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लघुकथाः तवा

- कालीचरण प्रेमी

नई दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले की भीड़ देखकर मैं हतप्रभ रह गया. किसी तरह प्रवेश टिकट लेकर अन्दर दाखिल हुआ. हाल न. 6 पर पहुँच कर मेरे कदम रुक गए. “क्या खरीदूँ ?” इस बात के लिए मेरे मन में ऊहापोह नहीं था. अभावों ने इतना तंगहाल बना दिया था कि शापिंग जैसे शब्द मेरे शब्दकोश से हमेशा बाहर रहे हैं.
शादी के बाद से मैं अपनी पत्नी अंजलि को कोई सुख नहीं दे पाया. सिवाय गरीबी में रहकर जीवन काटने के उपदेशों के. हम दोनों की तकरार में सभी विषय आर्थिक ही रहे हैं. मैं एक के बाद एक कई स्टालों पर घूमता हुआ रूक गया. एक नॉनस्टिक तवे को उलट-पलट कर देखने लगा. ध्यान आया, अंजलि अभी तक उसी घिसे-जले लोहे के बिना हेंडल वाले तवे पर रोटियां सेंकती है. उसकी उँगलियाँ कई बार खाना बनाते हुए जल जाती हैं. पराठे स्याह काले पड़ जाते हैं. अंजलि अकसर मुझसे तवा बदलने को कहती रही है. मैं अंजलि की पीड़ा को समझने के बजाय झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वालों की कठोर जिन्दगी से तुलना करके उपदेश देने लगता हूँ.
एक तवा इस बार खरीद ही लिया जाए. अंजलि के लिए यह एक सरप्राइज़ रहेगा. यही सोचकर मैंने तीन-चार कंपनी के तवे पलटे. एक जो मुझे अच्छा लगा, उसका भाव पूछा- “कितने का है ?”
“तीन सौ पचास का.”
कीमत सुनकर एक बारगी तो मैं सहम गया. पर तवे की खूबियाँ बार-बार मुझे आकर्षित कर रही थीं.
“यह हैंडल वाला है... नान स्टिक है... इसकी दो वर्ष की गारंटी है...इसमें पराठे नहीं जलते... यह घी और तेल की बचत करता है... इसके साथ एक छाता फ्री है...” स्टाल वाले ने लगातार तवे की कई खूबियों का जिक्र किया.
तवा लेकर जब शाम को घर पहुँचा तो अंजलि नया तवा देखकर खिल उठी. पहली बार शायद मैंने अंजलि के चेहरे पर इतनी खुशी देखी थी. अंजलि ने वह तवा संभालकर रख लिया. देर तक वह तवे को उलटपुलट कर देखती रही.
कोई दो सप्ताह बाद भी जब मैंने अंजलि को वही पुराना तवा इस्तेमाल करने देखा तो जिज्ञासा वश पूछा - “क्यों भई, उस नए तवे का क्या हुआ ?”
“मैंने उसे पैक करके संदूक में रख दिया है”
अंजलि के उत्तर से भौंचक मैंने पूछा - “क्यों भला ?”
“सुरभि बिटिया के दहेज में काम आएगा.”
“अभी से ?” किंचित सोचते हुए मैं बोला - “अभी तो वह सात-आठ साल की बच्ची है ?”
“आप समझते क्यों नहीं हैं” अंजलि मुझे समझाने लगी. “अभी से तिनका-तिनका जोड़ोगे तब भी दहेज पूरा नहीं हो पाएगा. जानते नहीं आजकल लड़की वालों को कितना कुछ देना पड़ता है. आगे समय और भी खराब आने वाला है.”
तवे पर रखी रोटी जल गई थी. उसमें से धुआं निकल रहा था.

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कथाकार कालीचरण प्रेमी की रचनाएँ सैकड़ों प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं, जिनमें से अनेक पुरस्कृत भी हो चुकी हैं. आपकी कुछ रचनाओं का बांग्ला, पंजाबी व मराठी में भी अनुवाद किया गया है. कई पत्रिकाओं में आपका संपादन सहयोग भी है.

1 टिप्पणियाँ

  1. यह तो आपने दहेज़प्रथा पर बहुत ही तीखा प्रहार किया है. वास्तव में दहेज़ हमारे समाज में कैंसर की तरह फ़ैल रहा है जिसके शिकार सब होते है. गरीब हो या अमीर सबको अपनी बेटी की शादी में कर्ज लेना ही पड़ता है ..

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