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मोहनदास नैमिशराय की कहानी: आग ऐसे लगी





आधी रात तक मुखी के शरीर में प्राण थे. कुछ लोग सोने के लिए चले गए थे और कुछ अभी तक जाग रहे थे. उनकी आंखों में नींद से अधिक चिंता थी. चिंता घनी होती तो चिता के निर्मोही चित्र सामने तैर उठते. वे चित्र कच्चे धागे पर नहीं तैरते बल्कि उन्हें भीतर बाहर से उद्वेलित करते. मृत्यु चित्रों से वे सब घिरे थे. कोई मुखी की आँखों में झांकता तो कोई उसकी सांस लेने की प्रक्रिया को महसूस करता. स्वयं मुखी बारी-बारी से अपने आस-पास बैठे परिजनों की ओर देखता और ताकता! जैसे सांस अटक गई थी उसकी. एक-एक पल का हिसाब-किताब उन सभी के बीच था. मुखी असहाय था. थोड़ा बहुत वह हिलडुल सकता था. अपने नजदीक के लोगों को देख सकता था. लेकिन कुछ बोल नहीं सकता था. कुछ कहने के लिए होंठ बार-बार कांपते थे, पर कंपन से स्वर बाहर नहीं आ पाता था.

परिवेश में गर्मी थी और उमस भी. छत का पंखा धीमी गति से चल रहा था. जैसे पंखे और मुखी में सभी कुछ तो समानता हो. मुखी और पंखे की उम्र बिलकुल एक जैसी थी. मुखी का जब जन्म हुआ था तब पंखा खरीदा गया था. घर में पहली बार बिजली से चलने वाला पंखा आया था. इसलिए आस-पड़ोस में उसे मुखी का पंखा लोग कहते थे. इस बीच मुखी भी बीमार हुआ और पंखा भी. पर पंखे ने हिम्मत नहीं हारी. पचास बरस का पंखा जैसे-तैसे चलता रहा. हाँ, मुखी ने चारपाई पकड़ ली. मुखी भी पचास बरस का था और पंखा भी पचास बरस का. दोनों की जीवन यात्राओं में व्यवधान आते-जाते थे. जिन्हें पार कर वे आगे बढ़ जाते थे.

सती को इस बार भी उम्मीद थी. उसका मरद बीमारी से मुक्त हो जाएगा. उसकी आंखों में नींद नहीं थी. वह फर्श पर बैठी थी और बार-बार अपने पति की ओर देख लेती थी. इस बीच उसके भीतर आशंका उभरती. मन पत्ते की तरह कांप उठता. अपने-आपको हिम्मत कर वर स्वयं को कमजोर होने से बचाती. कुछ देवताओं को याद करती. उनसे पति के ठीक होने की विनती करती. कमरे में मुखी के अलावा अब वह अकेली रह गई थी.

सुबह उसकी आँखें खुली तो उसके जीवन में अँधेरा हो गया था. अंधेरे की विरासत को ढोने वालों में उसके साथ दो बच्चे और भी थे. एक का ब्याह हो गया था. दूसरा अभी बिन ब्याहा था. आकाश में बादल थे. वे बरसने को आतुर थे. प्राणहीन मुखी के आसपास जमीन पर बैठे लोगों की आँखों में अनगिनत सवाल थे. छत का पंखा रात भर चलता रहा और अभी भी चल रहा था. जैसे-जैसे मर्द-औरतें जुड़ रहे थे वैसे-वैसे परिवेश में आर्तनाद स्वर उभर रहे थे. सती की आँखें रोते-रोते लाल हो गई थीं. बड़ा बेटा कल से बाहर था. वह अभी लौटा नहीं था. उसकी घरवाली का भी रोते-रोते बुरा हाल था. छोटा बेटा जमीन पर लेटे हुए अभी भी सुबक रहा था.

महू के पास गवली पलासिया गांव था. उसी में भीम नगर नाम से दलितों की बस्ती थी. कभी यह गांव होल्कर इस्टेट में आता था. अब इन्दौर जिले में दर्ज है. गांव में पाटीदार बहुसंख्यक थे. दलितों की संख्या बहुत कम थी. गांव के बारे में हर माह बहुत-सी बातें दर्ज होती थीं. कभी थाने में तो कभी अस्पताल में. पुलिस अधिकारियों के साथ मंत्रियों के दौरे होते थे. पक्की सड़क के नज़दीक ही गवली पलासिया गांव था.

बड़े बेटे के आ जाने पर अरथी सजाने का कार्य तेजी के साथ होने लगा था. मां-बेटों के रुदन के साथ पड़ोस की महिलाएँ भी रोने लगी थीं. मर्दों की आँखों में भी आँसू थे. अरथी को कंधा देकर चार लोग बाहर लाए तो बूंदा-बांदी शुरू हो गई थी. कुछ ने आकाश की ओर देखा था. वहाँ पानी के बादल थे. शवयात्रा में औरतें शामिल नहीं हुई थीं. कुछ बच्चे जरूर थे. कोई पैदल तो कोई अपने चाचा तथा बाबा के कंधों पर बैठे हुए. गांव से बाहर आए तो भीम नगर नाम के लिगे पत्थर के पास आकर पल भर लोग ठहरे थे. जैसे मौन सलामी दी गई थी. पार साल ही यह पत्थर स्वयं मुखी ने अपने हाथ से लगाया था. वह चिनाई मजदूर था. गांव में मुखी का मान था. उसका अम्बेडकरी जलसों में नियमित रुप से आना जाना था. यही कारण था कि कई गांवों के दलित उसकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए थे. उनमें युवक भी थे और अधेड़ भी. बीच-बीच में उनकी आँखों में आँसू आ जाते थे. मुखी ने समय से पहले उनसे विदा ले ली थी. इसी बात का उन्हें रंज था.

श्मशान आते-आते बरसात खुलकर होने लगी थी. जो अभी तक थोड़ा-बहुत भीगे थे, वे पूरी तरह से भीग गए थे. गांव में दो श्मशान थे. एक दलितों का श्मशान तो दूसरा सवर्णों का श्मशान. लोग उसे पाटीदार का श्मशान भी कहते थे. इसलिए की श्मशान को भी उसने अपनी मिल्कियत बना लिया था. जैसे मन्दिर वैसे ही श्मशान. दोनों के भीतर दलितों का प्रवेश निषेध था. दलित अपने श्मशान में ही अंतिम संस्कार करते थे. गांव की यह परिपाटी थी. जिसे कायम रखने में पाटीदार सबसे आगे थे.

बरसात थमने का नाम नहीं ले रही थी. शवयात्रा में आए लोगों के साथ शव भी पूरी तरह भीग चुका था. नजदीक ही पाटीदार का श्मशान था. जिस पर छतरी लगी थी. कुछ ने कुछ की आँखों में झांका था. तभी दो-तीन युवकों ने कहा था.

‘सामने पाटीदार के श्मशान में चलो’

सुनकर बुजुर्गों ने युवकों की आँखों में देखा था. इस बीच एक बुजुर्ग बोला था,

‘क्या कै रये हो तुम, यै तमे मालूम है?’

बुजुर्ग व्यक्ति के सवाल का जवाब तत्परता से दिया था उन्हीं युवकों ने,

‘हमें मालूम है, हम क्या कह रहे हैं.’

‘यै जानते हुवे भी कि हमै इस श्मशान में जाने की मनाही है.’

‘हाँ हाँ यह जानते हुए भी कि दलितों को पाटीदार के श्मशान में जाने की मनाही है.’ दो युवक एक साथ बोले थे. उनके भीतर उनका जोश छलक रहा था. मेघ बरसना अभी बंद नहीं हुआ था. कुछ लोग खुले में खड़े थे तो कुछ बैठे थे. उनके बीच बहस होने लगी थी. तभी कोई अधेड़ व्यक्ति बोला था.

‘आखिर कब तक हम हियाँ बरसात में भीगते रहेंगे?’ बुजुर्गों में से किसी ने भी जवाब नहीं दिया था. फग्गन टाल से रिक्शा में लकड़ी ले आया था. बरसात बंद होने के कोई आसार दिखाई नहीं दे रहे थे. तभी मुखी के बड़े बेटे के भीतर की अधीरता फूटी थी.

‘कुछ तो करना होगा फग्गन चाचा’

फग्गन ने जैसे समर्थन किया था,

‘हां बेटे कुछ न कुछ तो करना ही होगा.’

नजदीक खड़े चार-पाँच युवकों ने सुना तो उन्हें बल मिला था. उनमें से कुंती के बेटे ने आगे आकर तपाक से कहा था, ‘तुम सब यहाँ मेघ में भीगते रहो. हम खुद अजल-मजल कर देंगे.’

जैसे निर्णय सुनाया था उसने. बूढ़ों के पेट का पानी हिलने लगा था. उन्होंने मन ही मन सोचा था. ऐसा कैसे हो सकता था भला? गांव भर में आग लग जाएगी. युवकों ने कुछ देर और इंतजार किया था. अंतिम संस्कार का मामला था. बड़े बूढ़ों की सहमति जरूरी थी. पर बूढ़े अभी असमंजर से बाहर ही नहीं निकल पाए थे. वे अपनी ही बस्ती के एक-एक युवक की आँखों में आँखे डालकर देखते और उनमें विद्रोह महसूस करते. उन आँखों में बेचैनी थी. वे सभी अब उतावले दिखाई देने लगे थे.

इस उहापोह में दोपहरी बीत गई थी. बरसात अभी भी हो रही थी. शव यात्रा में आए सभी के कपड़े मेघ में भीग गए थे. कुछ बूढ़े अगले और पिछले जन्म की कथाएँ बांचने लगे थे. वहीं कुछ के भीतर से करनी और भरनी का दर्शन उभर रहा था. युवक उनकी बातें सुन-सुन कर तंग आ गए थे. सिर छुपाने तक को आस-पास पेड़ तक नहीं था. सामने ही दिखाई देता था पाटीदार का श्मशान. अचानक चार युवक अरथी के पास आए और बिना देरी किए उन चारों ने अरथी को अपने-अपने कंधे पर रख लिया था. बूढ़ों ने देखा तो वे हड़बड़ा उठे थे. कुछ ने मौन सहमति दे दी थी. श्मशान से वे चले तो युवकों के पीछे बूढ़े थे. श्मशान से बाहर आए तो आगे के दो युवक, जिन्होंने अरथी को कंधा दिया हुआ था, बोल उठे,

‘राम नाम सत्य है...’

पीछे से बूढ़ों ने कहा था,

‘सत्य बोलो गत्त है.’

जल्दी ही वे पाटीदार के श्मशान के पास आ गए थे. बरसात थोड़ी कम हो गई थी. श्मशान में कोई न था. बिलकुल निर्जन और अकेला. सिवाय दो पेड़ों और उसके पत्रों में अपने आपको वर्षा से बचाने के लिए बैठे कुछ पक्षियों के. अरथी लेकर कुछ लोगों को उन्होंने आते देखा तो अपने पंखों को फड़फड़ाते हुए वे एक-एक कर उड़ने लगे. बूढ़ों को तसल्ली हुई की श्मशान में पाटीदार का कोई आदमी न था. टीन के शेड के नीचे वे सभी बैठ गए थे. बीच में रखी गई थी अरथी. फग्गन रिक्शा पर लकड़ी लादे अभी भी वहीं खड़ा था कि कब से रिक्शा से लकड़ियाँ उतारी जाएँ और कब वह अपनी इस जिम्मेदारी से मुक्त हो. बिना किसी से पूछे तुरता फुरती में चार-पाँच युवकों ने रिक्शा से लकड़ियाँ उतार ली थीं.

श्मशान में न कोई पण्डित था और न चाण्डाल. सभी कुछ उन्होंने ही करना था. वैसे अंतिम संस्कार की विधि वे सब जानते थे. श्मशान में मौजूद कुछ बूढ़ों को तो तीस-चालीस मुर्दों का क्रिया-कर्म करने का अब तक अनुभव हो गया था. अरथी पर से सभी गीली चादरें उतार ली गई थीं. उनसे पानी निचुड़ रहा था. कफन तक गीला था. कुछ लोगों ने जल्दी-जल्दी नीचे लकड़ियाँ जमायीं. फिर उन पर मुखी के मृत शरीर को रखा गया. ऊपर से पुनः लकड़ी के टुकड़े रखे गए. मुखी के दोनों बेटे वहीं मौजूद थे. उसके तीनों भतीजे भी थे. बड़े बेटे ने चिता की परिक्रमा की. जैसे बूढ़े बताते जाते वैसा ही वे करते जाते.

अब आग लगाने की बारी थी, जो लग नहीं रही थी. जिनके पास माचिस थीं. उनका मसाला सील गया था. दियासलाई रगड़ते-रगड़ते माचिस की तीन-चार डिब्बियाँ व्यर्थ हो गई थीं. अब क्या करें? उनके सामने सबसे बड़ा सवाल था. नजदीक ही सवर्णों की बस्ती थी. उनके घरों से धुआं उठते देखा था बुजुर्गों ने. कौन जाए आग मांगने? सवर्ण मुर्दे को फूंकने के लिए आग दें या न दें. दलित बुजुर्गों ने जमाना देखा था. उन्हें विश्वास न था. वे सवर्णों की परिपाटियों के चश्मदीद गवाह थे. एक जख़्म भरता नहीं तो दूसरा जख़्म दलितों को दे दिया जाता था. ऐसे समय पर वे अपने-आपको असहाय महसूस कर रहे थे. एक-दो बुजुर्गों ने फिर से माचिस के आर-पार लगे मसाले की पट्टी पर दियासलाई रगड़ने का प्रयास किया था. वे माचिस को हथेली में लेकर फूंक मारते और फिर मसाले पर दियासलाई रगड़ते. सीली हुई दियासलाई आग कैसे पकड़ती. लकड़ियाँ तो पानी से भीगी हुई थीं. शवयात्रा में आए लोगों के बदन गीले थे. उनके कपड़े पानी से तर थे. पर वे भीतर ही भीतर सुलग रहे थे. अचानक दियासलाई जल उठी थी. आग की छोटी सी लौ ने उनकी उम्मीदों को ऊर्जा प्रदान की थी. उनमें से कुछ ने सोचा था. जल्दी ही अंतिम संस्कार पूरा हो जाएगा और वे अपने-अपने घरों की ओर लौटेंगे. घर से अरथी उठे हुए पूरे पाँच घण्टे हो गए थे. तभी सामने की दिशा से आते हुए शोर ने उनका ध्यान खींचा. सभी ने देखा पाटीदार के साथ उसका बड़ा बेटा तथा उसकी जाति के लोग थे. आगे-आगे पाटीदार था और पीछे-पीछे अन्य लोग. जैसे-जैसे वे नज़दीक आते जा रहे थे बुजुर्गों के शरीरों में सिहरन भरती जा रही थी. उन्होंने देखा. पाटीदार के लोगों के पास लाठी और बल्लम थे. जबकि युवकों का खून गर्म होने लगा था. श्मशान के नजदीक वे आए तो स्वयं पाटीदार ने चीखते हुए कहा था-

‘आग बुझा दो.’

एक दो पल बाद पुनः उसने क्रोध में कहा था,

‘ढेड़ों तुम्हारी इतनी हिम्मत, पाटीदार के श्मशान में अपना मुर्दा जलाओ.’ तभी पाटीदार का बेटा बोला था,

‘आग बुझा दो वरना सारी बस्ती में आग लग जाएगी. खैरियत इसी में है. अपना मुर्दा लेकर लौट जाओ.’ इस बार दलितों के बीच से कोई बूढ़ा हिम्मत कर बोला था,

‘किया कै रैये हो पाटीदार बिना अंतिम संस्कार किए कोई श्मशान से लौटा है आज तक.’ जवाब दिया था तुरंत पाटीदार ने,

‘हमें नई मालूम. अपना मुर्दा अपने श्मशान में जलाओ.’ तभी पाटीदार के लोगों के बीच से आवाजें उभरी थीं,

‘आग बुझाओ, आग बुझाओ.’

दलित समाज के बूढ़ों ने युवकों की ओर देखा था. निर्णय सुनाया था मुखी के बड़े बेटे ने,

‘एक बार मुर्दे में आग लगने के बाद आग बुझाई नहीं जाती है पाटीदार.’

सुनकर पाटीदार का बेटा भड़क उठा था.

‘तेरी यह जुर्रत. ढेड़ होकर जबान लड़ाता है.’ जवाब भी तड़ाक से मिला था.

‘ढेड़ हों कोई भी हों हैं तो आदमी.’ पाटीदार आँखें निकालते हुए चीखा था,

‘पाटीदार के सामने जबान चलाने का अंजाम नहीं जानता तू.’

वैसे ही स्वर में कहा था मुखी के बेटे ने,

‘अंजाम जानता हूँ. तभी तो पाटीदार की आँखों में आँखें डालकर बात कर रहा हूँ.’

‘तेरी यै हिम्मत. आंखें निकाल ली जावेंगी यै.’

‘हाथ हमारे भी हैं पाटीदार.’

बीच में पाटीदार का बेटा भड़का था,

‘इन हाथों को तोड़ दिया जाएगा.’

मुखी का बेटा भी कहां पीछे रहने वाला था. तत्काल वह बोला था,

‘अगर दो हाथ तुम तोड़ोगे तो एक हम भी तोड़ने की ताकत रखते हैं.’

इससे पहले कि मारकाट मचे, दलित बूढ़ों ने बीच-बचाव करने की कोशिश की थी,

‘पाटीदार जरा तुम्हीं सोचो, झगड़ा बढ़ाने से क्या होगा?’ तभी पाटीदार भभका था,

‘इससे कै दो, जरा संभल कर बात करे वरना एक मुर्दे की जगह इसे भी हिंयाई फूंक दिया जावेगा.’

मुखी का बेटा फिर से बेखौफ हो बोला था,

‘पाटीदार मुझे अपनी जान की परवाह नहीं. तुम्हारी सड़ी गली परंपरा तो टूटेगी.’

तभी पाटीदार बोला था,

‘मारो स्साले को...’

सुनकर पाटीदार के बेटे ने चन्दर पर लाठी से वार करना चाहा था. पर मुखी का पेटा सजग था और सतर्क भी. उसने एक हाथ से वार रोक कर दूसरे हाथ से चिता के ऊपर रखी लकड़ी उसके सिर पर दे मारी थी. पाटीदार ने देखा तो चीख उठा वह,

‘बचने न पावै यै. डाल तो इसी चिता पर मारकर.’ उसने स्वयं पीछे के आदमी से बल्लम लेकर वार किया था. बल्लम में लगी लोहे की नोक चन्दर के कंधे में घुस गई थी. खून का फ़व्वारा उसके शरीर से बहने लगा था. वह आहत होकर वहीं चिता पर गिर पड़ा था. पाटीदार ने उसके शरीर में फिर से बल्लम मारना चाहा तो मुखी का छोटा अपने बड़े भाई के शरीर पर लेट गया था. तभी फग्गन ने चिता से जलती हुई लकड़ी खींच कर पाटीदार को मारी थी. लकड़ी की चोट से वह जमीन पर गिर गया था. इस बीच पाटीदार के बेटे ने फग्गन के सिर पर लाठी से वार किया था. लाठी के भरपूर वार से उसका सिर फट गया था.

जैसे वे हमले की तैयारी करने के बाद ही आए थे. जबकि दलित अपने शव का अंतिम संस्कार करने आए थे. दलित खाली हाथ थे, पर जातीय जख्मों ने उन्हें नई हिम्मत दे दी थी. दलितों में से कोई भागा न था. बूढ़ों तक ने अपनी रक्षा की थी और वार भी किया था. दलितों की संख्या पचास के लगभग थी जबकि पाटीदार दस-पन्द्रह लोगों के जत्थे के साथ आया था. चारों तरफ मारकाट मची थी. कुछ लोगों ने अपने हाथों से चिता की आग बुझाने के प्रयास किए थे. उन हाथों को दलित युवकों ने तोड़कर रख दिया था. चिता की आग भड़क उठी थी. आग दलितों के भीतर भी भड़क रही थी. बिना परिणाम की चिंता किए वे हमलावरों पर टूट पड़े थे. अपनी जाति के लोगों को पिटते/मरते/तथा गिरेत पाटीदार ने देखा तो वह चिल्ला उठा,

‘बंदूकें ले आवो. भून दो ढेड़ों को.’

अपने पिता की आवाज सुनकर उसका घायल बेटा उठ कर भागा था. पीछे-पीछे पाटीदार भी था. शेष श्मशान में दलितों के वार सहने को रह गए थे. दलितों ने उन्हें उन्हीं की लाठियों तथा बल्लमों से मारा था. बूढ़ों के शरीरों में जैसे खून खौलने लगा था. वे बीच-बीच कहते,

‘मारो इन पाटीदारों को. उमर गुजर गई तुम्हारी इनका जुल्म सहन करते-करते.’

अपने बुजुर्गों के मुंह से युद्ध घोष सुनकर दलित युवक उनकी और भी धुनाई करने लगे थे.

अपने-अपने घरों में भीमनगर की औरते बाहर लोगों की पदचाप सुनकर समझीं कि उनके पति, भाई तथा बेटे अंतिम संस्कार कर लौटे हैं. उन्होंने दरवाजों, खिड़कियों से बाहर देखा तो वे हक्की-बक्की रह गईं. वे अपने आदमी नहीं थे. पाटीदार के लोग थे. वे बंदूकों, बल्लमों और लाठियों से लैस थे. शोक में मुखी के घर में बैठी महिलाओं तथा लड़कियों की संख्या दस के लगभग थी. सबसे पहले पाटीदार के लोगों ने उन्हीं पर धावा बोला था. पहली गोली की आवाज सुनकर औरतों ने अंदाजा लगा लिया था कि माजरा क्या है. मुखी के घर में जैसे आग बरसी थी. दनादन गोलियाँ चलाई गई थीं. शोक में डूबी हुई औरते भागी थीं. सीढ़ियाँ चढ़ते हुए, दीवार फांदते हुए, दरवाजे बंद करते हुए उन्होंने अपनी-अपनी सुरक्षा करनी चाही थी, लेकिन अधिकांश बच नहीं सकी थीं. पाटीदार और उसका बेटा उन निरीह महिलाओं तथा बच्चों के सामने चिल्ला रहे थे,

‘बचने न पाए. पकड़ो स्सालियों को.’

उनके पास जितनी घृणा थी वह शब्दों के रुप में बाहर आ रही थी. मुखी का घर जला दिया गया था. पचास बरस का पंखा भी उसी में जल गया था. लच्छू की बकरी, जीतू की भैंस, मुन्ना की साइकिल और फग्गन की दुकान. सभी में आग लगा दी गई थी. उनके भीतर से ईर्ष्या और घृणा उभर रही थी. महिलाओं के कपड़े फाड़ डाले गए थे. और कपड़ों के साथ उनकी अस्मिता को तार-तार कर दिया गया था. बच्चों को बल्लमों की नोक पर उछाल-उछाल कर मारा गया था.

अंतिम संस्कार कर दलित भीम नगर बस्ती में लौटे तो परिवेश में ध्वंस पसरा था. उनके घर धू धू कर अभी भी जल रहे ते. आग की लपटों के आसपास औरतें जख्मी हालत में पड़ी थीं. उनके शरीर से खून बह रहा था. उनके कपड़े अस्त व्यस्त थे. बच्चे मांस के टुकड़ों के रूप में इधर-उधर पड़े थे. मुखी का छोटा लौट आया था. बड़ा बेटा अस्पताल में था. फग्गन चाचा श्मशान में ही दम तोड़ चुका था.

साठ बरस के करमा ने पाटीदारों के वार झेल कर उन्हीं की लाठियाँ उन्हीं पर चलाई थीं. उसी का छोटा भाई उसी की आँखों के सामने हमलावरों के बल्लमों से घायल हो गया था. कुछ लोग लौट आए थे तो कुछ अभी लौट रहे थे. पाटीदार के श्मशान पर लड़ते हुए उन्होंने सबक सीखा था.

सती जलते हुए मकान के भीतर से घिसटते-घिसटते बाहर आ गई थी. छोटे बेटे को देखा तो उसके भीतर ऊर्जा भर आई थी. शरीर पर लगी चोटें पल भर को वह भूल गई थी. छोटे बेटे ने जानबूझ कर नहीं बतलाया था कि उसका बड़ा भाई अभी भी पाटीदार के श्मशान पर मृत पड़ा है. वे फिर से पाटीदार के श्मशान जाएंगे और पुनः अमानवीय परंपराओं को तोड़ेंगे. शेष बच्चों ने अपनी माओं-बहनों को देखा था. वे खौफजदा न थे. मुक्त हो गए थे परंपराओं-परिपाटियों के खौफ से. नन्हीं आंखों में आंदोलन था और श्मशान पर दलितों के द्वारा किए गए संघर्ष ने उन्हें प्रेरणा दी थी.

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रचनाकार – मोहन दास नैमिशराय की 35 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें उपन्यास, कथा संग्रह, आत्म कथा तथा आलेख इत्यादि शामिल हैं. संप्रति, मुख्य संपादक – सामाजिक न्यास संदेश.

चित्र – एम.एफ़. हुसैन की कलाकृति.

2 टिप्पणियाँ

  1. बेनामी6:09 pm

    its really a very touching and the truth about Dalits .
    We should be aware about our past what our forefathers did so that we are here.

    जवाब देंहटाएं
  2. बेनामी1:12 pm

    आज जब जातिगत संबंधों से आदमी उपर होता जा रहा है सार्वजनिक स्‍थानों पर जाति शब्‍द के आधार पर कोई भेद नहीं होता । स्‍कूल कॉलेज, दफतर, बाजार इत्‍यादि में जाति का कोई आस्तितव नहीं है तब ऐसे समय में जातिगत आधार पर आरक्षण और इस तरह का नफरत फैलाने वाला हिंसात्‍मक साहित्‍य कौन से नए भारत की रचना कर रहा है । जिस तरह सवर्णो की नफरत गलत है उसी तरह दलितों की नफरत भी गलत है । उसे किसी क्रांतिकारी कदम की तरह बयान करना एक नैतिक जुर्म है । अगर किसी का सामाजिक स्‍वाधिकार का कोई भूखण्‍ड है तो उस पर वह किसे आने देता है और किसे नहीं यह उसके अधिकार क्षेत्र की बात है । क समाज की कोई धर्मशाला है तो उसमें यह समाज का स्‍वाधिकार की बात है कि वह किसको दे और किसको ना दे । यदि ख उसका उपयोग करना चाहता है तो विनम्रता का ही उपयोग करना होगा अन्‍यथा हिंसा से कोई मसला हल होता नहीं । अत: हिंसात्‍मक कोई भी कदम हो महिमामण्‍ि‍डत नहीं किया जा सकता । कहानीकार ने पात्रों और स्‍‍थान की को वास्‍तविक जामा देकर कहानी को वास्‍तविक जैसी बनाने का प्रयत्‍न किया है जो खेदजनक है । पाटीदार शब्‍द का खलनायक की भांति इतनी बार उपयोग कहानीकार शर्मनाक है । सरदार वल्‍लभभाई पटेल इसी पाटीदार समाज के थे । अत: कहानीकार को अगर शर्म हो तो इसतरह का घृणा को बढानेवाला लेखन बंद कर देना चाहिए ।

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