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रमेश चंद्र शाह की तीन कविताएँ :

1 – युधिष्ठिर उवाच

**-**
‘तुझे सुई भर जगह न दूँगा’
कहता है दुर्योधन.
हर बस्ती में आग लगाता
फिरता है दुर्योधन.

बदले का सपना यह कब तक
टुकड़ों पर पलना है?
यह अज्ञातवास कितने दिन
और अभी चलना है?

नाच-गा रहे अंतःपुर में
योद्धा पार्थ सरीखे.
क्षोभ-सत्व को बंधक रखना
कोई हमसे सीखे!

कहाँ अरे, वह सपना, जिसने
पुरखों तक को तारा!
कहाँ तुम्हारा सच यह, जिसने
लगातार है मारा!

जगा हुआ हूँ में जिस सच में
उसे छोड़कर खाली
सपने की भी आज तुम्हारे
कौन करे रखवाली!

जीवन स्वयं भीख है, जिस दिन
यह पहचान सकोगे,
मेरे इस निराश धीरज को
अपना मान सकोगे.

भूत और भावी तक कुछ-कुछ
मैंने जान लिया है,
कुरूक्षेत्र पर नहीं टलेगा
यह पहचान लिया है.

*-*-*
2 साथ
--*--
सूनी अंधेरी सड़क
सूना
आसमान
एक सूनी झील
सूनी रात
चल रहा हूँ रात के भीतर
निरन्तर
एक सूनी और अक्षय टिमटिमाहट
दे रही है
साथ.
--*--

3 संध्याटन
--*--
झील में अटका पड़ा यह
व्योम देवल
छंद केवल?
या कहीं
कुछ बात?
पूछती है
रात

**-**
हिन्दी के सुप्रसिद्ध, वरिष्ठ रचनाकार, रमेशचंद्र शाह भारत सरकार के प्रतिष्ठित सम्मान ‘पद्मश्री’ से नवाज़े जा चुके हैं.

1 टिप्पणियाँ

  1. कहाँ अरे, वह सपना, जिसने
    पुरखों तक को तारा!
    कहाँ तुम्हारा सच यह, जिसने
    लगातार है मारा!
    ...

    wah ! wah !!

    Dhanyavaad rachnakaar ji...

    जवाब देंहटाएं

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