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कुछ पाकिस्तानी ग़ज़लें



मुनव्वर हुसैन बलोच की दो ग़ज़लें

इस धरती पर कितना दुःख है

इस धरती पर कितना दुःख है प्यारे, देख

ऊँचे महलों के वासी दुखियारे , देख

भूक और बेचैनी का हर-सू राज यहाँ

ये मजदूरों की बस्ती है प्यारे, देख

सुर्खी, पाउडर और परफ़्यूमों के इनसान

बिलख रहे हैं बच्चे भूक के मारे, देख

आस न तोड़ मिलन की, मन को आशा दे

चाँद की राहें देखें कब से तारे, देख

बादल, सब्जा, फूल और पानी, सब यकजा

कुदरत की फनकारी के शहपारे देख

लफ़्जों में तस्वीर उतर सकती है कब

होंट कली से बढ़कर नैन नियारे देख

यार बलोच ये वक्त भी कितना जालिम है

हमसे बिछड़े कैसे यार हमारे देख

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फीका-फीका सा है शहर का रंग

मैं मजबूर, तेरी चाहत और शहर का रंग

कब तक देखूं इक जलती दोपहर का रंग

लोगों बोझल आँखों के सब ख्वाब हवा

नींदें अपनी और न अपना दहर का रंग

कौन समय की आँखों में डूबा-उभरा

किसने देखा उस उठती हुई लहर का रंग

जख़्मों की गहराई नापने से हासिल?

क्या मतलब खंजर से, कैसा जहर का रंग

मर मिटना ही जब ठहरा अंजाम तो फिर

क्या घबराना जुल्म से, कैसा कहर का रंग

यार मुनव्वर इक मैं ही अफ़सुर्दा नहीं

फीका-फीका सा है सारे शहर का रंग

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रिजाज़ साग़र की दो ग़ज़लें

मैं बिखर रहा हूँ

मैं जर्रा-जर्रा बिखर रहा हूँ

मैं लम्हा-लम्हा गुज़र रहा हूँ

अजीब मौसम है मुझपे हावी

न जी रहा हूँ न मर रहा हूँ

चराग़ रक्खे हथेलियों पर

दयारे-शब से गुजर रहा हूँ

जवाब देगा तो कैसा देगा

सवाल कर के मैं डर रहा हूँ

अजीब हैं बेचराग रातें

हवेली अपनी से डर रहा हूँ

मैं पैरहन हूं गयी रुतों का

शजर के तन से उतर रहा हूँ

नहीं मुकद्दर में मौत सागर

जनम-जनम से अमर रहा हूँ

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कहीं इक पल ठहरना चाहता हूँ

कोई इलजाम धरना चाहता हूँ

तेरे हाथों संवरना चाहता हूँ

शगूफ़े, फूल, फल, पत्ते, हवाएँ

मैं मौसम हूँ, बिखरना चाहता हूँ

लबों पर रख के खामोशी का पत्थर

मैं तुझसे बात करना चाहता हूँ

नहा कर शबनमे-रंजो-अलम में

बरंगे-गुल निखरना चाहता हूँ

अजब हैं तश्नगी की ख्वाहिशें भी

कि दरियाओं में मरना चाहता हूँ

मुक़द्दर गर्दिशें हैं फिर भी सागर

कहीं इक पल ठहरना चाहता हूँ

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2 टिप्पणियाँ

  1. यार ‘मुनव्वर’ इक मैं ही अफ़सुर्दा नहीं

    फीका-फीका सा है सारे शहर का रंग

    गज़लें बाँटने के लिये शुक्रिया.

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत धन्यवाद, गज़लें पढ़ कर आन्नद आ गया.

    जवाब देंहटाएं

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