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संस्मरण : मा...स्सा...ब पाँच मिनट..


- पद्मनाभ मिश्र


नोट: यह कहानी बिहार राज्य के सुपौल जिलान्तर्गत बनैनियाँ नामक गाँव की है; जो आज से लगभग १७ साल पहले घटी थी.

रात के साढ़े दस बजे इंस्टीट्यूट के मुख्य परिसर के सामने घास के मैदान में बैठा कुछ सोच रहा था, बल्कि प्राकृतिक हवा का आनन्द ले रहा था. सामने लम्बे बोर्ड पर लिखा था - "इन्डियन इंस्टीट्यूट आफ़ टेक्नोलोजी, डेडिकेटेड टू द सर्विस आफ़ नेशन" लगा कितना प्रासंगिक एवं सत्य है ये वाक्य???. खास तौर पर "डेडिकेटेड" शब्द जो ४५ डिग्री उलटा लटका था जो मेरे मन की शंकाओं को और ज्यादा बलवान कर रहा था. इतना ही नहीं उसमें से भुगभुगाती रौशनी मेरे ध्यान को केन्द्रित होने नहीं दे रही थी. "डेडिकेटेड" शब्द के भुगभुगाती रौशनी से मेरा ध्यान यादों के गलियारों से निकलता हुआ पहले खड़गपुर से शुरु होकर "इलाहाबाद" फिर गोरख्पुर से होता हुआ बनैनियाँ तक जा पहुँचा. "बनैनियाँ" मेरा गाँव जहां मैं जिन्दगी के शुरुआती १४ साल गुजारा था. ललित कोसी पीडीत उच्च विद्यालय बनैनियाँ. हाँ उससे भी पहले राज्यकीय मध्य विद्यालय बनैनियाँ मेरा वास्तविक कर्म भूमि. इस स्कूल की याद आते ही कान में जोर से सुनाई दिया "मा...स्सा...ब पाँच मिनट...!!! सोचा क्यों ना कहानी लिखूं.........


पाँच मिनट बोले तो बिहार के मिथिला (बिहार) रीजन में बाथरूम, टोइलेट, १ नम्बर, पाकिस्तान के बदले स्कूल में बोला जाने वाला वाक्य. देश के दूसरे हिस्से में जितना अच्छा परिवेश उतना अच्छा तरीका. पाँच मिनट को अलग-अलग ढंग से बोला जाता है. जितना सभ्य समाज उतना ही सभ्य तरीका. पाँच मिनट के बोलने के तरीके से किसी की संस्कृति और सभ्यता उजागर होती है. यही नहीं लोग यहाँ तक बोलते हैं कि इससे कोई अपने पारिवारिक वातावरण का संक्षेप में परिचय दे देता है. बात पारिवारिक हो तो कोई बात नहीं यहां तो पाँच मिनट से राष्ट्रीयता और राष्ट्रप्रेम की भी भावना जुड़ती है. दस लोगों के बीच में बैठे हों और अपना राष्ट्रप्रेम दिखाना हो तो पाकिस्तान को गाली देने से अच्छा और क्या हो सकता है, सो बोल दो पाकिस्तान जाना है. कितना सभ्य तरीका और कितना सारा राष्ट्रप्रेम. लेकिन हम तो राष्ट्रीयता से ऊँचा उठ कर वसुधैव कुटुम्ब्कम मे विश्वास करते हैं इसीलिए पाकिस्तान को गाली देने के बजाए ... पाँच मिनट.

पाँच मिनट का नाम लेते ही याद आता है राज्यकीय मध्य विद्यालय बनैनियाँ के एक टीचर श्री उपेन्द्र नारायण झा गाँव वालों के लिये यही नाम , बाकी टीचरों के लिए उपेन्द्र बाबू और हम लोगों के लिए उपेन्दर मास्स...साब. उनकी विशेषता ये कि वो हम लोगों के एक पीढ़ी उपर के भी गुरुजी रह चुके थे. किसी विद्यार्थी को धमकाना हो तो वह बोलते थे तुम्हारे पिताजी को इसी क्लास में पीटा था तो तुम क्या चीज हो. लेकिन कालान्तर में एक विशेष बीमारी बुढ़ापा ने उन्हें आंखों से लाचार कर दिया था. हमारे उपेन्दर मास्सा..ब की आंख की रौशनी कमजोर पड़ गयी थी. हमारे पिताजी के अपेक्षा हम लोगों के उपर उनकी उतनी निगरानी नहीं रह पाती थी. और उपर से ५-मिनट और १०-मिनट के चक्कर ने तो उन्हें और ज्यादा लाचार बना दिया. वह करते भी तो क्या करते विद्यार्थी आते, होठों को भींच कर सामने हथेली दिखाते हुए बोलते... "मा...स्सा...ब पाँच मिनट... इससे पहले की मास्सा...ब कुछ सोच पाते वह भाग चुका होता.

इस बार उपेन्दर मास्सा..ब टाइट हो गये. बोले एक बार में केवल २-३ विद्यार्थी ही पाँच मिनट जाएगा. फिर बाकी का क्या होगा. समय बीतता गया और उपेन्दर मास्सा...ब टाइट होते गए. और फिर आ गया मई का महीना. कच्चे सड़क के किनारे जंगली जलेबी का पेड़ और उस पर लटका हुआ लाल-लाल रंग का जलेबी. मास्सा..ब इतना टाइट और बीतता समय. स्कूल से ५-१० मिनट मिलता नहीं. लगा इस साल बिना जलेबी का निकल जाएगा. शाम को हमारे मित्र मंडली ने निर्णय लिया चाहे जो कुछ भी हो मास्साब से ५-१० मिनट लेकर हम लोग जलेबी तोड़ने जायेंगे. दल तैयार तो हो गया बाकायदे कूटनीति के साथ कि कल क्या करना है. लो कल भी आ गया.. चाणक्य की तरह कूटनीति तो तैयार हो गयी, लेकिन कूटनीति को लागू करने का साहस किसी में नहीं था. आखिर सिकन्दर का-सा साहस होगा किसके अन्दर. पर, लोगों ने आखिर सिकन्दर चुन ही लिया - 'मैं, और 'अमोल'. समय आया तो मैं और अमोल सिकन्दर का-सा साहस लिए उपेन्दर मास्साब के पास .... बहुत ही नजदीक एक साथ गए. हम दोनों ने अपनी-अपनी हथेली अचानक उपेन्दर मास्साब के आंखों के सामने करते हुए जोर से चिल्लाए मास्स..स्स..साब..... पाँच मिनट..... इससे पहले कि मास्साब अपनी कमजोर नजरों से कुछ देख पाते और अनुमान लगाते कि आखिर हुआ क्या....??

योजना के अनुसार बिरोज, विपिन, कैलाश, ब्रजेश और सम्बोध फरार. मुझको और अमोल को तो परमिशन मिल ही गया था. बांस के पेड़ पर चढ़ कर जलेबियां टूटने लगीं. ५ से १० मिनट हुआ. १० मिनट से आधा घण्टा और फिर एक घण्टे में कुछ ही समय रहा होगा कि उपेन्दर मास्साब को ६-७ विलुप्त विद्यार्थियों की तरफ़ ध्यान गया. इधर उधर खोजा कहीं नहीं. हमारे दल में चाणक्य की कूटनीति थी... समय रहते सिकन्दर का-सा साहस भी आ गया था.

लेकिन हम चन्द्रगुप्त की तरह दूरदर्शी नहीं थे. सोचा ही नहीं कि मास्साब यदि पैदल चलकर यहां तक आ जाएँ तो क्या होगा. और उपेन्दर मास्सब सामने खड़े थे. काटो तो खून नहीं. अपने दल में एक दूसरे की कमियाँ नजर आने लगीं. मास्साब गरज कर बोले.... अच्छा ये है पाँच मिनट. विरोज के बुशर्ट में रखा लाल लाल जलेबी अपने आप जमीन पर आ गया. विपिन तो बांस पर जो चढ़ा लगा, मास्साब कुछ देखे ही नहीं. अन्त में हम लोगों को स्कूल लाया गया. सजा मिली १० छड़ी... एक सप्ताह तक रोज खांत पढ़ाने की जिम्मेदारी....

अभी भी कुछ प्रश्न हमेशा मुझे झकझोरते हैं. क्या मास्साब पाँच मिनट के बदले इतने ही रोचक कोई अन्य शब्द कॉन्वेन्ट स्कूल में भी बोला जाता होगा या ये कॉन्वेन्ट वाले "लौर्ड मैकाले" को अपना सर्वस्व लुटाने के बाद हम गाँव को असभ्य समझते रहेंगे. उत्तर चाहे कुछ भी हो.... हमारे लिए तो "मा...स्सा...ब पाँच मिनट... एक सभ्य संस्कृति का नाम है.... जो दुनियाँ मे 'झा' , 'मखान' , 'पाग' , बगिया, सामा-चकेबा सा और इस तरह के बहुत सारी चीजों की तरह पवित्र है.


**-**रचनाकार - पद्मनाभ मिश्र अभी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में पी० एच० डी० कर रहे हैं. इन्हें बचपन से लिखने का शौक है. पहले डायरी के पन्ने काले करते थे अब की बोर्ड पर उंगलियाँ टपराते हैं. इनकी लिखी वेब डायरी आप यहाँ पर पढ़ सकते हैं- http://padmanabh.blogspot.com/

1 टिप्पणियाँ

  1. रवि जी का धन्यवाद जिन्होंने मेरी रचना को रचनाकार मे जगह दिया मेरी बाँकी रचनाएँ इस पते पर देखी जा सकती है. देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

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