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दो पिताओं की कथा


- कुंदन सिंह परिहार

कस्बे के समाज के प्रमुख सदस्यों की बैठक थी. समाज के एक सदस्य रामेश्वर प्रसाद की बेटी ने घर से भागकर अंतर्जातीय विवाह कर लिया था. अब लड़की-दामाद रामेश्वर प्रसाद के घर आना चाहते थे लेकिन रामेश्वर भारी क्रोध में थे. उनके खयाल से बेटी ने उनकी नाक कटवा दी थी और उनके परिवार की दशकों की प्रतिष्ठा धूल में मिल गई थी.

बैठक में इस प्रकरण पर विचार होना था. समाज के एक सदस्य भगवानदास एक माह पहले अपनी बेटी का विवाह धूमधाम से करके निवृत्त हुए थे. लड़केवालों की मांग पर उन्होंने ‘सेंट्रो’ कार भेंट दी थी. करीब दस लाख से उतर गए थे. इस बैठक में वह ही सबसे ज्यादा मुखर थे.

रामेश्वर प्रसाद को इंगित करके वह बोले, ‘असल में बात यह है कि कई लोग अपने बच्चों को ‘डिसिप्लिन’ में नहीं रखते, न उन्हें संस्कार सिखाते हैं इसीलिए ऐसी घटनाएँ होती हैं. हमारी भी तो लड़की थी. गऊ की तरह चली गई.’

रामेश्वर प्रसाद गुस्से से बोले, ‘यहाँ फ़ालतू लांछन न लगाए जाएँ तो अच्छा. हम अपने बच्चों को कैसे रखते हैं और उन्हें क्या सिखाते हैं, यह हम बेहतर जानते हैं.’

समाज के बुजुर्ग सदस्यों ने भगवानदास को चुप कराया फिर समस्या पर विचार-विमर्श हुआ. यह निष्कर्ष निकला कि लड़के लड़कियों द्वारा अपनी मर्जी से दूसरी जातियों में विवाह करना अब आम हो गया है इसलिए इस बात पर हल्ला गुल्ला मचाना बेमानी है. रामेश्वर प्रसाद को समझाया गया कि गुस्सा थूक दें और बेटी-दामाद का प्रेमपूर्वक घर में स्वागत करें. अपनी संतान है उसे त्यागा नहीं जा सकता. रामेश्वर प्रसाद ढीले पड़ गए. मन में कहीं वह भी यही चाहते थे लेकिन समाज के डर से टेढ़े चल रहे थे.

यह निर्णय घोषित हुआ तो भगवानदास आपे से बाहर हो गए. चिल्ला-चिल्लाकर बोले, ‘हमारी लड़की की शादी में दस लाख चले गए, हम कंगाल हो गए और इनको मुफ़्त में दामाद मिल गया. या तो इनको समाज से बहिष्कृत किया जाए या फिर समाज मेरे दस लाख मुझे अपने पास से दे.’

वह चिल्लाते-चिल्लाते माथे पर हाथ रखकर अकस्मात् बिलखने लगे और समाज के सदस्य उनका क्रंदन सुनकर किंकर्तव्य विमूढ़ बैठे रहे.

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