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एक कवियत्री की प्रेम कथा (उपन्यास समीक्षा )

अत्यंत कर्मठ, सतत क्रियाशील रहने वाला जाना पहचाना नाम सुरेश सौरभ ,जिनकी जन्मस्थली एवं कर्मस्थली लखीमपुर खीरी है ।सुरेश सौरभ ने साहित्य जगत को अनेक  लघुकथाएं, अनेक कविताएं एवं संपादकीय सेवाएं प्रदान कीं हैं। एक कवि ,कथाकार ,संपादक के रूप में तो इनकी पहचान है ही, परंतु एक कवयित्री प्रेम कथा उपन्यास लिख कर एक महान उपन्यासकार के रूप में साहित्य के क्षेत्र में पदार्पण भी किया है। इनकी लेखनी वर्तमान के साहित्यिक परिवेश, भौतिकता की अंधी दौड़ मंचों की चकाचौंध, इन सभी के पीछे के यथार्थ को उजागर करने में पूर्णत: सक्षम है। आज के परिवेश में कवि, कविता, कवियत्री साहित्यकार आदि सभी में अधिकांशत: नैतिक मूल्यों का ह्रास होता चला जा रहा है ।अपनी मर्यादाओं को तोड़ कर धन-दौलत नाम-सम्मान को प्राप्त करने की महत्वाकांक्षाएं इंसान को पतन की ओर लिए जा रही हैं। और इंसान महत्वाकांक्षाओं के कारण अंधा होकर गलत और अनैतिक रास्ता अपनाता हुआ अपने चरित्र को खो देता है ,अंत में चतुर्दिक फैला हुआ घना अंधकार उसे समूचा निगल जाता है। यही मर्म इस उपन्यास का है। सौरभ का उपन्यास एक कवियत्री की प्रेम कथा में नायिका सुमन एक महत्वाकांक्षाओं से ग्रस्त हुई कवयित्री है ।उसकी इन्हीं महत्वाकांक्षाओं के साथ-साथ उसकी कुछ पारिवारिक एवं आर्थिक समस्याएं हैं, मेरे अनुसार किसी भी व्यक्ति को अपनी मर्यादाओं को तार-तार करके समस्याओं का हल ढूंढना धन दौलत प्राप्त कर लेना लोगों से घिरे रहना, नैतिकता को शर्मसार करना घोर निंदनीय पाप है, अपराध है।

      नायिका सुमन को देश-विदेश के बड़े-बड़े मंचों के लोभ, बड़े-बड़े धनवान और राजनीतिक लोगों के सान्निध्य का मोह अतिशय प्रशंसा का लालच इन सभी ने अंत में सुमन नायिका को अत्यधिक बेरहमी से नष्ट कर दिया।

      इस उपन्यास का मैंने गहनता से अध्ययन किया। पढ़ते-पढ़ते बीच-बीच में मेरे मन में अनेक ख्याल, अनेक भाव आते रहे कि व्यक्ति इतना महत्त्वाकांक्षी कैसे हो सकता है कि सारी सीमाएं सारे बंधन अपनी मर्यादांए ही तोड़ता चला जाए, वह भी नश्वर चीजों के लिए, एक तरफ सुमन को लोभ, मोह ,लालच ,स्वर्णिम चमकते हुए सपनों ने ,मृग-मरीचिकाओं ने अंधा कर दिया वहीं दूसरी तरफ समाज के ऐसे लोग जो इंसानी वेश में भेड़िए हैं,वे किसी पर दया ,हित करने से पहले अपना स्वार्थ निश्चित कर लेते हैं ।

     आज प्रत्येक वर्ग में अधिकतर लोग अपने स्वार्थों की पूर्ति करने में पूर्ण रूप से संलग्न है ,उन्हें सही-गलत अच्छा-बुरा उचित-अनुचित नैतिकता-अनैतिकता से कोई मतलब नहीं होता ।

   मैं तो सिर्फ इतना कहना चाहतीं हूं कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक क्षेत्र में सत्य ,धर्म, न्याय ,ईमान  सच्चरित्रता के मार्ग पर चाहे कितने कंटक आएं, बाधाएं आएं उनका साहस और हिम्मत के साथ सामना करते हुए निरंतर डटे रहना चाहिए। सफलता कदमों का चुम्बन अवश्य करेगी। अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के प्रयत्नों के साथ-साथ अपनी सीमाओं और मर्यादाओं पर दृष्टि रखते हुए उन्हें कठोरता के साथ थामें रहना अनिवार्य है। व्यक्ति को निरंतर प्रयत्नशील रहना आवश्यक है लोगों की चिंता किए बिना निरंतर अबाध गति से चलते रहना ही जीवन है ।यहां पर सुप्रसिद्ध कवियत्री डॉक्टर मृदुला शुक्ला "मृदु"की पंक्तियां दृष्टव्य  हैं।

       चलता चल तू चलता चल

      रोड़े पत्थर बहुत मिलेंगे,

      ठोकर  मार के चलता चल

नदिया की धारा सिख लाती                      

चलता चल तू चलता चल।

     सुरेश जी का यह उपन्यास जन-जन के मन को उद्वेलित करता हुआ कुछ अनबूझे सवालों को जनता हुआ, दया ममता करुणा ,उत्सुकता के साथ-साथ क्रोध का भी आविर्भाव करता हुआ हर तरह से एक बार में सोचने पर पाठक को विवश अवश्य करेगा।

     उपन्यास के पात्र परिवेश कथावस्तु भाषा,शैली गुण अलंकार सभी का औचित्यपूर्ण ढंग से निर्वाह किया गया है । मेरा पूर्ण विश्वास है "एक कवियत्री की प्रेम कथा" उपन्यास साहित्य जगत में जन-जन का प्रिय बनकर अपार ख्याति प्राप्त करेगा। अस्सी पृष्ठीय इस उपन्यास का मूल्य ₹200 है, जिसे रवीना प्रकाशन दिल्ली ने प्रकाशित किया है। मैं सुरेश सौरभ को अपनी अनंत शुभकामनाएं प्रेषित करती हूं ।

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कु० विमला शुक्ला

(समीक्षक साहित्यकार )

महाराज नगर लखीमपुर खीरी

पिन-262701

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