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आलेख - हमारे किशोर किस ओर...


हमारे किशोर किस ओर
- मृणाल पाण्डे

शेख सादी के ‘गुलिस्तां' में एक लड़के की कहानी आती है जिसे बादशाह-सलामत का स्वास्थ्य ठीक करने के लिए शाही हकीम के बताए नुस्खे के तहत हलाक (बलि) किया जाना था पर यह लड़का जब बादशाह सलामत के सामने ले जाया गया तो मुस्कुरा पड़ा. बादशाह ने अचरज से पूछा कि अपनी मौत की इस घड़ी में तू हँसने लायक ऐसा क्या देख रहा है? लड़के ने जवाब दिया, "बच्चे को पहला सहारा मां-बाप का होता है जो उसे पालते-पोसते हैं और बच्चे पर जुल्म हो तो फरियाद लेकर तुरत काजी के पास जाते हैं ताकि बादशाह सलामत न्याय करें. यहाँ हालत यह है कि मेरे मां-बाप ने पैसे के लालच में मुझे बेच दिया है और काजी साहब ने बादशाह को खुश करने को तुरत फतवा दे दिया है कि इस लड़के का मारा जाना ही ठीक है. जब काजी और मां-बाप ही नहीं, खुद बादशाह सलामत भी मेरी मौत में ही अपना भला देख रहे हों तो मैं जुल्म का इनसाफ उनसे करने को क्या कह सकता हूँ? कहते हैं, बादशाह ने शर्मिंदा होकर लड़के को गले से लगाया और उसे बहुत सारा धन देकर यह कहते हुए विदा कर दिया कि एक बेगुनाह के खून से अपनी जान बचाने से तो मेरा मरना ही बेहतर होगा.

देश के महानगरों में बदहवास होकर कालेजों में दाखिले के लिए भटकते या उच्च शिक्षा में आरक्षण के विरोध और समर्थन में लामबंद होते हुए लड़कों और लड़कियों को देखकर यह कहानी मन में कौंध गई. कहते हैं युवावस्था मनुष्य के जीवन की सबसे स्वर्णिम, सबसे आनंदकारक अवस्था होती है पर इन दिनों हमारे किशोरों को देखिए तो उनकी बेचारगी पर तरस आता है. जिन अभिभावकों से उनको शारीरिक-मानसिक श्रम की अति से बचाने की उम्मीद की जाती है वे स्कूली दिनों से ही ऊँची तनख्वाह की नौकरी दिलानेवाले उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लालच में बच्चों को बेपनाह ट्यूशनों और रतजगों के भँवर में ठेलते रहते हैं. इसका सीधा नतीजा परीक्षाकाल आने पर छात्रों में बढ़ते तनाव और आत्महत्या की प्रवृत्ति के रूप में हमें दिखाई देने लगा है. नतीजे निकल आए तो शुरू होती है, ‘कट-ऑफ़' और ‘कैट' की ‘मार्क्स' वादी कवायद. ऐसे में उच्च शिक्षण संस्थानों में अतिरिक्त आरक्षण का प्रावधान उनको अपने घावों पर नमक छिड़कने जैसा लग रहा है.

पिछड़ों के लिए आरक्षण तथा गैर पिछड़ों के लिहाज से सीटें बढ़वाने को लेकर भले ही राजनीति हो रही हो लेकिन इस क्षेत्र में आरक्षण को बढ़ाने से पहले उपलब्ध शिक्षण संस्थानों के संसाधनों, संकायों में नई सीटों को आत्मसात करने की क्षमता और सबसे ऊपर शिक्षकों की अतिरिक्त भर्तियों पर समय रहते पूरा विचार और तैयारी जरूरी बनती है. पिछले छप्पन सालों से अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों को हमारे संविधान ने आरक्षण दे रखा है फिर भी अधिकतर शिक्षण संस्थानों में आरक्षित कोटा पूरी तरह नहीं भर पाता. झारखंड, उत्तरांचल, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे जनजातीय बाहुल्य वाले प्रांतों से केंद्रीय सिविल सेवा या इंजीनियरिंग सेवा परीक्षाओं में आज भी बमुश्किल एक दर्जन लोग चुने जाते होंगे और खुद जनजाति कल्याण मंत्रालय स्वीकार करता है कि इसकी मूल वजह प्राइमरी तथा सेकेंडरी स्तर पर कमजोर वर्गों के छात्रों को समुचित शिक्षा का न मिल पाना है लेकिन इन दोनों स्तरों की बेहतरी और वहाँ पर आरक्षण का प्रावधान करने की बजाए विशुद्ध राजनीतिक स्वार्थों और कालेज स्तरीय पिछड़ों, खासकर छात्रों के वोट-बैंक हथियाने की होड़ के तहत बात प्रशिक्षण की गारंटी की बजाय भर्ती की गारंटी यानी आरक्षण कोटा बढ़ाने की ही हो रही है वह भी सिर्फ उच्च शिक्षा क्षेत्र में, जहाँ इन वर्गों के मुट्ठीभर ही छात्र पहुँच पाते हैं और जो पहुँचते भी हैं, वे प्रायः मलाईदार परतों से ही जुड़े होते हैं.

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अब ये छात्र मार्गदर्शन और न्याय की उम्मीद किससे करें? उन मध्यवर्गीय अभिभावकों से जिन्हें ऊँची तनख्वाह की नौकरी (और परिप्रेक्ष्य में मिलने वाले ऊँचे दहेज) का इतना लालच है कि वे बच्चों को कोड़ामार साइसों की तरह दिन-रात दौड़ा रहे हैं? उन काजियों से जो चुनाव जितवाने के लिए सामाजिक न्याय के नाम पर लाखों छात्रों का खून बहाना अनिवार्य समझ रहे हैं? या उस बादशाह से, जिसकी जमीनी पकड़ लगातार कमजोर पड़ रही है और जो इस खून से अपनी सियासी सेहत सुधारने का इच्छुक है?

पिछले वर्षों में हमने देखा है कि कैसे हर न्यायपरक और लोकतांत्रिक सोच जब-जब वह हमारी राजनीति के अंतःस्थल से निकलकर इतिहास में अपनी राह बनाने लगती है, अपने मौलिक स्वरूप से स्खलित होकर मूल का विकृत कैरिकेचर बन जाती है. हर किसी जाति को तरक्की के इतने अवसर मिलें कि उसका सदस्य अपनी जातीय अस्मिता के बोध से भरे, उस पर गर्व करे, यह एक सुंदर सोच थी लेकिन जमीनी राजनीति के साथ जुड़ने पर उसने हर पार्टी के भीतर एक-से-एक अहंग्रस्त, आक्रामक और जातीय असहिष्णुता से भरपूर नेता पैदा कर डाले. मनुवादी व्यवस्था की आलोचना हम इसलिए करते हैं और ठीक ही करते हैं कि उसके वर्चस्व तले दलित तथा पिछड़ी जातियाँ और हर जाति-वर्ग की स्त्रियाँ अपनी मानवीय विशिष्टता गंवाकर एक गुलाम, ग्लानिबोध और हीनभावना से भरी भीड़ बनने को बाध्य होते रहे हैं पर क्या गैर मनुवादी जातीय अस्मिता में जीते हुए लोग सही अर्थों में अधिक लोकतांत्रिक, उदार और समदर्शी नागरिक बन पाए हैं? क्या उनमें भी हम स्त्रियों के लिए आरक्षण पर वैसा ही अड़चनवादी रूख और मलाईदार परत की छटनी कर अपनी जाति के पिछड़े लोगों को आगे लाने के प्रति ठंडी उदासीनता नहीं दीखती?

उच्च शिक्षा के क्षेत्र को सभी वर्गों-जातियों के बच्चों के लिए समान रूप से सुलभ बनाने की बहस अधूरी रहेगी अगर हमारे अभिभावक, काजी और बादशाह सीधे-सीधे उन प्रश्नों का सामना नहीं कर पाते जिन्हें ये किशोर उठा रहे हैं और वे प्रश्न सीधे हमारे नेतृत्व के स्वरूप, शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षकों और शिक्षण संस्थानों की बहुलता और प्रतिभा के मानकों से जुड़े हुए हैं, इस बात से नहीं कि उत्तर प्रदेश के चुनावों में यादवों को हराने के लिए एक जातीय संघर्षवाहिनी कैंपसों में कैसे खड़ी की जाए? या कि मलाईदार परत की कानूनी व्याख्या को कैसे अनंत समय तक छेंक दिया जाए!

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साभार - कादम्बिनी, जुलाई 2006.

1 टिप्पणियाँ

  1. बहुत दिनों से मृणाल पाँडे जी का लिखा कुछ पढ़ने का अवसर नहीं मिला था, उनका यह लेख पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. उनका बात को स्पष्ट और सरल तरीके से कहना मुझे हमेशा अच्छा लगता रहा है. रचना को रचनाकार तक लाने के लिए रवि तुम्हे भी धन्यवाद.

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