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सआदत हसन ‘मण्टो’ की कहानी : ...देख कबीरा रोया


-सआदत हसन मण्टो

नगर-नगर ढिंढोरा पीटा गया कि जो व्यक्ति भीख मांगेगा, उसको गिरफ़्तार कर लिया जाएगा. गिरफ़्तारियाँ आरंभ हुईं. लोग खुशियाँ मनाने लगे कि बहुत पुराना अभिशाप दूर हो गया.

कबीर ने यह देखा तो उसकी आँखों में आँसू आ गए. लोगों ने पूछा, “ऐ जुलाहे ! तू क्यों रोता है ?”

कबीर ने रोकर कहा- कपड़ा दो चीजों से बनता है- ताने और पेट से. गिरफ़्तारियों का ताना तो आरंभ हो गया, पर पेट भरने का पेटा कहाँ है?

एक एम.ए.एल-एल.बी. को दो सौ खुड्डियां अलाट हो गईं. कबीर ने यह देखा, तो उसकी आँखों में आँसू आ गए.

एम.ए.एल-एल.बी. ने पूछा, “ऐ जुलाहे के बच्चे ! तू क्यों रोता है ? क्या इसलिए कि मैंने तेरा अधिकार छीन लिया है ?”

कबीर ने रोते हुए उत्तर दिया- “तुम्हारा कानून तुम्हें यह नुक्ता समझाता है कि खुड्डियां पड़ी रहने दो और सूत का जो कोटा मिले, उसे बेच दो. मुफ़्त की खटपट से क्या लाभ ? परंतु यह खटपट ही जुलाहे की जात है.”

छपी हुई पुस्तक के फर्में थे, जिनके छोटे-बड़े लिफ़ाफ़े बनाए जा रहे थे. कबीर का उधर से गुजरना हुआ. उसने दो तीन लिफ़ाफ़े उठाए और उन पर छपा हुआ लेख देखकर उसकी आँखों में आँसू आ गए. लिफ़ाफ़े बनाने वाले ने आश्चर्य से पूछा-

“मियाँ कबीर तुम क्यों रोने लगे ?”

कबीर ने उत्तर दिया- “इन कागजों पर भक्त सूरदास की कविता छपी हुई है. लिफ़ाफ़े बनाकर अनादर न करो.”

लिफ़ाफ़े बनाने वाले ने आश्चर्य से कहा-

“जिसका नाम सूरदास है वह भक्त नहीं हो सकता.”

कबीर ने फूट-फूटकर रोना आरंभ कर दिया.

एक ऊँचे भवन पर लक्ष्मी की बहुत सुंदह मूर्ति स्थापित थी. लोगों ने जब उसे अपना दफ़्तर बनाया, तो उस मूर्ति को टाट के टुकड़ों से ढांप दिया. कबीर ने यह देखा तो आँखों में आँसू उमड़ आए. दफ़्तर के लोगों ने उसे ढांढस दिया और कहा, “हमारे धर्म में यह बुत उचित नहीं.”

कबीर ने टाट के टुकड़ों की ओर अपनी भीगी हुई आँखों से देखते हुए कहा- “खूबसूरत चीज को बदसूरत बना देना भी किसी धर्म में उचित है !”

दफ़्तर के लोग हँसने लगे, कबीर दहाड़ें मार-मारकर रोने लगा.

पंक्ति में सजी हुई फ़ौजों के सामने जरनैल ने भाषण करते हुए कहा- “अनाज कम है, कोई परवाह नहीं. फसलें तबाह हो गयी हैं, कोई चिंता नहीं ! हमारे सिपाही शत्रु से भूखे ही लड़ेंगे.”

दो लाख फौजियों ने जिन्दाबाद के नारे लगाने आरंभ कर दिए.

कबीर चिल्ला चिल्ला कर रोने लगा. जरनैल को बहुत गुस्सा आया. वह पुकार उठा - “ऐ व्यक्ति बता सकता है, तू क्यों रोता है ?”

कबीर ने रोनी आवाज में कहा- “ऐ मेरे बहादुर जरनैल ! भूख से कौन लड़ेगा ?”

दो लाख व्यक्तियों ने कबीर मुर्दाबाद के नारे लगाने शुरू कर दिए.

“भाइयों दाढ़ी रखो, मूंछें कुतरवाओ और शरई पाजामा पहनो. – बहनों ! एक चोटी करो. सुर्खी पाउडर न लगाओ. बुर्का पहनो.”

बाजार में एक व्यक्ति चिल्ला रहा था तो कबीर ने यह देखा. उसकी आँखें आँसुओं से डबडबा आयीं.

चिल्लाने वाले व्यक्ति ने और अधिक चिल्लाकर पूछा, “कबीर, तू क्यों रोने लगा ?”

कबीर ने अपने आँसू रोकते हुए कहा - “तेरा भाई है, न तेरी बहन और यह जो तेरी दाढ़ी है इसमें तूने वस्मा क्यों लगा रखा है ? – क्या यह सफेद अच्छी नहीं थी ?”

चिल्लाने वाले ने गालियाँ देनी आरंभ कर दीं. कबीर की आँखों से टप-टप आँसू गिरने लगे.

एक जगह बहस हो रही थी.

“साहित्य-साहित्य के लिए है.”

“सर्वथा बकवास है. साहित्य जीवन के लिए है.”

“वह जमाना लद गया. – साहित्य प्रोपेगण्डे का दूसरा नाम है.”

“तुम्हारी ऐसी की तैसी-”

“तुम्हारे स्टालिन की ऐसी की तैसी-”

“तुम्हारे रूढ़िवाद और अमुक-अमुक रोगों के मारे हुए फलाबियर बाउलियर की ऐसी की तैसी.”

कबीर रोने लगा. बहस करने वाले बहस छोड़कर उसकी ओर आकर्षित हुए. एक ने उससे पूछा-

“तुम्हारे तनमन में अवश्य कोई ऐसी वस्तु थी, जिसे ठेस पंहुची है.”

दूसरे ने कहा- “ये आँसू बुर्जुआई दुःख का परिणाम हैं.”

कबीर और अधिक रोने लगा. बहस करने वालों ने तंग आकर एक साथ प्रश्न किया - “मियाँ यह बताओ कि तुम रोते क्यों हो ?”

कबीर ने कहा- “मैं इसलिए रोया था कि आपकी समझ में आ जाए – साहित्य-साहित्य के लिए है या साहित्य जीवन के लिए है.”

बहस करने वाले हँसने लगे. एक ने कहा - “यह पोल्तारी मसखरा है.”

दूसरे ने कहा - “नहीं, यह बूर्जुआई बहुरूपिया है.”

कबीर की आँखों में फिर आँसू आ गए.

कानून लागू हो गए, नगर की समस्त वेश्याएँ एक महीने के अंदर-अंदर विवाह कर लें और शरीफाना जीवन व्यतीत करें.

कबीर एक चकले के सामने गुजरा तो वेश्याओं के उतरे हुए चेहरे देखकर उसने रोना आरंभ कर दिया. एक मौलवी ने उससे पूछा – “मौलाना, आप क्यों रो रहे हैं?”

कबीर ने रोते हुए उत्तर दिया- “नीति के अध्यापक इन वेश्याओं के पतियों के लिए क्या व्यवस्था करेंगे ?”

मौलवी, कबीर की बात न समझा और हँसने लगा. कबीर की आँखें और अधिक आँसू बहाने लगीं.

दस-बारह हजार की सभा में एक व्यक्ति भाषण कर रहा था- “भाइयो ! विरोधियों से छुड़ाकर लायी हुई महिलाओं की समस्या हमारी सबसे बड़ी समस्या है. इसका हल हमें सबसे पहले सोचना है. यदि हम ग़ाफ़िल रहें, तो ये औरतें वेश्यालयों में चली जाएंगी – बाजारी बन जाएंगी. – सुन रहे हो, बाजारी बन जाएंगी. तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम उनको भीषण भविष्य से बचाओ और अपने घरों में उनके लिए स्थान पैदा करो. अपनी, अपने भाई की या अपने बेटे की शादी करने से पहले तुम्हें इन औरतों को कदापि-कदापि भूलना नहीं चाहिए.”

कबीर फूट-फूटकर रोने लगा. भाषण करने वाला रुक गया. कबीर की ओर संकेत करके उसने ऊँची आवाज में उपस्थित लोगों से कहा- “देखा, इस व्यक्ति के दिल पर कितना प्रभाव हुआ है ?”

कबीर ने भर्राई हुई आवाज में कहा- “शब्दों के बादशाह ! तुम्हारे भाषण ने मेरे हृदय पर कुछ प्रभाव नहीं किया – मैंने जब सोचा कि तुम किसी मालदार औरत के साथ शादी करने के उद्देश्य से अभी तक कुंआरे बैठे हो, तो मेरी आँखों में आँसू आ गए.”

एक दुकान पर यह बोर्ड लगा हुआ था, “जिन्नाह बूट हाउस”

कबीर ने देखा, तो ताबड़तोड़ रोने लगा.

लोगों ने देखा कि एक व्यक्ति खड़ा है, बोर्ड पर आँखें जमी हैं, और रोए जा रहा है. उन्होंने तालियाँ बजाना आरंभ कर दीं- “पागल है, पागल है.”

देश का सबसे बड़ा क़ाइद (नेता) चल बसा, तो चारों ओर शोक के बादल छा गए. प्रायः लोग भुजाओं पर काले बिल्ले बांधकर फिरने लगे. कबीर ने यह देखा, तो उसकी आँखों में आँसू आ गए. काले बिल्ले वालों ने उससे पूछा- “तुम्हें क्या दुःख पहुंचा जो तुम रोने लगे ?”

कबीर ने उत्तर दिया- “ये काले रंग की चंदियाँ (बिल्ले) यदि जमा कर ली जाएँ तो सैकड़ों की नग्नता ढंक सकती है.”

काले बिल्ले वालों ने कबीर को पीटना आरंभ कर दिया. तुम साम्यवादी हो- कम्यूनिस्ट हो- फ़िफ़्थ काल्मिस्ट हो ! पाकिस्तान के गद्दार हो.

कबीर हँस पड़ा, “परंतु दोस्तो, मेरे बाजू पर तो किसी रंग का बिल्ला नहीं.”

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रचनाकार – उर्दू के जानेमाने कथाकार सआदत हसन मण्टो की कहानियाँ मार्मिक व्यंग्य प्रस्तुत करती हैं, जिन्हें पढ़ पाठक सचमुच रो देता है.

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