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मैं कलमकार





-धनपतराय झा
मैं कलमकार
कलम की पंखों से उड़ता
अनंत आकाश में
अनुभूति खोद लाता हूँ

जीवन का जल
सागर की गहराई तक
जाकर ढूंढें मोती
कुछ असली, कुछ नकली

नाक से नहीं, नोक से सुंघा
समस्या का जल
जीवन की त्रासदी
अक्षर-ब्रह्म की साधना

शब्द ब्रह्म से याचना
कहीं मरा से राम हो जाए
तभी शुरु हुए जमाने के मखौल
कनखियां और फ़िकरे

सुनो, हो गया सूपकर्ण
फ़िकरे पचाते पचाते लंबोदर
फ़िकरे भी कैसे - कामसूत्र पर कुआरों ने
छेड़ी हो बहस जैसे

छोड़ पगले,
दुनिया ने किसी को छोड़ा है
तू क्यों फिर
प्रतिफल को दौड़ा है

क्या नहीं जानता?
साधना का पथ कंटीला है
ज्वाला का समन्दर है
डूबकर पार पहुंचना है

साधना है स्वान्तः सुखाय
तू दीपक है तुझे तो तिल-तिल जलना है
आंधी के दरख़्त पर
तूफ़ान का पलना है

जले तो जल
बुझे तो तेरा क्या जाना है?
तुझे सौन्दर्य बोध जगाना है
तमस को मिटाना है

कोयल के साथ
समवेत में गाना है
लहरों के साथ नाचना

और नाद को सजाना है ।

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रचनाकार – धनपतराय झा रचनाकारिता के नए आयाम गढ़ने को तत्पर प्रतीत होते हैं.आप शिक्षक की भूमिका में रहते हुए भी हिन्दी साहित्य में कई चर्चित-पुरस्कृत पुस्तकें लिख चुके हैं. आपको श्रेष्ठ अध्यापक का राज्यपाल पुरस्कार प्राप्त हो चुका है. आपकी कुछ चर्चित प्रकाशित पुस्तके हैं 'सत्य करे श्रृंगार', 'सर्मपण का देवता', 'तत्र श्री विजयोर्भूति', 'प्रणय निवेदन', 'दुर्ग नाशिनी दुर्गा', 'पार्वती परिणय', एवं 'कलजुगी भ्रमर गीत'.
दो पुस्तकें ‘मावजी महाराज की कथा’ एवं ‘रास रसेश्वर माव’ विमोचनार्थ तैयार हैं.
आपका ई-पत्र संपर्क पता है – dhanpatraijha [at] yahoo.co.in

चित्र- सौजन्य हेल्पेज-इंडिया

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