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देवेन्द्र आर्य की चंद तूफ़ानी ग़ज़लें

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ग़ज़ल 1
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हवाएँ दो रुपए में एक कप तूफान लेती हैं
फिर उसके बाद राहत की मलाई छान लेती हैं।

कोई मौसम हो, जैसे औरतें जब ठान लेती हैं
ख़ला में भी हवाएँ अपने तम्बू तान लेती हैं।

बंधी तनख़्वाह वाले हम, छिपाना भी जो चाहें तो
हमारी जेब के पैसे हवाएँ जान लेती हैं।

ग़रीबी की तरह कमज़र्फ होती हैं हवाएँ भी
जरा सी सांस क्या मिलती है, सीना तान लेती हैं।

हवा को हम भले पहचानने में भूल कर जाएँ
हवाएँ राह चलते भी हमें पहचाने लेती हैं।

हम अपने घर में हैं, बाज़ार जाते भी नहीं लेकिन
हवाएँ फिर भी हमको अपना ग्राहक मान लेती हैं।

हमारी तरह थोड़े ही कभी तोला, कभी माशा
हवाएँ ठान लेती हैं तो समझो ठान लेती हैं।

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ग़ज़ल 2
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कचहरी हो गई ईमानदारी
और उस पर झूठ की दूकानदारी।

कहाँ पैदल कहाँ टाटा सफारी
भला दिल्ली से क्या तुलना हमारी।

अमानत में खयानत ऐसे कैसे
हैं अपने पास भी बन्दूकधारी ।

जहाँ, जिस हाल में हो भाई चारा
मिले आके, हुआ फरमान जारी।

तुम्हारे बिन ये लम्हे भर की दुनिया
न पूछो किस तरह मैंने गुजारी।

दिया तो मैंने भी औकात भर था
मगर बेटी मेरी किस्मत की मारी।

अभी पूंजी भला कैसे मरेगी
अभी जिंदा हैं हम जैसे भिखारी।

सभी सच के तराजू पर चढ़े थे
मगर देखो जरा हिम्मत हमारी।

सियासत में सियासत मुस्लिमों की
मोहकमे में मोहकमा, आबकारी।

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ग़ज़ल 3
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फिर वही, फिर वही पुरानी बात।
बन न पाई मगर कहानी बात।

जाने कब से बिलो रही है हमें
थाम के हाथ में मथानी बात।

चुप्पियों को हटा के बैठ गई
अंधी बातों में एक कानी बात।

उसकी बातों की लंतरानी में
भूल जाता हूँ मैं बतानी बात।

आज मत सच तलाशना इसमें
आज हमको भी है जमानी बात।

इस अदा से अगर कहोगे तो
हो ही जाएगी पानी पानी बात।

बात बनते ही टोकता है वो
और वो आपकी फलानी बात।

ओए लाला मुझे भी दे दे यार
चार पैसे की खानदानी बात।

हकबकाई खड़ी है दिल्ली में
मेरे कस्बे की चौमुहानी बात।

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ग़ज़ल 4
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कहने के लिए था तो बहुत कुछ मगर अभी।
रिश्तों में नहीं आई थी रिश्तों की बेबसी।

कुछ और अभी बहने दो आँसू भी खून भी
इक पल में निकलती नहीं बरसों की दुश्मनी।

यह क्या कि सरे बज़्म मुझे कोसने लगी
ऐ जिंदगी कुछ बात थी तो मुझसे बोलती।

अब जाके जरा साफ हुआ चेहरा प्यार का
होठों प’ सियापा है मगर दिल में गुदगुदी।

मौसम ने कहा, गांव गिरावों ने भी कहा
है सूख गई फिर भी नदी है अभी नदी।

बासी न पड़ा होता अदब, काम आते लफ़्ज
की होती अगर हमने भी थोड़ी जियादती।

मेरा ही पसीना मुझे दुगने में बेच कर
सपनों में घुसा आए है सपनों का आढ़ती।

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- - रचनाकार – देवेन्द्र आर्य की पहचान उनकी नए तेवर, नए अंदाज़ की ग़ज़लें हैं. रचनाकार में देवेन्द्र की कुछ अन्य विप्लवी किस्म की गज़लें आप यहां -
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चित्र: सौजन्य, सृजन कैमरा क्लब, रतलाम

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