणनीति में भारत की युवा शक्ति का समुचित निवेश करना होगा। इधर यह खबर भी हौसला बढ़ने वाली है कि जल प्रबंधन पर शोध के लिए होनहार युवक पीयूष रंजन का चयन टेनसिस टेक्नोलॉजी विश्वविद्यालय कुकवैली अमेरिका में किया गया है। जहां पर दो वर्ष तक पीयूष द्वारा शोध कार्य किया जाएगा। शोध कार्य हेतु विश्वविद्यालय द्वारा प्रतिमाह 12 सौ डॉलर दिया जाएगा। विदित हो कि पटना जिले के मरांची गांव निवासी पीयूष रंजन राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित है। यहां इस उपलब्धि के उल्लेख का तात्पर्य यह है कि हमारे युवाओं में योग्यता, लगन, जूनून, जज़्बा सब कुछ है, जिनका इस्तेमाल पानी के सवालों के हल में सही ढंग से सही समय पर किया जाये तो बात बन जाये।

कौन नहीं जनता कि पानी प्रकृति की सबसे अनमोल धरोहर है। वह विश्व सृजन और उसके संचालन का आधार है। मानव संस्कृति का उद्गाता है।  मानव सभ्यता का निर्माता है। पानी जीवन के लिए अनिवार्य है। पानी के बिना जीव जगत के अस्तित्व और साँसों के सफर की कल्पना बेकार है। फिर भी सभी लोगों को पीने के लिए साफ पानी नहीं मिल पाता है। खेती किसानी की आशाएं पानी के आभाव में धूमिल हो जाती हैं। नदियों को कलकल निनाद कब अवसाद में बदल जाएगा कोई नहीं जनता। जलाशयों को जीवन कब ठहर जाएगा, कह पाना मुश्किल है। पानी न मिलेगा तो परिंदों की उड़ान पर भी सवालिया निशान लग जायेगा। वैसे भी,उड़ान के लिए पानी रखने की जरूरत को हम भुला बैठे हैं। कहा गया है न कि -


नए कमरों में अब चीज़ें पुरानी कौन रखता है

परिंदों के लिए शहरों में पानी कौन रखता है।

हमीं गिरती हुई दीवार को थामे रहे वरना

सलीके से बुज़ुर्गों की निशानी कौन रखता है।

इसलिए ,अब युवा शक्ति की लोकतान्त्रिक पहचान पानी से जुड़ी हमारी आन-बान -शान के आसपास ही मिल सकती है। जल प्रबंधन और जल संरक्षण के प्रश्न पर युवा पीढ़ी को संजीदा होना पडेगा। उन्हें खुद जागकर लोगों को जगाने का बीड़ा उठाना होगा। जल संकट की भयावहता और जल की महत्ता को लेकर लोगों को जगाने की जिम्मेदारी कोई एक दिन, सप्ताह या माह भर मनाने वाले उत्सव की तरह नहीं बल्कि, हर दिन, पर पल जीकर दिखाने वाली चेतना का ही दूसरा नाम है।

युवा शक्ति को स्वयंसेवी उद्यम के साथ-साथ रोजगारमूलक अभियानों में नियोजित किया जाना चाहिए ताकि वह जल चेतना के दूत बनकर व्यावहारिक स्तर पर श्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकें। युवा शहरों और गाँवों  में पहुंचकर अच्छी आदतों से पानी की बचत का सार तत्व लोगों तक पहुंचाएं। बताएं कि पानी पर हमारी निर्भरता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है और पानी के स्रोत दिनों-दिन घटते जा रहे हैं।

हमें पेयजल, दैनिक दिनचर्या, कृषि कार्यों और उद्योग धंधों में पानी की आवश्यकता होती है जिनकी पूर्ति के लिए हम उपलब्ध जल संसाधनों के साथ-साथ भूजल का भी जमकर दोहन कर रहे हैं। लगातार हो रहे दोहन से भूजल का स्तर प्रतिवर्ष नीचे जा रहा है। परिणामस्वरूप जल स्रोत सूखने लगे हैं। जलसंकट गहराने लगा है। वर्षा भूजल स्रोत बढ़ाने का कार्य करती है। भारत में औसतन ग्यारह सौ से बारह सौ मिलीमीटर के आसपास बारिश होती है। अगर हम वर्षा जल का उचित प्रबंधन करें तो यह हमारी आवश्यकताओं के हिसाब से पर्याप्त है बस जरूरत है वर्षा के जल को सहेजने की। वैसे भी पानी कोई समस्या नहीं है बल्कि पानी का भंडारण और पानी को प्रदूषित होने से बचाना एक चुनौती है।

हमरी युवा पीढ़ी समझे और लोगों को समझाए कि जल पर्यावरण का अभिन्न अंग है। मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है। मानव स्वास्थ्य के लिए स्वच्छ जल का होना नितांत आवश्यक है। जल की अनुपस्थित में मानव कुछ दिन ही जिन्दा रह पाता है क्योंकि मानव शरीर का एक बड़ा हिस्सा जल होता है। अत: स्वच्छ जल के अभाव में किसी प्राणी के जीवन की क्या, किसी सभ्यता की कल्पना, नहीं की जा सकती है। यह सब आज मानव को मालूम होते हुए भी जल को बिना सोचे-विचारे हमारे जल-स्रोतों में ऐसे पदार्थ मिला रहा है जिसके मिलने से जल प्रदूषित हो रहा है।

जल संकट को दूर करने के कुछ उपाय इस तरह संभव हैं - अत्यधिक जल दोहन रोकने के लिए कड़े कानून बनाये जायें जिनमें सजा का प्रावधान हो।तेजी से बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण एवं परस्पर विवादों को समाप्त करके इस समस्या का निदान किया जाये। समुद्री जल का शोधन कर कृषि कार्यों में उपयोग किया जा सके, ऐसी विधियों की खोज की आवश्यकता है।कोई ऐसी व्यवस्था बनाई जाये जिसके तहत् नदियों के मीठे जल का अधिक से अधिक उपयोग किया जा सके। भूगर्भीय जल भण्डार को रिचार्ज करने के अलावा छत से बरसाती पानी को सीधे किसी टैंक में भी जमा किया जा सकता है। बड़े संसाधनों के परिसर की दीवार के पास बड़ी नालियाँ बनाकर पानी की जमीन पर उतारा जा सकता है। इसी प्रकार कुओं में भी पाइप के माध्यम से बरसाती पानी को उतारा जा सकता है। इसी प्रकार वर्षा जल को एक गड्ढ़े के जरिये सीधे धरती के भूगर्भीय जल भण्डारण में उतारा जा सकता है।

जल संरक्षण से कुछ सीमा तक जल संकट की समस्या का निराकरण किया जा सकता है। जल को प्रदूषण से मुक्त रखने तथा इसकी उपलब्धता को बनाये रखने के कुछ और भी उपाय किए जा सकते हैं जैसे रेन वाटर हारवेस्टिंग को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। मकानों की छत के बरसाती पानी को ट्यूबबैल के पास उतारने से ट्यूबबैल रिचार्ज किया जा सकता है। शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों के निवासी अपने मकानों की छत से गिरने वाले वर्षों के पानी को खुले में रेन वाटर कैच पिट बनाकर जल को भूमि में समाहित कर भूमि का जल स्तर बढ़ा सकते हैं।

पोखरों में एकत्रित जल से सिंचाई को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिससे भूमिगत जल का उपयोग कम हो। शहरों में प्रत्येक आवास के लिए रिचार्ज कूपों का निर्माण अवष्य किया जाना चाहिए, जिससे वर्षा का पानी नालों में न बहकर भूमिगत हो जाये।तालाबों, पोखरों के किनारे वृक्ष लगाने की पुरानी परम्परा को पुनजीर्वित किया जाना चाहिए।ऊँचे स्थानों, बाँधों इत्यादि के पास गहरे गड्ढ़े खोदे जाने चाहिए, जिससे उनमें वर्षा जल एकत्रित हो जाये और बहकर जाने वाली मिट्टी को अन्यत्र जाने से रोका जा सके। कृषि भूमि में मृदा की नमी को बनाये रखने के लिए हरित खाद तथा उचित फसल चक्रअपनाया जाना चाहिए। कार्बनिक अवशिष्टों को प्रयोग कर इस नमी को बचाया जा सकता है। वर्षा जल को संरक्षित करने के लिए शहरी मकानों में आवश्यक रुप से वाटर टैंक लगाए जाने चाहिए। इस जल का उपयोग अन्य घरेलू जरुरतों में किया जाना चाहिए।

जल हमें नदी, तालाब, कुएँ, झील आदि से प्राप्त हो रहा है। जनसंख्या वृद्धि, औद्योगीकरण आदि ने हमारे जल स्रोतों को प्रदूषित किया है जिसका ज्वलंत प्रमाण है कि हमारी पवित्र पावन गंगा नदी जिसका जल कई वर्षों तक रखने पर भी स्वच्छ व निर्मल रहता था लेकिन आज यही पावन नदी गंगा क्या कई नदियाँ व जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं। यदि हमें मानव सभ्यता को जल प्रदूषण के खतरों से बचाना है तो इस प्राकृतिक संसाधन को प्रदूषित होने से रोकना नितांत आवश्यक है वर्ना जल प्रदूषण से होने वाले खतरे मानव सभ्यता के लिए खतरा बन जायेंगे। इसलिए 'बिन पानी सब सून' की सीख की अधिक अनसुनी न करने में ही बुद्धिमानी है।

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