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लघुकथा - भिक्षुक भोज - प्रियंका कौशल

यहां भिक्षुक भोज हो रहा है, आप सादर आमंत्रित हैं। बाबा रामदेव पीर मंदिर के बाहर लगे बैनर को पढकर सुधा चहक उठी। चलो यहीं खाना खा लेते हैं। मंदिर है, भगवान का दर है। सुधा की बात रमेश को बेतुकी लगी। हम यहाँ खाना खा लें, वह मुंह बिचका कर बोला। मेरे और तुम्हारे स्टेटस की जरा भी चिंता है तुम्हें। कुछ भी कहने के पहले सोच लिया करो। तुम केंद्रीय विद्यालय की टीचर हो और मैं एक बैंक मैनेजर, और किसी मंदिर के भिक्षुक भोज में खाना खाएँगे। इतना सुनकर सुधा बोल उठी कि क्यों कल ही तो आप भगवान से मांग रहे थे कि हमारा एक बंगला हो जाए। इतना होने के बाद भी हम सब भगवान के आगे भिक्षुक ही तो हैं। हर वक्त ईश्वर से कुछ ना कुछ मांगते रहते हैं, याचना करते रहते हैं। केवल इस बात को मानना नहीं चाहते। सुधा की बात सुनकर रमेश बिना कुछ बोले भिक्षुक भोज के पंडाल की तरफ बढ़ गया।

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प्रियंका कौशल
संक्षिप्त लेखक परिचय -लेखिका पिछले 15 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। नईदुनिया, दैनिक जागरण, लोकमत समाचार, जी न्यूज़, तहलका जैसे संस्थानों में सेवाएं दे चुकी हैं। वर्तमान में भास्कर न्यूज़ (प्रादेशिक हिंदी न्यूज़ चैनल) में छत्तीसगढ़ में स्थानीय संपादक के रूप में कार्यरत् हैं। मानव तस्करी विषय पर एक किताब "नरक" भी प्रकाशित हो चुकी है।

ईमेल आई.डी-priyankajournlist@gmail.com

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