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संजय विद्रोही की चंद ग़ज़लें

ग़ज़ल (१)
जब भी गिरता है नीर आँखों से,
झरने लगती है पीर आँखों से.

उसके झोले में चाँद सूरज हैं,
वो, जो दिखता फकीर आँखों से.

खींच देगा वो आज सीने पर,
पीर की एक लकीर आँखों से.

फिर ना जाने, गई कितनी जानें
उसने छोड़े जो तीर आँखों से.

पंखुरी लब की चूमने निकली,
ओस भी बे-नजीर आँखों से.

ग़ज़ल (२)

पीर है, प्यार है, जमाना है
और हम हैं, हमें निभाना है.

आँधियों को सहेज भी लेता,
नीड़ लेकिन मुझे बनाना है.

रात भर करवटें बदलता हूँ,
नींद है, या कि छ्टपटाना है.

तू ना मेरी तरह परेशां हो,
तू, ना मेरी तरह दीवाना है.

चुप हुई रूह इस तरह अपनी,
जिस्म जैसे कि कैदखाना है.

ग़ज़ल (३)
अपनी ही गल्तियों से, उछ्ले मेरे फ़साने
लोगों ने बहुत रोका, हम थे कि हम ना माने.

उनकी सियासतों ने कितना दिया वतन को,
आबाद कब्रगाहें, रोशन यतीमख़ाने.

बस इस तरह से बीते है जिन्दगी हमारी,
साँसों का कर्ज, आहों से हम लगे चुकाने.

मिलके जो उनसे लोटे, ये हाल था हमारा
ना होश थे ठिकाने, ना हम रहे ठिकाने.

पतझर, बसंत, फागुन, बारिश, बहार, सरदी
सूरत बदल के मौसम, आते रहे लुभाने.

जिस भी तरफ गए हम, टूटा है दिल हमारा
कोई कभी तो आए, 'मजलूम' को बचाने.

ग़ज़ल (४)
उसको गर अब उड़ान दे मालिक,
तो नया आसमान दे मालिक.

जिसमें घर का सुकून मिलता हो,
मुझको ऐसा मकान दे मालिक.

अपनी बातों से आग ना बरसे,
हमको मीठी जुबान दे मालिक.

आ के मजहब की बात में निसदिन,
कोई क्यूँ अपनी जान दे मालिक.

प्यार बच्चों को बाँटने दीजे,
मजहबों का ना ज्ञान दे मालिक.

सारी आजमाईशें मेरी ही क्यों?
वो भी तो इम्तिहान दे मालिक.

ग़ज़ल (५)
जितनी तेज दुपहरी होगी,
छाया उतनी गहरी होगी.

दुआ ना आ पाई मुझ तक क्यूँ?
कहीं राह में ठहरी होगी.

बाई ने ही पाला होगा,
बच्चे की माँ शहरी होगी.

झूठे लोग- मुकदमे झूठे,
पर खामोश कचहरी होगी.

तन्हाई रोशन है जिससे,
कोई याद सुनहरी होगी.

जिसने दिल की बात ना समझी,
दुनिया गूँगी-बहरी होगी.

ग़ज़ल (६)
मुश्किलों से भरी है डगर देखिए
वक्त से दुश्मनी का असर देखिए.

याद में रात भर जिसकी जागेंगे हम
सो रहा है यहाँ बेखबर देखिए.

दर्द पलकों के नीचे मचलने लगा
इस नदी में उठी जो लहर देखिए.

कौन जाने कि कल हम रहें ना रहें
आज हैं, तो जरा-सा इधर देखिए.

होश की बात करते रहे उम्र भर.
वो ही बेहोश हैं, इक नजर देखिए.

ग़ज़ल (७)
जुगनू लेकर अड़ा हुआ हूँ
रात के आगे खड़ा हुआ हूँ.

ठोकर खा-खा कर सीखा है,
ऐसे ही तो बड़ा हुआ हूँ.

सबकी प्यास बुझाई मैंने,
जाम-सा टूटा पड़ा हुआ हूँ.

बाहर बाहर फूल-सा कोमल,
भीतर भीतर कड़ा हुआ हूँ.

फाँस बना हूँ, दुनिया भर की-
दो आँखों में गड़ा हुआ हूँ.

ग़ज़ल (८)
जितने गहरे रिश्ते होंगे,
उतने ज्यादा रिसते होंगे.

उस बस्ती में बुत महँगे हैं,
तय है इन्सां सस्ते होंगे.

पीढ़ी-दर-पीढ़ी काँधों पर,
वही पुराने बस्ते होंगे.

मेरे-तेरे सम्बन्धों पर,
दुनिया वाले हँसते होंगे.

पंछी दो दानों की खातिर,
नित जालों में फँसते होंगे.

ग़ज़ल (९)
जीने को हैं बहुत जरूरी,
आधे सपने, नींदें पूरी.

चाहा जिसको उसे ना पाया,
साध हमारी रही अधूरी.

सपने कैसे सच हो पाते?
किस्मत की थी नामंजूरी.

आहें देखी, आँसू देखे;
किसने देखी है मजबूरी?

जिस्मों-जिस्मों मिलना देखा,
रूहों-रूहों देखी दूरी.

ग़ज़ल (१०)
मँझधार में ना छोड़ के जाने की बात कर,
झूठा ही सही प्यार निभाने की बात कर.

किसने निभाई दोस्ती किसने दगा दिया,
तू अपनी बात कर, ना जमाने की बात कर.

माना कि बड़ी मुश्किलें हैं सामने तेरे,
जैसे भी सही रब्त निभाने की बात कर.

मस्जिद की बात कर ना शिवाले की बात कर,
एक ताजमहल और बनाने की बात कर.

गीता-कुरान-बाइबिल वो आप पढ़ेगा,
बच्चे को अपने प्यार पढ़ाने की बात कर.

रातों की ओर देख ना तारों की ओर देख,
रुखसार से बस जुल्फ हटाने की बात कर.

जाति के भेदभाव के मसले निकाल दे,
'संजय' दिलों में प्यार जगाने की बात कर.

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