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संजीव ठाकुर की कहानी: नारायण! नारायण!!

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मैं चक्रधरपुर जा रहा था. बेटिकट! साथ में चाचा जी थे. टिकट लेना शायद चाचा जी को अपमानजनक लगा था. मेरे यह कहने पर कि 'टिकट ले लें'...






मैं चक्रधरपुर जा रहा था. बेटिकट! साथ में चाचा जी थे. टिकट लेना शायद चाचा जी को अपमानजनक लगा था. मेरे यह कहने पर कि 'टिकट ले लें', उन्होंने कहा था, 'धुर, बुड़बक! तीन ही स्टेशन तो जाना है, टिकट क्या करेंगे?' यानी चाचा जी भी आम बिहारियों की तरह 'लोकल' यात्रा में टिकट लेना जरूरी नहीं समझते? चाचा जी भी? रिटायर्ड प्रोफ़ेसर रामेश्वर प्रसाद चौधरी! बेटिकट! मेरे हैदराबादी संस्कार को धक्का लगा. साउथ में तो...

गाड़ी फ्लाई ओवर के पास धीमी होने लगी थी. डिब्बे में फुसफुसाहट हुई, 'चेकिंग तो नहीं?' चाचा जी सीटी बजाने लगे थे, तनाव मुक्त दिखें इस गरज से! मैं तो तनाव में आ गया था, 'न जाने कितनी बेइज्जती होगी?' लेकिन नहीं, गाड़ी स्पीड में आ गई थी. चाचा जी की सीटी बंद!

मैं एनबी कॉलेज_नारायण भगत कॉलेज जा रहा था_एज ए लेक्चरर! साथ में चाचा जी इसलिए कि ये भी इसी कॉलेज में प्रोफ़ेसर हुआ करते थे. इस अत्यंत अपरिचित जगह में सब से परिचय करवा देने का जिम्मा उन्होंने उठाया था. मैं उन्हें मन ही मन कोस रहा था. इन्हीं महाशय की कृपा से मुझे लेक्चरर होना पड़ गया था_भरी जवानी में लेक्चरर!! जबकि मेरे पढ़ने की, खेलने की, मस्ती करने की उम्र है, जबकि मुझे हैदराबाद यूनिवर्सिटी कैंपस में अपने मित्रों के साथ होना चाहिए था_गप्पें हाँकते हुए, कॉफी पीते हुए, सांबर-बड़ा खाते हुए, मैं चाचा जी के साथ था_मूँगफली टूँगते हुए! ''अरे! खाओ, टाइम पास होगा!'' मैं लाचार! जो-जो चाचा जी कह रहे हैं, करने को अभिशप्त!...चाचा जी ने फार्म भिजवा दिया था. ''पंद्रह साल बाद बिहार में वैकेंसी आ रही है, काफ़ी सीट है, अनिकेत को फॉर्म भरने बोलो, मैं भेज रहा हूं.'' पापा को फ़ोन पर कहा था. अभी-अभी तो एम एससी पूरी हुई है, रिसर्च करना है...वैज्ञानिक का जीवन जीने का सपना...! ''अरे! भाई, एप्लाय करने में क्या जाता है? बाद में तुम्हारी मर्जी! फिर बिहार में तुम्हारा होना भी असंभव ही है. वहां तो सोर्स चाहिए, घूस चाहिए.'' पापा ने कहा था और मैं राजी हो गया था. इंटरव्यू हुआ, अच्छा हुआ! दुर्भाग्य! मैं चुन लिया गया. जहां बिहार में एप्वाइंटमेंट में धांधली की ख़बरें हैदराबाद तक के अख़बारों में आ रही थीं वहां मुझे बिना धांधली के क्यों चुन लिया गया था, पता नहीं? शायद मेरा जीवन धूल में मिलाने के लिए! शायद मेरी किस्मत में आग...! ''अरे! किस्मत की बात करते हो? यहां देखो, बीस-बीस साल से लोग पी-एच डी किए बैठे हैं. कोई टयूशन से गुजारा कर रहा है कोई किसी वित्त रहित कॉलेज में प्रोफ़ेसर होने का गुमान पाले हुए हैं. तुम्हें एम एससी करते ही नौकरी मिल गई तो किस्मत खराब हो गई?''...चाचा जी मेरा रिजल्ट लेकर हैदराबाद पहुंच गए थे, मुझे ज्वाइन करने को फुसला रहे थे! पिताजी की भी सहमति थी, माताजी की भी, छोटे भाई की भी. विभाग के प्रोफ़ेसरों की भी. मित्रों की भी. ''जाकर देख लो, ठीक नहीं लगे तो वापस आ जाना!''

मैं चक्रधरपुर स्टेशन पर था. साथ में चाचा जी. एक किलोमीटर का पैदल सफर. सड़क कच्ची. ''बरसात के दिनों में तो यहां काफ़ी दिक्कत होती होगी चाचा जी?'' मैं पूछता हूं. ''हां, होती तो है, मगर कौन तुम्हें यहां रोज आना है? यहां पूरी आजादी है. जब चाहो आओ, न चाहो मत आओ!'' चाचा जी आश्चर्य प्रकट करने का मौका दिए बगैर मेरे ज्ञान में वृद्धि कर रहे थे!

मैं नारायण भगत कॉलेज के मैदान में खड़ा था. सामने कॉलेज_दो-तीन टूटे-फूटे कमरे_खपरैल के_जैसे गाँवों में किसी गरीब-गुरबे के भी नहीं होते. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैदान कॉलेज का है या इस मैदान में ही कॉलेज है?...आह! हैदराबाद यूनिवर्सिटी!!
''देखो, उधर भी बिल्डिंग है!'' चाचा जी ने मेरी मनःस्थिति को भांपकर दिखलाया था. ''अच्छा, पक्की बिल्डिंग भी है?''... तीन-चार कमरों का मकान, जिसमें ऑफिस, लाइब्रेरी, लेबोरैट्री आदि 'जरूरी' चीज़ें हैं और जिसमें बरसों से 'व्हाईट वाशिंग' नहीं हुई है_बरसात के पानी का गहरा दाग, दीवारों पर दरार!

गुनगुनी धूप थी, दिसंबर का महीना. कॉलेज बिल्डिंग के सामने मैदान में कुछ कुर्सियां लगी थीं, कुछ लगाई जा रही थीं. चाचा जी को देखकर चपरासी रामदेव ने दोनों हाथ उठा दिए, कहा, ''परनाम सर!'' खुश रहने का आशीर्वाद देकर चाचा जी ने मेरा परिचय करवाया, ''मेरा भतीजा है! यहां फिजिक्स का प्रोफ़ेसर बहाल हुआहै.''...''बहूत बढ़ियां सर! बहूत बढ़ियां. आइए, बैठिए न?'' रामदेव ने आग्रह किया था.

''प्रणाम सर!''...''प्रणाम सर!'' जो-जो लोग कॉलेज आते, चाचा जी को प्रणाम करते और चाचा जी उनसे मेरा परिचय करवाते, ''मेरा भतीजा है, फिजिक्स...!'' यानी मैं चाचा जी का भतीजा था, तभी फिजिक्स का लेक्चरर! अनिकेत तो था ही नहीं! हैदराबाद में किसी ने नहीं कहा था_मि. चौधरी का बेटा. स्कूल से लेकर यूनिवर्सिटी तक मुझे लोग मेरे नाम से जानते थे. यहां चाचा जी के नाम से. मेरा अपना नाम मिट गया था. कहीं इसी तरह मेरा अस्तित्व भी तो...!

मैदान की उन कुर्सियों पर काफ़ी प्रोफ़ेसर आकर विराज चुके थे. कुछ नए भी, यानी मेरे साथ ही बहाल हुए किन्तु मुझ से बहुत पहले ज्वाइन कर लेने वाले.

हम लोग खुले आकाश के नीचे बैठे थे. खुला मैदान था. मैदान के एक कोने में बच्चे कबड्डी खेल रहे थे. हार से आहत होकर एक दूसरे को 'तोरी माय के...', 'तोरी बहिनिया के...' करने से भी नहीं चूक रहे थे. कुछ लोग साइकिल चलाने का अभ्यास भी मैदान में कर रहे थे. और गाय-भैंसे अपनी मर्जी से आवाजाही कर रही थीं. मुझे पूरा वातावरण 'शांति निकेतन' जैसा लग रहा था. बल्कि प्रकृति यहां उससे भी अधिक थी_यहां तो प्रकृति भी अपनी प्राकृतिक अवस्था में थी!

'काश! मैं दबाव में नहीं आया होता? काश! मैं अपने मन के ख़िलाफ़ नहीं गया होता!' मैं सोच रहा था.

''एम एससी कहां से किए हैं?'' चाचा जी के पास बैठे प्रोफ़ेसर ने सवाल किया था.
''जी! हैदराबाद से.''

''बी एससी?''
''वहीं से.''

''अरे! भाई, यह पहली से एम एससी तक हैदराबाद में ही पढ़ा है.'' बगल में बैठे चाचा जी ने इकट्ठे बता देना जरूरी समझा.

''औ! तब तो यहां बिहार में आपको मन नहीं लगता होगा?''
''नहीं! ई तो ज्वाइन भी करना नहीं चाहता था. इसको तो पकड़ कर हम लाए हैं!'' चाचा जी ने गर्व का भाव चेहरे पर लाते हुए कहा था.

''अरे! नौकरी कोई छोड़ता है भला? इस जमाने में नौकरी मिलने में इतनी दिक्कत है. अच्छा किया इन्हें पकड़ कर ले आए.'' उन्हीं सज्जन ने कहा था.

''सर! कितना देना पड़ा?'' 'सज्जन' चाचा जी के कान में फुसफुसा रहे थे. चाचा जी हंस पड़े, ''अरे! भाय, इसका वश चलता तो यह नौकरी करने आता ही नहीं! और आप कह रहे हैं घूस-घास?''...

प्रिंसिपल साहब नहीं आए थे_बारह बजने के बावजूद! ज्वाइनिंग कैसे होगी? चाचा जी चिंतित थे. एक वरिष्ठ प्राध्यापक ने उन्हें आश्वस्त किया, ''अच्छा! नहीं आएंगे तो क्या? ज्वाइनिंग आज के डेट में हो जाएगा.'' उन्होंने रामदेव को 'बड़ा बाबू' को बुला लाने कहा. जब हेड क्लर्क आए तो उन्होंने निर्देश दिया, ''इनसे 'ज्वाइनिंग' लेकर रख लीजिए, कल प्रिंसिपल साहब आएंगे तो दस्तखत करवा दीजिएगा.'' हेड क्लर्क ने वैसा ही किया. ऑफ़िस से वापस आकर मैं फिर कुर्सी पर बैठ गया. मैंने भीड़ में ही एक सवाल उछाला, ''लड़के नजर नहीं आ रहे हैं?'' सब लोग गुम हो गए. नए आए एक लेक्चरर ने कहा, ''इस कॉलेज में लड़के नहीं हैं.''...''मतलब?'' मैं चौंक गया. ''मतलब यह कि एक तो यहां कम लड़के एडमीशन लेते हैं, उनमें से अधिकांश अपने-अपने धंधों में लगे रहते हैं. एक ही बार परीक्षा देने आते हैं.''...मैं इस अति आधुनिक व्यवस्था की जानकारी पा कर सन्न रह गया था. तब तक एक सीनियर प्रोफ़ेसर ने रामदेव को बुलाया था और कहा था, ''सच्चो बाबू का लड़कवा यहीं है न? उसको जाकर कह देना, 'आकर क्लास करेगा. फिजिक्स के प्रोफ़ेसर आ गए हैं'.'' और वे मेरी ओर देखकर बोले थे, ''क्या कीजिएगा? यहां बरसों से पोस्ट खाली है. बहाली होती नहीं. लड़के आकर क्या करेंगे?''

''लेकिन यहां तो फिजिक्स में पहले से ही एक शिक्षक थे? अभी ही कोई बता रहे थे?'' मैं पूछता हूं. मुस्कराते हुए वे जवाब देते हैं, ''बस यही समझ लीजिए कि नहीं थे!...उनको तो कॉलेज आने की तभी जरूरत होती है जब वेतन लेना हो!''...''वैसे ऊ पढ़ाएंगे भी क्या? कुछ आता-जाता थोड़े है?'' उन्होंने अपना स्वर थोड़ा दबाकर कहा था.

बगल से किसी ने कहा था, ''उनसे खेती-पथारी का गप चाहे जितना कर लीजिए, फिजिक्स-उजिक्स उनसे नहीं सपरता है!''...मैं अवाक् हो गया था.

अगले दिन मैं फिर चक्रधरपुर जा रहा था, टिकट लेकर. सिर्फ चार ही रुपए का सवाल था!
कॉलेज में 'सच्चो बाबू का लड़कवा' मेरी प्रतीक्षा में उपस्थित था. 'चलो, इसे पढ़ाते हैं.' मेरे मन में आया. मैंने रामदेव से पूछा, ''किस रूम में क्लास लें?'' रामदेव बोल पड़ा, ''सर! परयोगशाला में भी ले सकते हैं, लेकिन ऊ गंदा होगा. यहीं फील्डे में बैठ जाइए न? धूप भी है!''

रामदेव ने 'स्टाफ रूम' से थोड़ी दूर पर एक कुर्सी लगा दी. मैं कुर्सी पर बैठ गया, नीचे वह लड़का, रूपेश कुमार, वल्द सच्चो बाबू!...''हां, इंटर में तुम्हारा डिवीजन क्या था?'' मैं पूछता हूं. वह कहता है, ''फर्स्ट डिवीजन सर!''...''अच्छा!'' मैं प्रभावित हो जाता हूं.

''कोर्स में क्या-क्या है?'' मैं पूछता हूं. वह चुप! बहुत कुरेदने पर वह कहता है, ''नहीं जानते हैं सर! अभी दू महीना पहले एडमीशने हुआ है!''

''माई गॉड! दो महीने हो गए, इसे अभी तक कोर्स भी नहीं पता?'' मेरे मन में एक झल्लाहट सी होती है लेकिन मैं कहता हूं, ''अच्छा! आज ऐसे ही बातें करते हैं. बताओ इंटर में क्या-क्या पढ़ा था?'' वह अटक-अटक कर बताता है, गति, प्रकाश, चुंबक...!

''अच्छा यह बताओ कि आकाश में तारे टिमटिम करते क्यों प्रतीत होते हैं?'' मैं पूछता हूं तो उसका मुख सिग्नल की तरह नीचे झुक जाता है.

''अरे! नहीं जानते हो? यह तो तुम्हें आना चाहिए? जेनरल नाउलेज का सवाल है यह तो!''...अच्छा यह बताओ 'चुंबकीय क्षेत्र' किसे कहते हैं?''

उसका नत मस्तक और डाउन हो गया. मुझे लगा इसे इससे भी आसान सवाल पूछना चाहिए ताकि इसका खोया हुआ आत्मविश्वास वापस लौटे. मैंने पूछा, ''अच्छा, न्यूटन के गति के नियम क्या-क्या हैं?'' उसके अधोगामी दिमाग ने बहुत-बहुत याद करने की कोशिश की लेकिन बेकार! लगा कि इस बार भी वह नहीं उठ पाएगा. मेरे चेहरे पर पसीना आ गया था. जेब से रूमाल निकाल कर पसीना मैंने पोंछा और उससे कहा, ''ठीक है, आज जाओ! कल न्यूटन का गति-नियम पढ़कर आना.''

मैं मैदान में लगाए गए उसी स्टाफ रूम में आ गया. मैंने रामदेव से पानी मांगा और बगल में बैठे मंडल जी से कहा, ''देखिए, क्या स्टैंडर्ड है? बीएससी में पढ़ता है और गति का नियम तक नहीं जानता है.'' हिंदी के श्रीवास्तव जी कह पड़े, ''अरे! भाई, यह तो बहुत बड़ा सवाल कर दिया आपने. मेरी सुनिए! मेरे ऊपर कृपा करके जब कभी कोई ऑनर्स का लड़का आता है और मैं उससे पानी और हवा का लिंग-निर्णय करने कहता हूं तो वह नहीं कर सकता!..यहां अच्छे लड़के एडमीशन ही कहां लेते हैं? जो समर्थ हैं, बाहर चले जाते हैं.''

''लेकिन किसी का बेस इतना कमजोर कैसे हो सकता है? और बावजूद इसके वो फर्स्ट क्लास कैसे ला सकता है?''

''अनिकेतजी! आप धीरे-धीरे सब जान जाएंगे! यहां बेटे से ज्यादा बाप की परीक्षा होती है. बाप जितना मिहनती होता है, बेटे को उतने ही नंबर आते हैं...परीक्षा में नक़ल, फिर नंबर बढ़वाने का रिवाज. विद्यार्थी पढ़कर ही क्या करेंगे?'' श्रीवास्तव जी ने स्पष्ट किया था...''फिर स्कूल लेबल पर तो पढ़ाई का स्तर बहुत गिरा हुआ है न?'' उन्होंने आगे जोड़ा था.

रामदेव पानी लेकर हाजिर था. मैंने देखा_स्टील का मोटा-सा गिलास_जो पता नहीं कब से सफाई का मोहताज था? हाथ में लेकर देखा_गिलास के भीतर भी कालिमा थी. और काई जैसे कुछ कण उसमें तैर रहे थे. मैंने रामदेव से पूछा, ''यह क्या तैर रहा है इसमें?'' रामदेव ने सहज भाव में जवाब दिया, ''चापाकल का वासर सड़ गया है, वही थोड़ा-थोड़ा आ जाता है.'' मैंने कहा_फेंक दीजिए इसको, नहीं पी सकूंगा.'' प्यासा रहना मुझे ज्यादा उचित लगा था. मुझे पेशाब करने की भी इच्छा हो रही थी. मैंने रामदेव से ट्वायलेट का पता पूछा. उसने विहंसते हुए जवाब दिया, ''यहां बाथरूम कहां है सर? उधर दिवाल के पीछे चले जाइए न?''...मैं चला गया. दीवार से सटा एक गड्ढा सा था.

उधर 'प्रणाम सर! प्रणाम सर!' होने लगा था. प्रिंसिपल साहब पधार चुके थे. थुल-थुल से. मुड़ी-तुड़ी कमीज पहने. पैरों में प्लास्टिक की चप्पलें. 'ओह! डॉ रामाराव, आप मुझे क्यों याद आ रहे हैं? आपकी पर्सनालिटी से मैं इनकी तुलना क्यों करने लगा हूं?''

कल जो सज्जन चाचा जी की बगल में बैठे थे_शायद महादेव बाबू_प्रिंसिपल से मेरा परिचय करवा रहे थे, ''रामेश्वर बाबू का भतीजा है सर! अपने कॉलेज में फिजिक्स...!''

''अच्छा! अच्छा! बहुत अच्छा!...कल क्या हुआ क्या कहें?''
''क्या हुआ सर?'' प्रिंसिपल का दुख सुनने को सभी कान व्यग्र हो उठे. प्रिंसिपल ने सुनाया, ''कल भोरे से 'बेटीचोदना' दांत में दरद हो रहा था. इसीलिए नहीं आ सके.''

''दांत हिलता है क्या सर?''
''गरम पानी से कुल्ला नहीं किए थे?''
''मधु और फिटकिरी मिलाकर लगा देते?''
''नीम का दातुन किया कीजिए सर!''...

चारों ओर से जिज्ञासा और सलाहों की बौछारें पड़ने लगी थीं. कोई इनमें पीछे रहने को तैयार नहीं था. बात आखिर प्रिंसिपल साहब के दांत की थी! एक मैं ही मौन था और प्रिंसिपल साहब के वक्तव्यों में से एक शब्द पकड़ कर उस पर विचार कर रहा था, 'बेटी...!'

दंत-पुराण से निकल कर प्रिंसिपल साहब ने मेरे ज्वाइनिंग एप्लीकेशन पर दस्तख़त कर दिया था.
मेरी गाड़ी का समय हो गया था, मैं सबको प्रणाम कर निकल गया.

अगले दिन फिर से वह लड़का आ गया था लेकिन बिना कुछ पढ़े. ''घर में काम रहता है सर! नहीं पढ़ पाते हैं!'' उसने कहा. मैं द्रवित हो गया. कहा, ''ठीक है, तुम रोज यहां आया करो. मैं तुम्हें शुरू से पढ़ाऊंगा.'' मैंने सोचा आज ज़रा लेबोरेटरी का मुआयना कर लिया जाए? रूपेश कुमार को साथ लेकर मैं चल पड़ा. उस पक्की बिल्डिंग में एक छोटा कमरा लेबोरेटरी के नाम था, उसमें फिजिक्स, कैमिस्ट्री, बायो सबके प्रयोग एक साथ किए जाते थे. कमरे के चारों कोनों में चार टेबल थे जिन पर कुछ-कुछ उपकरण 'मौजूद' थे. एक 'विम बैलेंस', जिसके बाहर के शीशे टूटे हुए. बैलेंस का एक पलड़ा ग़ायब. दूसरा धूल के भार से नीचे बैठा हुआ. कुछ टूटी-फूटी परखनलियां. कुछ बोतलों में फंफूद लगे केमिकल्स. कुछ बोतलों में सूखे हुए पौधे... वगैरह-वगैरह!

अब मैंने लाइब्रेरी देखने की इच्छा जताई. कल भी जताई थी लेकिन कल लाइब्रेरियन नहीं आए थे. रूपेश कुमार मुझे बाहर वाले कमरे में ले गया. लकड़ी की कुछ पुरानी अलमारियां_कुछ टेढ़ी, कुछ बंद होने से इनकार करतीं. किताबों के गट्ठर अलमारियों पर अलग से बोझ डाले हुए!...यानी, ये थे मेरे वैज्ञानिक बनने के उपकरण! सपना_सपना_सपना! भुगतो परिणाम_ हैदराबाद के इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमीशन न लेने का. पढ़ो अनिकेत कुमार फिजिक्स पढ़ो_खूब पढ़ो! इंजीनियरिंग में गए होते तो किसी अच्छी कंपनी में, अच्छे शहर में काम कर रहे होते! रिसर्च करना है फिजिक्स में! रिसर्च करना जरूरी है कि नौकरी? चाचा जी के अनुसार तो नौकरी! पिताजी के अनुसार भी. तभी न यहां भेजने में उन्हें ज्यादा सोचना नहीं पड़ा? अब नौकरी छोड़ने की बात करता हूं तो सब हँसते हैं_इतनी अच्छी नौकरी! काम कम, पैसे ज्यादा. इतनी मुश्किल से मिलती है नौकरी, भला छोड़ोगे?

हैदराबाद जैसे शहर में बचपन से रहने के बाद गांव में रहना! रोज दो किमी पैदल चलकर स्टेशन पहुंचना, गाड़ी से यात्रा! वापसी बड़ी कठिन थी, सचमुच!...चाचा जी ने आश्वासन दिया था_''कुछ दिन कष्ट सहो न? तुम्हारा ट्रांसफर शहर के कॉलेज में करवा दूंगा. कुछ दिन धैर्य रखो!'' लेकिन मुझमें धैर्य नहीं था. कॉलेज तो कॉलेज था और गांव, गांव! बचपन के तीन-चार साल यहीं गुज़ारे हैं मैंने. फिर पिताजी के साथ हैदराबाद. साल-डेढ़ साल में एक बार गांव आना! अच्छा लगता था, लेकिन सब दिन यहां रहने की बात कभी नहीं सोची थी. सोच में कभी आई ही नहीं थी. चाचा जी लाख कहते रहें, ''नौकरी के लिए तो कहीं भी जाना पड़ता है. तुम्हारे पिताजी इतनी दूर हैदराबाद गए कि नहीं?''..''हैदराबाद जाना चाहे जितना कठिन रहा हो चाचा जी! वहां से लौटना तो और भी कठिन है!'' मैं तर्क करता हूं...''क्या आप नहीं समझते कि मेरे लिए वैसी ज़िंदगी जीने के बाद ऐसी ज़िंदगी जीना कितना कठिन हो सकता है?''

''हां, सब समझता हूं बेटा! कुछ दिन रुको न? मैं तुम्हारा ट्रांसफर करवा दूंगा न?'' चाचा जी विश्वास दिलाना चाहते हैं. झख मारकर मैं रहता हूं. दोस्तों को ख़त लिखकर मन का बोझ कम करने की कोशिश करता हूं. दोस्तों को यहां की बातें अविश्वसनीय लगती हैं. पूरे कॉलेज में कुल तीन-चार छात्रों की उपस्थिति तो घोर अविश्वसनीय!

आखिर छह महीने के उस 'सश्रम कारावास' से मुक्ति पाने का दिन भी आता है_चाचा जी का परिश्रम रंग लाता है, मेरा तबादला विक्रमगंज के 'प्रतिष्ठित' कॉलेज में हो जाता है. क़िस्सा मशहूर है कि यह बीएन_बिमला नारायण कॉलेज बिहार के चार-पांच श्रेष्ठ कॉलेजों में से एक है. मेरे चाचा जी और पिताजी तक को इस कॉलेज में पढ़ने का सौभाग्य मिल चुका है. अब जब मुझे उस कॉलेज में तबादले का सौभाग्य मिला, तब इस कॉलेज_एनबी-नारायण भगत कॉलेज के प्रिंसिपल मुझे रिलीव करने के पक्ष में नहीं थे. 'इतने दिनों बाद फिजिक्स के कोई अच्छे प्रोफ़ेसर आए हैं, वे भी चले जाएंगे तो लड़कों की पढ़ाई का क्या होगा?'...और उन्होंने कब्र खोद-खोद कर 'लड़कों' को जिंदा कर लिया था. जिस रूपेश कुमार को छोड़कर मैंने किसी का नाम तक छह महीने में नहीं सुना था, उनके नाम से मेरे स्थानांतरण के विरोध में आवेदन आ चुके थे. कुछ अभिभावकों के भी पत्र प्रिंसिपल ने जुगाड़ लिए थे और अपनी 'अच्छी' अंग्रेज़ी में वीसी से मेरा स्थानांतरण रोकने की अपील कर चुके थे. यानी जो प्रिंसिपल मेरे चाचा जी के अंतरंग मित्र होने का दावा करते थकते नहीं थे, भतीजे के विरूद्ध लंगोट कसकर उतर चुके थे. उन्हें इस महाविद्यालय के कुल जमा एक विद्यार्थी का भविष्य अंधकारमय दिखने लगा था. जो शिक्षक पूरे साल कॉलेज नहीं आते, उनको कुछ कहने की हिम्मत इन्हें नहीं है, लेकिन मेरे नहीं रहने से इनका कॉलेज बंद हो जाएगा! मेरे मन में गुस्सा ही गुस्सा था. प्रिंसिपल के सामने कुर्सी पर गुस्सा दिखाकर मैं शांत हो गया था. मैं सोच रहा था, इनके विरूद्ध चांसलर को लिखूंगा. मैं तो इस कॉलेज के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगाते हुए ही पत्र लिखूंगा. जिस कॉलेज पर लाखों रुपए प्रतिमाह सरकार ख़र्च करती है, उसकी उपलब्धि क्या है? आखिर सरकारी धन का ऐसा दुरुपयोग क्यों किया जा रहा है? क्यों नहीं इस कॉलेज को बंद कर यहां के लोगों को वहां भेज दिया जाता है_जहां 'मैन पावर' की वाक़ई जरूरत है?...मैं इन मुद्दों को प्रेस में देने की भी सोचने लगा था.

मैं स्टेशन की तरफ़ जा रहा था. साथ में थे हसन साहब और श्रीवास्तव जी. हमें आता देख आगे चल रहा कॉलेज का चपरासी पाठक जी रुक गया. हमारे साथ ही चलने लगा. ''बड़ा दोगला है प्रिंसिपल सर!'' उसने मेरे दुख में शामिल होते हुए कहा. ''देखे थे ऊ दिन जब मंटा यादव इनको लाठी कर रहा था, तब कैसा मुंह हो गया था?...भला का जमाने नहीं है!'' उसने आगे जोड़ा था.

सचमुच! उस दिन मंटा यादव इनका बुरा हाल कर देता. गाली तो खुले आम दे रहा था. एक चपरासी प्रिंसिपल को अपने गुप्तांग का बाल कह रहा था! कोई कुछ नहीं बोल रहा था. मैं ही बीच-बचाव करने क्यों पहुंच गया था? बीच-बचाव करना यहां का रिवाज ही नहीं है. आज ही जब प्रिंसिपल मेरी बात तक सुनने को तैयार नहीं थे, कोई टीचर कुछ क्यों नहीं बोल रहे थे? यहां अपना महाभारत आप ही लड़ना होता है शायद!

उस तनाव ग्रस्त वातावरण को रंजकता प्रदान करने के उद्देश्य से श्रीवास्तव जी ने पाठक जी को टहोका, ''अच्छा, पाठक जी? प्रिंसिपल साहब का दो हज़ार वाला क़िस्सा क्या है?''...पाठक जी हँसने लगे, ''बताए थे न सर?''...''हां, हां, बताए तो थे! अनिकेत जी नहीं जानते हैं न? सुनाइए ज़रा!''

''हुआ क्या था सर?'' पाठक जी मेरे मुखातिब थे, ''कि एक बार प्रिंसिपल साहब से एक जनानी दू हजार रुपया उधार ले गई थी. घर में प्रिंसिपल साहब किसी को नहीं बताए थे. मगर किसी तरह उनके बेटवा को पता चल गया. अब बेटवा ऊ जनानी के यहां पहुंच गया, पैसा मांगने. जनानी बड़ा जब्बर थी. बेटवा को बोली, ''पैसा कोन चीज़ का मांगते हो? दू बार 'घचपिलेंटिस' जो किया तुम्हारा बाप! दू हज़ार असूल हुआ कि नहीं?''...

हँसते-हँसते हम लोट-पोट हो गए. मेरा तनाव थोड़ा कम हो गया. स्टेशन आ गया था. पता चला, गाड़ी एक घंटा लेट है. 'चलिए चाय पीते हैं,' हसन साहब ने सुझाव दिया. हमने माना. वैसे मौसम बहुत गर्म था, फिर भी टाइम पास! हम लोग पीपल के एक घने पेड़ के नीचे बैठ गए. पाठक चाय के लिए दुकानदार को बोल आया और हम लोगों के साथ नीचे ज़मीन पर उकड़ूं बैठ गया. उसके हाव-भाव से लग रहा था कि वह कुछ और बात करना चाह रहा है. तब तक हसन साहब ने उसे उकसाया, ''अरे! विमलेश बाबू वाली कहानी क्या है?'' मुझे लग गया कि हसन साहब उस कहानी से परिचित थे, लेकिन मुझे ही सुनवाना चाहते थे. पाठक शुरू हो गया, ''अरे! सर, क्या बतावें? पहले हमारा कॉलेज यहां नहीं था, उधर गंगाजी के किनारे था. हौस्टल भी था उसमें. अब न गंगा में कट गया? स्टाफ क्वाटर भी था. बिमलेस बाबू उसी में रहते थे. इनकी जनानी गांव में रहती थी. एगो मेहतरनी साफ़-सूफ़ करने इनके घर आती थी. दसहरा का टैम था. बिमलेस बाबू हटिया से एक ठो साड़ी ख़रीद कर लाए, मेहतरनी को दिए. बगल में रहते थे सिंह जी. सिंह जी मज़ाक़ किए, 'का हो बिमलेस बाबू, मंगनिये दे दिए साड़ी?'...तऽ बिलमेस बाबू बोले, 'एतना बुड़बक समझते हैं हमको?...अरे पूरा छुट्टी ऊ हमरा 'काम' करती रही थी!''

हम फिर ठहाके लगा रहे थे. चाय की चुस्कियों के साथ पाठक एक से एक कहानी सुना रहा था. कुछ क़िस्से समान लिंगों के भी थे. एक रिटायर्ड प्रोफेसर तो चपरासी, किरानी सबके लिए 'प्रस्तुत' हो जाया करते थे!!

मैं विक्रमगंज जा रहा था. साथ में चाचा जी. विचार हुआ कि 'छोड़ो साले प्रिंसपलवा को, सीधे वीसी के पास चलते हैं. जिस वीसी ने ट्रांसफर किया है, वही ज्वाइन करवाएंगे'...

वीसी ने बिमला नारायण कॉलेज के प्रिंसिपल को फ़ोन कर दिया, ज्वाइनिंग हो गई.

यह बी एन कॉलेज सचमुच भव्य था. ऊंची-ऊंची बिल्डिंग, स्टेडियम, प्रिंसिपल का सजा हुआ चैंबर, पेड़-पौधे. सौ एकड़ ज़मीन पर कॉलेज है. नारायण सिंह इस इलाक़े के बहुत बड़े जमींदार थे, उन्होंने ही ज़मीन दी, पैसे दिए. इसीलिए उन पति-पत्नी के नाम पर यह कॉलेज है.'' चाचा जी ने जानकारी दी थी.

ज्वाइन करने के बाद विभागाध्यक्ष को रिपोर्ट करना भी जरूरी था. आज ही से गर्मी की छुट्टियां हो गई थीं, विभागाध्यक्ष कॉलेज नहीं आएंगे. हेडक्लर्क ने बताया, 'स्टेडियम के पीछे उनका क्वार्टर है,

डॉ मिश्र वहीं मिल जाएंगे, चले जाइए!' हम लोग गए. डॉ मिश्र चाचा जी से परिचित थे. उन्होंने मेरा परिचय पूछा और एक बार फिर चाचा जी, ''मेरा भतीजा है...!''

''वाह! यह तो बहुत अच्छा रहा. 'अपने' हैं.'' विभागाध्यक्ष कह रहे थे, ''एक नए व्यक्ति ट्रांसफर होकर आ रहे हैं, यह तो पता था लेकिन यह नहीं पता था कि 'अपने'...! मुझे बताया गया था इनका नाम. लेकिन 'चौधरी' टाइटिल से कन्फ्यूजन हो गया था. पता नहीं चल पा रहा था कि 'भू धातु' (भूमिहार) हैं कि सामाजिक न्याय के हैं कि हमारी ही तरह?...अब मैं निश्चिंत हो गया हूं.''

विभागाध्यक्ष डॉ मिश्र तो मुझे अपनी जाति का पाकर निश्चिंत हो गए थे लेकिन मैं उद्विग्न हो गया था. जातिवाद यहां इतने गहरे तक है इसका अनुमान नहीं था. सामान्य लोग जातिवादी हों, ठीक! नेता लोग जात का उत्पात मचाकर वोट लें, यह भी ठीक. लेकिन पढ़े-लिखे लोग, 'प्रोफ़ेसर्स!' वो भी फिजिक्स के?..शर्म है भाई शर्म! इस प्रोफ़ेसर मिश्र और उस पियन पाठक में आखिर अंतर क्या है? उसने एकांत पाकर एक दिन, ''आहा! सर, एक तो आए हैं अपन जात के, बाक़ी सब तो...!'' कह ही दिया था तो क्या बुरा किया था?

छुट्टियां हो ही गई थीं, मैंने हैदराबाद जाने की इच्छा व्यक्त की. चाचा जी पहले तो कहते रहे कि 'कामेश्वर भी तो गांव आने वाला था, क्या करोगे जाकर?' लेकिन मेरी जिद पर झुक गए. पिताजी यहां आते तो चाचा जी मेरी शादी की बात पक्की करने की कोशिश करते. जब से नौकरी लगी है, कोई न कोई रिश्ता लेकर चाचा जी के पास पहुंच ही रहा है. मेरा रुकना संभव न देखकर चाचा जी ने एक लंबा पत्र सभी रिश्तों की डिटेल देते हुए पिताजी को लिखा. कुछ 'अच्छी' लड़कियों की तस्वीरें भी लिफ़ाफ़े में दे दीं. लिफ़ाफ़ा जान-बूझकर खुला रखा ताकि मैं देख सकूं. मैंने देखीं भी_ट्रेन पर टाइम पास करने के ख़याल से. उन्हें देखकर मुझे गुस्सा ही आता रहा. लड़कियां क्या थीं, कार्टून थीं. किसी ने कुत्ता पकड़कर फ़ोटो खिंचवाया था. किसी ने घर के सभी साजो-सामान, फ्रिज़, टीवी, टेपरिकार्डर इकट्ठे कर लिए थे और बीच में खुद खड़ी हो गई थी. कोई खुले बालों में आकाश ताक रही थी. मन किया था कि एक थप्पड़ ऊपर से देकर इसका सर सीधा कर दूं!

हैदराबाद पहुंचकर मैं सबसे पहले अपने मित्रों से मिला. अपनी नौकरी के अनुभव सुनाए. मेरे लिए सुपरवाइजर प्रोफ़ेसर रेड्डी से मिलना बहुत जरूरी था. मैं बाहर रहने लगा हूं इसलिए मेरा रजिस्ट्रेशन कैंसिल भी किया जा सकता है. प्रोफ़ेसर रेड्डी ने आश्वस्त किया, ''तुम्हें स्पेशल परमीशन दिलवा दूंगा...वैसे तुम छुट्टियां लेकर आ जाओ. एक-डेढ़ साल में काम पूरा कर लो!'' मैंने उन्हें बताया कि अभी छुट्टियां नहीं मिलेंगी, प्रोबेशन पीरियड है! प्रोफ़ेसर रेड्डी ने तब सलाह दी कि, ''छुट्टियों में यहां आओ और बाक़ी समय वहीं पढ़ाई करो. बीच में एक-दो महीना मेडिकल तो ले ही सकते हो? बीमारी को कौन रोक लेगा?''

प्रो रेड्डी ने पूछा था, ''पेमेंट मिलना शुरू हुआ या नहीं? तुमने तो लिखा था कि तीन महीने हो गए, एक पैसा नहीं मिला है?''

''हां, सर, इन कुल छह महीनों में से डेढ़ महीने का वेतन मिला है. वो भी तीन दिन वीसी के आगे धरने पर बैठने के

बाद.'' प्रो रेड्डी 'क्वाइट सरप्राइजिंग' कहते हुए मुस्करा रहे थे. मैंने आगे कहा था, ''वेतन का यह हाल है सर! कि पूरा कभी नहीं मिलता. डीए वहां स्टेट गवर्नमेंट के एम्प्लाई की तुलना में आधा ही मिलता है. पीएफ कट जाता है लेकिन शिक्षकों के खाते में जमा नहीं होता. पीएफ से कोई लोन लेना चाहे तो उसमें कठिनाई! फिर लोन रिकवरी के लिए सैलरी से जो डिडक्शन किया जाता है, वह भी खाते में जमा नहीं होता. और तो और, एलआईसी के एवज में काटी गई राशि भी एलआईसी को नहीं भिजवाई जाती. यूनिवर्सिटी खा-पका जाती है.''
''हॉरिबुल!'' प्रो रेड्डी बोल पड़े थे.

''हां, सर, उसी 'हॉरिबुल कंडीशन' में मैं रह रहा हूं. और जानते हैं सर..'' मैं आगे बताना चाहता हूं, ''रिटायर्ड होने के बाद शिक्षक कॉलेज और यूनिवर्सिटी के चक्कर लगाते-लगाते चक्कर की बीमारी पाल लेते हैं, लेकिन पीएफ के पैसे वापस नहीं मिलते, ग्रेचुइटी नहीं मिलती, पेंशन फिक्स नहीं हो पाता!...''

प्रो रेड्डी ज़ोर से हँसने लगे थे. मैंने कहा, ''मैंने देखा है सर कि बूढ़े लोग यूनिवर्सिटी जाते हैं, क्लर्कों के पास गिड़गिड़ाते हैं. ऐसी अपमानजनक स्थिति है कि क्या कहें?...क्लर्क लोग पान चबाते हुए कुर्सियों पर बैठे रहते हैं, रिटायर्ड प्रोफ़ेसर्स खड़े रहते हैं या ज्यादा से ज्यादा स्टूल पर बैठा दिए जाते हैं.''

''पूरा सिस्टम ही गड़बड़ है बिहार का. ऐसे में तुम्हें परेशानी तो होती ही होगी!'' प्रो रेड्डी मुझसे सहानुभूति दिखाने लगे थे. मैंने विनम्र भाव से निवेदन किया था, ''मैं नौकरी छोड़ देना चाहता हूं सर!''

''नहीं, अभी नहीं. समय आने दो. जब यहां कुछ हो पाएगा, तब छोड़ना...तुम तो यूनिवर्सिटी पॉलिटिक्स में भी नहीं हो, तुम्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है!'' प्रो रेड्डी ने रैशनल होने की सलाह दे डाली थी.

घर में माताजी, पिताजी भी नौकरी छोड़ने की मेरी बात से सहमत नहीं हो रहे थे. ''अब तो अच्छे कॉलेज में आ गए हो न बेटा? शहर भी ठीक ही है विक्रमगंज. मन लगाने की कोशिश करो. शुरू में थोड़ी कठिनाई होगी, फिर एडजस्ट कर जाओगे.''

''हम तो तुम्हारी भलाई के लिए ही कह रहे हैं न बेटा?''

मां, पिताजी और छोटा भाई मेरी शादी के लिए लड़कियों की तस्वीरें देखते, किसी को पसंद करते, किसी को छांटते. उनके उत्साह को ठंडा करने के लिए मैंने साफ़ कह दिया, ''मैं अभी शादी नहीं करने जा रहा हूं.''

वापस विक्रमगंज लौटने से पहले मैं अपनी प्रिय जगह, 'साइंस म्यूजियम' गया था. कई बार देखे, परखे यंत्रों को मैं फिर-फिर देखता रहा, उनसे बतियाता रहा. वहां से मैं बिड़ला मंदिर भी गया था. बिड़ला मंदिर की उस ऊंचाई से नीचे की झील में छलांग लगा देने की इच्छा मुझे हुई थी!...जीवन की निरर्थकता का यह बोध घर लौटते वक्त चारमीनार के ऊपर उड़ने वाले परिंदों को देखकर और बढ़ गया था.

विक्रमगंज में चाचा जी ने एक छोटा-सा फ्लैट मेरे लिए किराए पर ले रखा था. मात्रा बारह सौ रुपए में वह बहुत बढ़िया फ्लैट था. हैदराबाद में इतना सस्ता फ्लैट तो नहीं ही मिलता है. कुछ दिन होटल में खाकर काम चलाने और कुछ ही दिन में एक नौकर की व्यवस्था कर देने का आश्वासन देकर चाचा जी गांव लौट गए थे. 'मिथिला होटल का खाना फर्स्ट क्लास होता है' चाचा जी की इस उक्ति को होटल में खाते हुए चावल में प्राप्त कंकड़ के साथ-साथ महसूस किया जाता था. चावल के मोटे-मोटे दाने भी किसी कंकड़ से कम नहीं लगते थे. डोसा खाने को मन ललकता तो मित्रों के बताए शहर के सबसे अच्छे रेस्तरां में चला जाता और पाता कि उसका डोसा हैदराबाद के फुटपाथी डोसे से भी खराब है!

कॉलेज खुल चुका था. पहले दिन कॉलेज पहुंचा, हेड से मिला. उन्होंने मेरा परिचय अन्य विभागीय सदस्यों से करवाया. हेड अपने कमरे में चले गए, मैं विभागीय सदस्यों के साथ स्टॉफ रूम में बैठ गया. प्यास लगी थी. चपरासी मेरे बगल वाले सज्जन को पानी पिला रहा था. सज्जन बोल पड़े, ''अरे! कृष्ण जी, गर्मी में गर्म पानी? घड़ा क्या हुआ?''

''घड़ा फूट गया है सर!''
''तो दूसरा नहीं मंगवाया?''

''प्रिंसिपल साहब को कितना बार कहे सर! बड़ा बाबू को भी कहे, मगर ध्यान ही नहीं देते. आज कह रहे थे, 'अपने पैसा से ले आओ, बिल दे दो!' अब आप तो जानबे करते हैं ई कौलेज? अपना पैसा हम गरीब आदमी फंसा दें और बिल पास करवाने के लिए नाक रगड़ते रहें? ई कैसे होगा सर?'' कृष्ण जी धारा प्रवाह बोल गए थे. मुझे अपनी यूनिवर्सिटी के हर कोने में मौजूद वाटर कूलर की याद आ गई. क्यों याद आती है, मुझे हैदराबाद की बातें? मैं भूल क्यों नहीं जाता?...मैंने कृष्ण जी से पानी देने का आग्रह किया. कृष्ण जी ने अभी-अभी पिए गए गिलास में दो-चार बूंद पानी देकर उसे साफ़ किया, पानी भरकर मुझे पकड़ाया. मैंने देखा, गिलास पर जहां अभी-अभी एक वरीय सदस्य ने अपने निचले ओठ रखे थे, वहां पान की पीक के कुछ अंश मौजूद थे. मेरा मन उबकाई से भर आया. मैं बाहर निकल गया. गिलास का पानी फेंक दिया, गिलास वापस कृष्ण जी को देकर प्यासा बैठ गया.

''आज क्लास नहीं होगा सर?'' मैंने पास बैठे एक सज्जन से पूछ लिया. ''होगा! लेकिन आज कम लड़के आएंगे. आज कॉलेज खुला ही है न? दो-चार दिन में लड़के आने लगेंगे. आज आपको किसी क्लास में परिचय करवा देंगे, फिर रूटीन में आपके नाम बंटवारा भी कर देंगे.'' उन्होंने कहा था और उधर हो रही बातचीत में शामिल हो गए थे, ''क्या? क्या कहा? फिर से कहिए न?''

''अरे! भाई, कैमिस्ट्री डिपार्टमेंट वाली बात बता रहा था. पांडे जी नहीं बोले थे?''
''क्या? क्या बोले थे?''

''अरे! नई महिला नहीं आई हैं उनके डिपार्टमेंट में? आते ही मैटरनिटी लीव पर चली गईं. हेड साहब परेशान! तो पांडे जी बोले कि 'सर! अच्छा है ऊ अभी मैटरनिटी लीव पर चली गईं. कुछ दिन रह जातीं तो बदनाम आप ही होते न?''

सभी 'विद्वान' प्राध्यापकगण 'ठी-ठी' करके हंस पड़े थे. यानी यहां भी वही सब? यानी एन बी कॉलेज और बीएन कॉलेज में केवल क्रम का ही अंतर था? एनबी_बीएन! दोनों में और कोई अंतर नहीं है? धीरे-धीरे मुझे पता चल गया कि यह अंतर केवल क्रम का था_एनबी_बीएन! और दोनों में एक चीज़ तो कॉमन ही थी_'नारायण!'... ओह! यहां भी नारायण! नर नदारत!! बिल्डिंग ज़रूर ऊंची और बड़ी थी लेकिन कोई बता नहीं सकता कि कब से 'व्हाईट वाशिंग' नहीं हुई है? दरकी हुई दीवारों में पीपल के पेड़ उगे हुए भी देखे जा सकते थे. वर्षा होने पर कमरे के अंदर पानी का प्रवाह भी देखा जा सकता था और हां, पढ़ाते हुए कभी आप उन बंदरों को देखने का लुत्फ भी उठा सकते थे जो कमरे के दोनों ओर की खिड़कियों को जीटी रोड की तरह इस्तेमाल करने में ज़रा भी भयभीत नहीं होते थे. खुले-खुले वेन्टीलेटर पर कबूतर की गुटर-गूं और नीचे डेस्क पर उनके गू...! लेबोरेटरी यहां इंटर के लायक ठीक थी. बीएससी के विद्यार्थियों को दिक्कत होती ही थी. सालों से कोई ख़रीद नहीं हुई है. पैसे जो ग्रांट के आते हैं, अथॉरिटी खा जाती है!

एक दिन अपनी यूनिवर्सिटी की चमकती दीवारों को याद कर मेरे मुंह से निकल गया, ''यहां सब बेईमान ही हैं क्या?''
''क्यों? हैदराबाद में सभी ईमानदार ही हैं?'' पास बैठे गिरधारी बाबू बोल पड़े थे.

''नहीं, सर! बेईमान वहां भी हैं. लेकिन वहां काम भी होता है, यहां सिर्फ चोरी...वहां भी कॉलेज फंड से पैसे उड़ाए जाते हैं लेकिन इतना काम हो जाता है कि लोगों को कहने का मौका नहीं मिलता. यहां देखिए, व्हाईट वाशिंग कब से नहीं हुई है? घड़े की ख़रीद में वक्त क्यों लगता है? उपकरण क्यों नहीं ख़रीदे जाते?...अब यहां की सड़कों को देखिए और साउथ की सड़कों को देखिए? ऐसा नहीं कि वहां स्वयं धर्मावतार सड़क बनवाते हैं! वहां भी सड़क बनवाने के पैसे खाए जाते हैं लेकिन सड़क पर भी पैसे लगाए जाते हैं. यहां...!'' मैं चुप हो गया था. गिरधारी बाबू जवाब नहीं दे पाए थे, 'सो तो है ही' कहकर रह गए थे.

लड़के यहां अपेक्षाकृत अच्छे थे. संख्या भी पूरी थी. पहले-पहल सौ-सवा सौ लड़कों को एक साथ देखकर मैं घबड़ा गया था. कहां एनबी कॉलेज का वह इकलौता भक्ति भाव से नीचे बैठा शिष्य, कहां सौ शिष्य. आपस में बातचीत करते हुए. हाजिर लेने में पसीना निकलने लगा. पंद्रह मिनट लग गए. एक सेक्शन में डेढ़ सौ से ज्यादा लड़के रखे गए हैं, यह भी एक बड़ा मज़ाक़ है!

क्लास पर अधिकार जमाने के उद्देश्य से मैंने विद्यार्थियों की ओर देखना शुरू किया. आगे के बच्चे शांत होने लगे थे. पीछे घुसुर-पुसुर जारी थी. वैसे ही एक विद्यार्थी को खड़ा कर मैंने पूछा, ''बताओ जी! प्रकाश की गति क्या है?'' वह चुप. कमरे में चुप्पी. 'न जाने किसको खड़ा कर देंगे?'' इस भय से. आगे के एक-दो लड़कों ने हाथ ऊपर किया और जवाब भी सही दिया. मैं विषय पर आ गया. जब भी किसी नए क्लास में जाता, यही फार्मूला अपनाता. क्लास विनीत बन जाता. दो-तीन क्लास लेने के बाद तो प्रत्येक कक्षा के कुछ-कुछ लड़के झुंड बनाकर मेरे पीछे पड़ जाते. मेरा नाम पूछते, रहने का स्थान पूछते. टयूशन पढ़ने की इच्छा ज़ाहिर करते. मैं उन्हें अपना नाम और रहने का स्थान तो बता देता, टयूशन पढ़ाने से साफ़ मना कर देता. 'कभी कोई दिक्कत हो, क्लास में समझ नहीं पाओ तो बाहर भी पूछ सकते हो,' ऐसा आश्वासन देता. कुछ लड़के तो मुग्ध भाव से यह भी कह उठते, ''अपना शिष्य बना लीजिए सर!'' मैं कहता, ''अरे! यार, अभी शिष्य बनाने की मेरी उम्र नहीं हुई है! हां, बड़ा भाई समझकर पास आओ तो खुशी होगी.''

कुछ लड़कियां भी समय निकाल कर मुझसे मिलने आतीं. एक तो ऐसी थी जिसने मुझे भी डिस्टर्ब कर दिया था. बीएससी पार्ट थर्ड की वह लड़की...! उस पर नजर पड़ते ही मैं क्लास में हकलाने लगता. उसकी हँसती हुई नाक पीछा करती. हँसती हुई नाक मैंने जीवन में पहली बार देखी थी.

इंटर की उस कन्या पर मुझे दया ही आई थी! मैंने अपना 'गुरुत्व' सम्हाल लिया था और प्रैक्टिकल की कॉपी जांचते हुए उसकी जांघों के दबाव से अपने पैर को मुक्त करवा लिया था! लेकिन यह हँसती हुई नाक...! क्या इससे गुरु-शिष्य संबंध के अतिरिक्त भी कोई संबंध स्थापित किया जा सकता है? यहां तो इस तरह की परंपरा भी रही है! किसी ने एक कहानी सुनाई थी. कोई सज्जन इसी विभाग में थे. पचास साल तक अपना कौमार्य बचाए रहे. फिर पता नहीं कैसे बाईस वर्षीय कन्या पर मुग्ध हो गए और पिता की जगह पति बन गए?...यहां से ट्रांसफर करवाकर अन्यत्र चले गए. क्या वह कहानी फिर से दोहराई नहीं जा सकती? यहां तो उम्र का अंतर भी कम ही होगा, वर 26 का वधू 20 की! इतना तो चलता ही है?...क्या मैं ऐसा सोचकर भ्रष्ट हो गया? क्या मैंने गुरु की गरिमा घटाई?...इस उम्र में ही गुरु बनने का अभिशाप उठाए मैं आखिर कर भी क्या सकता था?

महीना बीतते-बीतते मेरा परिचय बहुत लोगों से हो गया था. ज्यादातर नए लेक्चरर्स के साथ ही उठना-बैठना होता. क्लास में पढ़ाना भी अच्छा ही लगता, लेकिन अपनी पढ़ाई के छूटने का दुख बराबर बना रहा. एक दिन सोचा, अब पढ़ाई शुरू करनी चाहिए. चलें यहां के पुस्तकालय का 'अवलोकन' करें? बांग्ला विभाग के चटर्जी साहब के साथ मैं पुस्तकालय पहुंच गया. पुस्तकालयाध्यक्ष से परिचय हुआ. अपने विषय से संबंधित पुस्तकों का रजिस्टर देखा. रजिस्टर इसलिए कि यहां 'कैटलॉग' की सुविधा नहीं थी. कुछ किताबें काम की थीं, मैंने उन्हें निकलवा देने का आग्रह किया. लग रहा था, मैं पागल हो जाऊंगा सुनकर! चटर्जी साहब बता रहे थे, ''रिटायर्ड करने पर भी ये किताब नहीं लौटाते! इनके बेटे-बेटी, नाती-पोती सहित कई पीढ़ी के लोग उससे पढ़ते हैं. रिटायर्ड करते समय किताब का दो गुना क़ीमत जमा कर फ्री हो जाते हैं...अब देखिए, तीस साल पहले जिस किताब का दाम पंद्रह रुपया था, उसके बदले तीस रुपया जमा करना क्या मुश्किल है? जबकि आज के हिसाब से उसका दाम तीन सौ रुपया होता है!''

''भ्रष्ट हैं सब, भ्रष्ट!'' मैं बोल पड़ा था. ''इनको यह चिंता नहीं कि विद्यार्थियों को कितनी दिक्क़तें होती हैं?...तभी तो मैं जब लड़कों को लाइब्रेरी जाने को कहता हूं तो वे किताबें न मिलने का रोना रोते हैं?''

हमें चाय पीने की इच्छा होती है लेकिन कॉलेज में कैंटीन नाम की कोई चीज़ नहीं है. 'कल्चर ही नहीं है कैंटीन का!' मैं कहता हूं. 'चलिए न बाहर चलकर पी लेंगे.' चटर्जी साहब कहते हैं. हम चल पड़ते हैं. कॉलेज गेट से बाहर निकल कर जब चौक पर जाते हैं तो पाते हैं कि वहां लड़कों की भीड़ है. एक लड़का रह-रहकर घंटी बजा रहा है. एक बंदर मरा पड़ा है. एक लड़का उसकी पूंछ पकड़कर उसे उठाए हुए है. बगल में एक लाल रंग का कपड़ा बिछा है, जिस पर कुछ सिक्के कुछ नोट पड़े हैं. कुछ लड़के हर आने-जाने वाले वाहनों को रोककर पैसे देने का 'आग्रह' कर रहे हैं. उत्सुकतावश हमने एक लड़के से माजरा समझना चाहा तो उसने बताया, ''एक हनुमान जी मर गए हैं सर! लड़के चंदा जमा कर रहे हैं, यहां मंदिर बनेगा''... ''चलिए चटर्जी साहब! इन पागलों की भीड़ में हम कुछ नहीं कर पाएंगे. हमारा पढ़ाना बेकार जा रहा है. अब तक ये हनुमान और हनुमानजी का अंतर नहीं समझ सके हैं!!''
चाय की दुकान पर हम बैठे ही थे कि श्रीकांत जी गुज़रते मिल गए. हमने उनसे भी चाय पीने का आग्रह किया. आग्रह स्वीकार कर उन्होंने एक गरमागरम ख़बर हमें देना जरूरी समझा. ''जानते हैं? एक कांड हो गया है!''

''क्या?'' हमें उत्सुकता हुई.

''अरे! हॉस्टल नंबर तीन के वार्डन नहीं हैं, उपाध्याय जी? उनकी मिसेज अपने क्वार्टर के आंगन में नहा रही थी. एक लड़का छत पर था, देख रहा था, देखता रहा. थोड़ी देर में मिसेज की नजर जब ऊपर गई तो वह भागी भीतर! और बताया उपाध्याय जी को. उपाध्याय जी फायर! तुरत नोटिस निकाल दिया उसको हॉस्टल खाली करने के लिए.''

''अरे! ये क्या हो गया?'' मैं कहता हूं तो श्रीकांत जी कहते हैं, ''अभी क़िस्सा बाक़ी है! लड़के को प्रोक्टर के पास भेजा गया. लड़के ने क्या जवाब दिया, जानते हैं?...बोला, 'सर! हम इतना देर तक देखते रहे तऽ ऊ दिखाती काहे रही?''

हमारे दुखी होने की बारी थी. श्रीकांतजी लेकिन खुश थे. उपाध्याय जी से उनकी नहीं बनती है इसलिए. 'कैसे लड़के हैं यहां भाई?' मन घृणा से भर गया. 'ऐसे लड़कों को तो सचमुच निकाल देना चाहिए. अनुशासनहीनता की अच्छी मिसाल है यह!'...मुझे एक घटना याद आई और मैंने उन लोगों को सुनाया भी, ''एक दिन मैं क्लास के लिए जा रहा था. लेट हो रहा था इसलिए तेजी से चल रहा था. मैंने कहीं से आवाज़ सुनी, ''भौजी!''...आवाज़ बड़ी तेज़ थी. पीछे मुड़कर मैंने देखा तो कुछ लड़कियां मेरे पीछे-पीछे आ रही थीं. लड़कों ने उन्हें ही 'भौजी' कहा था. मैंने आवाज़ की दिशा में देखा तो ऊपर के कमरों में खिड़कियों पर लड़के खड़े थे, हंस रहे थे. मेरे उधर देखने पर सब पीछे हट गए थे.

इसी तरह खेल के मैदान की बात है. कई साल बाद एथलेटिक्स का आयोजन कॉलेज में हुआ था. लड़कियां भी हिस्सा ले रही थीं. 'डिस्कस थ्रो' हो रहा था. एक शादी-शुदा स्थूल सी लड़की डिस्कस फेंक रही थी. वह साड़ी में थी. जब वह डिस्कस फेंकती, भीड़ से आवाज़ आती, 'चाची!'...मैं गुस्से से लाल हो गया था. वे लड़के भीड़ में कहीं छुप गए थे, नहीं तो...! अरे! भाई, हम लोग भी यूनिवर्सिटी में लड़कियां देखा करते थे, उनके बारे में बातें किया करते थे, लेकिन किसी के सामने ऐसा कमेंट नहीं किया करते थे!''

''इतनी छोटी जगह में 'को-एड' होना ही नहीं चाहिए. जहां बचपन से ही लड़के- लड़कियों का अंतर मन में बैठाया जाता हो, वहां एकाएक बंधन तोड़ देना घातक होता है.'' श्रीकांत जी ने मेरी बात को बढ़ाते हुए कहा था, फिर उन्होंने एक घटना का जिक्र किया कि एक बार एक लड़का, एक लड़की एक कमरे में रोमांटिक मूड में बातें कर रहे थे. घूमते-घामते प्रिंसिपल वहां पहुंच गए. दोनों के गार्जियंस को बुलवा लिया गया. दोनों प्रेमियों ने कहा कि 'हम पढ़ाई की बात कर रहे थे!'...

''देखिए, 'को-एड' होने पर लड़के- लड़कियां आपस में बातचीत तो करेंगे ही? कुछ प्रेम-प्रसंग भी होंगे, इनको रोका नहीं जा सकता. हां, बदतमीजी न हो, इस बात का ख़याल ज़रूर रखा जाना चाहिए.'' मैंने कहा था.

मेरे जीवन से डेढ़ साल निकल चुके थे. इस बीच दो बार हैदराबाद भी हो आया था. रिसर्च का काम थोड़ा हो गया था. इस कॉलेज में शुरू-शुरू में पढ़ाने का जो उत्साह बना था वह भी धीमा होता जा रहा था. पढ़ाना अब बोरिंग लगने लगा था. क्लास कम से कम हो यही इच्छा बनी रहती थी. इसमें दो लंबी छुट्टियों के अतिरिक्त कभी शिक्षकों की हड़ताल, कभी शिक्षकेतर कर्मचारियों की, कभी छात्रों की तोड़-फोड़ मदद पहुंचाती थी. बची-खुची कसर परीक्षाएं निकाल लेती थीं. बिहार के किसी भी विश्वविद्यालय का अपना कोई कैलेंडर नहीं है इसलिए यहां साल भर परीक्षाएं होती रहती हैं, कभी पार्ट वन, कभी पार्ट टू, कभी पार्ट थ्री तो कभी इंटर. बचे समय में कॉलेज की वार्षिक परीक्षाएं, टेस्ट परीक्षाएं! और इनमें डयूटी करने की अनिवार्यता. इस नौकरी का सबसे घटिया पक्ष. तीन घंटे की भयानक परेड. कॉपी बांटना, पर्चे बांटना, सबकी एटैंडेंस लेना फिर चौकीदारी_ इधर-उधर तो नहीं कर रहा? इस कॉलेज की परंपरा रही है नक़ल नहीं करने देने की. लेकिन फिर भी नक़ल हो ही जाती है. चिट निकाला, पकड़े जाने पर धमकी, ''मैं फलां का आदमी हूं.''...मैंने तो कह दिया था, ''तुम किसी के भी आदमी हो, अभी तुम्हें एक्सपेल्ड करूंगा.'' बीच में सहयोगी शिक्षक बचाव करने लगे थे, शायद डर गए थे, ''दे दीजिए कॉपी!''...''ऐ! लड़का तुम आगे बैठकर लिखो!'' वही सहयोगी मुझे थोड़ा-बहुत आंख मूंद लेने की सीख दे रहे थे, ''अरे! भाई, नौकरी करनी है न? क्यों टेंशन मोल लें? और आप यहां रोककर भी क्या कीजिएगा? जहां कॉपी जाएगी, वहां पहुंच जाएंगे, नंबर बढ़वा लेंगे! वहां भी नहीं तो सीधे यूनिवर्सिटी से मनचाहा नंबर पा लेंगे!''

''लेकिन कैसे छोड़ दें इस तरह सर?'' मैं उनसे पूछता हूं.

''अरे! भाई, आप नहीं छोड़िएगा तो प्रिंसिपल छोड़ देंगे! एक बार मेरे साथ यही हुआ था.''
''हे भगवान! मैं कहां फंस गया हूं?...मैं क्या-क्या छोड़ूं? टयूशन पढ़ाना, नोट्स बेचना मुझे अपने पेशे के प्रति बेवफाई लगी, छोड़ दिया. कॉपी जांचना भी इसीलिए रिफ्यूज कर चुका हूं कि बेईमानी करने से बच जाऊं. एक बार गलती से कापियां आ गईं. उनसे पहले आ गए थे सिफारिशी लोग. चपरासी से लेकर वीसी तक के लोग. कुछ लोकल अधिकारीगण. कुछ पुराने कॉलेज के सहयोगी. कुछ चाचा जी का खत लेकर! तंग आकर मैंने कापियां यूनिवर्सिटी को वापस कर दीं. अब यह जो अनिवार्य डयूटी मिली है, निगरानी की, उसे भी ठीक से नहीं निभाऊं?

''ऐ! लड़का! बात क्यों कर रहे हो?'' दो लड़कों को मैंने देख लिया था. दोनों की कापियां मैंने ले लीं. एक लड़का अकड़ने लगा, ''हम बात नहीं कर रहे थे सर!''

''तुम बात कर रहे थे, मैंने तुम्हें देखा है.''
''अब नहीं होगा सर!'' दूसरा समर्पण कर चुका था. दूसरे को मैंने कॉपी दे दी. पहला स्वीकार ही नहीं कर रहा था अपनी गलती. मैंने कहा, ''देखो, अगर गलती नहीं मानोगे तो परीक्षा से बाहर कर दूंगा.'' वह भी समर्पण कर बैठा. मैंने उसे भी कॉपी दे दी. लेकिन पीछे एक लड़का चिट से लिख रहा था. उसे 'एक्सपेल्ड' करने के अलावा चारा नहीं था. मैं उसे परीक्षा-नियंत्रक के हवाले कर आया.

अगले दिन डयूटी में तैनात सिपाही मुझसे कह रहे थे, ''सर! आप ही किए थे एक्सपेल्ड? लड़का लोग पूछ रहा था. लुच्चा-लफंगा होता है सर! बेकार...''

''अरे! भाई, आप लोग भी ऐसी बात करते हैं?'' मैंने कहा था, ''पुर्जा लेकर कोई नकल कर रहा हो तो उसे छोड़ देंगे?...वैसे लड़के करेंगे क्या? जान ही से न मार देंगे? मार दें, लेकिन नकल करते देखा नहीं जाएगा मुझसे.''

पता नहीं क्यों? इस बार का 'एक्सपल्शन' कॉलेज में गूंज रहा था. जो मिलता, वही पूछता, ''आप ही किए थे एक्सपेल्ड?''...इससे पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ था? कई लोग कर चुके थे एक्सपेल्ड?

दो-तीन दिन बाद की बात है. मैं अपने आवास से निकल कर बाज़ार जा रहा था. रिक्शा नहीं मिला था, पैदल ही. बीच में सुनसान-सा स्थान पड़ता था. वहां कुछ लड़के खड़े थे, मेरा रास्ता रोके. एक दादा क़िस्म का लड़का मुझसे सवाल कर रहा था, ''कॉपी छीनते हो?''

''हां! कोई नकल करेगा तो छीनेंगे ही!' मैं बोल गया था.
''भेजा गोली से उड़ा देंगे.''
''ठीक!''

''माधर...!'' उसने आधी गाली भी दी. मेरा दिमाग काम करना बंद कर चुका था. वह हाथ उठाने लगा था शायद! तब तक बाक़ी लड़के बीच-बचाव करने लगे थे, उस 'दादा' को पकड़कर ले जाने लगे थे. मैं मर चुका था. ज़िंदगी में अपमान का एक लफ्ज़ भी सुनने को नहीं मिला था, आज...!

मैं घर लौट आया. रोने लगा. रोता रहा. खाना भी नहीं खाया गया. रात किसी तरह बीती. सुबह वर्मा जी को फ़ोन करके बुलवाया. वे समझाने लगे, ''यहां कुछ भी संभव है. मैं तो यहां स्टूडेंट लाईफ से ही रह रहा हूं. ऐसे ही एक केस में किसी ने घुसा दिया था, पीछे से डंडा...! नृशंस! नृंशस हैं लोग भाई! बच के रहने में ही फ़ायदा है.''

''अभी कुछ दिन पहले अख़बार में नहीं पढ़ा था?'' वर्मा जी बोल रहे थे, ''मननपुर के कॉलेज का हाल?...कॉलेज में घुसकर एक शिक्षक से गाली-गलौज की, एक को पीटा! अरे! यहां तो कॉलेज में घुसकर आपको कोई गोली मारने आए, तो भी कोई बचाने वाला नहीं है. इसलिए...''

''मैं यह नौकरी छोड़ रहा हूं वर्मा जी! मैं एलान कर देता हूं, 'मेरा अपमान हुआ है'.''

''देखिए! नौकरी छोड़नी हो तो छोड़ दीजिए? वैसे भी आपको यहां मन नहीं ही लग रहा है. आप छोड़ सकते हैं, जा सकते हैं हैदराबाद! लेकिन यहां कितने लोग नौकरी छोड़ने की स्थिति में हैं?...हां, जहां तक अपमान की बात है, तो अपमान आपका नहीं हुआ है. आप चोरी, बेईमानी नहीं कर रहे थे. आप तो अच्छे काम की वजह से प्रताड़ित हुए हैं. आपकी बेइज्ज़ती का सवाल ही कहां है?' मित्र होने के नाते वर्मा जी ने मरहम लगाना चाहा था. लेकिन उस हादसे को मैं भूलने की स्थिति में नहीं था. मुझे याद आ रही थी हाल ही में प्रधानमंत्री जी के मुख से सुनी गीता की उक्ति, 'न दैन्यं न पलायनं!' यह प्रधानमंत्री जी का मोटो है, आदर्श वाक्य! ऐसी उक्तियां प्रधानमंत्रियों पर ही चरितार्थ हो सकती हैं, या फिर कृष्ण पर, अर्जुन पर! हमारे जैसे साधारण मनुष्यों के हिस्से तो दैन्य ही आता है, पलायन ही आता है.

मैं पलायन कर रहा हूं. अगर दुनिया में रहने लायक कोई जगह नहीं बची हो तो मैं अपेक्षाकृत कम खराब जगह का चुनाव करूंगा. वहां जाकर अपना रिसर्च पूरा करूंगा. फिर आगे के रिसर्च के लिए बाहर चला जाऊंगा. मैं वैज्ञानिक का जीवन जीना चाहता हूं, लेक्चरर का नहीं! इस पेशे से मुझे नफरत हो गई है. जिन विद्यार्थियों को मैं जी-जान से चाहता था, उनके नाम से नफ़रत हो गई है.

मैं धरती के इस सबसे बड़े नरक से मुक्ति चाहता हूं.
मैं स्टेशन जा रहा था. अकेला. वाया कलकत्ता हैदराबाद का टिकट बुक करवाने.
**-**

रचनाकार - संजीव ठाकुर के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ, समीक्षाएँ, भेंटवार्ताएँ, बाल-कहानियाँ तथा एक कहानी-संग्रह, 'नौटंकी जा रही है.' प्रकाशित हैं. कुछ पुस्तकों के सहयोगी लेखक, तथा कुछ पुस्तकों का संपादन भी आपने किया है.


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चित्र – रेखा श्रीवास्तव की कलाकृति, कैनवस पर तैलरंग – 36x48 इंच

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 6
  1. बेनामी3:38 pm

    मेरा संजीव ठाकुर से एक प्रश्न है, क्या बिहार मे वाकई हालात इतने खराब है ?
    यदि ये सच है तो बिहार का भगवान ही मालिक है।

    जवाब देंहटाएं
  2. बेनामी3:51 pm

    संभवतः

    पर इंडिया टुडे के एक लेख को मानें तो यह भी सच है कि भारत के सर्वाधिक आइएएस अफ़सर भी वहीं से चयनित होते हैं.

    जवाब देंहटाएं
  3. बेनामी4:42 pm

    बहुत सुन्दर।
    कहानी पढते पढते कब बिहार मे चले गये, पता ही नही चला। स्थानीय बोली का अच्छा परयोग किए है संजीव बाबू।

    इ कहानी तो बहुतइ ही मजेदार है, पप्पू भैया को जरुर पढाएंगे।

    जवाब देंहटाएं
  4. बेनामी1:26 am

    कहानी कम, आत्मकथा ज्यादा लगी। केवल बिहार या झारखंड ही क्यों, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल, छत्तीसगढ, राजस्थान, विदर्भ या हरियाणा के ज्यादातर विद्यालयों या विश्वविद्यालयों की यही कहानी है। बिहार निश्चित रूप से सबसे पीछे है, तभी तो हजारों हजार बिहारी बिहार छोडकर बाहर हैं। रवि जी, केवल आई ए एस ही क्यों हर जगह आपको काम करने वालों में बिहारी ही मिलेंगे, मजदूर हों या अफसर।

    जवाब देंहटाएं
  5. बेनामी7:53 am

    इतनी लंबई कहानी बिना रुके शायद पहली बार पढी होगी..वाकई, बहुत जीवंत शैली है, बधाई हो.रवि भाई, ऎसी करामत करते रहें...

    जवाब देंहटाएं
  6. बेनामी1:35 pm

    बहुते बढ़िया मालिक !

    जवाब देंहटाएं
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रचनाकार: संजीव ठाकुर की कहानी: नारायण! नारायण!!
संजीव ठाकुर की कहानी: नारायण! नारायण!!
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