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कहानीः दत्तक पुत्र


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- मीरा शलभ

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बड़े भैया. आप क्या कल सवेरे ही चले जाएंगे? छोटी गुड़िया ने जानते हुए भी यह प्रश्न किया था. “हां” – बड़े भैया ने एक लम्बी श्वास खींचते हुए कहा और हाथ का सामान हाथ ही में थामे न जाने क्या सोचते हुए रह गए. फिर एक क्षण को अपने अधरों पर एक विस्मत रेखा खींचते हुए से बोले ... “क्यों? गुड़िया तू चलेगी मेरे साथ. बता, चलेगी क्या?”

गुड़िया ने निरीह भाव से मुझे देखा और मैंने शीघ्रता से आँखें झुका लीं तथा पायल को सुलाने के बहाने उस कक्ष से आँगन में चली आई. गर्मियों के दिन थे. सब लोगों के बिस्तर आँगन और छत पर लगे हुए थे. कुछ लोग सो चुके थे और कुछ सोने लेने का उपक्रम कर रहे थे. कुछ सदस्य जाग भी रहे थे और जो जाग रहे थे वे आपस में बतिया रहे थे.

बड़े ताऊजी ने निःश्वास भरते हुए कहा... “लो भई मुरलीधर भी गए... अब हम ही रह गए हैं दिन गिनने के लिए...” फिर थोड़ा रुक कर बोले -“भई, आदमी का भी क्या है? आज है और आज नहीं. सामान सौ बरस का और कल की खबर नहीं”

अम्मा ने उनकी बात सुनकर दबी-दबी सिसकियों को ऊँचा आलाप देना शुरू कर दिया और अवरूद्ध कंठ से बोलीं ... “अरे तेरहवीं भी निबट गई. अब तुम सब लोग भी कल चले जाओगे... बस मैं ही अकेली रह जाऊँगी ... दीवारों से टकराती हुई डोलूंगी सारे घर में...” बुआ धीरे से बोलीं... “सुना है नित्या भी कल ही चला जाएगा.” इतना सुनते ही ताईजी बड़े ही नाटकीय अंदाज में बोलीं- “अरी बीवी... कौन किसका है? कौन किसके लिए बैठा रहे उम्र भर...? सभी अपने-अपने धंधों में लगे हुए हैं.”

अब तक के तमाम वार्तालाप को मैं चुपचाप सुन रही थी. किंतु ताई जी की व्यंग्यवाणी से मैं तिलमिला गई थी और यह सोचने पर विवश हो गई... आखिर क्यों आएंगे बड़े भैया यहाँ पर? क्या रखा है उनका इस घर में? केवल खोखले संबंध जिनमें छलावा ही छलावा बसा है. पिता जी की मृत्यु का दुःख अब इतना नहीं साल रहा था जितना कि भैया के प्रति हुए अन्याय एवं तिरस्कार का दुःख. जिस पर भैया अब भी उतने ही सामान्य बने हुए थे जैसे कि उनके साथ कुछ हुआ ही न हो, कुछ गलत घटा ही न हो.

बड़े भैया जब चार वर्ष के थे तब पिता जी ने उनको दूर-दराज की रिश्तेदारी से गोद लिया था. किंतु गोद लेने की रस्म का निर्वाह इसलिए नहीं किया था कि शायद-कभी भविष्य में ईश्वर ने उनकी गोद भर दी तो, फिर इस पराए रक्त से भविष्य में कैसा संबंध रहे या न रहे. यूँ भैया को पालने-पोसने में पिताजी ने कोई कसर नहीं रखी. उनका लालन-पालन उच्च स्तर का किया. अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवाया. किंतु अपनी संतान की अभिलाषा में पिता जी शायद उन्हें मन से कभी पुत्र रूप में स्वीकार नहीं कर पाए थे.

परंतु यह तो जीवन है... यूँ ही अविरल धारा की भांति सारे काम बहाव में होते रहते हैं. नौ बरस पश्चात् वास्तव में चमत्कार हो गया और पिता के आस-भरे आँगन में मेरा जन्म हो गया. मेरे बाद आशा, फिर अनिल, ललित फिर गुड़िया का जन्म हुआ. घर आँगन हम सब की किलकारियों से गूंज उठा. बड़े भैया उम्र में बड़े तो थे ही, उम्र का फासला भी बहुत था. हम सब पर उनका रौब चलता था. कब उनकी उँगली पकड़ कर मैं चलना सीखी – याद नहीं. दिन भर के कामों का ब्यौरा भैया नित्य हम सब भाई बहनों से लेते थे और रात्रि में अपने साथ हम सभी को पढ़ाते भी थे.

समय पंख लगाकर उड़ रहा था और हंसते-गाते व्यतीत भी हो रहा था. हम सारे बहिन-भाई एक दूजे में डूबे यूं ही बड़े होते गए. मुझे याद है बड़े भैया ने बी.ए. तक शिक्षा प्राप्त की तो पिताजी ने अपने मित्र की फैक्ट्री में उन्हें काम पर लगवा दिया था. नौकरी लगते ही अम्मा ने भैया के विवाह को लेकर शोर मचाना आरंभ कर दिया था... “देखो जी... अब नित्या कमाने लगा है सो जल्दी से घर में बहू ले आओ ताकि मैं चैन की थोड़ी सांस तो ले सकूँ, थोड़ी मुक्ति तो पा सकूँ इस घर के झमेले से.”

फिर सचमुच में ही एक सांवली-सलोनी कन्या ढूंढ कर अम्मा ने भैया का विवाह रचाया था. भाभी बहुत ही मधुर स्वभाव की थीं. घर भर की सेवा कर और अपनी मृदुल मुस्कान से उन्होंने सबका मन मोह लिया था. मगर एक दिन सुख की वर्षा पर अचानक जैसे वज्रपात हो गया. भैया की फैक्ट्री अचानक घाटे में आ जाने से बंद हो गई. घर में माहौल चिंताजनक हो गया. कुछ महीने तो भैया ने इधर-उधर हाथ पैर मारे तब कहीं जाकर सुदूर कलकत्ता के किसी व्यवसायी के यहाँ नौकरी मिली.

भैया होली दीवाली पर जरूर आते. अब मैं भी बड़ी हो चुकी थी. पिताजी एवं भैया को मेरी शादी की चिंता होने लगी. पिताजी अकसर ही भैया से कहा करते - “ प्रभा का विवाह जल्दी ही करना होगा... उसकी उम्र निकली जा रही है. अब तो सब तुम्हीं को करना है नित्या. भई मेरे पास जो कुछ भी था वह मैंने तुम्हारे पढ़ाने लिखाने में और तुम्हारे विवाह में लगा दिया”

एक दिन मेरे हाथ भी पीले हो गए. मेरे हाथों की मेहँदी का रंग भैया के सर पर बीस हजार रुपयों के कर्ज से आया था. इधर मेरे विवाह का कर्ज उनके सर से ले देकर उतरा ही था कि आशा विवाह के लिए तैयार बैठी थी. जैसे तैसे भाभी के गहने गिरवी रख और नए कर्ज लेकर भैया ने आशा का भी विवाह कर दिया.
आशा के विवाह के पश्चात् पिता जी की तबीयत अचानक ही तेजी से बिगड़ने लगी. जाँच पड़ताल से पता चला कि वे कुछ दिनों के मेहमान हैं – उन्हें रक्त-कैंसर हो गया था. एक दिन उन्होंने अपनी वसीयतनामा तैयार करवाई और उसे सीलबंद मुझे सौंप दिया था. आज जब उनकी मृत्यु के सभी कार्यक्रम सम्पन्न हो गए तो मुझे वसीयतनामा की याद आई.

मैं वसीयत पढ़ रही थी... “नित्यप्रकाश मेरे रिश्तेदार का पुत्र है, जिसकी परवरिश, पढ़ाई और ब्याह इत्यादि में मेरा बहुत रूपया खर्च हो गया. अतः मेरे मकान और जमीन जायदाद पर प्रभा, आशा, अनिल, ललित का बराबर-बराबर अधिकार है. जब तक मेरे बच्चे नाबालिग हैं उनकी देखरेख नित्यप्रकाश करेगा. मेरी पत्नी के देखरेख की जिम्मेदारी भी उस पर है... क्योंकि यह घर का सबसे बड़ा बेटा है.”

जैसे-जैसे मैं वसीयत पढ़ती जा रही थी, मेरी गर्दन शर्म से झुकती जा रही थी. मेरा रोम-रोम भैया के प्रति पिता के अन्याय और तिरस्कार के कारण कांप रहा था किंतु मैं विवशतापूर्वक क्रोध और ग्लानि के विष को पीती रही. जिसे निःसंतान रहने पर पिताजी दत्तक पुत्र बना कर लाए थे, अपनी संतान पाकर उसे एकदम से भूल गए. भैया की झोली में उन्होंने अपनी वसीयत में सिर्फ कर्तव्य ही डाले – परंतु अधिकार का कोई अंश नहीं डाला... हृदय में बार-बार हूक सी उठती और मैं सिसक-सिसक कर रह जा रही थी. लोगों को लग रहा था कि पिता की याद में मैं रो रही हूँ. वे कहने लगे थे - “न बेटी मत रो... जो चला गया वो लौट के थोड़े ही न आएगा... एक दिन सबको जाना है...”

रात आँखों में ही कट गई. मैं ईश्वर से विनती कर रही थी कि काश! समय यहीं ठहर जाए और सवेरा न हो... सवेरे भैया के जाने से पहले फिर रिश्तेदारों की टोली उन्हें घेर उनका कर्तव्यबोध कराएगी और मेरी आँखें फिर शर्म से झुक जाएंगी.

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रचनाकार मीरा शलभ के कई काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं तथा एक-एक कहानी / लघुकथा और काव्य संग्रह प्रकाशनाधीन हैं. कथा संसार पत्रिका में संपादन सहयोग का निर्वाह भी आपने किया है. प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में आपकी हर विधा में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं.

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