स्त्री की बौद्धिकता पर एक ख़ुफ़िया बहस

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-अभय कुमार दुबे समाज में जब किसी मुद्दे पर बहस बहुत तेज़ हो जाए तो समझ लेना चाहिए कि वह बदलाव की पेशबंदी कर रहा है. इस समय सबसे ज्यादा त...




-अभय कुमार दुबे

समाज में जब किसी मुद्दे पर बहस बहुत तेज़ हो जाए तो समझ लेना चाहिए कि वह बदलाव की पेशबंदी कर रहा है. इस समय सबसे ज्यादा तीखा विवाद मैरिट पर है, और संदर्भ पिछड़ी जातियों के आरक्षण का है. ज़ाहिर है कि सतह के ऊपर द्विज बनाम शूद्र का द्वंद्व है, पर मैरिट का कम से कम एक आयाम ऐसा भी है जिस पर की जा रही बहस का मुख्य रूप अफ़वाहबाजी का है, और उसकी प्रकृति फेंटेसीनुमा है. यह पहलू है स्त्री की मैरिट का.

सरगोशियों, लंतरानियों, शाम को होने वाली नशीली अड्डेबाजियों और गॉसिप कॉलमों के गुप्त मैदानों में होने वाला यह वाद-विवाद आजकल तय करने में लगा हुआ है कि स्त्री जो बोलती है, स्त्री जो लिखती है और समाज में अपने लिए बौद्धिक प्रगति के जो मौक़े संघर्ष करके हासिल करती है, क्या वास्तव में उसे उसका एकांत श्रेय दिया जाना चाहिए? हिंदी पब्लिक-स्फेयर के इस भूमिगत माहौल से अल्बर्टों मोराविया की एक कहानी याद आ जाती है. मोराविया की यह नायिका रचनाकार बनना चाहती है. लेकिन, जब वह अपनी रचना लेकर एक वरिष्ठ साहित्यकार से मिलती है, तो किसी अंधेरी गली में खड़ी कार के भीतर खुफिया तौर पर बैठा वह पुराना पापी वैकल्पिक रचना लिख कर उसे थमा देता है, बदले में उसका सानिध्य मांगता है. उस स्त्री के साथ ऐसा कई बार होता है. साहित्य का मूल्यांकन करने वाले पुरुष को लगता है कि या तो स्त्री की रचना में बहुत से संशोधन होने चाहिए या उसे फिर से लिख डालना चाहिए. और, इस सेवा के बदले उनका उस स्त्री पर स्वाभाविक हक़ बन जाता है. उस छोटी-सी कहानी का क्लाइमेक्स बड़ा वीभत्स है; आत्महत्या की कगार पर पहुंच चुकी वह स्त्री अचानक तय करती है कि वह सिर्फ़ एक देह बन जाएगी. फिर वह स्त्री लिपिस्टिक लगाती है, और शहर की सड़कों पर संभवत: वरिष्ठ साहित्यकारों की खोज में निकल पड़ती है. ज़ाहिर है कि मोराविया का ज़माना बहुत पीछे छूट चुका है.

स्त्री द्वारा रचा गया साहित्य और विमर्श-विमर्श सांस्कृतिक उत्पादन की प्रक्रिया को एक नए पायदान पर पहुंचा चुका है. स्त्री की रचना को किसी पुराने पापी की बदरंग चिप्पी नहीं चाहिए.
यह कामयाब स्त्री वह नहीं है जो हर सफल पुरुष के पीछे खड़ी रहती है. सफल पुरुष और पृष्ठभूमि में खड़ी स्त्री का आपसी संबंध कुछ ज्यादा ही सुपरिभाषित और सुनिश्चित क़िस्म का हो चुका है. चर्चा में कम आने वाली वह औरत या तो कामयाब मर्द की पत्नी है या फिर उसकी मां है. मां के रूप में या तो उसने पुरुष को ककहरा सिखाया है या फिर वह उसकी कुछ नैसर्गिक प्रवृत्तियों की जिम्मेदार है. पत्नी के रूप में वह उसकी पोशाक, कॉफी, लंच, डिनर या दोस्तों की आवभगत का कौशलपूर्ण बंदोबस्त करने के साथ-साथ यौन-सुख की नियमित सप्लाई का स्रोत है. इसके बदले में वह मंडन मिश्र अपनी एक किताब उसे भेंट कर देता है, या अन्य पुस्तकों के आभार प्रदर्शन की आख़िरी पंक्ति उसके लिए सुरक्षित कर दी जाती है. इस पंक्ति का पैटर्न भी तयशुदा है : 'और अंत में मैं भारती का शुक्रिया अदा किए बना नहीं रह सकता क्योंकि अगर वे मुझे धीरज और उत्साह न बंधातीं तो यह बौद्धिक परियोजना शायद अपने अंजाम तक न पहुंच पाती.' किसी भी मशहूर किताब का आभार प्रदर्शन पढ़ लीजिए, उसके आख़िर में यह पंक्ति किसी न किसी रूप में मिल ही जाएगी.

पृष्ठभूमि में खड़ी स्त्री को आभार प्रदर्शन के ज़रिए निबटा देने के बाद अब बहस इस बात पर है कि जब मंडन मिश्र ने शास्त्रार्थ में अपनी पराजय स्वीकार की ही नहीं, न ही पृष्ठभूमि में खड़ी पत्नी को मोर्चा संभालने की जिम्मेदारी थमाई, तो फिर यह स्त्री कहां से आ गई जो आगे निकलकर अपनी बौध्दिकता की स्वतंत्र दावेदारी कर रही है? यह स्त्री अजीब सी है. मंडन मिश्र ने इसे इतिहास के किसी पृष्ठ पर नहीं देखा. क्योंकि यह उपन्यास लिखती है, कविताएँ लिखती है, लेख लिखती है, आलोचना लिखती है, स्तंभ लिखती है, खूब लिखती है, टाइम पर लिखती है, लिखे हुए पन्नों की लाइन लगा देती है, ऊपर से जगह-जगह भाषण देते घूमती है, रिसर्च करती है, सिगरेट पीती है, शराब पीती है, कॉफी बनाती है और अक्सर सिर्फ़ अपने लिए बनाती है, गोष्ठियों में बिंदास जाती है, खुलकर हँसती है, इसका उच्चारण स्पष्ट है, और सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह स्त्री सामाजिक रूप से सुपरिभाषित जीवन भी जी सकती है, और अगर मन चाहे तो पिता द्वारा आयोजित स्वयंवर के बिना स्वयंवरा भी हो सकती है.

मंडन मिश्र न तो इस स्त्री की शिनाख्त अपनी मां के रूप में कर पा रहे हैं, न पत्नी के रूप में. तो फिर वह कौन है? विवाह या दूसरे संस्थानों में सुरक्षित बैठी शीलवती सन्नारियां इसे 'शी-ड्रैकुला' का नाम देती हैं. वस्तुत: चूंकि इस विकट प्रश्न का उत्तर खोजने में वे नाकाम हैं, इसलिए उन्होंने पुरानी कहावत को नया रूप दे दिया है. इसीलिए स्त्री की बौध्दिकता पर होने वाली खुफिया बहस के केंद्र में यह कहावत रख दी गई है कि हर सफल स्त्री के पीछे एक पुरुष होना लाज़मी है. ध्यान रहे कि पहले पृष्ठभूमि में खड़ी स्त्री की आकृति साफ़ थी, पर पीछे खड़े इस पुरुष की अस्मिता अनाम है. अगर वह वास्तव में पीछे खड़ा होता तो उसे खुद को धन्यवाद देने की क्या ज़रूरत होती. उसे धन्यवाद स्त्री देती, वह भी उसके लिए एक अच्छी-सी पंक्ति गढ़ लेती. पीछे दिखाई दे रही वह भुतहा आकृति सफल स्त्री के प्रेमी की भी नहीं हो सकती. क्योंकि अगर वह प्रेमी होता तो फिर प्रेमिका के बारे में अफ़वाह उड़ाने की ज़रूरत क्या पड़ती!

हिंदी के पब्लिक स्फेयर पर कुछ ऐतिहासिक कारणों से अधिकांशत: साहित्य और कुछ-कुछ पत्रकारिता की छाया रहती है, इसलिए बहस के औज़ारों द्वारा सबसे ज्यादा शल्यक्रिया जिन स्त्रियों की होती है, वे अक्सर साहित्यकार ही होती हैं. अगर उन्हें कोई मामूली-सा भी पुरस्कार मिला है तो उनकी कामयाबी के पीछे मौजूद पुरुष भूत पुरस्कार की निर्णय कमेटी का सदस्य निकल आता है. और, अगर वह निर्णय कमेटी का सदस्य नहीं भी है और पुरस्कार बहुत मानिंद क़िस्म का है तो हवाओं में घूमने वाली सरगोशियां खोज निकालती हैं कि पुरस्कृत कृति के पीछे अमुक की डायरी है. शाम की गोष्ठियों में यह गोपनीय तथ्य कुछ इस तरह परोसा जाता है कि जैसे जब वह डायरी उपन्यास के रूप में टीपी जा रही थी तो कोई चश्मदीद गवाह वहां साक्षात् मौजूद रहा होगा. माना जाता है कि स्त्री साहित्यकारों की हर कृति कोई न कोई वरिष्ठ पुरुष साहित्यकार ही दुरुस्त करता है, या फिर उसका पुनर्लेखन करता है, या किसी न किसी प्रकार उसे प्रस्तुति योग्य बनाता है. और, कोई स्त्री उस समय तक किसी पत्रा-पत्रिका में स्तंभ नहीं लिख सकती जब तक कल्पना की उड़ानें किसी न किसी प्रकार उसका संबंध संपादक के साथ न जोड़ दें. इसके साथ ही यह अनकही धारणा अपने आप जुड़ जाती है कि बदले में उस पुरुष ने स्त्री रचनाकार का अगर दैहिक नहीं तो रागात्मक साहचर्य अवश्य प्राप्त किया होगा. ये सब बातें हिंदी के पब्लिक स्फेयर में एक ओपन सीक्रेट की तरह की जाती हैं कि अमुक स्त्री साहित्यकार अमुक के साथ फिट है.

कई वर्षों से चल रही इस साहित्यकार का संबंध उन प्रकाशकों से भी जोड़ा जाने लगा है जो उनकी रचनाएं प्रकाशित करते हैं. चर्चाएं सुनने में आती हैं कि हिंदी का एक बड़ा प्रकाशक आजकल किसी कवि-कवि या किसी कहानीकार-कहानीकार पर ख़ासतौर से मेहरबान है. यानी इस अफ़वाहबाजी के मुताबिक स्त्री ज्यादा से ज्यादा अपनी रचना का रफ़ ड्राफ्ट ही बना सकती है जिसे लेकर पहले उसे अपनी कामयाबी के पीछे खड़े भुतहे पुरुष के पास जाना होगा, रचना ठीक करवानी होगी, बदले में उसे कम से कम रागात्मक साहचर्य का आश्वासन देना होगा, और फिर उसे प्रकाशक या संपादक से निबटना होगा जो इस पितृसत्तात्मक फेंटेसी का नया किरदार है.

बहुत दिन से हिंदी का पब्लिक-स्फेयर इन बातों को अफ़वाहों या प्रवादों की श्रेणी में डालकर अपना काम चला रहा है. लेकिन, अब इससे कतराने का वक्त निकल चुका है. अब भारतीय समाज उस मुकाम पर पहुंच गया है जहां समुदायों की मैरिट के मानक तय हो रहे हैं. बेहतर होगा कि इसी दौर में स्त्री की मैरिट के मानक भी तय हो जाएं. आख़िरकार स्त्री समुदायों का समुदाय है. उसकी मैरिट का सवाल उठाने का सबसे बड़ा फ़ायदा होगा कि मैरिट के नए मानक किसी महा-आख्यान के बोझ तले दबने से बच जाएंगे. हम जानते हैं कि अभी तक समाज में मैरिट का महा-आख्यान द्विज जातियां, खासकर ब्राह्मणों द्वारा सूत्रबद्ध किया जाता रहा है.

अब पिछड़ी जातियां, दलित और आदिवासी समुदाय उसे नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश में हैं. महिलाएं और उनके पैरोकार इस मौक़े का लाभ उठा सकते हैं. वे इस क़िस्म की अफ़वाहबाजी को पितृसत्ता के विकराल तर्क के रूप में पेश करके कह सकते हैं कि पिछले बीस वर्षों से हिंदी साहित्य में स्त्री रचनाशीलता का जो उन्मेष हुआ है, उसे अब स्वतंत्र और स्वायत्त मान्यता मिलनी ही चाहिए. पहले यह काम केवल हंस जैसी पत्रिका ही करती थी, पर स्त्री द्वारा रचे गए साहित्य और स्त्री के विमर्श पर विशेषांक निकालने की दौड़ में आज तक़रीबन हर पत्रिका शामिल हो चुकी है.

जहां तक प्रकाशकों का सवाल है, हर प्रकाशक मुनाफ़ा कमाना चाहता है. अपनी इसी नैसर्गिक वृत्ती के आधार पर वह जानता है कि हिंदी में इस समय सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबों में या तो दलित विमर्श की किताबों का शुमार है, या फिर स्त्री विमर्श की किताबों का. स्त्री पर या स्त्री द्वारा लिखी गई किताबें छापना किसी भी प्रकाशक का स्वार्थ ही हो सकता है, अपनी व्यक्तिगत रागात्मक संतुष्टि के लिए किया जाने वाला चुनाव नहीं.

स्त्री की बौध्दिकता पर होने वाली यह बहस अब अफ़वाहबाजी के भूमिगत दायरों से निकाल कर ज़मीन से ऊपर लाई जानी चाहिए. स्त्री कृतियों की आलोचना की कसौटियां अलग से तय की जानी चाहिए. उसका सौंदर्यशास्त्र लाज़मी तौर पर पुरुषों द्वारा रचे गए साहित्य जैसा नहीं है. उसकी भाषा, उसका तर्क विन्यास, उसकी कहानी का क्रम, उसकी निरंतरताएं और विच्छिन्नताएं अगल क़िस्म की हैं. इस बहस का फ़ैसला अनिवार्य तौर पर भारतीय स्त्री की बौध्दिकता के सच्चे और स्वायत्त सूचकांक की निर्मिति के तौर पर होगा. और जैसे ही यह सूचकांक बनकर तैयार हो जाएगा, वैसे ही कामयाब स्त्री के सामाजिक चित्रा की पृष्ठभूमि पर छाई हुई वह

भुतहा पुरुष आकृति तिरोहित हो जाएगी, जो आज उसकी मैरिट पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है.
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संपर्क : 07, सनब्रीज अपार्टमेंट, टावर-ए, सेक्टर-5, वैशाली, ग़ाज़ियाबाद-201010
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चित्र - रेखा की कलाकृति - कागज पर पेंसिल से रेखांकन
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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया 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रचनाकार: स्त्री की बौद्धिकता पर एक ख़ुफ़िया बहस
स्त्री की बौद्धिकता पर एक ख़ुफ़िया बहस
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