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प्रलय - काव्य संकलन - रतन लाल जाट

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कवि-परिचय  रतन लाल जाट S/O रामेश्वर लाल जाट जन्म दिनांक- 10-07-1989 गाँव- लाखों का खेड़ा, पोस्ट- भट्टों का बामनिया तहसील- कपासन, जिला- च...

कवि-परिचय 
रतन लाल जाट S/O रामेश्वर लाल जाट
जन्म दिनांक- 10-07-1989
गाँव- लाखों का खेड़ा, पोस्ट- भट्टों का बामनिया
तहसील- कपासन, जिला- चित्तौड़गढ़ (राज.)
पदनाम- व्याख्याता (हिंदी)
कार्यालय- रा. उ. मा. वि. डिण्डोली
प्रकाशन- मंडाण, शिविरा और रचनाकार आदि में
शिक्षा- बी. ए., बी. एड. और एम. ए. (हिंदी) के साथ नेट-स्लेट (हिंदी)

ईमेल- ratanlaljathindi3@gmail.com


(1) कविता- "जब थी पिया अपनी"
                                             
जब थी पिया अपनी,
तब धरती पर स्वर्ग उतर आया था।
सुध ना हमको कोई थी,
सुख के आगे, बस कुछ ना मालूम था॥

जब थी वह बाला,
स्नेह-प्रेम की जगह प्यार हुआ।
लेकिन आज यहाँ,
प्यार ने कर दिया हाल बुरा॥

लुभाने लगी दुनिया उसको,
कूते भी चूमने लगे पैर।
किसी के ना होकर भी वो,
छिपकर करने लगे आज बैर॥
बैर! बैर भी सामने नहीं,
झूठा अपनापन दिखाकर।
कहते हैं वो उसे स्त्री और प्यारी,
फिर उसी प्यारी के साथ करते हैं छल॥

मिलते हैं नहीं कोई,
बस एकांत में कुछ पल,
सब करना चाहते हैं पूरी अपनी वासना।
अपना-अपना ही देखते हैं,
कभी ना वो चाहने वाले हैं अच्छा॥

जब थी पिया अपनी,
दुनिया में जगमगाता था सितारा एक।
कितना होता है दुख,
मुझको झकझोरती है वो जब॥
बस सोच-सोचकर मैं, दहककर जल उठता।
मुझको माँझती है वो बनाकर बर्तन,
या जलाती है दीपक-सा॥


आह! मालूम हुआ है,
दोष नहीं है पिया तुम्हारा।
बदलता है जग और,
पुनः मिटकर होता है नया॥

रो-रोकर भी जब,
सूख गये थे नयन अपने।
याद आकर सामने मेरे,
उभर आते हैं सपने तुम्हारे॥

पिया मेरी जग करेगा क्या?
कर चुका मैं समर्पित,
ईश्वर करेगा तेरी रक्षा।
सबला को समझकर अबला,
विश्वास के पीछे किया है शिकार।
पावनता को बदलकर उसकी,
दुर्गँध हवा से कर दिया बदनाम॥

बदल सकते हैं मन उसका,
चंचल है जो नहीं रहता,
कभी स्थिर एक पल।
जल्दी ही बदल जाती है देह,
लेकिन नश्वर है जो,
और उसका क्या होगा पतन?

जब थी पिया अपनी,
पवित्र आत्मा थी कोमल रूप,
तब हुआ आघात।
अब भी है दिल सच्चा,
बदलता नहीं,
न कभी करता है विश्वासघात॥

करने दो, जो कोई कर रहा।
अंत सत्य है उसका॥
चाहे वो अच्छा है या बुरा।
रूकेगा, एकदिन थम जायेगा॥

आज भी वो आँखें,
मालूम होती है असीम प्यार बरसाती।
दिल भी है वो ही,
धड़कन जिसकी प्रेम-नाम उसकी॥

वो कोमल है काया आज भी,
चाहे, कर दे दुनिया नाश उसका।
लेकिन नजरें मेरी,
छू-छूकर सहलायेगी,
खुशबू, रंग और फूल-सा तन
उसका मालूम होगा॥

जब थी पिया अपनी,
लहराते थे बाल सघन वन हो जैसे।
आज भी मैं फिरता हूँ,
गुम जाने को कोमल-कुन्तलों में॥

चिर विश्वास नहीं बदल सकता है कभी।
क्यों करेगा घात? सदियों-जन्मों में भी॥
पुनः होगा मिलन,
दिल की है सच्चाई जिसका।
और उस प्यारी की,
प्यारी है आत्मा का॥
हमें न मालूम, न किसी को,
गहरा होगा, सच होगा।
जीत होगी उसी की,
आज नहीं, कल नहीं,
बरसों बाद भी होगा,
नाश पाप-झूठ का॥

जब थी पिया अपनी,
पास आयी वो चूमने मुझको।
आँखें मिलाकर धड़कन हुई,
तब दिया उपहार वो॥

वियोग मेरी भक्ति है,
आराधना करूँ मैं श्वाँसों से गान।
आँखें रहकर प्यासी,
स्वप्न में करे पुकार॥

कभी न मिटे तमन्ना प्यार की।
कभी न छुटे प्यार, कमी न होगी॥
साथ उसका ना छोड़ूँ, मरने के बाद भी।
नहीं चाहता संग मिलन का,
कई जन्मों तक जलेगी विरहाग्नि॥

बन चुका जीवन मेरा,
वियोग ही प्रेम है।
चाहत है स्पर्श करूँ,
पिया की श्वाँसों का, दिल का।
न कभी मिलूँगा, बोलूँगा,
बस पिया कहूँगा॥

जब थी पिया अपनी, आज भी है।
मरण उसका, क्षोभ उसका,
झेल नहीं पाऊँगा।
हिम्मत इतनी है कहाँ?

चलकर उसके संग,
प्राण मेरे मिलकर।
चंचल मन नश्वर देह का,
छोड़ देंगे बन्धन॥
तब मिलन करके,
हम दो दिलों का।
आत्मा एक आत्मा बनकर,
जा मिलेगी परमात्मा॥

न छोड़े वादा, न तोड़े कसम।
तैयारी है आज या अब।
नहीं झूकेगी गर्दन अपनी,
शर ला, उड़ा दे शीश॥
मरण ही जीवन है,
प्रेम ही वियोग है।
पल नहीं, संगम है॥
कपट नहीं, विश्वास है।
आज भी उतना ही॥
जब थी पिया अपनी
—————————


(2) कविता- “प्रलय”     

संभव है अब होगा, प्रलय यहाँ जो भारी।
आज नहीं, नहीं अब, समय थोड़ा है बाकी॥
सुलगने को बेचैन, कितना अब रहेगी।
निश्चय ही एकदिन, अचानक आग जलेगी॥

सत्य छिपकर दूर, हमसे होगा वो जूदा।
फिर क्रूर काल-नाश, वो आ जायेगा यहाँ॥
कैसे हम बचने की, कर सकते कल्पना।
कर्म पाप फल नाम वह, भोगना ही भोगना॥

सब चाहेंगे बदला, लेने को हम से पूरा।
हम कहाँ से क्या करे, दोनों तरफ है कुआँ॥
नाराज हो सब अपने, तोड़ देंगे चिर-वादा।
फिर विश्वास नाम भी, धरा से खो जायेगा॥

शायद शंका सबको, होगी उस अनिष्ठ की।
सामर्थ्य नहीं है शक्ति, वो अपने तक ही।
खड़े रहेंगे असहाय, हालत और नाजुक।
कौन करेगा दया रे, पागल तू मनुज॥

दया का मूल है धर्म जो, बचा नहीं यहाँ-वहाँ।
लगने लगे सब स्वार्थी, शायद भू-आसमाँ॥
पुनः सजीव हो करें, नाश पाशविकता रे।
अब कौन नहीं चाहे, कोई युग अवतार लें॥
       —————————
          


(3) कविता- “प्रेम"
                         
तेज प्रचंड भीषण-
         गर्मी और गर्म लू है।
बैठकर कहीं छिप,
          वो भेजती जहाँ हूँ मैं॥

कर जल्दी तू और बरसा आग यहाँ ऐसी।
कच्चा होगा जो रोकर करेगा किलकारी॥

मैं जलकर दहक जाऊँगा एक प्यार को।
विश्वास नहीं है तुझे, कहीं छिप देख लो॥

जलकर अंगार मैं और हँसूँगा जोर से।
पिया! बस, इतनी-सी तुझमें आग कैसे?


जरा, कर प्रार्थना और तू अग्निबाण चला,
दहक जायेगा प्रिय, लेकिन प्यार करेगा॥

बदल न सकती है, उसको कोई विपदाएँ।
गर्मी-सर्दी और तेज बरसात हो चाहे॥

तुम सब पिघलाकर, बर्फ बना दो मुझे।
शंका हो, तो भाप बना, वर्षा हो बरसूँ मैं॥

प्रेम न मरता है, न जरा कभी बदलता।
बाधा उसका नाश नहीं, देती है अमरता॥
पिया, आग मैं पी जाऊँ, करने को तुझे ठण्डा।
बाधा-संकट मुझे रूलाती नहीं, सदा ही हँसाया॥

प्रेम को चैन नहीं, उथल-पुथल नाम है।
पिया! संयोग नहीं, वियोग ही जीवन है॥

अरे, दूर रहकर भी लूँगा सुधि तुम्हारी।
मिलन होगा थोड़ा, तो फिर दशा बुरी क्यों होगी॥

संयोग ने क्या पाया है? बुराई-लड़ाई यहाँ।
संग तो लोहा पाकर हवा का जंग खाता॥

मधुर मधु भी, कुछ दिनों बाद, विष होता।
फिर कौन चाहेगा दिल से संग दुबारा॥
ग्रीष्म यह जलायेगी, एकबार भी मुझको।
फिर किसी दिन, जरूर याद आयेगी वो॥

मिलन दूर का, प्रेम दिल का, बातें आँखों की।
क्षण मात्र सच्चा वो मौन पुकार और भी॥

प्यार चाहता समर्पण, माँगे जीवन सारा।
प्यारी बाला! संशय कभी तू मत रखना॥

सूरज बन या तू बिजली चमके-बरसे।
फूल मैं सूरजमुखी, खिला तुझे देखके॥

असीम प्यार अपना, जन्म नहीं मरण भी।
दिन-रात, आकाश-पाताल तक हैं साथी॥

प्रेम सच्चा, आभूषण उसके हैं, कई सारे।
यादें, इतिहास है नहीं, नया रच डाले॥

वादा, इरादा, जुदाई, कसम, खवाब सब हैं।
फिर मालूम होगा, कहे सब प्यार उसे॥

तेज प्रचंड भीषण-गर्मी और गर्म लू है।
सच्चे प्रेमी को पिया के सब रूप अच्छे हैं
         —————————


(4) कविता- “पिया”
                                       
दिल में बैठ तो खुशी है, धड़कन हमेशा चले।
जहाँ में है नहीं ऐसी , प्यारी वो चाहा जिसे॥

बता! तुम जैसा कहाँ है, सृष्टि सारी और मैं।
बैठा, अकेला करूँ क्या, सब अजनबी है॥

दिल को भाये रोना रे, लेकिन बतायें किसे?
नहीं देखने वाला है, कहूँ कि वो मुझ पिय है॥

विकल्प किसी का कोई है, लेकिन हूँ विशेष मैं।
ना है अथवा ना कोई, बस अनिवार्य वह है॥

जग बेमतलब माना है, मात्र तेरा साथ है।
दुःख में एक सितारा वो, चमके पिया वाह रे॥

जैसे शक्ति कोई जादू, सच्चा देखूँ रंग मैं।
दिल में बैठ तू, खुशी है, सब अजनबी खूब है॥

पल-पल बदले तू छाया, देव! नर देखा कभी।
आ तू सीने में वादा याद है वो क्या नहीं॥

जल तू, मीन मैं, अधूरी जैसे थिति न आसमां।
बादल तू, चातक मैं हूँ, मोक्ष तुझे कहूँ अपना॥

तुम मिलना, मत जाना, संग न तोड़ूँगा कभी।
चोली-दामन साथ यहाँ, सात जन्मों बाद भी॥
        —————————
 
(5) कविता- “निष्काम कर्म”     
                     
कर रहा हूँ अपना, निष्काम कर्म जो जाना।
कभी समाया है डर, भीतर मन मेरा॥

‘ओह! मैं कहता उसे, नहीं किसी से डरूँगा।’
बाहर है बाधा कई, अन्दर उठा तूफाँ॥

होश मेरे उड़ ना तू, पैर मजबूत होंगे।
बस, कठिन डगर, गीत साहस गायें॥

कुछ और चल आगे, पैरों ने मुझे बताया।
शूल क्यों है पुष्प जैसे, पहले तो सताया॥

लेकिन अब खुशबू, बहते खून से आती।
मार्ग लंबा है मंजिल, जैसे पास वो आयी॥

साहस का सम्मान वो, उद्धत है करने को।
भेंट में ही दिया लक्ष्य, स्वयं अपने हाथों॥

अब याद आयी कुछ, पल जो कभी बीते थे।
हँसते हुए होंठों ने, प्यारी इन आँखों ने॥

बताता, मेरे अपने, झरते सिर पसीना।
तभी सुनाने वो लगा, मंजिल सारी गाथा॥

टिका ये रखी निगाहें, सिर्फ उस मंजिल पे।
अपलक पूरा ध्यान, लगाया साधना में॥

‘साधना!’ यह और क्या है? दुःख में है मृदु हँसी।
घनघोर तिमिर बीच, किरण है एक जगी॥

चलते हुए रात वो, गुजर गई थी आधी।
किन्तु नैनों में है नहीं, आलस या निद्रा भी॥
बस, सततता थी संग, उत्साह और भी बातें।
सिर्फ कर्म जो निष्काम, आदि और अंत है॥

अचानक देखा मैंने, पास आ चरण छूते।
स्वयं मंजिल थी जो, इतने में ही कैसे?

अद्भूत-सा था वो समां,
चिर-आनंद अनोखा।
कहता हूँ बस, सदा
फल निष्काम कर्म का॥

अवश्य है एकदिन, मिलना तुझको राही।
कर्म और लगन वो, हैं समर्पण भारी॥

कर रहा हूँ अपना, निष्काम कर्म जो जाना।
कभी समाया है डर, भीतर मन मेरा॥
      —————————

(6) कविता- “वाह! क्या काल आया है?”
                               
कैसे तुमने कह दिया मुझे?
मिट गई अब उनकी प्यासें।
राक्षस! वृति छोड़ पाये हैं,
कभी नहीं, त्याग सकते हैं॥

सब्र हैं कहाँ? उन लोगों में,
हरदम रहती वासना है।
अरे! आज का है मानव ये,
ऊपर से, अन्दर से दानव है॥

हो गयी है अब मुश्किलें कई,
सीधे-सादे मालूम है।
न सींग, न नाखून है उनके,
दो हाथ, पग भी दो है॥

बाहर-से सब कुछ है जैसे,
नर या और अच्छे शायद हैं।
फिर बात नयी, काम भी नया,
कोरा दिखावा है नर का॥

देख! करतूत उनके कितने?
प्यारे ना किसी का डर है।
होने लगा ब्रह्मानन्द उन्हें,
वाह! क्या काल आया है?
   ————————— 


(7) कविता- “थोड़ी-सी जिन्दगी”
                
जीये थोड़ी-सी जिन्दगी,
कर गयें दुनिया में वो नाम अपने।
कुछ करने वाला वर्ष माँगता है नहीं,
हरपल नया इतिहास रचता है॥

जिन्दगी हर दिन होता है नया,
कुछ कर दिखाने को बेचैन वो रहते हैं।
सिर्फ बेचैनी नहीं, संघर्ष और हिम्मत,
अथक निशि-दिन कर्म में लीन रहते हैं॥

कभी ना हुआ होगा जो कोई सपूत,
अरे! लगाते होंगे अनुमान कई जनें।
जीया वो बरसों या पूरी शती,
न मालूम सच्चाई, जवानी में ही प्राण गँवायें॥

हुए हैं वीर अनेक, लेकिन वो लाखों में एक।
कैसे? तू उनको देख, शहीद है वीर या महापुरूष॥

सो-सोकर जो चाँदनियों में, धरा पर रहता है छिप कहीं।
दर्द न मालूम उसको, जीवन-पथ पर है कुछ भी॥
सूरज की गर्मी, काँटों भरी राह, धूल उड़ाती है आँधी।
उधर कब जगा था वो? मालूम नहीं, पता है अभी रूकेगा नहीं॥

मोह नहीं सताता है, उनको व्यर्थ किसी का।
केवल जिन्दगी का है समर्पण, बचाने को सजाने को मानवता॥
दुःख झेलकर दर्द पी जायेंगे, बुराई से लड़कर।
अंत विजय का दीप वो जला, सौंप देंगे किसी के कर॥

सिर्फ जीवित रहकर, बैठे रहना निष्क्रिय।
कभी न भाता यह, न बैठकर सोचा भविष्य॥

बैठे हुए मालूम होंगे हमको, लेकिन वो चलते हैं।
चलता है मस्तिष्क, बोलती है आत्मा, दिल सब सुनता है॥

जीये थोड़ी-सी जिन्दगी,
कर गये दुनिया में वो नाम अपने।
कौन चाहेगा? जिन्दा होकर मौत,
पशु बनकर क्या? योंहि मर जायेंगे॥
कभी-कभी आती है आँधी, कभी होती है बरसात।
रोज न पड़ता है कोहरा, न होता है हिमपात॥
किसी दिन कुछ पल, बस! वो रहता है याद।
माह नहीं, एक या दो, आने वाले कई साल॥

आओ, देखो, कुछ करो ऐसा।
संग बनाये पवित्र आँचल को॥
छू न जाये कोई बुराई जहाँ।
कर दिखायेंगे नाम अपना, सब बोलो॥

हिम्मत है बेहद जरूरी, जगाता उसको साहस।
जब पौरूष दिखाता मानव, राह हो जाती है जगमग॥
जीये थोड़ी-सी जिन्दगी,
कर गये दुनिया में वो नाम अपने।
बैठे हुए मालूम होंगे हमको,
लेकिन वो चलते हैं॥
—————————


(8) कविता- “दर्द न दिखता है तुझे”
                  
दर्द न दिखता है तुझे,
अपने माँ-बाप का।
बेटी तू उनकी है,
कहता यह सारा जहाँ॥

कई हैं प्यार करने वाले,
लेकिन सच्चा स्नेह और कहाँ?
माँ-बाप तेरे, तू उनकी प्यारी है,
सखियाँ तेरी, बहिना और है भाई तेरा॥

सब तेरे हैं,
क्योंकि तू उनकी है।
देख! उधर वो हैं,
जिनकी तू नहीं, लेकिन वो तेरे हैं॥

दर्द न दिखता है तुझे…………

सच्चे सखा कम हैं ऐसे,
जो जाने मौन दिल की भाषा।
दर्द देखकर सखा तेरे,
छिप जाते हैं कहीं नजर बचा॥

बहिन लड़कर करेगी पीहर में,
केवल मात्र अधिकार अपना।
कभी न लेगी खबर वो,
दर्द पिलायेगी उनको उल्टा॥
दर्द न दिखता है तुझे…………

आज लगता नहीं है मुझे,
कहीं भी सच्चा भाई तुम्हारा।
देख! रंग तू उसका, कैसे?
वो बीवी के मोह में फँसा॥
मालूम न उसको,
होता क्या स्नेह है?
अपना मत मान उसे,
सच्चा नहीं, वो कच्चा है॥
दर्द न दिखता है तुझे…………

भाभी को है प्यार तुमसे,
लेकिन वो करेगी दिन कितने,
मम्मी-पापा के डर से।
पढ़ी-लिखी, होशियार है तू,
मालूम नहीं, फीस कौन भरता है?

भाई! एक चाबी है उसके पास,
सारे खजाने की, क्योंकि वो कूबेर है।
अब हाथ में रहा न कुछ,
और बेचैन आज बाप है॥

दर्द न दिखता है तुझे…………
 
‘जैसे-तैसे हो,
लेकिन पढ़ाना है।
बेटी मेरी, बाप मैं,
हिम्मत है करूँगा मजदूरी मैं॥’

सुनकर शब्द तुम्हारे,
लाख जतन कर पैसे लाये तात तुम्हारे।

दर्द न दिखता है तुझे…………

आज का जवान भाई है,
लेकिन छिप गयी जवानी, कहाँ है?
काम-भाव और नशा-वृति से,
उसको मोह बहुत बड़ा है॥

हो गये हैं अधेड़ तेरे,
उम्र ढली माँ-बाप की।
फिर भी वो सुबह उठते,
चाय पीते हैं या नहीं॥
दर्द न दिखता है तुझे…………

करे वो काम खेती का,
भाई तेरा उठे नहीं।
क्या रात है? क्या दिन?
न मालूम पास है, या दूर अपनी बीवी॥

धूप न देखी है,
रात है उनको प्यारी।
फल खाये या अमृत-पान करे,
ऐसे हैं तेरे भैया-भाभी॥
दर्द न दिखता है तुझे………

कड़ी धूप में करते हैं काम वो, भूखे-प्यासे और
तू बेटी होकर उनकी, करती है लाज-शर्म॥

जैसे हैं, तेरे हैं,
बाहर से नहीं, दिल से।
बेटी! पढ़ी-लिखी है तू,
माँ-बाप तेरे, फिर ऐसा भाव क्यों?
दर्द न दिखता है तुझे…………

छोड़ छल और झूठ तू,
समझ दर्द उनका है बड़ा।
जन्म दिया, पाला-पोसा,
पढ़ाया और शादी है बाकी करना॥
टूटेगा आँखों का तारा,
रोयेगा तब वो बन आसमाँ।
नयन करेंगे भारी वर्षा,
गोद सूनी होगी तेरे बिना॥

दर्द न दिखता है तुझे…………

कौन झूमकर तुझे?
स्नेह से गाल चूमेगा।
भाई-भाभी, सखा-सखी,
न और कोई रोयेगा॥

करेंगे वो दुआ तेरी,
सुनेगा ईश अकेला।
दर्द न दिखता है तुझे…………

धरती पर माँ-बाप,
बस, यही सच और प्यार है।
स्नेह, ममता, दया, करूणा,
सभी में वो अपने ईश हैं॥…………
   —————————
(9) कविता- “पिया कहती है”
            
पिया कहती है,
‘हीरो बन जा तू।’
धीरे-से पूछता हूँ,
‘हीरो! क्या होता है?
किसे तू हीरो मानती है?’

बड़ी उत्सुकता से,
बताती है बातें।
‘जो जीन्स-टीशर्ट पहन,
लम्बे रखे हेयर अपने।
मर्द होकर भी स्त्री-सी,
वह बोले वाणी।
और वैसी ही,
चाल हो उसकी॥’

‘अरे, वाह!’ अफसोस हुआ।
लेकिन प्रत्युत्तर देना था॥
तभी मैं बोला, ‘सुन पिया!

ऐसे हीरो, घर-गली में।
हरकहीं मिल जायेंगे॥
सड़कों पर फिरते हुए,
आवारा कई सारे॥

जीन्स? यह पहनता,
बाबू ही नहीं, मजदूर भी।
कुलीन के साथ,
पहनकर इसे नीच भी।
सब पक्के हीरो बन चुके हैं॥
अब बचा हूँ मैं ही एक अकेला।
लेकिन तू कहती है- हीरो बन जा॥
      -------------------------
(10) कविता- “वो श्रवण पुत्री”                   
तम-तम कर रही,
यहाँ से वहाँ बिखरी।
वो धूप हमें आज ही,
तपाकर माँझ देगी॥

सिर से पसीना ढ़ुलककर,
पूरा बदन भीगो चुका था।
और नीचे उतरकर,
पूज्य बना उसको बह गया॥

हाँ, वो सुन्दर है और
निम्न होकर भी ऊँची।
क्योंकि चलते हुए मुझको,
मालूम हुआ था यही॥

बाप मर गया था कभी,
अब शेष बची थी माँ अकेली।
जो बीमारी से पीड़ित,
उसके साथ वो रहती थी॥

सड़क के किनारे,
एक पुरानी-सी लारी।
जहाँ वो कई चीजें,
बेचती है अकेली॥

वो छोटी-मोटी चीजें,
जरूरत हर किसी की।
बच्चों के साथ है,
बड़े-बूढ़ों के काम की॥
एक तरफ माँ,
धूप के मारे हो गयी बेहोश।
तो हिलाकर दुपट्टा,
करने लगी हवा का जोर॥

तो दूसरी तरफ,
करने है कई सारे काम।
यह लो अच्छी चीज,
बस इतने ही है दाम॥

चलती है उस रकम से,
जिन्दगी माँ-बेटी की।
आज देखकर उसे,
रह गया दंग मैं भी॥

अरे, इतनी धूप,
ना ऊपर छाया।
वो श्रवण पुत्री,
फर्ज निभाती माँ-बाप का॥

इधर आते-जाते,
लोग कई सारे।
रखती है ध्यान वो,
किसको क्या जरूरत है?

धन्य है इस युग में,
ऐसी श्रवण-कुमारियाँ।
जो एक सहारा है,
अपने माँ-बाप का॥
  —————————
 

(11) कविता- “मध्यम ही सबकुछ”
                 
मध्यम ही सबकुछ, जीवन का सार यही।
यही मरता है रोज, जीता भी सच्चा यही॥

कभी नहीं मरता है, वर्ग अमीर जिसका।
क्योंकि मरने के बाद भी, जीवित वो रहता॥

नाम लेते याद कर और उसके नाम से।
कर लेते हैं काम वो, दूसरे जीवन में॥

मालूम ना यह होगी, बात जो भीखमंगों की।
यह नीच वर्ग रहे, खाये-पीये और जीये ज़िन्दगी॥

सच कहता हूँ यह, यहाँ है भी या नहीं है।
जो जीवित भी मरा है, फिर क्या मरने में॥

न कोई रोये-चिल्लाये, दर्द ना होता किसी को।
क्योंकि उसका कुछ भी, ना यहाँ, ना वहाँ है॥

मध्यम ही सब कुछ, मरण उसका सच्चा।
जन्म उसका है नया, करने को ही हुआ॥

जग का आधार यही, जीवन का सार यही।
सच का अधिकारी भी, कहेंगे इसको ही॥

कानून इसके लिए, सजा का हक भी इसे।
राज बनाता है यह, जो उसका नाश है॥

ऊँच दबाये मध्यम, मध्यम की नहीं माने।
नीच उल्टा वार कर, मध्यम को मार दे॥
      —————————


(12) कविता- “जल जा भू”
             
जल जा भू, दिखा जादू।
ना बरसे, ना गरजे।
पानी के संग हवा,
माँझ दे हमें थोड़ा।

हम मानव बदल गये,
रंग-रूप से और कर्म से।
हर अपना लगे पराया,
और साथ है स्वार्थ अपना।

क्या छोड़ा है? और बचाया भी,
हमने यहाँ-वहाँ कुछ नहीं।

अब कैसे बरसे पानी?
क्यों चले पवन सुरीली?
मीठे-ताजे फल वो,
भाते नहीं मुख को।

आज स्वाद बदल गया,
हम मानव भी बदल गये।
जल जा भू, दिखा जादू।
ना बरसे, ना गरजे।

थिति पर फैल गया अन्याय यह,
हर जगह झूठ बन रहा सच।
लोग छोड़के पुण्यता,
मान बैठे पाप को अच्छा।

माफ करोगे कितने दिन?
आ रहा प्रलय अब धीरे-धीरे।
करना तुम भी, तैयारी अपनी।
कह रहा हूँ, बातें सच्ची॥

पुनः तू सबको समतल कर दे।
जहाँ गिरि था वहाँ सूखा नद।
और नद की जगह,
खड़ा कर दे पर्वत॥
छोड़के यह प्यारी धरा।
रहने चले आसमां॥
पानी के संग हवा,
माँझ दे हमें थोड़ा।

जब गूँजेगा यह गगन।
क्या करेंगे सब जन॥
दिन ना चाहते, प्यारी रात लगे।
फूल तोड़े और काँटे भी ना चूभे॥

कहते हैं होगा कुछ नहीं।
कम फल मिलता भी नहीं॥
जल जा भू, दिखा जादू।
ना बरसे, ना गरजे।
पानी के संग हवा,
माँझ दे हमें थोड़ा॥
———————


(13) कविता- “अपना धर्म”
             
आकर कहता है कोई,
बात किसी को अपनी।
पास उसके कानों में,
धीरे-से आवाज दी॥

आपका धर्म है कौनसा?
विस्मय हुआ, फिर मैं बोला-
जन्म हिन्दू के घर
देश हिन्दुस्तान और
है मानव-धर्म मेरा।
क्यों? आपका मतलब क्या?

थोड़ी-सी छायी स्तब्धता,
और डगमगायी आँखें उसकी।
फिर झिझकते हुए कहा-
हिन्दू, मस्लिम या
हो सिक्ख-ईसाई।
राम नाम सुमरो या
अल्लाह-अल्लाई।
एकाग्र दृढ़ता थी और
आत्म-दृष्टि भी॥

बिना जवाब पाये,
और कही बातें।
शायद आप जाते हैं,
गुरूद्वारा या चर्च में॥

सुनता रहा, अनिमेष नजरों से,
ना कुछ बोला, न कहा कुछ उसे॥

रूक-रूककर वह,
देने लगा सफाई।
उसके अपने धर्म की
और सब भाई॥

हिन्दू करते पूजा-अर्चन।
बलि चढ़ाते अल्लाह को मुस्लिम॥
कट्टर मने जाते हैं सिक्ख।
ईसाई की बात है अलग॥
तब रूका न गया,
मुझसे और थोड़ा।
एक शब्द निकला,
मुँह से अनोखा॥

अरे भाई, आपका मतलब,
फिर से बताओ, न आया समझ।

ख्तम हो चुकी थी बात,
अब दिखाई दिया लाचार।
तब मैंने दया-भाव से,
यही कह पाया उसे॥

मन्दिर में जाऊँगा,
दिल से करके पूजा।
शीश अपना झूकाऊँगा ,
अल्लाह के चरणों में सच्चा॥
गुरूद्वारा है पवित्र,
अच्छे लगते हैं गिरजागर।

राम-कृष्ण या त्रिदेव,
और भी हैं हमारे
तैंतीस करोड़ देव।
गीता, कुरान, बाईबल
और गुरू-ग्रंथ साहब
सब अच्छे हैं,
करते हैं संहार पाप का।
हर बुराई से दूर,
देते हैं सन्देश महानता का॥

क्यों करें खिंचातानी?
और त्यागे धर्म अपना।
निज धर्म में भी है,
और पर-धर्म में भी।
सबका सार एक,
जो मानव धर्म।
जो बनाये देव-तुल्य,
या उससे भी महान्॥

जग में भेजा, जगदाता ने,
मवन-लोक के बीच रहने॥
और रहें हम अकेले,
मावन से दूर, उसको पाने की चाह में॥
लेकिन मिलेगा क्या?
मानव से दूर,
ऐसी कौनसी जगह।

कई गये खोजने उसको,
पर्वत, गुफा-कन्दरा में।
ली समाधि, दी कुर्बानी,
न दिल से, न आत्मा से॥

चला गया उनका, सब व्यर्थ प्रयास।
न देखा देव-रंग, कहीं जग-से अलग॥

एकांत है, अलग है,
सुख है, शांति है।
उसका नाम स्वर्ग,
जो शाश्वत है॥
लेकिन यहाँ पर,
हैं इसके विलोम।
अगर कोई देखें,
उनमें दर्शन उसका।
तब आनन्द मिलता,
कुछ और ज्यादा॥

जब देखें दृष्टि सम,
विचारें दूसरे के हित।
दुख झेलकर दें सुख,
और मरने से ना हो डर॥
दें किसी को हम,
एक नया जन्म।

तभी है सार्थकता,
और मिलती है मंजिल॥
धर्मों से महान, है धर्म मानव का।
वही देव-रूप, मनुजमात्र के बीच बसा॥
       —————————
(14) कविता- “सुन, खाली हैं नैना"
             
सुन, खाली हैं नैना,
कहाँ गया नीर इसका।
एक तेरे ही नाम,
बहते हैं बन अश्रुधारा॥

जीवन बचाऊँ, इस जहां से।
देने के लिए, कुर्बानी मैं॥
जिसे न देता, जग कुछ भी।
देता हूँ मैं, सर्वस्व उसको ही॥

प्यार सबका हैं, लगता नहीं ऐसा।
सचमुच मुझे है, प्यार किसी का॥

क्या बात कहूँ?
समझ में न आयेगी।
लेकिन सच है,
देखें उसमें घृणा ही॥
उसी में खोजूँ थोड़ा-सा।
मैं प्यार अपना सच्चा॥

स्वर्ग आये मिलने को,
उससे मुँह फेरकर।
तब जाऊँगा मैं, किसी के संग॥
जहाँ मिलन बड़ा प्यारा है,
शायद होगा वहाँ नरक।
लेकिन उसी में आनन्द समझ,
मान लूँगा मैं स्वर्ग॥

हाय! मेरे स्वर्ग,
मुझसे ना होना अलग।
बाँधे रखूँगा नाता,
कभी ना होऊँ जूदा॥

मेरी थिति मेरा जादू,
सोने जैसा है सूरज।
रजत आँचल में,
हीरे-मोती जगमग॥
केवल वही है,
जो है तुझमें ही।
नहीं देख सके कोई,
सौ जतन करके भी॥

लेकिन देखा है,
पहली ही नजर में।
नख-शिख के,
उस पार मैंने॥

आह, कैसे जीऊँ?
स्वर्ग न जीकर
आ रहा हूँ अब।
साथ तेरे नरक में,
वही मुझे प्यारा है।

जुल्म हम दोनों के,
भोगने को पूरी उमंग से।
तैनात खड़ा मैं,
आकर बता, तू कहाँ है?
राह कहाँ है अपनी?
जग के उस पार,
एकपल तो दिखा वो छवि॥
मेरी प्राण-पिया तू,
सुन, खाली हैं नैनां॥
—————————


कविता- “विश्वास”
          
रखो इतना विश्वास,
पहाड़ों पर क्या चढ़े?
बुलन्द हो हौसला अपना,
आसमां लाँघ जायें॥

मुसीबत का प्रचंड,
रवि हमको देखेगा।
बढ़ते मंजिल तक,
जब हमें वो पायेगा॥

ऐसी आग बरसेगी,
खून भाप हो उड़ेगा।
लेकिन हम ना रूकें,
तो जीत दिलायेगा॥

खूद वो लेकर दीप,
राह अपना चमका।
अटूट विश्वास तेरी,
पार लगेगी नैया॥

नींद ना आँखों में यहाँ,
बस, मंजिल है सपना।
रात आधी जाग उठा,
क्योंकि उसको जाना॥

उस पार जहाँ तक,
गया नहीं कोई यारा।
लेकिन बढ़ रहा है,
अतिपास उसके॥

नहीं देखा था उसने,
लुढ़कनेवालों! तुम्हें
बस, चलता वो गया,
कई गिरे, वो मरे॥

उसने देखा सपना,
सच्चा आज कर दिया।
नामुमकिन है नहीं,
काम कुछ करना॥
जग में थोड़ा मुश्किल,
हिम्मतवालों! सच है।
यदि जज्बा दिल में,
तब कौन हराये?
———————

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