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कहानी : चिड़िया की उड़ान


- महेश दर्पण

रिनी जब नियत समय पर ऑफ़िस न पहुंची तो पांच मिनट बाद से ही जी हुजूरियों ने मैडम तक किसी न किसी बहाने यह ख़बर पहुंचाने में कोई कसर न छोड़ी. मटकू अपने अंदाज़ में मैडम के पास जा पहुंचा था, ''मैडम, आज बाज़ार लेट हो जाएगा.''

''क्यों?''

''सेम प्रॉब्लम...अभी तक पहुंची नहीं.''

''जैसे ही आए, मुझे बताओ...इस लड़की को आज ठीक करना ही पड़ेगा. और देखो, आज बाज़ार तुम कर दो...पेपर का काम नहीं रुकना चाहिए.''

जीनियस कनखियों से खीझते हुए लौटते मटकू को देख तो रहा ही था. उसने जैसे खुद से कहा, 'और करो चमचागीरी!''

मटकू अपनी सीट पर आकर बड़बड़ा रहा था, ''उंहऽऽ पेपर का काम रुकना नहीं चाहिए...''

रश आवर निकल जाने के बाद चीफ कमरे में मैडम से बतिया रहे थे, ''इस लड़की को समझा दीजिएगा, ऑफ़िस का डिसिप्लिन तोड़ना मुझे पसंद नहीं. आज कोई फ़ोन किया इसने?''

''जी नहीं.''

''मोबाइल पर फ़ोन लगाइए ज़रा, देखिए तो आज न आने का कौन-सा बहाना मारती है.''

चीफ़ के कमरे से बाहर आते ही जीनियस ने चुटकी ली, ''सर, रात को पार्टी में ज्यादा हो गई होगी न!''

मैडम ने जीनियस की तरफ नज़रें घुमाईं और मुस्करा दीं. अचानक जाने उन्हें क्या सूझी, जैसे जीनियस की फब्ती का जवाब देना हो, '', तुम ये तीन पीस आधे घंटे में बनाकर मुझे दो. बाद में अपना रेल का रैकेट करते रहना.''

टीम अपने में डूबी, कहीं गहरे में, काम की लय पकड़ चुकी थी. झुके हुए सर और की-बोर्ड पर जंप करती उंगलियां बता रही थीं कि जल्द से जल्द बहुत कुछ कर डालना चाहते हैं समय संदेश के ये कारिंदे. ठीक इसी वक्त रिनी से काफ़ी पहले, उसके आने की ख़बर आ पहुंची थी.

न्यूज़ डेस्क के पास खड़े दिल्ली एनसाइक्लोपीडिया ने शरारती आंखें नचाते हुए कहा, ''लो भई, हो ही गई.''

''क्या हो गई सर...?'' जवाब में समवेत स्वर.

''सगाई. मिठाई का डिब्बा लेकर आ रही है.''

''हूंऽऽऽ'' मैडम ने सिर कुर्सी की पीठ से शीर्ष पर टिका दिया.

''बहुत ख़ूब...हमें तो पहले ही से पता था मैडम.'' जीनियस ख़ामोश कैसे रह सकता था.. ख़ामोश ज्वालामुखी ने एक जोरदार सांस ली और क़रीब-क़रीब सांप की तरह फुंफकार-सी लगाते हुए दोनों हाथ इस तरह ऊपर उठा लिए जैसे कहना चाहते हों, ये तो होना ही था..मटकू खुश था, ''मैडम, मिठाई खाओ खुशी मनाओ. अब सब ठीक हो जाएगा.'' डिप्टी साहब, जो हमेशा की तरह अपनी रौ में डूबे, मेज़ पर फैलाए दो-तीन सौ विजिटिंग कार्ड्स में से तुरंत काम में आ सकने वाला कोई ख़ास खोज रहे थे, जैसे सोते-सोते चौंक पड़े हों, ''क्या हुआ भई, कुछ हमें भी तो बताओ!''

बस, यही वह क्षण था जब रिनी हाथ में मिठाई का डिब्बा लिए सामने आ खड़ी हुई.. उसने एहतियात से डिब्बा अपनी मेज़ पर रखा और फिर पूरे कमरे को ग़ौर से अपनी तरफ़ देखते हुए एक नज़र में देख लिया. वह जैसे पूरे शरीर से प्रफुल्लित थी. उसने अपनी दोनों हथेलियों के गद्दे आंखों पर रख लिए थे और खुद को इस बात के लिए तैयार कर रही थी कि खुशखबरी प्रसारित किस तरह से करे!

कमरा शायद उससे भी कहीं ज्यादा बेताब था. मटकू ने शुरुआत की, ''रिनी, मिठाई हमारे लिए है न!'

''हां सर!'' भर्राए हुए स्वर में उसके मुंह से निकला.

मैडम कुछ न करते हुए भी बहुत कुछ करने के अभिनय में लगी चौकन्ने कानों से यह संवाद सुनने के बाद खुद को तैयार कर ही रही थीं कि डिप्टी साहब नाकों मुस्कराते हुए बोले, ''तो रिनी, आख़िर हो ही गया काम है!''

''हां सर!'' रिनी ने सिर झुकाते हुए ख़ास अंदाज़ में कहा.

ख़ामोश ज्वालामुखी ने मौन तोड़ा, ''अरे भई बांटो भी अब, ये लाई काय के लिए हो?''

''चीफ़ अभी सीट पर नहीं है सर.''

जीनियस सिर झुकाए जैसे अपने की-बोर्ड को संबोधित कर रहा था, 'हां भाई, टेक्नीकल प्वाइंट है. चीफ़ का अप्सेंस में मिठाई कैसे बंटेगा.''

दरवाज़े पर खड़ा दिल्ली एनसाइक्लोपीडिया अपने साथ क्राइम की अंगुली पकड़े चीफ़ की खोज में निकल गया, ''रिनी, हम आते हैं अभी चीफ़ को लेकर...ये लोग चाहे जो कहते रहें, तुम न जुबान खोलना और न डिब्बा, ओ के?''

रिनी ने पूरा सिर हिलाकर कहा, ''यस सर!''

कमरा मैडम और रिनी के जुड़े सिरों के बीच से आती फुसफुसाहटों को सुनने की कोशिश कर ही रहा था कि चीफ़ सामने आ खड़े हुए, ''क्या रिनी, दफ्तर के काम की तरह तुमने लड़का खोजने में भी इतना टाइम लगा दिया? लाओ, निकालो, कहां है मिठाई?''

''नहीं सर, वो बात नईं है.'' रिनी खुला डिब्बा लिए चीफ़ के सामने खड़ी थी.

''फिर क्या बात है?''

''सर, पहले आप मिठाई खाइए!''

''हूंऽऽ अब बोलो!'' चीफ ने बरफी का पीस उठाते हुए पूछा.

''सर, मुझे ए चैनल में जॉब मिल गया!'

''लेटर दे दिया?''

''यस सर...'' रिनी की खुशी में सातों आसमान शामिल थे.

''लैटर तो ले लिया, अब ज़रा खुद भी लिटरेट हो जाओ! मीडिया के लिहाज से अभी तुम्हें बहुत कुछ सीखना बाक़ी है. प्राण खींच के रख देंगे 'ए चैनल' वाले. और ये मत समझना कि...'' चीफ जाने क्या कुछ कहे जा रहे थे और पूरे कमरे की दिलचस्पी उसे सुनने से भी कहीं ज्यादा इस बात में थी कि सुनते हुए दिखाई ज़रूर दे. इसी वक्त चीफ़ का मोबाइल बजने लगा और वह बतियाते हुए कमरे से बाहर निकल गए.

मिठाई का डिब्बा आगे बढ़ाती रिनी को शायद पहली बार अब इस बात की कोई फ़िक्र न रह गई थी कि वह इस काम में औरों की तरह ही वरिष्ठता क्रम का ख़याल रखे.

उसकी एक आंख में खुशी नज़र आ रही थी तो दूसरी में समय संदेश के लोगों से बिछुड़ने का दुख.

जैसे ही रिनी मिठाई का डिब्बा लेकर कमरे से बाहर निकली, मटकू ने अपनी चेयर का रुख मैडम की तरफ़ कर लिया, ''अब समझ आया मैडम, ये हर दूसरे दिन डॉक्टर के पास क्यों भागती रहती थी.''

हालांकि कमरे के चौकन्ने कान सब सुन रहे थे, लेकिन मैडम की कोशिश यही थी कि कोई सुन न ले. उन्होंने क़रीब-क़रीब फुसफुसाने वाले अंदाज़ में कहा, ''अरे, मैं तो कुछ और ही समझी थी.''

पीठ किए बैठा जीनियस, जो प्राय: एटिकेट्स का पूरा ख़याल रखता था, खुद को रोक न सका, ''वही तो हम भी सोचे थे मैम...''

मटकू को उसका बीच में टपक पड़ना अच्छा तो नहीं लगा, लेकिन उसने लगभग आक्रामक शैली में पूछा, ''क्या समझा था तू? बता ज़रा, क्या समझा था! अबे, तुझे पता भी है कि मैम कह क्या रही हैं!''

पूरी प्रतिष्ठा दांव पर लगी देख जीनियस को मन की बात कहनी ही पड़ गई, ''अरे, हम तो समझे थे न डॉक्टर-वाक्टर कुछ नहीं है. ई त जाती है अपना ब्वॉयफ्रेंड का पास.''

पानी सिर से ऊंचा उठता देख ख़ामोश ज्वालामुखी ने मुंह खोला, 'तुम लोग तो पहले ही शादी करके बैठ गए...और उसके बारे में सोचते हो कि इत्तो बड़े सहर में किसी को अपना भी न बनाए!''

डिप्टी, जो अब काम का कार्ड मिल जाने से काफ़ी संतुष्ट नज़र आ रहे थे, अपने शहर की लड़की के बारे में यह सब सुनने को शायद क़तई तैयार नहीं थे.

डिप्टी काफ़ी कुछ बोलते, लेकिन जीनियस और ख़ामोश ज्वालामुखी ने आंखों ही आंखों में एक-दूसरे को इशारा किया और समवेत राय ज़ाहिर की, ''लो जी, अब प्रवचन शुरू...''

तमाम, दूसरी जिम्मेदारियों के साथ ही डिप्टी को 'आस्था' कॉलम भी एडिट करना होता था. इस काम का उन पर ऐसा असर पड़ता जा रहा था कि वह जब चाहते ध्यान योग करने लगते. खुद में ऐसे डूब जाते कि उन्हें फिर दीन-दुखिया की कुछ ख़बर ही न रहती. उन्होंने डिपार्ट में रिनी को प्रवेश दिलाने में न सिर्फ़ काफ़ी मेहनत की थी, बल्कि मानने के लिए तैयार ही न थे कि रिनी ने औरों की तरह उनसे भी यह राज़ छिपाए रखा. वह इस प्रसंग पर अपनी सुविचारित टिप्पणी प्रस्तुत कर रहे थे: ''देखो भाई, साफ़ बात तो ये है कि जिसे ज्यादा पैसा और बेहतर जॉब मिलेगा, वह ज़रूर जाएगा. तुम लोगों को अगर पहले से बता देती तो सबके सब उसकी मदद करने के बजाय सारा जोश ठंडा करने में लग जाते. मैं तो कहता हूं...'' उनकी बात अभी पूरी भी न हो पाई थी कि रिनी खुला डिब्बा हाथ में लिए कमरे में आ पहुंची. ऐसे में डिप्टी के अधूरे वाक्य का सिरा कुछ इस तरह पूरा हुआ, ''लाओ रिनी, किसी को हुई हो या न हुई हो, हमें तो भई ख़ूब खुशी हुई तुम्हारे नए जॉब की. लाओ, ज़रा एक पीस और दो. काजू की बर्फी का एक पीस तो दांतों के बीच ही अटका रह जाता है.''

रंगीन और टेप संगीत से मिलते हुए रिनी जब बिजी विदाउट वर्क के पास पहुंची तो उनकी ठेपी अपने ही अंदाज़ में खुली, ''हमें तो ख़ैर पहले ही पता था कि ये लड़की यहां ज्यादा दिन टिकने वाली नईं है. दिखने और होने में बड़ा फ़र्क़ होता है पंडज्जी. आज के मीडिया में जुगाड़ फिट करने वाला चइए, आज यहां तो कल वहां. और फिर हमारे ज़माने की तरह अब जॉब छोड़कर कहीं जाना उत्ता ख़राब भी नहीं माना जाता. जो जित्ता कूदता-फिरता है, उत्ता तरक्की.'' वह एक तरह से यह भी कहना चाह रहे थे कि हमारी तरह एक ही जगह पड़े-पड़े सड़ने में कौन बड़ी समझदारी है. हम तो ख़ैर घर-परिवार से बंधे हैं, इस लड़की का अभी क्या है...शुरुआत में जित्ता भी रिस्क ले सको, ज़रूर लेना चाहिए.

शहर, कंपनी, फ़िल्म और मेडिकल से मिलते हुए रिनी अपनी ही सीट पर किसी बेगाने-सी आ बैठी थी. कभी वह अपने कंप्यूटर तो कभी आलमारी की तरफ़ देख रही थी..कमरा ख़ामोश था. उसे शायद अब सचमुच लगने लगा था कि लड़की तो गई.

एक व्यक्ति के रहने और न रहने के बीच का फ़र्क़ अब कमरे की चिंता का विषय खुद-ब-खुद बन गया था. सबसे निखट्टू मानी जाने वाली मिनी 'क्या-क्या नहीं कर पाती थी' के बजाय अब यह सोचा जा रहा था कि 'वह क्या कुछ संभाल लेती थी.' वह भी हँसते-खीझते, सीट दर सीट बदलते हुए.

सुबह जब वह आती, उसे रिपोर्टर्स के साथ बैठना होता चूंकि डेस्क की तमाम सीटें ऑकुपाइड होतीं. काम उसे डेस्क का करना होता, लेकिन एडजस्ट रिपोर्टर्स के साथ करना पड़ता. नई-नई आई इस लड़की को कभी फ़िल्म के कंप्यूटर पर काम करना पड़ता तो कभी रंगीन के. आउट डोर शूटिंग से फ्री होकर जिस दिन ये दोनों उसी के वक्त पर आ बिराजते वह अपना बैग, जैकिट और टिफिन उठाए नए ठिए की खोज में भटकती रहती. आख़िर में उसे पंचायत में रखा कंप्यूटर मिला था जहां बैठकर काम करना सबसे कड़ा इम्तेहान माना जाता था. इसके एक तरफ़ दो विभागीय सहयोगी बैठते थे और दूसरी तरफ़ दो पियन. और फिर समय मिलने पर उनके मुंह लगे लोग भी आ बैठते. काम हुआ तो ठीक, वरना दफ्तर की मुसलसल आलोचना इस जगह का स्थाई एजेंडा हुआ करता.

एकाध दिन तो चलो ठीक, लेकिन रोज़मर्रा की यही चाल रहे तो कोई कैसे काम कर सकता था वहां! जिस रोज़ रिनी ने कहा कि वह वहां बैठकर काम नहीं कर सकती, नया एरेंजमेंट तो ज़रूर कर दिया गया, लेकिन साथ ही यह भी बता दिया गया कि अख़बार के ऑफ़िस में किसी की कोई नियत जगह नहीं होती. हर तरह के लोगों के बीच उठना-बैठना पड़ता है, शोर-शराबे के बीच भी काम करना होता है.

नई व्यवस्था के तहत रिनी को सुबह तीन घंटे एक सीट पर काम करना होता, क्योंकि फेंग शुई अक्सर लेट आता था. तीन घंटे बाद वह उस सीट पर आ जाती जिसे शेयर बाज़ार खाली करता. वह वहां आ ज़रूर बैठती, लेकिन चार घंटे बाद जब उसी सीट पर स्पोर्ट्स आ खड़ा होता तो उसे फिर अपने लिए नई जगह तलाश करनी पड़ती. इस समय तक कंप्यूटर तो कई खाली हो जाते, लेकिन जगह बदल-बदलकर काम करने से उसकी लय टूट जाती. वह अपने काम में कंसनट्रेट न कर पाती और नतीजतन उसे कभी किसी की तो कभी किसी की झाड़ खानी पड़ जाती. दफ्तर में इस मामले में सभी एकमत थे कि न्यू एंट्री को जितना ज्यादा काम से लाद सको, लाद दो. ग़लत करे तो झाड़ने से भी मत चूको.

अक्सर ऐसा होता था कि वह बाज़ार कर रही होती और डिप्टी साहब उसे दो-तीन न्यूज एडिट करने के लिए और ट्रांसफर कर देते. उनकी नज़र में भले ही वह काम मामूली होता, लेकिन रिनी के लिए तो वह एक दबाव ही बन जाता. वह भी ऐसी हालत में जबकि घर से चलते वक्त न वह ठीक से नाश्ता कर पाती और न ही पूरा दूध पी पाती. कलाई में बंधी घड़ी की जल्दबाजी से चिढ़ती वह किसी तरह बस पकड़ लेती तो ट्रैफिक जाम उसे ऑफ़िस समय से न पहुंचने देता.

ऑफ़िस के क़ायदे के मुताबिक महीने में दो-तीन रोज़ तो पंद्रह मिनट लेट आया जा सकता था, लेकिन ट्रैफिक को तो आप यह क़ायदा नहीं समझा सकते न! तेज़ चलती-चलती ब्लू लाइन अचानक किसी स्टैंड पर ऐसी खड़ी होती कि फिर हिलने का नाम ही न लेती. ऐसे में अक्सर ऑफ़िस पहुंचने में उसे सवा दस-दस बीस हो ही जाता. वह पहले ही घबराई होती, उस पर उसके पहुंचते ही आक्रमण शैली में कई-कई तरफ़ से आदेशों की बौछार शुरू हो जाती.

_रिनी, यू आर ऑलरेडी लेट. जल्दी से एजेंसी न्यूज एडिट करो.

_सुनो, रिनी को बोलो दो लोकल भेजी हैं...

_अभी तक किया नहीं, ये फोनोफ्रेंड बाद में हां.

_बाज़ार कर दिया है खेल ने. एक नज़र देख लो. यस सर, यस मैडम करती सूखे गले में भी रिनी यह भूल ही जाती कि ऑफ़िस पहुंचकर दो घूंट पानी भी पी ले.

चलो, अब इस सबसे छुट्टी मिली. सोच रही है रिनी. तभी मैम उसे टोकती हैं, ''तुम्हें लेटर तो मिल गया है न!''

''यस मैम...पूरे 20 हजार की स्टार्टिंग

है.''

''गुड! काम करना ज़रा जी लगा के. प्रिंट और विजुअल का फ़र्क़ तो तुम समझती ही होगी...''

''यस मैम...''

संवाद के बीच में उछलकर आई रकम ने कमरे का ध्यान अपनी तरफ़ खींच लिया था. 20 हज़ार मीन्स थ्री टाइम्स. कमरा हैरान था. कमरा परेशान था. कमरा सकते में था. कमरा सुखी था, यह कह पाना मुश्किल है. एक कुर्सी दोनों हथेलियों के बीच ठुड्डी लगाए सोच रही थी कि मरगिल्ली-सी इस लड़की को देखो तो ज़रा! दूसरी बाहर से खुशी ज़ाहिर करते हुए भी भीतर से आहत थी. तीसरी चौथी और पांचवीं आपस में गिटपिट करते हुए क़रीब-क़रीब इस नतीजे पर जा पहुंची थीं कि अरे इंटरव्यू-विंटरव्यू क्या होना है...इसका काम तो किसी जानकार के थ्रू ही हुआ होगा. आजकल इसके बगैर कहीं कुछ नहीं होता.

जीनियस ने चुटकी ली, ''ए रिनी, अब तो तुम सीधे स्क्रीन पर नज़र आओगी!''

''कह नहीं सकती सर!'' वहां कई तरह के काम होते हैं.''

''मुझे पूरा यक़ीन है कि एक दिन ये लड़की घर-घर टीवी पर देखी जाएगी.'' मटकू ने राय ज़ाहिर की.

ख़ामोश ज्वालामुखी ने काफ़ी देर बाद समवेत संवाद में खुद को शामिल किया, ''क्यों, अब भी कोई सक है क्या? ये लड़की वह सब कर सकती है जिसकी तुम कल्पना भी नहीं कर सकते.''

माहौल गरमाता देख रिनी उठी और यह कहती हुई चल दी कि अभी कुछ फॉर्मेलिटीज इस दफ्तर की भी पूरी करनी हैं.

रिनी उठकर क्या गई, लगा सचमुच चली ही गई. दिल्ली एनसाइक्लोपीडिया ने नाक पर मुस्कराहट खींचते हुए कमरे में प्रवेश किया, ''हां भाई, मुझको तो बस इत्ता बता दो कि दिल्ली ड्रामा अब कौन एडिट करेगा? लड़की तो गई.''

''सर, आपका लिखा एडिट होता ही कब है! वह तो हेडिंग लगाकर रवाना कर दिया करती थी, बस.'' जीनियस ने स्मार्टनेस दिखाई.

''तो फिर ठीक है कल से दिल्ली ड्रामा तुम करोगे एडिट. ओ.के.!'' मैडम ने जीनियस को तुरंत प्रसाद थमा दिया. जीनियस के मुंह से मरा-सा स्वर निकला, ''जी मैम!''

''अपन तो भैया अब आराम से बैठेंगे. अब अपुन से कोई कुछ कहने वाला नहीं.'' मटकू ने बेफ़िक्र अंदाज़ में कहा ही था कि मैडम ने कुर्सी घुमाते हुए उसी की तरफ़ रुख कर लिया, ''लड़की के चले जाने का मतलब ये नहीं है कि तुम छुट्टे घूमते फिरोगे. आज लंच के बाद तुम फ्रंट की सेलिब्रिटी बनाओगे...और हां उसका नया फ़ोटो भी सर्च करना है तुम्हें, समझे.''

''मैं तो ऑलरेडी बहुत बिजी हूं मैम!'' जान बचाने की एक फिजूल कोशिश.

''कोई बात नहीं. सबका हाल तुम्हारे जैसा है. जवान आदमी हो, थके हुए बूढ़ों की तरह बात मत किया करो.'' कहते हुए मैडम ने विभाग के जिस शख्स को ख़ासतौर पर सुनाना था, उसे भी लगे हाथ निबटा दिया.

कमरे को अचानक अब रिनी का चले जाना खलने लगा. हर सीट के साथ रिनी की कोई न कोई जिम्मेदारी अलग से चस्पा कर दी गई थी.

''हां सर, अब ज़रा देखिए तो क्या काम रह गया ऐसा जो बारह के बाद रिनी करती थी?'' मैडम ने अचानक कंप्यूटर पर क्रिकेट खेलते डिप्टी साहब को चौंका दिया.

वह ध्यानावस्था में थे, ''अरे मैडम, आपने जो भी किया है, ठीक ही किया होगा. आपके होते हुए समय संदेश को चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं.''

''चिंता की बात नहीं कर रही हूं मैं, ज़रा ये बताइए कि वीकली भविष्य कौन करेगा और लोकल कैप ज़रा आप खुद देख लीजिएगा. ओके?''

''ऐसा करते हैं मैम, लैटर्स को ही भविष्य भी सौंप देते हैं. यूं भी वह आजकल हर अंगुली में अंगूठी पहने घूमता है. लोकल कैप तो वैसे भी मुझे ही देखने पड़ते थे...रिनी का हाल तो ये था कि मामला करोल बाग का होगा और वह उसे बना देगी आरके पुरम का. उसके किए काम को ग़ौर से देखो तो समझो खुद गए काम से...'' डिप्टी खुद को ज़िम्मेदार बताते हुए रिनी की समीक्षा कर डालना चाहते थे, लेकिन मैम ने जैसे इस वक्त यह ठीक न समझा. वह डिप्टी की ओर मुखातिब हुईं और शुरू हो गईं, ''आपका काम ही जूनियर्स के काम को देखना है. वैसे अब ज़रा ग़ौर से करना लोकल कैप. पहले तो उस पर ग़लती का कंटीला ताज़ रखकर बेफ़िक्र हो जाते थे, अब ये संभव नहीं होगा.''

''हर वक्त तो उसका मोबाइल रिंग मारता रहता था...काम क्या करती...?'' डिप्टी ने जैसे खुद से कहा और काम के अभिनय में लग गए.

जीनियस ने उनके स्वगत को भी कैच कर लिया था, ''सर एक ही नंबर से आता था बार-बार, बॉयफ्रेंड होगा. तभी तो मोबाइल लेकर बाहर चली जाती थी, हर बार.''

''तुम ज़रा खामोश ही रहो तो बेहतर होगा...खुद को भूल गए, कैसे शादी से पहले फ़ोन पर फ़ोन आया करते थे!'' मटकू ने मज़ा लेने की कोशिश की.

''आप अपना काम कीजिए तो, मैं इस समय सर से बात कर रहा हूं.'' जीनियस ने तुर्श लहजे में उसे झिड़क दिया, ''तुझसे तो उसकी बुराई सुनी कहां जाएगी. अभी पता लगेगा बेटा, जब 'दिल्ली मॉडल्स' भी तेरे ही सिर पड़ेगा...बड़ा बोलता था न कि मैडम आप फ़ैशन शो में रिनी को क्यों भेज देती हैं.''

''तू यार हर चीज़ को पर्सनल मत बनाया कर...''

''चल-चल, अब तुझे पर्सनल नज़र आ रहा होगा, हैं!''

बात बढ़ती देख मैडम को बीच में आना पड़ा, '', तुम दोनों अब ज़रा दिमाग़ से ये बात निकाल दो कि किसी के चले जाने से पेपर का काम रुक जाता है. और हां, मैंने दो-दो स्टोरी तुम दोनों को ट्रांसफर की हैं. चुपचाप एडिट करो और काम में मन लगाओ...जो चला गया, उसे जाने

दो.''

जीनियस मूंछों में मुस्कराया और मटकू ने बालों को एक लहरदार झटका देकर सेट करने की कोशिश की. यह इन दोनों का खुद को जब्त कर लेने का नायाब तरीक़ा था. उन्हें ऐसा करता देख डिप्टी साहब के साथ-साथ मैडम की भी हँसी छूटते-छूटते रह गई.

सब अपने-अपने काम में मस्त थे कि अचानक ध्यान योग से उठे डिप्टी ने एक वाक्य हवा में उछाला, ''आगे बढ़ने के लिए रिस्क तो लेना ही पड़ता है.''

ख़ामोश ज्वालामुखी ने फ़ौरन लपक लिया, ''तुम यार तब से इसी सोच में डूबे हुए थे? अरे, ये यंग जेनरेसन है. रिस्क लेना खूब जानती है. हमारी-तुम्हारी तरह नहीं कि एक ही जगह पड़े रहो. हमें तो पग-पग पर इनसिक्योरिटी के बादल मंडराते नज़र आ जाते हैं.''

''भई देखो, हमारी बात और है, उसके सामने तो सारा आसमान फैला पड़ा है.'' किसी ने कहा ज़रूर पर उसकी बात हवा में कहीं बिला गई.

एक पैर के ऊपर घुटना मोड़े दूसरा पैर रखे मटकू सुकून से छत की तरफ़ देख रहा था. अब उसे कोई नहीं, कोई नहीं टोकेगा...उसने दोनों हाथों की अंगुलियों को एक-दूसरे में फंसाया और उनका स्टैंड-सा बनाकर गुद्दी उसी पर टिका ली. वह पूरे इत्मीनान में था.

जीनियस से उसकी बेफ़िक्री देखी न गई, ''देखिए न मैम, ऑफ़िस को इसने रेस्टरूम बनाकर रख दिया है. और अब तो रिनी भी नहीं है जो इसे ठीक से बैठने को कहे. सबसे ज्यादा इत्मीनान इसे ही महसूस हो रहा है.

अब चाहे जैसा वॉल पेपर लगा ले! कौन टोकेगा.''

मटकू जैसे सोते से जागा हो, ''हां यार, बताओ ये भी कोई बात हुई! ऐसे नहीं, ऐसे बैठो!...ये फ़ोटो बहुत अश्लील लगता है...अबे यार, जो फ़ोटो हम अपने अख़बार में छाप सके हैं, उसका वॉल पेपर क्यों नहीं बना सकते! इक्कीसवीं सदी में ये सोलहवीं की आत्मा कहां से आ गई भटकने के लिए! वो भी ऐन मेरी बगल में...मैंने तो इसीलिए हारकर राधाकृष्ण का वॉल पेपर बना लिया था. बस धूपबत्ती की कसर रह गई थी.''

कमरे को रह-रहकर रिनी और उसका होना याद आ रहा था. एक नज़र में बेहद मासूम और भोली नज़र आने वाली यह लड़की स्टैंड लेने में और जवाब देने में कितनी तेज़ हो सकती है यह उस रोज़ सबके सामने कैसे ज़ाहिर हो गया था! फ़ोन तब शायद मैडम ने ही उठाया था. किसी पीआर एजेंसी से था. रिनी के लिए.

''रिनी, तुम्हारा फ़ोन.''

''येस!''

''...''

''लिसिन, माइंड युअर लैंग्वेज़! आप हमें डायरेक्ट नहीं कर सकते कि हमें क्या और कैसे छापना है समझे.''

''......''

''नो, इट इज़ अवर वर्क. लैट अस डू. नो, नथिंग डूइंग. एंड डोंट कॉल मी अगेन. वी आर नॉट पी आर.''

मैडम ने रिनी का यह कॉन्फिडेंस देखा तो भीतर ही भीतर खूब खुश हुईं, लेकिन बाहर से उन्होंने उसे समझाया, ''कूल बेबी. व्हाट हैपन्ड?''

''कुछ नहीं मैम, ये लोग चाहते हैं, जो ये कहें, वहीं हम करते रहें. व्हाय?''

''ओ के, ओ के! अभी तुम पानी पियो और आराम से बैठो. ब्लड प्रैशर नईं बढ़ाने का.''

जहां कोई न जाना चाहता, वहां कवरेज के लिए रिनी को भेज दिया जाता. कभी वह खुद जाना चाहती तो कह दिया जाता कि पहले डेस्क का काम मन लगाकर करना सीखो, फिर घूमना. फर्स्ट प्रूव योअरसेल्फ.

भाषा यही होती, कहने वाले अलग. समय और मौक़े अलग-अलग.

रिनी कभी मन मसोसकर बैठी रह जाती तो कभी उसे लगता कि जो कुछ वह कर सकती है वह उससे करवाया क्यों नहीं जाता! अक्सर उसे ऐसी ख़बरें थमा दी जातीं जो अख़बार में न भी छपतीं तो कोई ख़ास असर न पड़ता. वह परेशान थी कि कुछ लोग मौक़ा पाते ही बयान देने और फ़ोटो खिंचवाने पर उतारू क्यों हो जाते हैं. उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं रहती कि मसला है क्या. बस, जुलूस निकाल लेंगे, विरोध या समर्थन में विज्ञप्ति जारी कर देंगे और कुछ न हुआ तो रक्तदान शिविर, जागरण या फिर नि:शुल्क धार्मिक यात्राओं के आयोजन करवा डालेंगे. क़रीब-क़रीब हर अख़बार में यही लोग अपने लिए जगह निकलवा लेते हैं. इसके कुछ ख़ास तरीके जाने कैसे ईजाद कर लेते हैं ये लोग...रिनी जब हैरान होती, तो उठ कर इधर से उधर घूमने लगती. कभी वह खुद से ही बोलने लगती या फिर दो-एक मिनट के लिए आंखें बंद कर ध्यान में चली जाती.

कमरा उसे देखता और बेआवाज़ हँस देता. कमरा उसकी आंखें खुलने पर नाटक करता_''क्या हुआ रिनी, आर यू ऑल राइट?''

''हां सर, मैं तो ठीक हूं...'' रिनी मुस्करा देती.

रिनी अक्सर सोचती कि क्या इसी सबके लिए उसने मासकौम से डिप्लोमा किया था. क्या इसीलिए वह अपने घरवालों से इतनी दूर इस बेगाने शहर में चली आई थी. क्यों? क्यों? क्यों आई थी वह?

उस रोज़ तो उसकी हैरानी की कोई सीमा ही नहीं रही जब उसने पूरे मन से एक रिपोर्ट मलिन बस्तियों पर तैयार की और उसे मैगजीन को सौंप दिया. देखते ही मैगजीन ने साफ़ कह दिया कि ये सब हमारे लिए बिल्कुल बेकार है. यह तो किसी एनजीओ बुलेटिन में छपवा लो. थोड़ा रिसर्च और कर लो तो प्राइज भी मिल सकता है.

रिनी कभी हताश हो जाती, कभी दुखी. कभी वह खुद को समझाती, कभी किसी परिचित को फ़ोन कर मन हल्का कर लेती. अक्सर ऐसा होता और रिनी की मासूम मुस्कराहट कुछ घंटों के लिए ग़ायब हो जाती. वह खाना मंगा लेती, पर उसे खाने का होश ही न रहता. चाय आती और ठंडी हो जाती. चार बज जाते और स्पोर्ट्स आकर जब उसके सिर पर हाथ फिराता तो उसे होश आता कि अरे, चार बज भी गए?

ऐसा नहीं था कि वह हरदम ऐसी ही रहती हो. कभी-कभी वह ख़ूब चहकती. औरों की तरह बातचीत में ख़ूब शामिल होती, ''सर मेरे साथ भी ऐसा एक केस हो चुका है.''

कोई कुछ खा रहा होता और वह

एक झटके से उठकर उसके पास पहुंच

जाती, ''सर, क्या खा रहे हैं आप? मैं भी खाऊंगी.''

मटकू तो अक्सर नाश्ता साथ ही लेकर आता था. चाय आते ही वह टिफिन खोलता और कभी आलू तो कभी गोभी के परांठे निकालकर खाने लगता. रिनी उसे खाते देखती तो झट से हाथ बढ़ा देती, ''मुझे भी दीजिए न सर!''

उसका अनौपचारिक अंदाज़, चाहे अपनत्व प्रदर्शन का हो या नाराजगी ज़ाहिर करने का, अनूठा ही था. उस रोज़ ही कैसे वह श्रीमान शरीफ के पास जा खड़ी हुई थी, ''सर, आपने मेरा नया पर्स देखा?''

''देखें तो, कितने का लिया है?''

''सर वन फिफ्टी का, सीपी से.''

''प्योर लेदर लगता है.''

''अरे नहीं सर, पता नहीं प्योर रेक्सीन भी है कि नहीं. दिल्ली में कुछ प्योर थोड़े ही मिलता है. वह भी इतनी कम क़ीमत पर!''

जीनियस को याद पड़ रहा था कि कैसे एक दिन रिनी एकदम गुमसुम होकर आ बैठी थी अपनी सीट पर. उसने जब डिप्टी सर को इशारा किया तो उन्होंने उसके पास जाकर ही पूछ लिया, ''क्या बात है, किसी ने कुछ कहा क्या तुमसे?''

''नहीं सर...'' कहते-कहते फफक ही तो पड़ी थी रिनी. ''सर, मैं मॉडल सीन नहीं करूंगी अब.''

''क्यों?''

(क्रमशः अगले अंक में जारी...)

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