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अन्तरा करवड़े की 53 लघुकथाएँ - 3

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लघुकथा संग्रह - देन -अन्तरा करवड़े लघुकथा क्र. 1-10 यहाँ पढ़ें लघुकथा क्र 11-20 यहाँ पढ़ें लघुकथाएं 21-30 : अधर आज रितेश और प्रिय...


लघुकथा संग्रह - देन

-अन्तरा करवड़े

लघुकथा क्र. 1-10 यहाँ पढ़ें

लघुकथा क्र 11-20 यहाँ पढ़ें

लघुकथाएं 21-30 :

अधर

आज रितेश और प्रियंका बड़े खुश थे। खुद की मेहनत के बल पर उन्होने शहर के सबसे महँगे और पॉश कहे जाने वाले इलाके में एक अत्याधुनिक फ्लैट खरीद लिया था। बीसवीं मंजिल पर बसा उनका ये नया आशियाना सचमुच बड़ा खूबसूरत था। चौबीसों घण्टे की वीडियो कैमरा और वॉईस फैसिलिटी से सुसज्जित सिक्युरिटी¸ एक पावर स्टेशन¸ प्राईवेट बस स्टॉप¸ पार्क¸ जिम¸ पूल¸ प्ले जोन¸ क्या नहीं था वहाँ!

रितेश को सबसे ज्यादा पसंद आई थी उसके फ्लॅट की सी व्यू गैलेरी। कितना मनमोहक दृश्य दिखाई देता था वहाँ से ! आज तक वे ग्राऊण्ड फ्लोर की इस छोटी सी पुरानी जगह पर रहते आए थे।

प्रियंका को तो जैसे पर लग गये थे। नये घर की सजावट¸ बुक शैल्फ¸ कर्टन्स¸ फर्नीचर और बी न जाने क्या क्या था उसक लिस्ट में।

अनमना सा कोई था तो उनका पाँच वर्ष का प्रशांत। उसे बिल्कुल भी समझ में नहीं आ रहा था कि इस जगह को छोड़कर वे आखिर उस इतनी ऊँची इमारत में क्यों रहने जाएँगे? उसकी चिंता भी वाजिब थी। उसकी सबसे अच्छी साथी यानी उसकी दहलीज पर दाना चुगने आती चिड़िया अब भूखी रहा करेंगी।

उसने एक बार नये घर में जाकर देखा था। कोई भी पेड उसके घर की बराबरी नहीं कर पा रहा था। तो क्या ये सब भूल जाना होगा उसे?

"क्या बात है प्रशांत? देखो मैं तुम्हारी मनपसंद कार्टून सी डी लाया हूँ।" रितेश ने उसे मनाते हुए कहा। प्रशांत ने कोई जवाब नहीं दिया।

तभी जोर जोर से खाँसती प्रियंका अंदर आई। "पिछली गली में कचरे के नाम पर क्या क्या जलाते है? दम घुटने लगता है कभी - कभी।"

"कुछ ही दिनों की तो बात है डियर! फिर तो हम इतने ऊँचे चले जाएँगे कि तुम बस देखती रहना।" प्रशांत ने सपनीली आँखों से उसे देखा।

"सचमुच! मुझे तो ऐसा लग रहा है कि कब ये कबाड़खाना छोडकर वहाँ शिफ्ट होंगे हम। कितना साफ¸ पोल्यूशन फ्री¸ एकदम हाई सोसाईटी फील के जैसा।" प्रियंका को अपना प्रिय विषय मिल गया था।

दोनों ने देखा कि इस नये घर को लेकर प्रशांत उतना उत्साहित नहीं है जितना कि उसे होना चाहिये।

"प्रशांत! बेटा हम थोड़े ही दिनों के बाद अपने नये घर में शिफ्ट होने वाले है। क्यों न हम तुम्हारे यहाँ वाले दोस्तों के लिये एक पार्टी अरेंज करें?" प्रियंका ने उसे टटोलते हुए पूछा।

"और फिर प्रशांत¸ नया घर तो बड़ी ऊँचाई पर है वहाँ से सब कुछ कितना अच्छा लगेगा है ना?" रितेश ने उसे मनाते हुए कहा। दोनों ही उसकी प्रतिक्रिया देखना चाह रहे थे।

"लेकिन पापा!"

"बोलो बेटा!"

"वहाँ पर न तो कोई पेड़ पौधे रहेंगे¸ न पंछी। ये सब बहुत नीचे होगा। और न ही हम चाँद तारों को छू सकते है¸ ये बहुत ऊपर होगा। ऐसी बीच वाली स्टेज को तो अधर में लटकना कहते है ना?"

दोनों के पास कोई उत्तर नहीं था।

उधर आँगन में¸ चावल के दानों पर अपना हक जताती एक चिया चहचहा रही थी।

डिस्चार्ज सेटिस्फेक्शन

"देखिये मल्होत्रा जी ! मॅडम के रिस्पॉन्सेस तो ठीक है लेकिन अभी मेरा सेटिस्फेक्शन लेवल तो नहीं बोलता कि डिस्चार्ज दूँ। आगे आपकी मर्जी!"

"देखिये डॉक्टर साहब! मधु को तो मैंने पूरा - पूरा आपके भरोसे कर रखा है। उसकी बीमारी क्यों पकड़ में नहीं आ रही है इसकी चिंता तो मुझे भी है। आप तो अपने हिसाब से उसका इलाज कीजीये।"

"ठीक है। तो फिर ये कुछ टेस्ट करवाने होंगे उनके। और याद रहे! सिर्फ श्रेया पॅथालॉजी में ही।"

"जी"

.....................

"श्रेया लॅब से बोल रहे है?"

"जी! कहिये!"

"मॅडम से बात करवाईये। मैं डॉ झा बोल रहा हूँ।"

"जी!"

"हैल्लो डॉ झा! कहिये¸ किसकी इन्टीमेशन है इस बार?"

"मॅडम! आपको न सिर्फ पॅथालॉजिस्ट बल्कि टेलीपॅथिस्ट भी होना चाहिये था। कितनी खूबसूरती से मन की बात जान लेती है आप! जवाब नहीं।"

"कहिये ना! कौन है इस बार?"

"मिस्टर मल्होत्रा। उनकी पत्नी के कुछ सेंपल्स आऐंगे आपके पास। रिपोट्‌र्स से डिस्चार्ज सेटिस्फेक्शन हफ्ते भर आगे बढ़ जाना चाहिये। आई विल बी वर्किंग फॉर फिफ्टीन पर्सेंट।"

"श्योर! ड़न!"

मल्होत्रा साहब बेटे को फोन लगा रहे थे।

"बेटे! तबियत ज्यादा खराब है। बीस की व्यवस्था और करनी होगी।"

जुगत

"अरे शर्मा बंधू सुना तुमने?" परिहार बाबू तंबाकू मलते हुए कहने लगे।

"अपने श्रीवास्तवजी तो अंदर हो गये। आज के अखबार में¸ पकड़कर ले जाते हुए का फोटो है उनका।"

"लेकिन ये गँवई भी आजकल बड़े चालाक हो चले है। वो किसनिया नहीं? नोट में रंग लगाकर ले आया पट्‌ठा!" शर्माजी की मुखमुद्रा दर्शनीय थी।

"तुम भी सम्हलकर रहना भैये। "डाईरेक्ट" में हो। अपना तो पर्सेंटेज वाला विभाग है। मिल गये तो ठीक¸ न मिले तो ठीक। सिर पे ठीकरा नहीं फूटने का। अपनी पहले से ही जुगत भिड़ी है।" परिहार बाबू खुश हो लिये।

"हाँ खैर! आपका काम अलग है।" शर्माजी अनमने से होकर कुछ जुगत भिड़ाने लगे। इन दिनों उनके घर में बेटी के ब्याह की तैयारियाँ चल रही थी। दो तीन मोटे ग्राहकों से उन्होने काम करवाकर देने के बदले में हॉल¸

गार्डन¸ हलवाई आदी की सैटिंग भी कर रखी थी।

"लेकिन इस तरीके से चलता रहा तो भारी पड़ेगा।" वे मन ही मन बुदबुदाए। तभी उनकी नजर अखबार के एक छोटे से शीर्षक पर पड़ी। "कर्मचारी स्थानांतरण शीघ्र संभाव्य।" जाने क्या सोचकर वे मन ही मन मुस्काने लगे थे।

दो तीन हफ्तों के बाद परिहार बाबू के हाथ उनका स्थानांतरण पत्र आया। उनकी बदली "डाईरेक्ट" वाले स्थान पर कर दी गई थी। और अब उनके पर्सेंटेज वाले स्थान पर आने वाले थे शर्मा बंधु।

"सबकी मिली भगत है।" परिहार बाबू दाँत पीसते रह गये...

सूट

विदेश में ब्याही बेटी तीन साल बाद मायके लौटी तो घर में जैसे खुशियाँ बरस पड़ी। हर कोई उससे बात करने¸ किस्से सुनने और उसके साथ रहने को आतुर था। लेकिन बेटी थी कि अपने नखरों से ही उबर नहीं पा रही थी।

"ऊफ! कितनी गर्मी है यहाँ।"

"मेरे लिये तो बस मिनरल वॉटर। पता नहीं अब ये सूट करे या नहीं।"

"इतना सारा खाना क्यों बना लिया है? वहाँ तो ये कल्चर ही नहीं चलता। इतना सब कुछ तो हम लोग पार्टीज के लिये भी नहीं बनाते।"

"मम्मी! कितना वेट गेन कर लिया है आपने? वहाँ होती तो सबकी टोकाटोकी सुनकर जिम शुरू कर देती अभी तक।"

सबके उत्साह पर पानी फेरती हुई बिटिया वहाँ के ऐश्वर्य और यहाँ की अनहाईजिनिक कन्डीशन्स को तौलती रहती। दो दिन बाद जब "वहाँ" का बुखार उतरा तब माँ से बोली¸ "माँ! तुम्हारे हाथ के आलू के परांठे और मटर पनीर खाना है।"

"मैंने तो तेरे आने की खबर सुनते ही सोच रखा था लेकिन तेरी बातें सुनकर लगा कि अब तुझे सूट करेगा या नहीं?"

"वहाँ पकाकर खिलाने को माँ नहीं होती कहीँ। शायद इसीलिये सारी असली चीजें सूट नहीं होती माँ। अब मुझे यहाँ सब असली और शुद्ध खिलाकर पक्का नहीं बनाओगी क्या?"

माँ के हाथों में थी मटर की फलियाँ और आँखों में मोती...

इन्स्टॉलमेंट

"अरे बाई! जरा दरद सहन कर। क्यों चिल्लाती है? देर है अभी।" गीताबाई ने प्रेम से उसके सिर पर हाथ फेरा।

इस अस्पताल में ही उनका जीवन गया था। जाने कितनी ही जच्चाओं को¸ उनके हाथ में गुड्‌डे गुड़िया थमा खुशी - खुशी घर भेज चुकी थी।

डॉ वैद्य की भरोसेमंद दाई थी वे। हड़बड़ी या जल्दबाजी में उन्होने कभी कोई निर्णय नहीं लिया। रात - रात भर ही क्यों न जागना पड़ा हो¸ उनका दबाव हमेशा ही सामान्य प्रसूति की ओर ही रहा करता था। । बहुत ज्यादा खतरा होने या देर हो जाने पर ही वे किसी गर्भवती की प्रसूति ऑपरेशन से करवाती।

इन दिनों उनकी बहू भी अस्पताल में आने लगी है जो कि स्वयं भी स्त्री रोग विशेषज्ञा है। उसके आने के कारण डॉ वैद्य ने अस्पताल आना काफी कम कर दिया है। बहू ने आते ही सारे अस्पताल का कायकल्प करवाया। खुद के केबिन में ए सी¸ नये इक्यूपमेंट्‌स¸ यंत्र¸ आधुनिक साजो सामान आदी सब कुछ "हॉस्पिटल इंप्रूवमेंट लोन" की राशि के अंतर्गत लिया था।

हालाँकि डॉ वैद्य इसके पक्ष में नहीं थी। क्योंकि इस खर्चे के चलते उन्हें अपनी फीस बढ़ानी पड़ी थी जिसके कारण उनकी बरसों पुरानी मरीज आजकल अपनी बहू बेटियों को उनके पास लाते हुए कतराने लगी थी। एक दो बार उन्होने अप्रत्यक्ष रूप से यह बात बहू से कही भी थी । लेकिन बहू ने यह कहकर उन्हें चुप करा दिया था कि उसके पास कमाई के दूसरे तरीके भी है। पूरा जीवन स्त्री राग विशेषज्ञा के रूप में बिता चुकी डॉ वैद्य असमंजस में जरूर पड़ी थी लेकिन उन्होने बहू से कुछ कहा नहीं। आखिर आगे ये सब कुछ उसे ही तो सम्हालना था।

उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब कुछ महीनों के बाद ही उनकी बरसों पुरानी गीताबाई¸ बिना किसी स्पष्ट कारण के तड़क फड़क नौकरी छोड़ गई।

तबियत थोड़ी गिरी हुई सी रहने लगी थी उनकी। बावजूद इसके वे उस दिन अस्पताल गई। वे पहुँची ही थी कि उनसे क्षण भर पूर्व अभिजात्य वर्ग का एक परिवार अत्याधुनिक गाड़ी से उतरा। एक बाईस तेईस साल की गर्भवती युवती¸ उसके पति¸ सास¸ ससुर आदी। अनुभवी डॉ वैद्य उस युवती को देखते ही जान गई कि इसे हफ्ते पन्द्रह दिन तक कुछ नहीं होने का¸ हल्के दर्द उठ रहे होंगे बस।

लेकिन वे हतप्रभ रह गई ये देखकर कि उनकी बहू ने उसे अपने केबिन में बमुश्किल पाँच मिनट जाँचा परखा और इमरजेन्सी केस घोषित कर ड़ाला! सारा परिवार सकते में। एक सदस्य मोबाईल से जाने किस किस को फोन करने लगा। दूसरा अस्पताल के काऊण्टर पर नोटों की गड्डियाँ रखने लगा और देखते ही देखते उस सामान्य सी दिखाई देती लड़की की ऑपरेशन द्‌वारा प्रसूति करवा दी गई।

डॉक्टर वैद्य बहू के ए सी केबिन में पहुँची तब वह सब से बेखबर¸ किसी से फोन पर बतिया रही थी।

"अरे अब कोई सहन करने की तकलीफ से बचना चाहे तो इमरजेंसी डिक्लियर करनी ही पड़ती है। एनी वे! इस बार का लोन इन्टॉलमेंट तो पूरा पक गया। तू सुना!"

डॉक्टर वैद्य को काटो तो खून नहीं। ये था उनकी विश्वस्त गीताबाई का नौकरी छोड़ने का कारण और काबिल बहू का पैसा कमाने का नया तरीका...

हक

"जल्दी करना सारा! पार्टी शुरू होने में घण्टा भर ही बाकी है।" अश्विनी ने फट से फोन पटका और तैयार होने के लिये कमरे में बंद हो गई।

नियत समय से दस मिनट पूर्व अश्विनी के घर पहुँची शालीन लिबास में लिपटी सारा को अश्विनी के तैयार न होने के कारण पन्द्रह मिनट और रूकना पड़ा।

"वॉओ ! लुकिंग ग्रेट। यार तुम इतनी जल्दी कैसे मैंनेज कर लेती हो सारा! मुझे तो ड्रेस डिसाईड करने में ही आधा घण्टा लग जाता है।" अश्विनी ने पूछा।

"मेरे लिये ये काम मेरी मम्मी कर देती है अश्विनी।" सारा ने सरलता से कहा।

"क्या मतलब? यानी तुम पार्टी में क्या पहनोगी ये डिसीजन भी अभी तक तुम्हारी मम्मी लेती है? बी मैंच्योर सारा! क्या तुम्हें सूट करता है उनका चॉईस?" अश्विनी ने कह तो दिया फिर जीभ चबाई कि उसने ही सारा को अच्छे लुक्स के लिये अभी कॉम्पलीमेंट दिया है।

सारा गंभीर हो उठी। "जिन्होने ये जिंदगी ही मुझे गिफ्ट की है¸ वे क्या मेरे लिये ड्रेस चुनने में गलती करेंगी अश्विनी? मैं तो इसे उनका राईट कहती हूँ।"

अब अश्विनी को अपनी पोषाक जाने क्यों¸ कुछ ज्यादा ही बदन उघाडू लगने लगी थी।

देशभक्ति

पूरा घर अंशुल के इर्द गिर्द जमा था। उसने रक्षा अकादमी की परीक्षा उत्तीर्ण की थी और अगले महीने से उसे ट्रेनिंग पर जाना था।

"आपकी माँ के थे चार - चार बेटे। सो एक का फौज में जाना सुहाया होगा उन्हें। मेरा एक ही दीपक है। मैं नहीं भेजने की इसे पूना।" माँ का कण्ठ अश्रुआर्द्र हो उठा था।

"लेकिन माँ! अंशुल की मर्जी जाने बगैर आप अपने इमोशन्स उसपर थोप तो नहीं सकती ना?" बहन अदिती तुनककर बोल पड़ी।

"और फिर मैं हूँ ना यहाँ आपके पास।" अदिती ने आगे कहा।

"तुम चुप रहो अदिती। अजी आप कुछ भी नहीं कहेंगे क्या?" माँ जल्द से लज्द निर्णय चाहती थी।

पापा वहीं कमरे में चक्कर काट रहे थे। जैसे कुछ सोच रहे हो। उनके लिये भी तो निर्णय लेना टेढ़ी खीर था। बरसों पुरानी फौजी परंपरा रही है गर में और अब इकलौता अँशुल। उनका भी कलेजा मुँह को आ रहा था। लेकिन निर्णय जो भी कुछ हो¸ इस वक्त दिल से नहीं दिमाग से लेना जरूरी था जिससे अँशुल का भविष्य और परिवार की परंपरा दोनों ही सुरक्षित रह सके। शाम को अदिती मुँह बनाए लॉन में टहल रही थी। उसे अचानक एक तरकीब सूझी।

दो दिनों के बाद माँ के हाथ में एक पर्ची थी और अंशुल घर से गायब! किसी सहपाठिनी से विवाह की बात लिखकर सारे घर को सकते में डाल गया था।

माँ वो चिट्‌ठी पढ़ती और रोती जाती।

"जाने कौन चुड़ैल है जो मेरे हीरे से लाल को ले गई अपने साथ! ये भी क्या उम्र है ये सब काम करने की? कहाँ तो मैं सपने सँजोए थी इसके आनेवाले कल के लिये और ये है कि हमारे मुख पर कालिख पोत गया है।"

अदिती और पापा दोनों तटस्थ थे। अँशुल घर से गायब।

"आपको कोई फर्क नहीं पड़ता है क्या? अब हम समाज में क्या मुँह दिखाएँगे? क्या कहेंगे कि हमारा बेटा किसी लड़की के साथ भाग गया? जाने क्या होगा अब! इससे तो अच्छा था कि वो पूना ही चला जाता।"

माँ विलाप करती रही। अदिती ने अँशुल का सामान बाँधना शुरू किया। पापा ने अँशुल के दोस्त के घर फोन किया।

"अँशुल! तुम्हारे कल का फैसला हो चुका है। तुम पूना जा रहे हो। जल्दी घर आ जाओ।"

आरोप

"देखो दिनेश! ये इस तरह से दिन भर घर में तुम्हारे दोस्तों का जमघट मुझे पसंद नहीं है। पढ़ाई पूरी कर चुके हो तो काम काज शुरू करो कुछ। और ये तो तुम जानते ही हो कि इनके बीच सर उठाकर क्यों रह पाते हो तुम!"

बाबूजी का फिर वही राग सुनकर दिनेश का मुँह कसैला हो आया। अब फिर वही दो साल पहले का आरोप उसपर मढ़ा जाएगा। उसने बाबूजी की दराज में से पाँच हजार रूपये लिये थे। अपने मित्र को उसकी माँ की बीमारी में देने के लिये। लेकिन रंगे हाथों पकड़ा गया था।

तब बाबूजी ने उसे घण्टों की डाँट फटकार और समझाईश के बाद माफ किया था। तब से आज तक¸ हर हफ्ते पन्द्रह दिन में इस घटना का जिक्र उसके सामने कर ही देते थे।

चूँकि अब दिनेश बड़ा हो गया था। इन आरोपों से तिलमिला उठता था। आज भी इस बिना वजह की असमय डाँट उसे गुस्सा तो दिला दिया था लेकिन वह गम खा गया। लेकिन बाबूजी कहते ही चले।

"कदम बहकने लगे थे तुम्हारे। याद है ना सब कुछ? मैं माफ नहीं करता तुम्हें और पुलिस को तलाशी में तुमसे रूपये मिल जाते तो सोचो क्या अंजाम होता था!"

"जो भी होता बड़ा अच्छा अंजाम होता बाबूजी!" अब दिनेश फट ही पड़ा था।

"आपने रूपये चुराते हुए मुझे रंगे हाथ पकड़ा था ना? अच्छा होता यदि आप मुझे पुलिस के हवाले ही कर देते। अरे पाँच हजार चुराने की सजा क्या होती? ज्यादा से ज्यादा साल भर ना! लेकिन आप जो मुझे हर किसी बात पर सलाखों के पीछे ड़ाल देते है¸ उससे तो लाख गुना अच्छी होती। आप यही चाहते है ना कि आपकी दी हुई इस माफी को मैं जिंदगी भर नहीं भूलूँ? लेकिन आपकी यही इच्छा आपका कद और कम कर देती है। काश कि इस एक गलती की सजा मैं काट आया करता। आप यूँ वक्त बेवक्त मुझे कटघरे में न खड़े करते।"

दिनेश धड़ाक से दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। बाबूजी मुँह फाड़े उसकी बातें सुनते रहे।

तभी पीछे से माँ आ निकली। बाबूजी को जैसे तिनके का सहारा मिला हो।

"देख रही हो भाग्यवान! हमारे सपूत के लक्षण! कैसे बातें बनाने..."

"कोई गलत बात नहीं कही उसने।" माँ ने बात काटते हुए कहा।

"लड़का बड़ा हो गया है। कद में बराबर आने लगा है। आप चाहते है कि उसे एक गलती के लिये माफ करके आपने कोई किला फतह कर लिया है जिसका बोझा वह बेचारा जिंदगी भर उठाए घूमता रहे?" माँ का चेहरा तमतमा उठा।

"उसकी यही गलती हुई ना कि वो पकड़ा गया? गनीमत समझिये कि आपके पिताजी नहीं जानते कि आपने उनके दस्तखत की नकल करके कितनी ही बार अपनी गाड़ी खींची है। बस पकड़ा गया ही चोर नहीं होता।"

और बाबूजी पहली बार पकड़े गये थे।

पता नहीं

"पता नहीं इन हवाओं का रूख कब बदलेगा¸ कब हमारे दिन फिरेंगे। लगता है जैसे भगवान का ध्यान ही कहीं और है।"

"ऐसा कहते हुए तुम अपनी खुद की ताकद को क्यों भूल जाते हो? तुम्हें हाथ - पैर मेहनत करने के लिये मिले है। ये दिमाग चलाकर काम करने के लिये मिला है और ..."

"अब बस भी करो ये लंबी चौड़ी हाँकना। खुद तो चाँदी का चम्मच लिये जन्मे हो। छोड़ क्यों नहीं देते इस दौलत को और खुद क्यों नहीं पसीना बहाकर अपनी जिंदगी जीते? खाने - पीने¸ पहनने ओढ़ने की चिंता न हो तब ही सूझती है ऐसी दार्शनिकता।"

"तुम क्या समझते हो मैं इस तरह की मेरी जिंदगी से खुश हूँ? कितनी भी मेहनत करने के बाद भी तो यही सब कुछ सुनना पड़ता है कि बरसों पुरानी जायदाद है उसे ही आगे बढ़ा रहे है। अपना तो जैसे कोई वजूद ही नहीं है।"

"वजूद बनाना पड़ता है। जमीन जायदाद के जैसा वो भी विरासत में नहीं मिला करता। नकल के आदी हो जाते हो तुम सब। जैसा बाप दादों ने किया¸ बस दोहराने लगे।"

"तुम सब होते ही ऐसे हो। मेरे पापा ठीक ही कहते है। तुम्हारे भाग्य में सुख सुविधाएँ¸ धन दौलत नहीं है ना इसलिये जलते हो। खुद तो कुछ कर नहीं पाते और हमें नाम धरते हो।"

"देखा तुमने? तुम्हारे विचार भी तो तुम्हारे अपने नहीं है। पिछली पीढ़ी के विचार लेकर नई पीढ़ी से लड़ोगे तो हार जाओगे बाबू। तकलीफ है इस दुनिया से तो निकल आओ धन दौलत की गुदगुदी दुनिया से बाहर। खुद सवाल करो ऊपरवाले से और फिर देखना जवाब कैसे नहीं मिलता।"

"तुम्हारी बातें तुम्हारे पास ही रहने दो। जाने कब सुधरोगे तुम लोग। इसी तरह से पैसे - पैसे को मोहताज होते हुए अपने भाग्य को रोते रहोगे।"

ये कहते हुए कथित धनिक निकल पड़ा था या शायद भाग रहा था सच्चाई से।

उसे अपनी प्रेयसी से मिलने जाना था। मन हुआ कि उसके लिये खुशबूदार रजनीगंधा ले चले। लेकिन याद आया कि उसके धनाढ्‌य परिवार में कोई भी पांच रोज से नीचे नहीं उतरा था। बनावटी और उधारी सोच के साये तले पलता यह उस धनिक का तीसरा प्रेम था जिसमें उसने ढ़ेरो परफ्यूम¸ सॉफ्ट टॉयज¸ ईयरिंग्स¸ ब्रेसलेट¸ फूल¸ कार्ड आदी न्यौछावर किये थे।

फिर भी एक धुकधुकी सी लगी रहती थी कि पता नहीं कब¸ क्या कहाँ बिगड़ जाए। उनका सारा वक्त "प्लीज"¸ "इफ यू ड़ोंट माईंड़"¸ "आई विल कीप फेथ ऑन यू"¸ "मैं लेट हो गया इसलिये चॉकलेट्‌स" और "हमारी मुलाकात की मंथली एनीवर्सरी है इसलिये डिनर" जैसे छुईमुई नुक्तों पर¸ इस रिश्ते को जिलाए रखने में बीतता था।

उधर फक्कड़ दार्शनिक आदमी ने अपने सात वर्ष पूर्व के अखण्ड़ प्रेम से कहा¸ "अब उपहार नहीं हम दोनों के मध्य। बस मैं ही हूँ तुम्हारी हर उमंग और अपेक्षा का उत्तर!"

प्रतिक्रिया में उसके प्रेम की आँखों में था अपनापन और सम्मान¸ खरे सोने सा। जिसका किसी कैरेट या तोले माशे में कोई मूल्य नहीं था...

घर

दूसरे¸ तीसरे और चौथे माले पर रहने वाली मिसेस शर्मा¸ मिसेस गुप्ता और मिसेस तिवारी। टीनों ही कुछ समय के लिये अपने बेटे बहुओं के पास रहने के लिये आई थी सो उनकी दोपहर की महफिलें जमा करती थी।

मिसेस शर्मा कहती चली¸ "मेरी बहू भी क्या लड़की है? काम से लौटते हुए पकी हुई चपातियाँ और साफ की हुई सब्जी ले आती है। घर आकर पन्द्रह मिनट में खाना तैयार। आग लगे ऐसी रसोई को। हम लोगों ने तो हमेशा से घर का पका खाना ह खाया हे। बुरा तो लगता है लेकिन क्या करें!"

"आपको कम से कम घर का पका कुछ तो मिलता है मिसेस शर्मा !" मिसेस गुप्ता ने कहा।

" हमारी बहूरानी तो ऑफिस से आते हुए दो - दो ट्‌यूशन्स करती आती है और साथ ही टिफिन बी ले आती है। दाल में भिगो भिगो कर रोटियाँ हलक से नीचे उतारनी पड़ती है। बुरा तो लगता है लेकिन क्या करें?"

अब कायदे से मिसेस तिवारी को अपना अनुभव बाँटना चाहिये था परंतु वे शून्य में तकती बैठी थी। आखिर मिसेस शर्मा ने टोका¸ "क्यों मिसेस तिवारी! आपकी बहू तो घर पर ही होती है। आपकी तो अच्छी कटती होगी।"

भारी आवाज में मिसेस तिवारी बोली¸ "मेरी बहू तो मेरे आते ही पूरा घर और मेरा बेटा ही मेरे भरोसे छोड़ अपने मायके चली जाती है... अच्छी कटती है मेरी।"

और वे उठकर चलने लगी। घर में बड़ा अँधेरा था।

चित्र - रेखा की डिजिटल कलाकृति

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इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,245,लघुकथा,1269,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,19,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,340,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2013,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,714,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,802,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,18,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,91,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,211,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: अन्तरा करवड़े की 53 लघुकथाएँ - 3
अन्तरा करवड़े की 53 लघुकथाएँ - 3
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