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रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' की तीन कविताएँ


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1 दुःख सगा है


- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

जब से यह दुःख
रात-दिन मेरे पीछे
लगा है ,
तब से मैंने जाना
गैर हैं सब
एक यही तो मेरा सगा है.

सगे जो होते हैं
जरा जरा सी बात पर
मुँह मोड जाते हैं ,
हम चाहें उन्हें मनाना
पर वे साथ छोड़ जाते हैं.
इन सुखों ने और सगों ने
मौका मिलने पर
मुझको बार बार ठगा है,


यह दुःख ही है बेचारा
जो मेरे हर दर्द में
सिरहाने बैठा रहा है
रात -रात भर
साथ -साथ जगा है.
****


2 इस धरती पर

धरो पैर इस धरती पर
तब आगे बढ़ पाओगे.
नभ में इतना नहीं उड़ो
जाने कब गिर जाओगे.

आंखों पर पट्टी बांधे
क्या पर्वत चढ़ पाओगे.
सावधान किसी दिन बड़े
गड्ढे में गिर जाआगे.

हमने माना नोटों के
बिस्तर तुम बिछवा सकते.
पर क्या इन नोटों से तुम
नींद घड़ी भर लाओगे?

किया आचमन धोखे का
मंत्र कपट के खूब पढ़े.
माना ऊंचे अम्बर में
कटी पतंग से खूब चढ़े.

तेज हवा का झोंका जब
जिस पल भी रुक जाएगा.
बिना डोर की पतंग को
धरती पर ले आएगा.

इसीलिए मैं कहता हूँ
मत मन में अभिमान करो.
अच्छे काम करो जी-भर
बुरे काम से सदा डरो.

****.

.


.

3 चांद-सा माथा

तुम्हारा चांद -सा माथा,
जो दो पल छू लिया मैंने.
कहें क्या बात जनमों की ,
पूरा युग जी लिया मैंने.

करें अभिशाप का वंदन,
मिलते वरदान फिर कैसे.
जब पूजा से दुआ गायब,
मिटे शैतान फिर कैसे.

बनारस जा नहीं पाया,
संगम नहा नहीं न पाया.
घर के द्वार पर ही आज ,
वह प्रियतम पा लिया मैंने.

पूजा उपवास ना जाना,
नाम का दान कब पाया.
न ओढ़ी रामनामी ही,
न घंटा- घड़ियाल बजाया.

कभी तप करना न आया
मुझे जप करना कब भाया.
जब चिड़िया भोर में चहकी,
कुछ गुनगुना लिया मैंने.

नरक का द्वार मिल जाए,
स्वर्ग का सार छिन जाए.
मुझे दोनों बराबर हैं,
रात आए या दिन जाए.

सबकी हर पीर मैं हर लूं,
उजाले प्राण में भर लूं.
थे जब गीले नयन पोंछे,
सभी कुछ पा लिया मैंने.

*****.
रचनाकार - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु' संप्रति केंद्रीय विद्यालय ओईएफ, हजरतपुर जि. फिरोजाबाद 283103, उप्र में प्राचार्य पद पर कार्यरत हैं.

चित्र: जवा मेहता की तैल रंग से बनी अनाम कलाकृति.

कविता 116048742480362469

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