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अन्तरा करवड़े की 53 लघुकथाएँ - अंतिम किश्त

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लघुकथाएँ - 41 - 53

बोझ

"तो मैं यह समझ लूँगी कि मेरा कोई बेटा था ही नहीं।"

"माँ!"

"क्यों ! आश्चर्य हो रहा है ना मेरे वाक्यों पर? ऐसा ही मुझे भी लगता था जब तुम कहते थे कि¸ दो चार साल हम नहीं भी मिले तो क्या हुआ? मैंने शादी अपनी मर्जी से भी कर ली तो क्या हुआ? इन्सान को सब कुछ सहन करने की आदत होनी चाहिये। अब कहो¸ क्या तुम इन्सान नहीं हो?"

"तुम ये सब इतनी सहजता से कैसे कह सकती हो माँ क्या तुम्हारे पास मेरे लिये कोई प्रेम नहीं बचा? मैंने तो सोचा था कि हमसे लाख गलतियाँ हो लेकिन तुम हमेशा ही हमारा साथ दोगी। लेकिन मैं ही गलत था।"

"तुम्हारी यही सोच कहाँ थी बेटा जब दो बार स्वदेश वापसी के दौरान तुम इसी शहर की अपनी संपन्न ससुराल में महीने भर तक आतिथ्य ग्रहण करते रहे। माँ - बाप के लिये बस एक औपचारिक दिन रखा¸ उसमें भी हमारी बहू तबीयत खराब होने का बहाना बनाकर यहाँ नहीं आई।"

"वो समय और था माँ! उन्हें सहारे की जरूरत थी। और मैं प्रीती का स्वभाव तुम्हें नहीं समझा सकता। उसकी पहली डिलेवरी के लिये उसकी माँ आई थी हमारे यहाँ। इस बार कॉम्प्लीकेशन है इसलिये अपनों पर भरोसा करना चाह रहा था। तुम हो कि पराया किये दे रही हो।"

"संतान अपनी मनमानी को गलतियों का रूप देकर अपना स्वार्थ सिद्‌ध करती रहे और माँ - बाप को उनके कर्तव्य पालन और ममता की दुहाई दे देकर अपना काम आसान करती रहे। मैं अच्छे से जानती हूँ कि अब तुम्हारे ससुरजी का बिजनेस बैठ गया है और वहां भी तुम्हारे ही एक गलत निर्णय के कारण। वहाँ जाकर आँख मिलाकर बात करने की हिम्मत नहीं है¸ मदद मिलने की उम्मीद नहीं है इसलिये यहाँ चले आए हो।"

"माँ! इतनी कठोर तो न बनो! ये तो सोचो कि अपना काम करते हुए मैं और प्रीती दो दो बच्चों को कैसे सम्हालेंगे? कुछ ही महीनों की ही तो बात है। मैं तुम्हें वापिस छोड़ने भी आऊँगा।"

"तुम्हारी गृहस्थी और हमारी नई बहू को देखने आना चाहती थी मैं। तुम्हें मदद करना ही चाह रही थी। लेकिन तब तो तुम जिम्मेदार और स्वावलंबी थे। तुमने ही कहा था कि हमने तुम्हें जन्म देकर¸ पाल पोसकर बड़ा किया¸ तुहारी पढ़ाई पर खर्च किया और अब हमारी जिम्मेदारी खत्म हो चुकी है।"

"माँ!"

"हाँ! और अब तुम्हारे बच्चों की जिम्मेदारी भी तुम्हारी अपनी है। इसके लिये अब तुम्हें मेरी जरूरत क्यों पड़ रही है? अपना किया हमने देखा। खुद का किया तुम देखो।"

शेखर चला गया था। रात प्रीती का फोन आया था।

"माँ प्लीज आ जाईये। मुझसे ये सब नहीं होगा। यहाँ नौकर बड़े महँगे है माँ। हम दोनों सब कुछ मैंनेज नहीं कर पाएँगे। वहाँ आने जाने में चौगुना खर्च हो जाएगा। आपके आ जाने से बड़ी सहूलियत हो जाएगी। हम दोनों वैसे भी साथ रहे नहीं है कभी। इसी बहाने अण्डर्स्टेंड़िंग हो जाएगी।"

माँ सुनती रही। प्रीती से उन्होंने वहाँ डिलेवरी करवाने और दो नौकर रखने की स्थिती में हो सकने वाले खर्चे की रकम मालूम की। दूसरे दिन उन्होंने स्वयं शेखर को बुलवाया। उसके हाथ में संभाव्य खर्चे से चौगुनी रकम का धनादेश रखा। शेखर हतप्रभ था।

"शेखर! यदि संतान ये समझती है कि माँ - बाप को बार - बार उनके रिश्ते की दुहाई देकर¸ कर्तव्यों की याद दिलाकर¸ जो बी चाहिये वह हासिल कर सकती है तब वह यह भूल जाती है कि यही वे माँ - बाप है जिन्होंने उन्हें जन्म दिया है।"

"......"

"हमेशा की तरह तुम्हारा इस बार का भी स्वार्थ पूरा किये दे र ही हूँ। लेकिन म्कौ ये अच्छी तरज्ह से जानती हूँ कि तुम मेरा भावनात्मक शोषण करते हुए ये रकम ले जा रहे हो। तुम्हारे स्वाभिमान को ठेस लगती हो तब भी तुम इसे मुझे लौताकर मुँह नहीं फेर सकते। याद रखो शेखर! कुछ ऐसी ही चोट तुम बरसों पहले मुझे दे चुके हो।"

शेखर काँप उठा। यही पैसा उसे देश से दूर ले गया। अब यही पैसा माँ बाप से अलग किये दे रहा है। उसके कदम बोझिल हो उठे थे। वह तय नहीं कर पा रहा था कि उसकी गलतियों का बोझ ज्यादा था या माँ - बाप के एहसानों का...

ममता

"ऊँ... आँ"

नवजात शिशु के रूदन से कमरा गूँज उठा। प्राची ने उनींदी¸ थकी आँखों से देखा¸ शाम के पाँच बज रहे थे। घण्टा भर पहले ही तो इसे दूध पिलाकर सुलाया था। कल रात भर भी रो रोकर जागता रहा था। प्राची को खीज हो आई। प्न्द्राह बीस दिन के उस नन्हे से जीव को गुड़िया जैसे उठाकर उसने गोदी में लिया। माँ का स्पर्श पाते ही वह गुलगोथना शिशु संतुष्ट हो गया। अपनी बँधी मुठ्ठियों की नन्ही¸ मूँगफली के दूध भरे दानों के जैसी ऊँगलियों को ही मुँह में लेकर चूसने लगा। प्राची को अब समझ में आया कि उसे क्या करना है।

तभी प्राची की माँ वहाँ आई।

"उठ गया क्या हमारा राजकुमार? चलो अब घूँटी पीने का समय हो गया है।"

"क्या माँ ! मैं तो परेशान हो गई हूँ इससे।" प्राची तुनक पड़ी।

"क्या हुआ?"

क्या क्या हुआ? सोने भी नहीं देता ढ़ंग से। एक तो रात रात भर जागता रहता है। हर घण्टे दो घण्टे में दूध चाहिये। कभी नैपी गंदा करता है तो कभी गोदी में रहना होता है। ऐसा ही रहेगा क्या ये?" प्राची रूआँसी होने लगी थी।

प्रसव के लिये मायके आई बेटी की इस परेशानी को समझते हुए माँ उसके पलँग पर ही पालखी लगाकर बैठ गई । नन्हे शिशु को गोदी में लिया और प्राची का सिर भी अपनी गोदी में रखकर उसे थपथपाने लगी। उनकी आँखों से आँसू बह चले। एक बिंदु प्राची के गल पर गिरा। उसने हड़बड़ाकर माँ को देखा। वे बड़बड़ा रही थी।

"जब तक इसे माँ चाहिये तब तक ये सुख भोग ले बेटी। आजकल पराए परदेसों का कोई भरोसा नहीं है। वो धरती निगल जाती है हमारे लाड़लों को।"

माँ प्राची के बड़े भैया की सामने ही रखी तस्वीर को देखे जा रही थी जो पिछले दस वर्षों से विदेश से वापिस ही नहीं आए थे।

नन्हे शिशु ने प्राची की ऊँगली अपने मैंदे से हाथ में थाम ली थी। प्राची ने अब उसे नहीं छुड़ाया।

टेस्ट

"देखो तो मौसी! वो है मेरी सहेली रीना।" श्वेता ने नेकलेस ठीक करते हुए कहा। मौसी ने गौर से देखा। एक चंचल आँखों वाली लेकिन परिपक्व व्यक्तित्व की स्वामिनी सुदर्शना युवती¸ आत्मविश्वास के साथ उनकी पार्टी में आ रही थी। हल्के नीले परिधान पर नाममात्र की साज सज्जा और चेहरे पर मोहक मुस्कान। साथ था उसका उतना ही शालीन मंगेतर¸ आनंद।

श्वेता ने उसे देखते ही मुँह बनाया । अपने दर्जन भर चूड़ियों वाले हाथ नचाते हुए कहने लगी¸ "देखो मौसी! मैं ना कहती थी? बड़ी स्टूड़ियस बनती है। सिंपल ब्यूटी के नाम से कॉलेज में जानी जाती थी। एन्गेजमेंट के बाद तो अच्छे से सज सँवर कर आना चाहिये ना पार्टी में?" श्वेता ने अपने ब्यूटीपार्लरित बाल लहराए और लिपे पुते चेहरे की अदाओं से बिजलियाँ गिरानी चाही।

मौसी मंद मंद मुस्कुराती रही। श्वेता फिर कह चली¸ "मुझे तो लगता है इसे ज्वेलरी या फैशन एसेसरीज का टेस्ट ही नहीं है। नहीं तो इस तरह से अपनी उम्र से बड़ा कौन दिखना चाहेगा भला?"वह एक बार फिर अपनी हाई हील पर डांवाडोल होते होते बची।

तभी रीना और आनंद एक साथ मुस्कुराते हुए आगे बढ़े। दोनों का जोड़ा जैसे एक दूसरे के लिये ही बना था।

"मुझे लगता है श्वेता!" मौसी ने कहा।

"रीना का टेस्ट¸ जिंदगी की सबसे जरूरी ज्वेलरी के हिसाब से तो काफी उम्दा है।"

श्वेता दाँत पीसती हुई लिपस्टिक टच करती रही...

ज्यादा जानकारी

कथा बड़े मार्मिक प्रसंग पर जाकर टिकी हुई थी। श्रीकृष्ण के विरह में सुध बुध खोती¸ उनके दर्शनों के लिये व्याकुल गोपियों की मन:स्थिती का बड़ा ही मार्मिक व सजीव चित्रण स्वामीजी कर रहे थे। भावुक भक्तों की आँखों से अविरल अश्रुधारा बही जा रही थी। तभी कथा पहुँची श्रीकृष्ण दर्शन के शुभ प्रसंग पर। श्रीकृष्ण का भव्य स्वरूप¸ गले में वैजयन्ती माला¸ मुरली की मोहक तान¸ गोपियों का आल्हाद¸ जीवन की पूर्णता का बोध। श्रीकृष्ण लीलास्थली जैसे उस कथास्थल पर जीवंत रूप में स्वामीजी की मधुर¸ सहज और भावपूर्ण वाणी में प्रस्तुत थी। भक्त तो भक्त¸ स्वामीजी का कण्ठ भी अश्रुआर्द्र हो उठता था।

कथा समाप्ति के बाद घर लौटते हुए शास्त्रीजी अपनी श्रीमतिजी से बोल ही पड़े¸ "क्या आनंद आता है इन स्वामीजी की कथा में तुम्हें? बड़ी भावावेश में आँसू बहाए जा रही थी! उनके ना तो भाषागत उच्चारण सही थे और कई स्थानों पर गलत व्याकरण का प्रयोग भी कर रहे थे।"

शास्त्रीजी का चढ़ा हुआ मुँह श्रीमति शास्त्री को जरा भी नहीं सुहाया।

"ये आप नहीं¸ आपके अंदर के हिन्दी भाषा के प्राध्यापक बोल रहे है। माना कि उच्चारण गलत थे। व्याकरण गलत था लेकिन ये सब कुछ एक भाव पर केन्द्रित था और वह है भक्ति।"

वे आगे बोली¸ "मुझे एक बात बताईये। सही¸ शुद्ध और शास्त्रोक्त भाषा में जब आप अपने छात्रों को तुलसी सूर के भक्ति पद भी पढ़ाते है तब क्या कोई भावावेश में आकर एक भी आँसू बहाता है? सही जानकारी भर बाँटते बाँटते उसका उद्‌गम स्थान शायद याद नहीं रहता आपको।"

अपनी भाषागत जानकारी के प्रति अति जागरूकता के चलते अब शास्त्रीजी की पलके भीगने को आतुर थी।

भेदभाव

लेखक संघ के प्रांगण में नये पुराने शब्द साधकों की गहमा गहमी थी। अवसर था¸ "भेदभाव" शीर्षक से आयोजित की गई कहानी प्रतियोगिता के परिणामों की घोषणा का।

आखिर द्ददय थामे बैठे प्रतियोगियों के बीच प्रथम पुरस्कार की घोषणा की गई । उम्रदाराज सोनीजी का नाम आते ही तालियाँ तो बजी ही साथ ही जिज्ञासाएँ भी बढ़ी।

तीसरे स्थान पर रहने वाली मिसेस जोशी बहू और बेटी के बीच भेदभाव करती सास की कहानी पर थी तो द्वितीय स्थान पर रहने वाले मिश्राजी ने अपने माँ बाप और सास ससुर के बीच भेदभाव करते बेटे का चित्रण अपनी कहानी में किया था।

"आपकी कहानी की थीम क्या थी सोनीजी?"

"मेरी कहानी का नायक है एक ऐसा बेटा¸ जो अपनी मिट्टी का नमक खाकर परदेस की जेबें भरने चला जाता है।"

ज्यादा कुछ न कहते हुए सोनीजी ने आयोजन से चलने की तैयारी की। इकलौता बेटा आठ वर्ष पूर्व परदेस जाकर बस गया था। बीमार मिसेस सोनी की देखभाल करने के लिये उन्हें जल्दी घर पहुँचना था।

वंशावली

दादाजी हर सप्ताह की भाँति आज भी अपनी पुरानी लोहे की पेटी खोलकर बैठे थे। पायल और पिनाक उन्हें इस मुद्रा में देखकर पहले ही दूर भाग जाया करते। वे अपनी कुल वंशावली निकालकर पीढ़ियों पुराने किस्से सुनाते। पुराने समय की असँख्य यादें आज भी उनके चित्त में अपना स्थान बनाए हुए थी।

दरअसल वही सब कुछ बार बार सुनकर बच्चों को बोरियत होने लगी थी। बच्चों के ये सब कुछ सुनने से मना करने पर वे बड़े प्रेम से समझाया करते थे।

"देखो बेटा! हमारे कुल¸ वंश और पीढ़ियों की जानकारी तुम्हें होनी ही चाहिये। यही तो हमारी असली संपत्ति है. कोई भी व्यक्ति अपने कुल नाम¸ वंश¸ गोत्र और जाति से ही तो जाना जाता है।"

"दादाजी!" नन्ही पायल बोल पड़ी।

"हाँ बिटिया!"

"मैं इन दिनों यदि किसी शख्सियत से सबसे ज्यादा प्रभावित हूँ तो वे है स्वामी विवेकानंद।"

"बड़ी अच्छी बात है बिटिया।"

"क्या आप बता सकते है उनके पिता¸ दादा¸ परदादा आदी का नाम और उनका गोत्र?"

"......"

"दादाजी! आज यदि उनके जीवन के इतने वर्षों के बाद भी उनके विचार¸ कार्य इतने सामयिक और सार्थक है तब उनका वंश¸ कुल¸ गोत्र मालूम न होने के कारण क्या हम उन्हें आदर्श नहीं मान सकते? सूतपुत्र होने के बावजूद कर्ण के कार्यों की सराहना तो की जाती है ना?"

दादाजी की त्यौरियाँ चढ़ने लगी थी। पायल ने सहज होकर कहा ¸ "दादाजी! मेरा मानना तो सिर्फ ये है कि जन्म लेना और जीना अलग है और जीकर कुछ कर दिखाना एकदम अलग। मुझे तो कुछ ऐसा कर दिखाना है जिससे सिर्फ मेरा नाम नहीं बल्कि मेरा काम आदर्श बने।"

"पायल दीदी!"

"आई विनू! बैठो तुम सब।"

पायल चल पड़ी। आज बस्ती के बच्चों की कक्षा में उसने विज्ञान के प्रयोग जो सिखाने थे।

रफ्तार

तूफानी गति से कार भाग रही थी। सुनसान हाईवे पर इस आधुनिक¸ सर्वसुविधायुक्त कार में बैठा था विवेक और पल्लवी का जोड़ा। शादी के बाद पहली बार लाँग ड्राईव¸ जून महीने की अलमस्त हवाएँ और चिकना सपाट रास्ता। विवेक तो जैसे बाँधे नहीं बँध रहा था। इस तरह की सुहानी शामें कितनी कम मिल पाती है जिंदगी में। यही तो एन्जॉय करने के दिन है। कार में कुछ इसी तरह की बातें हो रही थी।

तभी गप्पों के दौर के बीच जाने कहाँ से एक नन्हा सा बालक रास्ते पर आ निकला। उसकी मजदूरनी माँ पीछे पीछे दौड़ती हुई आ रही थी। विवेक ने देखा लेकिन गति नियंत्रित करनी बड़ी मुश्किल थी। बच्चे की माँ ने जोर से उसका हाथ खींचा। विवेक ने भी स्टेयरिंग दूसरी ओर मोड़ा।

बालक के पैर में गंभीर चोट आई। लेकिन विवेक¸ गति नियंत्रित करने के स्थान पर उस बालक की माँ की लापरवाही को लेकर लंबी चौड़ी बातें करता रहा। उन्होंने रूककर बालक को देखा भी नहीं।

बातें धीरे धीरे उनके वैवाहिक जीवन के भविष्य और सपनों पर जाकर टिकी। उन्हें अब बचत करने की आवश्यकता थी। दोनों को मिलाकर गृहस्थी चलानी थी। तभी तेज गति से चलती कार के रेडियो पर "तेल बचाओ सप्ताह" के तहत कुछ विज्ञापन प्रसारित होने लगे।

"क्या आप जानते है? अपने चार पहिया वाहन की गति को नियंत्रित कर आप ईंधन की एक चौथाई तक बचत कर सकते है!"

और कार की गति नियंत्रित हो गई।

पल्लवी को लगा जैसे एक मानव के जीवन पर एक चौथाई ईंधन के बराबर रूपयों की कीमत भारी पड़ी हो ...

जीनियस बालक

"मिठू! देखो कल मैंने डिस्कवरी चैनल के "विंग्स" प्रोग्राम से तुम्हारे लिये कुछ नोट्‌स निकालकर रखे है। उन्हें पढ़ जरूर लेना। और हाँ स्कूल की साईंस एक्जीबिशन का क्या हुआ?"

"वो तो सेवन ईयर्स एण्ड़ अप के लिये है ना मम्मी! मैंने मिस से पूछा भी था। वे बोली नेक्स्ट टाईम।"

"ठीक है। लेकिन इंग्लिश स्पेलिंग काँपिटिशन में तुमसे आगे कोई भी नहीं जाना चाहिये समझे? हमें उसकी पूरी तैयारी करनी है ओ के?"

"डन मम्मी!"

और मम्मी ने अपने मिठू को प्यार से देखा। छ: साल का उनका लाड़ला पूरी तरह से उनहीं अपेक्षाओं पर खरा उतर रहा था। और हो भी क्यों नहीं¸ वे खुद भी तो कितनी मेहनत कर रही थी उसके पीछे। उसे क्लास में चल रहे कोर्स से हमेशा एक लैसन आगे रखना¸ ट्‌यूशन्स के अलावा भी खुद पढ़ने लेकर बैठना¸ उसके जनरल नॉलेज के लिये ढ़ेरो पुस्तकें सी-डी आदी लाना। क्या कुछ नहीं किया था अपने मिठू के लिये उन्होंने।

मिठू भी पढ़ाई में होशियार था। क्लास में हमेशा पहले पाँच में रैंक होता था उसका। बाकी एक्टीविटीज में भी उसके उत्साह की सभी तारीफें किया करते थे।

उसकी मम्मी को इन दिनों चिंता थी उसके स्कूल में होने वाली इंग्लिश स्पेलिंग काँपिटिशन की। इस राउण्ड के बाद यदि मिठू जीत जाता है तो इण्टर स्कूल इंग्लिश स्पेलिंग काँपिटिशन में वह अपने स्कूल को रिप्रेजेन्ट करेगा। फिर सिटी लेवल¸ स्टेट लेवल¸ नॅशनल लेवल और इन्टरनॅशनल लेवल।

"मेरा मिठू तो सबसे आगे रहेगा।" ऐसा सोचते हुए उन्होंने काफी बड़े सपने बुनने शुरू कर दिये थे।

मिठू की इंग्लिश स्पेलिंग काँपिटिशन क्या हुई¸ पूरे घर में जैसे भूचाल आ गया हो। दादाजी की दवाईयों के रैपर से लगाकर किराना सामान के खोके¸ टी वी कमर्शियल्स से लगाकर अखबारों की कटिंग्स तक सब कुछ मिठू के पढ़ने के लिये तैयार रखा जाता। उसकी मम्मी का बस चलता तो उसे पुरा शब्दकोष ही रटवा देती लेकिन उन्होंने सुन रखा था कि इस इंग्लिश स्पेलिंग काँपिटिशन में ज्यादातर वे ही शब्द पूछे जाते है जिनके बारे में हम सभी की यही धारणा होती है कि हम इन्हें जानते है लेकिन वास्तव में वे बड़े मुश्किल होते है। उसकी काँपिटिशन न हुई मम्मी का ब्लड़ प्रेशर हो गया जो दिन पर दिन बढ़ता ही जाता था।

दुकानों के बोर्ड्‌स¸ न्यूज चैनल के स्क्रोलर्स¸ शेयर मार्केट की शब्दावलियों से लगाकर बॉटनिकल नेम्स तक सभी की जानकारी छोटे से मिठू के पीछे पड़ी थी कि कब वह अपने नन्हे से मस्तिष्क में उन्हें छोटी सी जगह दे।

यहाँ तक कि आजकल वह कुछ भी बोलने से पहले भी डरने लगा था। मम्मी उसके कहे हुए शब्द शब्द का हिसाब रखते हुए उसे बेहाल किये रहती। उसे प्रत्येक कहे हुए शब्द का स्पेलिंग मालूम होना जरूरी था।

मिठू कभी कभी सोचता कि यदि उसे यह पुरस्कार नहीं मिला तो मम्मी तो शायद बिस्तर ही पकड़ लेगी। हो सकता है स्युसाईड भी कर ले। और वह टेंशन में आ जाता कि उसे स्युसाईड की स्पेलिंग याद है या नहीं।

इस दबाव से घिरा हुआ मिठू आज बड़ा कमजोर¸ थका हुआ और सुस्त दिखाई दे रहा था। दो दिन के बाद इंग्लिश स्पेलिंग काँपिटिशन थी इसलिये मम्मी को लगा कि वह नर्वस हो रहा है। उन्होंने उसी हालत में¸ उसकी कमजोरी की कोई परवाह किये बिना इंस्टंट स्पेलिंग सॉफ्टवेयर पर टेस्ट आजमाया। अच्छे से ध्यान न दे पाने के कारण मिठू नब्बे प्रतिशत ही ला पाया। कल तक वह निन्यानवे तक पहुँच गया था और मम्मी के हिसाब से इन दो दिनों के अभ्यास से वह पूर्ण भी हो जाता था।

उन्होंने मिठू को फटकार लगाई। कॉन्सेन्ट्रेशन की कमी का ताना मारकर वे चली गई।

इधर मिठू परेशान हो रहा था। आँखें जवाफूल सी लाल¸ बदन गर्म सलाख सा तपता हुआ। टूटन और कँपकँपी से वह थक गया था। सर्दी खाँसी और तेजी से चलती साँस के बीच भी वह मेडिकल सॉफ्टवेयर के सिमटम्स वाले पेज पर गया। उसने अपने सिमटम्स डाले लेकिन तभी एक चक्कर खाकर गिरने को हुआ ।

मिठू दिन भर अपने कमरे में पड़ा रहा। न खाना खाया न किसी से बातचीत की। मम्मी के ड़र से घर में किसी ने भी नहीं पूछा कि उसे क्या हो रहा है।

मम्मी दिन भर¸ "नर्वस हो रहा है" "आज पॉईंट कम स्कोर किये है इसलिये पढ़ रहा होगा" जैसी बातें बताती रही।

मिठू के पापा रात दस बजे घर लौटे। हमेशा की तरह मिठू के कमरे में गये। उन्होंने देखा¸ उनका प्यारा बेटा बुखार में भी कुछ बड़बड़ा रहा था।

"ई...एन...एफ...।" वे झल्ला उठे। पूरे घर को सिर पर उठा लिया।

"किसी को कोई खबर नहीं है मेरा बेटा यहाँ बुखार में तड़प रहा है।"

मिठू से पूछने पर कि उसे क्या हो रहा है¸ वह घबरा जाता। उसने किसी से कुछ नहीं कहा। बस यही कहता रहा¸ "अभी नहीं¸ थोड़ी देर से बताऊँगा।"

जल्दी से डॉक्टर को बुलाया गया। सभी चिंतित थे और सभी की उपस्थिति में मिठू ज्यादा घबरा रहा था। डॉक्टर ने सभी को कमरे से बाहर जाने को कहा।

"बोलो मिठू बेटे। क्या हुआ है तुम्हें? मुझे नहीं बताओगे तुम्हें क्या हो रहा है?"

"डॉक्टर अंकल! आप मम्मी को तो नहीं बताएँगे ना?"

"अच्छा नहीं कहूँगा। बोलो भी अब।"

"मुझे इन्फ्लुएंजा हुआ है। मैंने मेडिकल सॉफ्टवेयर में सिमटम्स डालकर मालूम कर लिया था। लेकिन मम्मी से कहता तो वे उसकी स्पेलिंग पूछती। मैं क्या करूँ¸ मुझे याद ही नहीं हो रही।"

और मिठू फिर बड़बड़ाने लगा "ई...एन...एफ"...

गहरी जड़ों के नाम पर

"सारी जिंदगी घर को सजाने सँवारने में ही लग जाएगी। जाने इसमें चैन से रहेंगे कब!" खिड़कियों के शीशे पोंछते हुए शिखा बड़बड़ा रही थी। परसों ही तो साबुन से धोकर साफ किया था ये सब कुछ। फिर गलीचा धूप में डालते - डालते वह पसीना पसीना हो आई।

"इस घर के मर्द भी बस नाम को जिंदा है। बस खाने को और हुक्म चलाने को। हुँह।" उसने खुद ही बड़बड़ाते हुए फोन के आस पास का बिखरा सामान साफ किया। सुबह ऑफिस जाते हुए सभी अपने कपड़े¸ तौलिये¸ गंदे रूमाल यहाँ - वहाँ बिखेर गये थे। रोज घर का यही हाल होता था।

शादी के कुछ दिनों बाद तक रितेश थोड़ी बहुत शिखा की सुना सुनी अपना काम करने लगे थे। लेकिन बाबूजी की तीखी आँखें जब भी उन्हें घर का कोई भी काम करते हुए पकड़ती¸ दूसरे ही क्षण वे ऐसी राजनीति खेलते कि शिखा जल भुनकर राख हो जाती।

एक बार रविवार के दिन घर भर के परदे धोकर थकी माँदी शिखा ने रितेश को बस परदों भरी बाल्टी छत पर रख आने को कहा था। बाबूजी ने मौका ताड़ झट समधीजी को फोन लगाया। बातचीत में लगा बुझाकर कह ही दिया¸ "आपके जँवाई तो गुलाम बने आपकी बिटिया के साथ कपड़े धो रहे है। अब आखिर एक ही तो दिन मिलता है छुट्‌टी का तब भी चैन नहीं। ये औरतें तो घर में ही बैठी रहती है रोजाना।"

ऐसा एक नहीं कई बार हुआ। बाबूजी वैसे उसकी बड़ी इज्जत करते। चार लोगों के बीच तारीफ करते न थकते। माँजी के बाद घर की सारी जिम्मेदारी उसी पर सौंप रखी थी। शिखा की शादी के ड़ेढ़ साल बाद ही मँझला देवर राकेश एक विजातीय लड़की को चुपचाप ब्याह लाया था। पहले से ही घर के कामों में हड्डियाँ गला चुकी सास और उसी रास्ते पर चलती जेठानी के साथ वह नई लड़की कोई तारतम्य नहीं बैठा पाई।

पुरूष यदि कोई गलत तथ्य कह रहा हो तो उसे स्त्री ने सुधारना जबान चलाना क्यों कहा जाता है? घर में जब रहते सभी है तब थोड़ा थोड़ा काम सभी को करने में क्या हर्ज है?बाबूजी पानी तक अपने हाथ से क्यों नहीं लेते? ऐसे और न जाने कितने और सवाल मन में लिये वह दो महीने तक संघर्ष करती रही। सोचती रही कि या तो मन को समझ में आने वाले इन सवालों के जवाब ढूँढ़कर यहीं रम जाए या फिर अपनी जीवन शैली इन सभी को सिखाए जिसमें प्रत्येक को अपने अधिकार और अपना व्यक्तित्व था।

खैर! सुचित्रा एक उन्मुक्त आकाश में पली बढ़ी सुशिक्षित लड़की थी। उसे इन बंधनों में बाँधना ही बेवकूफी थी। शादी के तीसरे ही महीने शहर के मधय एक बहुमंजिला भवन में फ्लॅट लेकर उन्होंने अपना अलग जहान बसाया। सुचित्रा ने छोटी सी नौकरी करनी शुरू की। वे बिना किसी से बैर मोल लिये सुखी थे।

लेकिन बाबूजी के हिसाब से¸ उनके घर से जाने के बाद से ही माँ बीमार रहने लगी थी और छ: महीने के भीतर ही चल बसी। मेडिकल रिपोर्ट्‌स से यह मालूम होने के बाद भी कि उन्हें पुरानी दिल की बीमारी थी¸ बाबूजी ने राकेश और सुचित्रा का मुँह देखना तक बंद कर दिया। उनके विचार से सुचित्रा का यूँ घर छोड़ना ही माँ की मृत्यु का कारण था।

"अब ये सब कुछ क्या लेकर बैठ गई हूँ मैं!" महरी की आवाज से शिखा की तंद्रा टूटी। अलबम अवेरते हुए उसने थोड़े बहुत फोटो क्या पलट लिये थे¸ यूँ ही दिमाग में फितूर उठने लगे थे। साढ़े दस बज रहे है और सारा रसोईघर वैसा ही पड़ा है।

तभी बाबू जी किसी के साथ बैठक में दाखिल हुए।

"ऐसा है मिश्राजी! हमारे परिवार के रीति रिवाज¸ हमारे संस्कार इतने गहरे है ना! इसी के ऊपर तो हम लोग टिके हुए है साहब।"

ये संभाषण सुनकर शिखा के होश फाख्ता हो गये। बाबूजी फिर उन्हीं गहरी जड़ों वाले संस्कारों¸ मर्यादाओं और पीढ़ीजात परंपराओं का पुलिंदा लेकर बैठे है। इसका मतलब मिश्राजी आज यहीं खाना खाएँगे। अब तक शिखा को चाय तक पीने का वक्त नहीं मिला था।

वो सुबह तो कैसे कसरत करते हए निपटी थी शिखा ने उसका भगवान ही जानता है। थक हार कर खाना खाने ही बैठी थी कि फोन घनघनाया।

रमन की आवाज थी। उसका सबसे छोटा देवर।

"वो भाभी! मैंने कहा था ना¸ साक्षी को वो स्पेशल कचौड़ियाँ बनानी सीखनी है आपसे। तो वो अभी आधे घण्टे में ही पहुँच रही है घर पर। अपनी होने वाली देवरानी को अच्छे से ट्रेण्ड़ कर देना प्लीज!"

उधर से रमन की शरारत भरी हँसी के साथ फोन बंद हुआ। शिखा कसककर रह गई। उसे बाबूजी के सारे शब्द हथौड़े के जैसे कानों पर बजते हुए से महसूस हुए।

"हमारी गहरी जड़ैं है ये संस्कारों की। मर्यादाएँ¸ परंपराएँ बड़ों की इज्जत¸ सबको साथ लेकर चलना¸ ये सब हमारे घराने की विशेषताएँ है।"

क्या खाक विशेषताएँ है! इनमें से एक भी तो विशेषण आपके अपने कर्मों का फल नहीं है। मर्यादाएँ स्त्रियों के लिये है कि वे काम करती रहे¸ ऊफ न करें। परंपराएँ घर में निभती है और घर में रहती है औरतें तो निभाएगा कौन? बड़ों की इज्जत बहुओं को ही करनी होती है। रही सबको साथ में लेकर चलने की बात तो चौतरफा हमलों को लेकर पुरूष हमेशा से ही तो स्त्री की छाती पर सवार होता है जैसे कि वह कोई अष्टभुजा देवी हो और नाच नाच कर पुरूष की सारी जरूरतों को पूरा करते हुए उसके पुरूषत्व के खोखले अहं की पुष्टि करती रहे। जरा सी भूल चूक में उसके मायके का उद्धार और खुद की ऊँचाई का बखान। नींव के पत्थर जैसी जमींदोस्त होती इस घर में औरतें ही तो पुरूषों को अपने ऊपर खड़ा होने का मौका देती है।

"कहने को मालकिन होकर भी मैं क्या दो कौर भी शांति से खा नहीं सकती हूँ क्या?" शिखा झल्ला उठी।

साक्षी है रमन की मंगेतर। तीन महीने बाद शादी होने वाली है और रमन चाहता है कि सुचित्रा भाभी जैसी भूल साक्षी से न हो। इसलिये घर के तौर तरीके¸ काम करने का सलीका आदी सीखने के लिये किसी न किसी बहाने से उसे शिखा भाभी के पास भेजता रहता है।

कुछ ही देर के बाद साक्षी घर पर थी। शिखा का उतरा हुआ चेहरा¸ थकी माँदी देह¸ आधी छूटी थाली और ओढ़ी हुई मुस्कान काफी कुछ कह रही थी। साक्षी को समझते देर न लगी। उसे शिखा भाभी के वर्तमान में स्वयं के भविष्य की झलक पाई और मन ही मन दृढ़ निश्चय कर बैठी कि ऐसा जीवन तो कतई नहीं।

वो कुछ कह पाती इससे पहले ही बाबूजी बैठक में पधारे। "अच्छा तो छोटी बहू आई है।"

"जी बाबूजी।"

शिखा बाबूजी को साक्षी से बाते करते देख अपना बाकी काम निपटाने लगी। कुकर में कचौड़ी के लिये आलू उबलने रखे। मैदा नापकर थाली में ड़ाला। तभी फिर वही संभाषण कानों पर पड़ा जो सुबह मिश्राजी सुनकर गये थे।

"हमारा परिवार इतने गहरे संस्कारों की जड़ों से बना है कि..." शिखा को लगा कि उसके कान बज रहे है।

तभी साक्षी ने मुस्कुराकर उनकी बात काटते हुए कहा¸ "माफ कीजियेगा बाबूजी! इस परिवार के रीति रिवाज और परंपराओं के विषय में आप मुझे पहले भी चार पाँच बार समझा चुके है। और हाँ! मैं ये भी जानती हूँ कि सुचित्रा भाभी और राकेश भैया का आप मुँह भी देखना पसंद नहीं करते। क्योंकि वे इस परिवार की रीति के अनुसार नहीं चले। और इस वजह से माँजी चल पड़ी। लेकिन बाबूजी एक बात कहूँ?"

"हूँ..."

"डॉक्टर श्रीवास्तव जिन्होंने माँजी का इलाज किया था वे मेरे दूर के अंकल लगते है उन्होंने ही मुझे बताया कि उन्हें पुरानी दिल की बीमारी थी। खैर ! ये सब बातें ..."

"साक्षी ऽऽ"

बात बिगड़ती देख शिखा ने अंदर से आवाज दी। कोई प्रति-उत्तर नहीं मिला। साक्षी कहती चली।

"देखिये बाबूजी जिन गहरी जड़ों से जुड़े रहने की आप बातें करते है उन जड़ों को भी तो स्वाभिमान¸ सम्मान और अधिकार के पानी की आवश्यकता होती है। ये तो अन्याय ही होगा कि सारी प्रशंसा फूल पत्ते ही बटोर ले जाएँ और जड़ें गहरी और गहरी दबती जाएँ! इतनी कि अपना अस्तित्व ही खो दे...!"

शाम को रमन ने खाना लगाने में शिखा भाभी की मदद की। अपने कपड़े व्यवस्थित रखे।

"क्यों रे रमन! साक्षी यहाँ से सीधी तेरे पास आई थी क्या?" शिखा ने आश्चर्य से पूछा।

रमन बस मुस्कुराकर रह गया...

बेटी

"ये तो बात तुम्हारी गलत है दद्‌दा।"

दिनेश चबूतरे पर से उठ खड़ा हुआ था।

"जरूरत तुम्हारी आन पड़ी है सो हमारी जिज्जी की दुहाई देते पहुँच गये हो। इतने ही रिश्ते निभते तुमसे तो हमारे विकास को ये दिन ना देखना पड़ते। आए हो जँवाई बनने। अब वो लखनपुर की ससुराल याद नहीं आई?"

"बाबू!" पिताजी की हुक्के वाली सधी आवाज गूँजी।

वे खँखारकर गला साफ करते हुए कमरे से बाहर जाने के लिये उठे। उमा ने सहारा देना चाहा लेकिन उनकी
वक्र दृष्टि ही ना के लिये काफी थी। बाहर आकर देखा¸ सर झुकाए सदानंद बाबू बैठे थे। दिनेश वहीं पर¸ आधे घण्टे पहले झाड़ी बुहारी हुई जगह पर जबर्दस्ती झाड़ू फेरकर गुस्से को दबा रहा था।

"प्रणाम पिताजी!" सदानंदजी अनमने भाव से झुके।

इधर एक हूक सी उठी। इस व्यक्ति को देखकर न चाहते हुए भी वो सब याद आ जाता है।

कैसा हँसता गाता घर था। कैसी झिलमिल बारात उतरी थी। गाँव उलट पड़ा था दूल्हे की एक झलक पाने को। बिदाई के वक्त दुल्हन बनी रमा बिटिया और ये ही दूल्हा जब आशीष लेने को झुके थे तब पिताजी की एक आँख बेटी की बिदाई को रोई थी और दूसरी¸ अच्छा घर वर मिलने पर बेटी के भाग जगने की खुशी में बरसी थी।

रमा¸ उनकी पहली संतान। उन्हें पिता के गौरवपूर्ण पद पर आसीन करने वाली उनकी लाड़ली। जाति समाज की भी फिक्र किये बिना उन्होंने रमा को कॉलेज भेजा। बी कॉम करवाया। पढ़ी लिखी¸ काम काज में गुणी और सुंदर बिटिया को घर भी ऐसा मिला था कि एक पल को तो उधर से हाँ आने पर पिताजी को खुद के कानों पर भरोसा नहीं हुआ था।

वही रमा शादी के दूसरे ही साल प्यारे से बेटे के दोनों कुलों को निहाल कर बैठी थी। कितने चाव से सारे नेग शगुन दिये और रीती रिवाज निभाए थे पिताजी ने। दिनेश और उमा तो दिन भर जीजी¸ जीजाजी और छुटके की ही बातें किया करते। उसके भाग्य पर इतराते फिरते।

उसी रमा ने फिर मामूली बुखार में जो बिस्तर पकड़ा था। डॉक्टरों के इलाज के लिये शहर ले जाने की बात पर आगे पीछे होते हुए ये सदानंदजी ही अपनी माँ के कहने पर नीम हकीमों के चक्कर में पड़े थे। और सही इलाज के अभाव में रमा दीदी¸ चार साल के विकास को छोड़कर चल बसी।

पिताजी अंदर से टूट गये थे। वो तो दिनेश ने खेती बाड़ी सम्हाली और काम काज अपने हाथ में लिया तब जाकर धीरे धीरे सब कुछ ठीक होने लगा था।

तभी खबर मिली थी सदानंदजी के दूसरे ब्याह की।

"कोई जादू टोना ही किया है कँवरजी पे उन लखनपुर वालों नें । कहाँ तो सोने सी सुंदर बिटिया मेरी और कहाँ उस साहूकार की मँझली बेटी ला रहे है। जाने क्या गुल खिलाएगी अब।"

बाबूजी हर आए गये को यही सुनाते। माँ पर तो जैसे दु:खों का पहाड़ ही टूट पड़ा था। चूल्हे में जलती आग के जैसे उनका जी भी जला करता था। दिनेश और उमा भरसक स्वयं को सामान्य बनाए रखने का प्रयास किया करते। सबका जी जुड़ता था कहीं तो बस छुटके का ख्याल करके। नन्हीं सी जान! स्कूल जाने लगा था। मम्मी को याद करके रोना भूला भी नहीं था अभी कि ये सौतेली माँ आ बैठी है। जाने क्या सीख पढ़कर आई होगी।

खैर! विमला ने इन लोगों से अपने संबंध बखूबी निभाए। उसकी सास को पसंद तो नहीं आता था लेकिन विकास को लेकर रमा दीदी के मायके वे साल में एक बार जरूर आती थी। सदानंदजी को खैर अपनी नई ससुराल खूब फली। हर छठे चौमासे आठ पन्द्रह दिन रह आते। शिकार¸ दावत हर तरक का आनंद रहता। लखनपुर का राजाराम यदा कदा दिनेश को छेड़ा करता था। "तुम्हारे कँवर साहब तो लखनपुर में बिराजे है हफ्ता भर से। खूब मौज मजा चलता है।" दिनेश तड़पकर रह जाता था। लेकिन चुपचाप सुन लेने के अलावा कोई चारा भी तो नहीं था।

वे ही सदानंदजी इतने सें के बाद घर पधारे थे। विकास शहर से पढ़ लिखकर लौटा था। अच्छी फर्म में नौकरी भी पा गया था। लेकिन वहाँ किसी मराठी लड़की को पसंद कर बैठा। अब जिद पर अड़ा है कि शादी करेगा तो उसी से। लड़की के ताऊ इसी गाँ के है। उनके लड़के के साथ दिनेश का उठना बैठना है।

सदानंदजी बिरादरी बाहर की बहू नहीं चाहते थे। दिनेश से कहने आए थे कि लड़की के भाई को समझाकर लड़की को पीछे खींच ले। और इसी बात पर दिनेश फट पड़ा था।

असल में बात कुछ और ही थी। पिछले महीने विकास अचानक एक दिन के लिये दिनेश के पास आया था। सीधे खेत पर ही मिला था सो कोई जान नहीं पाया। लड़की का नाम¸ फोटो दिखाकर आशीर्वाद ले गया था। दिनेश तो इसी में गद्‌गद्‌ हुआ जा रहा था कि भांजा अभी भी मामा से इतना जुड़ा हुआ है कि मन की बात उसे सबसे पहले बताई। इसी बात पर रोजाना उठने बैठने वाले लड़की के ताऊ के लड़के यानी अपने दोस्त के साथ मिलकर उसने बधाई भी ली दी थी। लेकिन बात अपने तक ही रखी।

और आज सदानंदजी इसी खुशी में खलनायक बन पुराने रिश्तों की दुहाई देने आए थे। माँ उनके यथेष्ट स्वागत सत्कार में लगी थी । उमा यहाँ - वहाँ दौड़ भाग कर रही थी।

सदानंदजी ने बात मालूम पड़ते ही पहले तो विकास को खूब खरी खोटी सुनाई। अपने घर के संस्कारों की दुहाई दी। लेकिन जब वह टस से मस नहीं हुआ तब खुद को मामले से अलग करके तटस्थ बने रहे। विकास भी दूसरे ही रोज शहर चला गया था। बात हाथ से निकलती देख उन्होंने लड़की के सभी संबंधियों की पड़ताल की और यहाँ तक पहुँचे थे।

दिनेश अपने दोस्त राजीव से ये बात हर्गिज करने को तैयार नहीं था कि वह अपनी बहन को समझाए। विकास को अपनी माँ तो ठीक से मिली नहीं। पिताजी हमेशा खुद में ही मस्त रहे। रही सही नई माँ¸ तो उसका हृदय किसने टटोला है आज तक? और यही सदानंदजी आज रमा दीदी की याद में दो चार आँसू भी ढ़ाल चुके थे। उन्हीं पुराने रिश्तों को उखाड़ रहे थे जिन्हें उन्होंने खुद ही अपना मतलब पूरा होते से ही भुला दिया था।

उनकी और दिनेश की कहा सुनी पर पिताजी ने ठंडा पानी डाला था।

"विकास बेटा समझदार है। उसे थोड़ा वक्त देने की जरूरत है। अभी हम भी बात नहीं उठा सकते और आप भी धीरज रखकर बैठिये। जो भी होगा¸ प्रभु की मर्जी से ठीक ही होगा।"

सदानंदजी के लौटने के बाद कुछ दिनों तक शांति रही थी घर में।

फिर उस दिन विमलाजी स्वयं आई थी। अकेली¸ विकास के सिवाए वे पहली बार थी यहाँ पर।

"ये आए थे न यहाँ!" सीधी बात कही थी उन्होंने।

"हाँ बेटी! आए तो थे कँवरजी।" माँ ने अपनी कमजोर आवाज में कहा।

"इन्हे जरा भी नहीं सुहाया है विकास और अदिती का जोड़ा। लेकिन..." उन्होंने आगे कहा।

"मुजे कोई आपत्ति नहीं है। मैं तो मिल भी आई हूँ अदिती से। बड़ी समझदार और गहरी लड़की है। आप क्या कहती है माँजी?"

तब तक दिनेश भी आ चुका था।

"हम क्या कहेंगे जिज्जी! हमारी रमा जिज्जी के जाते से विकास क्या¸ वो घर क्या¸ हमारे हक से¸ रिश्ते से तो गया है। उस दिन जीजा साहब आए थे पुराने रिश्ते सिलने और आज आप आई है यहाँ। हमसे निबाता तो है नहीं कोई¸ गरज पड़ते आ जाते है सभी।"

दिनेश बिना उत्तर की प्रतीक्षा किये हाथ मुँह धोने आँगन में चला गया।

"ऐसा क्यों कहते है भैया? मैंने क्या विकास को कोई गलत परवरिश दी है जो आपकी दीदी नहीं देती। क्या कसर छोड़ी है उसकी माँ बनने में मैंने? विमलाजी की आँखें भर आई। घर का वातावरण बोझिल हो उठा। और कोई चारा न पाकर पिताजी¸ माँ¸ उमा¸ दिनेश सभी उनके इर्द गिर्द चौके में ही जमा हो गये।

"देखो भैया! देखिये पिताजी! मैं जानती हूँ रमाजीजी जैसी सुलक्षणा स्त्री ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलेगी। लेकिन मैंने भी तो अपनी पूरी कोशिश की ना खुद को उनकी जगह रखने की?" विमलाजी मुखर हो उठी।

"अपने सास - ससुर के तानें सुनकर भी छोटे विकास को लेकर आपके पास आती रही। क्या रमा जीजी जिंदा होती तो क्या वे भी नहीं आती ऐसे ही? विकास के सारे तीज त्यौहार इस गर से आए कपड़ों में ही करवाती रही जिससे उसे मामा घर का नेह लगे। उसे सारी कहानियाँ आप लोगों की ही सुनाती रही जिससे वह आप लोगों की ओर ही खिंचा रहे। और माँ ..." अपनी सारी शक्ति बटोरकर उन्होंने आगे कहा...

"लायक होते हुए भी बाँझ होने के ताने सुने जिंदगी भर। क्या इतना भी काफी नहीं?"

विमलाजी अब फफक फफक कर रोने लगी थी। माँ का आँचल और उमा का दुपट्टा भी भीगा। दिनेश और पिताजी आश्चर्यमिश्रित भय से इस रमा दीदी की सौत को देख रहे थे। इस बात पर तो गौर ही नहीं किया उन्होंने कभी। उल्टे जीजी का घर हड़पने के कारण ही उन्हें संतान सुख से वंचित रहना पड़ा है यही सोचकर खैर मनाते रहे थे।

जिस औरत ने हमारी बहन के बेटे की खातिर अपनी जिंदगी दाँव पर लगा दी। सारे हक हमें दिये और हम उसे कुछ अपने से शब्द भी न दे पाए। शायद इसीलिये विकास¸ दिनेश को ही आकर सबसे पहले अपने मन की बात बता गया था।

दिनेश अब और नहीं सह पाया। अपने मन की उथल पुथल दबाकर वह कुछ कहने ही जा रहा था कि नियंत्रित स्वर में विमलाजी बोल पड़ी।

"खैर! अब इन बातों में कुछ नहीं रखा। घर में तो कोई विकास की इस शादी के पक्ष में नहीं है। लेकिन मैंने ही उसे हिम्मत दी है। माँ के प्यार को तरसा हुआ बेटा अब अपने जिंदगी के प्रेम को तो न तरसे। अगले महीने शहर जाकर शादी कर आऊँगी दोनों की। मामा घर से आप लोग रहेंगे ना?"

"बेटी!" भर्राए स्वर में पिताजी बोल पड़े।

"विकास बेटा तरसा तो है। लेकिन अपनी माँ के प्यार को नहीं? पिता की छाया को। तुम्हारी जगह यदि हमारी रमा होती तो वो भी अपने बेटे के लिये शायद ही इतनी हिम्मत करती।"

फिर वे भावविभोर सी बैठी रमा की माँ से कहने लगे¸ "सुन रही हो ना रमा की माँ? रमा बेटी कहीं नहीं गई। विकास के पास है वो। हमारे घर में है।" माँ को तो समझ नहीं आ रहा था कि इस क्षण को वे कहाँ छुपाकर रख दे।

पिताजी विमलाजी को भरे गले से कहने लगे¸ "ये तो तुम्हारा मायका है बेटी। पूछो नहीं हक से कहो। हमारा नाती है। उसकी शादी पूरे जोर शोर से होगी। हम सब चलेंगे शहर।"

सबके हृदय से कितना बड़ा बोझ उतर गया था। सबकी आँखों से खुशी बह रही थी। कुछ देर बाद पिताजी कहने लगे¸ "अरे रमा की माँ! भूल गई क्या सबकुछ? शादी तय हुई है नाती की। बेटी को शगुन की साड़ी तो ओढ़ाओ...!"

जिंदगी भर का साथ

टेढ़ी मेढ़ी लकीरें खींचते आधा घण्टा बीत गया। घड़ी की ओर देखा। अभी तीन घण्टे बाकी थे आकाश को लौटने के लिये। घर का काम खत्म कर पिछले एक घण्टे से मैं टी वी के सामने बैठी थी। और कोई होता तो टी वी ऑन भी किया होता। मुझे इन फालतू सीरियल्स में कोई रस नहीं आता। पहली बात तो इतना ज्यादा रिश्तों का उलझाव देखकर ही उबकाई आने लगती है। फिर वक्त काटने के लिये और कोई जरिया भी तो नहीं है सिवाय खाली बैठे रहने के सिवाय।

अचिंत्य¸ मेरा बेटा। होस्टल में हे। घर में और कोई नहीं है। सारी सोसाईटी मेरे भाग्य पर ईर्ष्या करती है। कोई "झंझट" जो नहीं है मेरे पीछे। जब जी चाहे घर को ताला लगाकर कहीं भी घूम आ सकती हूँ¸ शॉपिंग पर जा सकती हूँ। अच्छी खासी स्मॉल कार भी है मेरे लिये।

कितना गुस्सा हुए थे आकाश उस दिन मैंने कहा था। "अचिंत्य अब एट्‌थ में आ गया है। काफी मैच्योर हो गया है। क्यों ना एक और इश्यू।"

"ये खाली बैठे बैठे कुछ भी फितूर पाल लेती हो तुम दिमाग में। आसान बात है क्या एक और बेबी मैनेज करना? जानती हो तुम कि कोई और है नहीं हमारा। फिर तुम्हारे चेक अप¸ तबियत¸ हॉस्पिटल वगैरह के लिये मुझे मेरे साल भर से तय प्रोग्राम्स डिस्टर्ब करने पड़ेंगे।"

कहने को कितना कुछ था मेरे पास। शारीरिक¸ मानसिक यंत्रनाओं से गुजरने को तैयार थी मैं। अपनी सोच की ¸ अपनी अभिव्यक्ति की एक सृजनात्मक प्रतिकृति चाहती थी मैं। काश कि बच्चे पैदा करने के लिये मुझे किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता!

सारे कष्ट तो मुझे होने थे जिनका कुछ भी सोचे बगैर आकाश फैसला ले चुके थे।

मैं जब अपने आप में लौटी तो पाया कि खाली थाली के सामने बैठी हूँ। आकाश खाना खाकर टी वी के सामने बैठे थे। टी वी चालू था...

ऐसा तो हमेशा से है। मेरे सामने टीवी भी काली होता है और थाली भी। आकाश कहते तो है। फ्रेन्ड्‌स बनाया करे। किटी जॉईन करो। पार्टीज में जाओ। लेकिन तुममें वो चीज है ही नहीं। आखिर पत्थरों से बातें करने की आदत ड़ालनी है तो ये भी तो याद रखना होगा कि थोड़ी देर बाद ये बातें वापिस भी तो लौटेंगी टकराकर! वो सब सुन सुनकर अब कोफ्त होने लगी है।

घूम फिरकर बस एक ही सवाल मन में गूँजता है। अब आगे क्या? कई बार तो दिमाग पर जोर डालने पर भी आकाश की छवि ही याद नहीं आती। फिर मैं घबराकर फोटोफ्रेम पर नजर डालती हूँ।

उस दिन डॉक्टर आनंद का फोन आया था आकाश के लिये। इन्हें साईकेट्रिस्ट के कन्सल्टंट की क्या जरूरत पड़ गई? कुछ बातें छुपकर सुन ली थी मैंने।

"एकदम कूल है डॉक्टर ! कोई लाईफ ही नहीं बची। फुल्ली अनप्रिड़िक्टेबल। यू नो! कोई रिलेटिव भी नहीं है मेरा जो कंपनी दे सके।"

फिर कुछ दिनों के बाद अचानक अचिंत्य घर आ गया। आकाश को छुट्टियाँ मिली। हम हिल स्टेशन गए। वही रूटीन। सुबह उठकर ब्रश करने जैसा या फिर डाईविंग के जैसा लगता था। ऊपरी तौर पर कई चेन्जेस दिखाए मैंने लेकिन अंदर न जाने क्या ऐसा चिपक गया था जो लाख निकालो¸ निकलता ही नहीं था।

आकाश भी जैसे अपना सब कुछ कहीं बाँट आए थे। दो खोखली जिंदगियाँ एक साथ आखिर क्या कर सकती थी?

"तुम ना आकाश! मुझे कभी नहीं समझ सकते।"

आखिरी दिन था छुट्टियों का। शाम की फ्लाईट थी। सुबह नाश्ता करते वक्त जब मेरे हिस्से खालीपन आया तब यही तो निकल पड़ा था मुँह से। आकाश देखते रहे थे मुझे।

"आर यू ओके सिमी?"

"मेरा नाम सिमी है ना! वो अरसे बाद आपके मुँह से सुना इसलिये..."

"लेटो-लेटो¸ आराम करो तुम।"

"डॉक्टर वो बहुत कोशिश कर रही है बट कहीं कोई गड़बड़ है। ठीक है¸ दिन में दो ना? मैं डोज़ डबल कर दूँगा। आई विल लेट यू नो। बाय"

डॉक्टर आनंद ही तो थे। आकाश मेरे लिये डॉक्टर आनंद से कन्सल्ट कर रहे है। कौन सी दवाई चल रही है मुझे जिसका डोज़ डबल होने वाला है?

खैर छोड़ो! ऐसे जाने कितने ही किस्से हो चुके है मेरे साथ। कहीं जाने के बहाने आकाश दस दस दिन सिटी में ही होते और मुझे अखबार पढ़कर मालूम होता। ऑर्ग्यूमेंट करूँ तब तक उनके हिसाब से इतना वक्त गुजर चुका होता था¸ इतनी हैप्पनिंग्स हो चुकी होती थी कि मुझे हर वक्त पुराने इश्यूज को न घिसते रहने की हिदायत मिला करती थी।

फिर आई निर्मला। फिर साल भर का फॉरेन टूर। मुझे सिर्फ दो दिन पहले मालूम पड़ा था कि अब साल भर अकेली रहना है। ऑफिस से सैलरी चैक आ जाया करेगा।

आज हमें वेकेशन से लौटे दो महीने हो गये है। आकाश फिर तीन महीने के टूर पर बाहर गये है। मैं माता रूक्मिणीदेवी मानसिक रूग्णालय में भर्ती हूँ।

दिमाग पर बहुत जोर डालो तो याद आता है। आकाश डॉक्टर आनंद से मिलकर आए थे। और फिर अजीब सी शक्ल सूरत वाली दो बाईयाँ आकर मुझे ले गई थी। मैंने कोई प्रतिरोध नहीं किया। उन्होंने साँस छोड़ते हुए कहा था¸ "थैंक गॉड ये वॉयलेंट केस नहीं है।"

लेकिन मुझे समझ नहीं आया। इस हिसाब से तो पिछले पाँच सालों से मैं पागल ही कहलाऊँगी। पहले पाँच साल तक मैं भी हर चीज से प्रभावित होती थी। खुशी¸ दर्द¸ आँसू मुझे भी तो महसूस होते थे। लेकिन मेरी किसी भी पुकार का असर आकाश पर नहीं होता था। वो जैसा चाहते¸ मैं वैसा करती जाती। प्रतिरोध करना छोड़ दिया।

जब कोई सुनने वाला ही न हो तब दीवारों से बड़बड़ाने वाला भी पागल कहलाता है और चुपचाप खुद से बातें करने वाला भी। यही तो चाहते थे ना आकाश? मैंने सिर्फ उन्हीं का सुना। खुद को दफना दिया। फिर भी जाने क्या¸ कहाँ गलत हो ही गया। मुझे अपने दोस्त प्रशांत से बार बार मिलवाकर हमें घण्टे दो घण्टे अकेले छोड़ देने वाले आकाश शायद जानते नहीं थे कि मैं ये अच्छी तरह से जानती हूँ कि मैं किसी प्रशांत से नहीं डॉक्टर आनंद से बातें कर रही हूँ।

उस दिन भी सीढ़ियों से उतरते वक्त सिस्टर मेरा हाथ इतने जोर से पकड़े हुए थी! मैंने जरा छुड़ाने की कोशिश की तो वे चिल्ला पड़ी। "शी इज गैटिंग वॉयलेंट! होल्ड हर प्रॉपरली।" और फिर मुझे और जोर से

पकड़कर ले जाने लगे थे।

परसों आकाश आए थे। सूजा हुआ सा मुँह लेकर अचिंत्य भी आया था। और मेरी स्काय ब्ल्यू साड़ी में थी निर्मला। अचिंत्य छिटककर दूर जा खड़ा था। मुझे देखकर मुस्कुराया। सालों बाद उन जोड़ी भर आँखों में अपना सा कुछ तैरता दिखाई दिया।

अचिंत्य ने भी निर्मला का कोई विरोध नहीं किया था। मेरा बेटा। बिल्कुल मेरे जैसा। मुझे अब कोई दर्द नहीं। मैं न सही मेरा अक्स है आकाश के पास। उसे जिंदगी भर का साथ निभाने को...

चुप होती आवाजें

"बहुत सी वीरानियों के साये पड़े है इस भरी पूरी जिंदगी पर। ये सिर्फ मैं नहीं¸ हजारों लाखों के दिलों की बातें होंगी जो लफ्जों से कभी मिल ही नहीं पाई। कभी ना कभी का वो औरत होने का दर्द जब नासूर बन जाता है¸ हम उसे समझौते और दूसरी पीढ़ी की भलाई के नाम पर भगवान की नेमतों का पलस्तर चढ़ा बस आगे बढ़ने और वक्त काटने का जरिया बस बन जाते हैं।

बदलावों की फेहरिस्त जो कभी खत्म नहीं होती। मैं अपने मन की बात आम औरतों की तरह नहीं समझा सकती पूरी तरह। बहुत सी जगह पढ़ा है जो लिखा जाता है पुरूषों के लिये कि वे समझे एक नारी की अपेक्षाएँ लेकिन संसार की हर एक नारी ये जानती है कि ये सब झूठ है। अपने आप से की जाने वाली अपेक्षाओं को कर्ज की तरह उतारना¸ बातों को दिल से लगाकर रखना और फिर भी दोयम दर्जे पर ही पड़े रहना ये सोचकर कि चलो ये तो नसीब हुआ।

मेरे ख्याल से अपनी भावनाओं का प्रदर्शन कर हम खुद ही मुसीबत मोल लेते है। अति संवेदनशीलता ही हमारी कमजोरी है। पुरूष जानते है कि कमजोर परिस्थितियों में औरत ही सबसे पहले पिघलती है।"

लिखते लिखते माथा गर्म हो उठा मधु का। ये बस सम्मेलन में पढ़ने के लिये की जा रही तैयारी है या दबाहुआ सा कुछ निकलने लगा था वक्त की खुरचन खाकर?

बरसों पहले की वो रूमानी बातें¸ इंतजार की रातें¸ दिल पर पत्थर रखकर मानी गई तोहमतें¸ खुलती सच्चाईयाँ¸ सतही रिश्तें¸ सूखता प्यार और आज की वीरानी । कलम रोककर एक ग्लास ठंड़ा पानी पिया¸ अपने फैसलों को टटोला और आत्मविश्वास से बरी कुछ साँसों के पैबंद लगा फिलहाल तो उमड़ते सैलाब को रोक दिया।

अब डर लगता है खुद से ही। खुद की ही बनाई हुई जिंदगी। जब खुद के ही हाथों से निकलने लगी थी तब उसने खुद को ही निकाल लिया था उस भँवर से।

तंद्रा टूटी¸ मधु आज में लौटा लाई खुद को। ऊँचे सपने देखने वाली हर युवती की तरह मधु के भी ख्वाब जिंदगी में बुलंदियों को छूने के थे। आज वो बुलंदी पर है। लेकिन ख्वाब पूरा होने के साथ उसे ये भी चाहिये कि कोई सुने कि वह कितनी मेहनत से इस मुकाम पर पहुँची है। मधु सक्सेना या फिर वर्मा। फिर वही उलझन। छोड़ो भी¸ जरा सी विचारों को हवा लगती है तो दूर तक आग जाती है।

ऊँचाई वाकई में खुबसूरत तो होती है लेकिन वहाँ जगह बहुत कम होती है। मुझे समझने वाला शायद कोई भी नहीं बना। शायद सबको यह समझाते हुए जीना ही मेरी जिंदगी है।

धप्प... "पोस्टमॅन"

शाम के साढ़े चार बजे है। डाक आई है। लेकिन वो फुर्ती नहीं है जानने की कि क्या आया होगा। कोई कौतूहल नहीं। नयापन नहीं। कुछ बचा है तो बस खीज और ओढ़ी हुई उम्र। डाक में मधु के लिये होता भी क्या है। कहीं सम्मेलन में अध्यक्षता का प्रस्ताव तो कहीं उद्‌घाटन का आमंत्रण¸ वृक्षारोपण या अनाथालय के बच्चों से मुलाकात।

शुरूआती दौर में अच्छा लगता था ये सब। परिवार में अपने अस्तित्व को लगता जंग जब घुन की तरह खाने लगा था तब मधू ने अपनी अभिव्यक्तियों के लिये समाज सेवा का रास्ता चुना था। शुरू में दो चार बच्चों को मुफ्त में पढ़ाना¸ कामवाली औरतों की समस्याएँ सुलझाना¸ अनाथालय में जाकर बच्चों की जरूरत की वस्तुएँ बँटवाना¸ वृद्धाश्रम में जाकर वक्त बिताना ये सब कुछ उसकी दिनचर्या के अंग बन चले थे।

फिर जिन्हें अपने काम के लिये उसकी जरूरत और आदत पड़ चुकी थी वे परिवार के सदस्य धीरे धीरे कुलबुलाने लगे।

आखिर में स्थितियाँ कुछ इतनी उलझ गई कि उन्हें सुलझ पाने की स्थिती में न पा उसने स्वयं ही इस सब से अलग हो जाना ठीक समझा।

दस वर्ष! कोई कम वक्त नहीं दिया था परिवार को। वो भी इतना वक्त इसलिये खींच पाई क्योंकि प्रतीक साथ थे। सचमुच¸ घर की जिम्मेदारियों को निभाती और अपेक्षाओं को पूरा करती हुई बुरी तरह से ऊबी हुई पत्नी को कोई भी काम के बोझ से दबा हुआ पति कभी भी समझ नहीं सकता।

नौ साल तक मधु¸ प्रतीक को समझती रही और दसवें साल में उसने अपेक्षा की कि प्रतीक कुछ समझा करे। लेकिन साल भर से कम में ही सारी समझदारी¸ शक शबूहों¸ अबोले और ऊँची आवाज में संभाषण करते हुए अपने अहं की अभिव्यक्ति में बदल गई।

बातें घर से बाहर जाएँ इससे पहले ही मधु ने अपने आप को सम्हाला । काम करना शुरू किया और आत्मनिर्भर होते ही आत्मसम्मत निर्णय लेकर अलग हो गई। कितना समझाया था सभी ने। पिताजी दस दिन तक आकर रह गये थे।

सबको पिछले दो सालों से बिना शर्त लौटाती रही है वो। सबकी बड़ी बड़ी बातें¸ "चैरिटी बिगिन्स फ्रॉम होम"। फिर "अपना घर तोड़कर दूसरों को जोड़ने की कोशिशें बेकार है।"

मधु को एकाएक विस्मय सा होता। उसने तो घर छोड़ा है। उसके वहाँ से हटते ही वो एकाएक टूट कैसे गया? सच ही तो है! जब रंग बिरंगी¸ इतराने वाली दीवारों का साथ नींव छोड़ देगी तो घर तो टूटेगा ही।

सब कुछ सोचना छोड़ उसने चश्मा उतारा। किचन में जाकर चाय बनाई। चाय पीते पीते शाम की डाक देखने की आदत थी उसकी। इस आदत पर अब कोई टोकने वाला या उसे अपनी मातहत समझकर डींगें हाँकने वाला कोई नहीं था यहाँ।

स्वतंत्र हवा में साँस लेने का सुख कुछ अलग ही स्वाद देता है। कितना तरसी थी वह इन सूकून भरे पलों के लिये अपनी पिछली जिंदगी में। अब रोकने टोकने या अपेक्षाओं बरा चेहरा लेकर सामने बैठने वाला कोई भी नहीं है। सचमुच! कोई भी तो नहीं है। कुछ भी करने के लिये...

ऐसा क्यों लगता है? अपने ही लिये हुए निर्णय पर फिर से सोचने का मन होता है। सिवाए प्रतीक और गुड़िया के¸ कुछ भी तो ऐसा नहीं है जो आँखें नम कर सके।

उस दिन साम की डाक में गुड़िया का कार्ड आया था। याद आया¸ दो दिन बाद जन्मदिन है मधु का। चुपके से डाला होगा। वो भी अब ऐसी उम्र में नहीं है कि उसे कुछ भी कहकर मन बहलाया जा सके। पूरे नौ बरस की हो गई है अब।

"माँ! पापा खुद पर जरा भी ध्यान नहीं देते। घर में दादा - दादी से झगड़ा चलता रहता है उनका। मैं अच्छे से पढ़ाई करती हूँ लेकिन आजकल स्कूल जल्दी से आवर भी हो जाए तब बी घर लौटने का मन नहीं करता। एनी वे ! हैप्पी बर्थ ड़े।

गुड़िया"

कितने बुरे मोड़ से गुजर रही है गुड़िया! प्रतीक ने ही तो जिम्मेदारी ली थी उसकी। एक दूसरे को समझदार और नये जमाने के वयस्कों की तरह मानते हुए मधु और प्रतीक ने एक दूसरे से अलग होने को "वक्त की माँग" के जैसा सतही नाम दिया था। सच भी था¸ इतनी गहरी चोट¸ ज्यादा ध्यान देते रहने से नासूर बन सकती थी। एक दूसरे से अपना मन छुपाकर¸ मन ही मन अलग होने चले थे।

आगे की जिंदगी! मधु¸ प्रतीक¸ गुड़िया...

"क्या करूँ! कितना कचोटता है ये सवाल?"

नहीं! अपनी ही आवाज को दबा दिया था उसने।

जिंदगी अजीब से मोड़ लेती रही थी। मधु और ज्यादा व्यस्त¸ और ज्यादा "कामयाब" होती रही। गुड़िया के कार्ड¸ पत्र आते रहे। मधु सार्वजनिक जीवन में एकाकीपन उठाए ऊपर चढ़ती गई। पिछले सारे रंग फीके पड़ते गए। उनपर जिंदगी का एक दूसरा ही रंग असर दिखाता गया।

वक्त जैसी दमदार चीज के सामने नाजुक संवेदनाएँ अब हार मानने लगी थी। ठहरे हुए पानी में अपने विचारों की लहरों के सहारे बहने का मजा ढूँढ़ लिया था मधु ने।

इसी ठह्‌रे हुए से पानी में एक बड़ा सा भँवर उत्पन्न हुआ था उस दिन।

दरवाजे के उस पार¸ घण्टी बजाने वाला शख्स और कोई नहीं¸ प्रतीक ही था। शायद इस पल को कल्पनाओं में कई बार जी चुकी थी मधु¸ इसलिये प्रतीक की उपस्थिति को सहजता से ले पाई। मन में कितना कुछ ऊपर नीचे हो चला था। जाने क्या क्या बोलता रहा वो। जाने क्या क्या सुनती रही मधु।

उन शब्दों में कोई अर्थ नहीं रखा था उसके लिये। उसे तो प्रतीक का सामने होना ही सब कुछ लगता रहा। प्रतीक भी शायद काफी पूर्वाभ्यास से आया था सो इतना धाराप्रवाह बोल सका। सब कुछ सुनकर भी यूँ लगा जेसे ये बीते कल की चंद प्रतिध्वनियाँ है। वे तनाव जिन्हें शब्दों के जरिये आपसी झगड़े बनने से पूर्व ही मधु ने खुद ही ढीला कर दिया था वे अब पुन: तंबू के जैसे तनकर उसे अपनी छाँव में लेने की कोशिश में थे।

प्रतीक की बातों से स्पष्ट था। वह अंदर से बुरी तरह से टूट गया था। माँ - बाबू जी से बातचीत बंद थी। गुड़िया से रिश्ता सुख चला था। इस घिर आए अकेलेपन को काटने का मधु के जैसा कोई भी तो तरीका नहीं था उसके पास।

प्रतीक लौटना चाहता था। वो मधु को लेने नहीं¸ उसके पास आने की इजाजत माँगने आया था।

मधु के लिये इस ताजपोशी का नशा अलग ही था। फूल से हल्के होते पल कितने अपने से लगने लगे थे। लेकिन मधु जानती थी कि ये खुशियाँ उसके लिये नहीं बनी है। घर बचाने के लिये उसका घर छोड़ना जब सबको घर तोड़ना लग सकता है तब पति का उसके पास लौट आना यानी बुढ़ापे में माँ - बाप को अकेला छोड़ना नहीं होगा?

उसके मन से हजारों आवाजें आती रही।

प्रतीक को उसने अपने एक एक आँसू का हिसाब दिया। मन की उमंगों से दोस्ती करवाई अरमानों की फेहरिस्त सुनाई। ओढ़ी हुई तटस्थता के अंदर की टूटी हुई अकेली मधु उस एकाकी क्षण में मुखर हो उठी। प्रतीक भी ज्यादा अलग नहीं था।

मधु का वापिस जाना संभव नहीं था। प्रतीक का यहाँ आ जाना सही नहीं था। दोनों ने एक दूसरे की आवाजें सुनी¸ पहचानी। लेकिन उनका जवाब उन दोनों में से किसी के पास भी नहीं था।

फिर वक्त आगे जाता गया। गुड़िया के खत आते गए।

"पापा मेरी पढ़ाई में इन्ट्रेस्ट लेते है माँ। खूब मेहनत करते है। दादा दादी से ज्यादा बोलते तो नहीं लेकिन झगड़ते भी नहीं। दो दिनों के बाद स्कूल में छुट्टियाँ है। पापा मुझे एक्टीविटी कैम्प भेजेंगे। बाकी सब ठीक है।

गुड़िया।"

मधु ने हमेशा की तरह शून्य में ही देखा लेकिन एक तसल्ली थी। अपने ऊँचे होते अरमानों की आवाज को चुप करने के बाद¸ इस मौन की आवज ज्यादा सुरीली थी।

जात

"मैथिली! जल्दी करो आशीष पहुँचता ही होगा।"

"बस हो गया भाभी!" मैथिली की आवाज धीरे धीरे पास आती गई।

"बस थोड़ा सा ये क्लिप तकलीफ दे रहा था। बाकी तो मैं ये तैयार हूँ।" अब मैथिली एकदम सामने थी शुभा के।

"अब देखती ही रहोगी या कहोगी भी कि कैसी लग रही हूँ।"

शुभा की आँखों मे एक साथ कई स्वप्न तैर गए। स्वयं को संयत करती हुई वह बोली¸ "नजर न लगे। मैं ना कहती थी! पीच कलर कितना सूट करता है तुझे!"

सचमुच! हकोबा का बारीक काम किया हुआ बिन बाँहों का कुरता¸ तंग चूड़ीदार और नेट की चुन्नी में मैथिली का रूप फटा पड़ रहा था। तिसपर क्रिस्टल की ढ़ेर चूड़ियाँ एक हाथ में और दूसरे में भैया की बर्थ डे पर गिफ्ट की हुई गोल्डन रिस्ट वॉच। सलीके से सँवारा गया चेहरा¸ बाल और मैंच करता पर्स। और क्या चाहिये शॉपिंग के बहाने किसी "योग्य" लड़के के साथ घूमने के लिये।

मैथिली शुभा की ननद और आशीष "शुभा" का योग्य छोटा भाई। अत्यंत उच्च कुल के दोनों परिवार। पानी की तरह बहता पैसा। क्लब¸ पूल¸ बार वगैरह के मापदण्ड़।

शुभा की आँखों में आशीष मैथिली का जोड़ा बहुत पहले से भा गया था। फिर जब आशीष ने सही तरीके से अपना बिजनेस भी सम्हालना शुरू कर दिया तब शुभा ने शादी लायक हुई मैथिली से अपने दिल की बात कह दी थी। जान बूझकर अनजान बनती लेकिन गुलाबी गालों में मुस्कुराती मैथिली की मर्जी तो शुबा उसी दिन जान गई थी। वह सिर्फ इतना चाहती थी कि दोनों का मेलजोल पहले आकर्षण में बदल जाए। फिर गर्म तवे पर जरा पानी डालते ही वह भाप देने लगेगा।

आशीष के बिजनेस पार्टनर की बहन की शादी थी और उसकी मम्मी को क्वालिटी पर्चेसिंग करवाने का जिम्मा आशीष पर था। ऐसे अवसरों पर उसकी एप्रोच सीधी शुभा दीदी ही होती थी। परसों ही तो आया था वो।

"दीदी! आप तो जानती है कि शर्मा अंकल की नरगिस की शादी है। मम्मी तो बस उसकी मम्मी बनने पर तुली हुई है जैसे।"

जिस हिकारत से ये सब आशीष बिना किसी हिचक के बोल गया था¸ शुभा भीतर तक हिल गई थी।

शर्मा अंकल पापा के अच्छे दोस्त है। पापा के बिजी बिजनेस शेड्‌यूल के कारण सारे व्यवहार¸ नाते रिश्ते मम्मी के ही जिम्मे थे। फिर शर्मा आंटी की अचानक मौत के बाद मम्मी का उनके घर आना जाना काफी बढ़ गया

था।

शुभा तो अपनी शादी के वक्त शर्मा अंकल का एहसान ही मानती रह गई थी। पापा बिदाई के समय भी नहीं पहुँचे थे और शर्मा अंकल रो रोकर मुँह सुजाए दे रहे थे।

"लेकिन मम्मी ऐसा कुछ..."

"छोड़ो दीदी!" आशीष लगभग चीखा।

"यदि पापा अपना ध्यान कहीं और लगाएँगे तो मम्मी को भी अपना फ्रस्ट्रेशन निकालने के लिये कुछ तो चाहिये ना। शुक्र करो कि एक ही है।"

कुछ पलों तक श्मशान शांतता रही थी दोनों के बीच। फिर विषय बदलने की गरज से आशीष शॉपिंग वाली बात कह गया था। बिना किसी लाग लपेट के शुभा दीदी ने अपनी किटी का बहाना बनाकर आज का आशीष और मैथिली का प्रोग्राम बना दिया था। आगे का सारा काम हाई सोसाईटी में पली बढ़ी मैथिली खुद कर लेगी।

सज धजकर तैयार खड़ी मैथिली को उतना ही शोभित आशीष ले गया। फिर दोनों पूरे तीन घण्टे बाद मैथिली के लिये एक ब्रेसलेट का उपहार लिये थके से घर लौटे।

"ओह भाभी! आशीष इज हेविंग अ नाईस सेंस ऑफ ह्‌यूमर। इतना हँसाया बाबा रे! और वो रेड साड़ी वाली आँटी जिनकी हील टूट गई थी¸ हाऊ इम्बरेसिंग शी वॉज!" और दोनों तालियाँ पीटकर हँसते रहे थे।

शुभा भी उनमें शामिल हो जाती शायद यदि उसे अरण्या का ख्याल न आ जाता।

मैथिली भी पागल। अरण्या को आशीष के सामने ले आने की क्या जरूरत थी? अच्छी भली उसके कमरे में छुपाए थी वह उसकी गरीब सहेली को। जाने क्या नोट्‌स वोट्‌स देने आई है। ले देकर बिदा करती।

अरण्या के सात्विक सौंदर्य का तेज आशीष से सहते न बना। गेहुएँ रंग पर स्वच्छ शुभ्र वस्त्र¸ नाममात्र के आभूषण¸ हल्के भूरे लंबे केश और नियंत्रित हाव भाव। मैथिली जहाँ डच रोज सी गमक रही थी वहीं अरण्या शुभ्र कमल से पवित्र भीनी महक दे रही थी। कहीं कोई मादकता नहीं।

हालाँकि उस दिन आशीष और अरण्या में कोई बातचीत नहीं हुई लेकिन उस लड़की में गुण ही इतने थे कि मैथिली आशीष का साहचर्य पाने के लिये अरण्या की बातों का सहारा लेने लगी। वह सोचती कि आशीष शायद इन बातों में इसलिये रस ले रहा है क्योंकि वे मैथिली के मुँह से कही जा रही है। लेकिन असल में तो वह इन बातों से मिलते संकेतों को जोड़कर अपने भविष्य की मूर्ति गढ़ता जाता था।

खैर! आशीष और मैथिली देर रात डिस्को से थके हुए¸ हॉटेल की प्लेटों में आधे से ज्यादा खाना छोड़ घर लौटते तो शुभा दीदी का जी गज भर का हो जाता।

अब वक्त आ ही गया है कि इनसे आशीष और मैथिली की बात की जाए। लेकिन मैथिली के भैया तीन महीने की अफ्रीकी देशों की यात्रा पर थे। शुभा दीदी आशीष और माँ की ओर से तो सहमत थी लेकिन पति की मंजूरी की अहमियत तो थी ही।

फिर मैथिली के जन्मदिन पर उसे स्वरोस्की क्रिस्टल भेंट करते हुए आशीष का ध्यान एक खुबसूरत लिखावट पर गया। कुछ पहचानी सी वह¸ अरण्या की ही थी। हाथ में उठाकर पढ़ा तो पढ़ता ही चला गया। मैथिली से अपनी दोस्ती¸ उसके रूप गणों का कितनी खूबसूरती से एक छोटी सी कविता में वर्णन कर दिया था अरण्या ने। आशीष कायल हो गया।

मेहमानों की धुत भीड़ में¸ गहने कपड़ों की लकदक के बीच वह अलग थलग सी पड़ी अरण्या तक आखिर पहुँच ही गया। पुन: शुभ्र वस्त्र। इस बार शीशे का काम था उनपर और सफेद ही एम्ब्रायडरी। सिर्फ उसके हल्के भूरे बाल ही उस शुभ्र विन्यास में कुछ रंगत भर रहे थे।

आशीष के लिये उससे बात करना बेहद जटिल था। हर बात में "वो मैथिली कह रही थी..." से शुरू होती और फिर अरण्या चुप होकर रह जाती। लेकिन आशीष ने भी कच्ची गोलियाँ नहीं खेली थी। उसकी लिखावट की¸ उसकी कविता की¸ मैथिली से उसकी दोस्ती की और उसके सफेद रंग की पसंद की बातों का सहारा लेकर उसने अरण्या का सारा इतिहास जान लिया था। उसके कॉलेज आने जाने का वक्त और रास्ता भी।

अरण्या के पिता किसी अच्छी कंपनी में एकाउंटेंट थे। माँ कुछ साल पहले चल बसी थी। बड़ी बहन अणिमा विवाह विच्छेद के बाद यहीं रहती थी। पिताजी का छोटा मोटा टेलरिंग का काम था। अणिमा वही देखा करती थी।

आशीष कौतूहल से भर उठा। इस लड़की की जिंदगी मेम् तो जरा ऊपर उठाकर देखने की भी गुंजाइश नहीं है। फिर कैसे यह अपने संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर स्वयं की स्पष्ट छाप छोड़ जाती है! आशीष जान चुका था¸ छोटी जात की¸ निम्न मध्यमवर्गीय जीवन जीते हुए भी संस्कारों में¸ नैतिकता में और सबसे बढ़कर दिमागी खूबसूरती में मैथिली इस लड़की के सामने बाल बराबर भी नहीं है। बातें भी करती है तो आँखें कहीं और रखकर। एक सुरक्षित दूरी बनाकर और अनाधिकार प्रवेश की चाह रखने वाले किसी भी व्यक्ति के विचारों को दूर से ही झटक देती है।

यूँ तो आशीष को उसके ऑफिस में एक से बढ़कर एक लड़कियाँ प्राप्य थी। लेकिन उन सबसे ऊब चुके आशीष को अरण्या में एक निर्मल निर्झर सा मिला था। उसकी ओर खिंचते जाते हुए आशीष ने यह परवाह भी नहीं की कि शुभा दीदी और मैथिली उससे क्या आस लगाए इस रिश्ते को बढ़ाने की छूट दे रहे है।

खुले तौर पर सभी आशीष मैथिली की जोड़ी को जानते थे। लेकिन अरण्या का नाम आते ही जैसे सभी पर घड़ों पानी गिर गया।

"देखो बेटा! वो लड़की आज तक क्लब की एक सीढ़ी भी नहीं चढ़ी। कभी कॉकटेल पार्टीज में पैर नहीं रखा। हमारा रहन सहन¸ हमारी लाईफस्टाईल इन सभी से कभी भी एडजैस्ट नहीं हो पाएगी वो। और ये सब छोड़ भी दे तो एक बात याद रखना आशीष।"

माँ एकदम तटस्थ होकर बैठी थी। कुछ हिकारत से आगे बोली¸ "इन्सान कभी भी अपनी जात नहीं छोड़ता।"

"मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी आशीष।" शुभा दीदी मुँह फुलाए बैठी थी।

जबसे उन्हें यह मालूम हुआ था कि आशीष उसकी सब्जपरी सी खूबसूरत और सलीकेदार ननद को छोड़ उसकी ही किसी नीची जात की सहेली पर मर मिटा है तो वे आपे से बाहर हो गई थी।

"मैथिली ने दिन भर से खाना नहीं खाया है। अरण्या महारानी आई थी अपना अपसगुनी चेहरा लेकर!"

आशीष की आँखों में अरण्या का नाम सुनते ही जो चमक आई थी उसे देखकर ही शुभा दीदी इस रिश्ते की गहराई को समझ गई थी।

अपनी हिकारत दिखाते हुए बोली¸ "हरि के हाथ ही कहलवा दिया था कि अब फिर कभी लौटकर न आए।"

सुर्ख जोड़े में सर से पाँव तक सजी धजी अरण्या पारंपरिक दुल्हन लग रही थी। सजीले कोसा के परिधान पर बाँधनी के छींट के दुपट्टे में था उसका दूल्हा आशीष।

कुछ दिनों के बाद आशीष के घर किचन में सुबह सुबह कुछ देर को चूड़ियों की खनखनाहट सुनाई देती। फिर माँ का वज्र घोष। अरण्या को सलीके सिखाते ताने धीरे धीरे उसके पिता के इस घर में घुसपैठ के इरादे तक जा पहुँचते। असहृय होने पर अरण्या पहले आँसू टपकाती¸ आशीष के समक्ष जा खड़ी होती। आश्रयस्तंभ एक ही तो था उसका।

घर में आने जाने वाले यहाँ तक कि नौकर भी उसे अजीब सी नजरों से घूरते। चारों ओर से बस एक ही शोर सुनाई देता था। "नीची जात...नीची जात... नीची जात"

अरण्या के दिन शूलों पर और रातें फूलों पर बीतती थी। आजकल काभी कबी शराब की बदबू को छुपाने के लिये इस्तेमाल किया जाने वाला दमदार स्प्रे भी उसे धोखा नहीं दे पाता था। कभी कभी वह अपने लिये हुए निर्णय पर सशंकित हो उठती थी लेकिन आशीष का उदात्त प्रेम उसकी हर शंका का समाधान बन जाया करता था।

माँ का शर्माजी के यहाँ आना जाना ज्यादा बढ़ गया था।

वक्त बीतते बीतते अरण्या एक स्वस्थ बेटे की माँ बनी। "औदार्य" सभी के आकर्षण का केन्द्र बना। फिर भी इस हँसते खिलखिलाते घर में अरण्या स्वच्छ पानी में स्याही की बूँद जैसी सभी को खटकती।

उस दिन अरण्या को आशीष के कोट में वह परफ्यूम लगा रूमाल मिला। उस सुगंध ने जाने कितना कुछ याद दिला दिया था उसे। मैथिली¸ उसकी मैंत्री¸ आशीष का आगमन और अब तक का सफर एक पल में तय कर अरण्या पुन: उसी प्रश्न के समक्ष जाकर खड़ी रह गई।

"मैथिली का रूमाल आशीष की जेब में क्या कर रहा है?"

अरण्या को खुलने में दो दिन लगे। बिजनेस डील के दिल्ली गया आशीष दोपहर तीन बजे लौटा। इस वक्त न तो कोई फ्लाईट थी न ट्रेन और उसकी गाड़ी भी यहीं थी।

"देखो अरण्या! ये रोक टोक मुझे पसंद नहीं है। मैं शहर में ही था। किसी के यहाँ रूका था बस।"

अरण्या सन्न रह गई। कुछ भी समझ में नहीं आया कि ये सब हो क्या रहा है।

जब उन भोली प्रश्नवाचक आँखों ने आशीष का पीछा नहीं छोड़ा तो हारकर उसे बताना ही पड़ा।

"देखो अरण्या! तीन साल हो गए है हमारी शादी को। अब तुम भी पहले जैसी नहीं रही हो। डोन्ट यू थिंक सो अ मॅन नीड्‌स चेन्ज? मैं दो दिन मैथिली के साथ था । शी वॉज रनिंग थ्रू डिप्रेशन फेज। दैट्‌स ऑल।"

अरण्या को साँस लेने में मुश्किल होने लगी। तीन सालों तक तो घर में बिंधते बाण इसलिये सह जाती थी कि आशीष मरहम का काम करेगा। आज उसे पीछे से ही कटार भोंक दी थी उस मरहम ने। टूटकर गिर जाने का मन हुआ। वे सारे प्रश्न¸ वे सारे मूल्य¸ वे सारी नैतिकताएँ बेशर्मी से उसके सामने आकर मुँह चिढ़ाने लगी।

क्यों इतने प्रेम और आकर्षण का दिखावा किया आशीष ने? जब फिर से मैथिली के पास ही जाना था तब ये प्रेम का नाटक क्यों? ऐसे हालात में उसे अणिमा के ¸ अपनी दीदी के चरणों पर ही चलना होगा क्या?

रात के ढाई बजे थे। उन कुछ शब्दों को सुनने के बाद से अरण्या को हवा भी काटने को दौड़ रही थी। और उन्हें कहने वाला आशीष¸ निश्चिंत सोया था। तो आज तक उसका अपना कहलाने वाला आशीष¸ आज उसका अपना नहीं था।

मैथिली¸ उसका जिस्म¸ उसकी अदाएँ¸ उसकी खुशबू सभी कुछ सामने घूमने सा लगा। इस व्यक्ति के चेहरे पर शिकन तक नहीं? मैथिली भी डिप्रेशन से गुजर रही है मतलब? साल भर पहले ही तो उसकी शादी बड़े भव्य तरीके से की गई थी। ऊँचे घर में ब्याही गई मैथिली के पति भी ऊँचे इरादों के थे। आशीष के पापा की तरह वे भी घर में कम ही टिकते।

तो क्या इसीलिये मैथिली! लेकिन आशीष! उसे क्या कमी है? कह तो रहा था तीन साल हो गये है। चेन्ज चाहिये। मैं भी वैसी नहीं रही । तो क्या बस यूँ ही? तो ऐसी अब तक कितनी... और माँजी और शर्मा अंकल!... वही चेन्ज... आशीष ...माँजी......

"छी..."

अरण्या के पूरे शरीर में डंक मारने वाले असंख्य बिच्छू रेंगने लगे। घृणा हो आई इस माहौल से उसे। मैथिली और आशीष पहले भी तो एक साथ थे। वो तो अरण्या की ओर स्वयं ही हाथ बढ़ाया था आशीष ने। लेकिन अब ये सब कुछ क्या है? वो प्यार वो पागलपन सब झूठ था? घण्टों वह पैर सिकोड़े गुड़ी मुड़ी सी पड़ी रही।

जिंदगी के मायने बदल रहे थे¸ सोच बदल रही थी¸ अरण्या बदल रही थी। कभी प्रेमवश आशीष ने उससे कहा था¸ "तुम अपने नाम के ही जैसी किसी अरण्य में विहार करती कुमुदिनी के जैसी हो अरण्या!" और आज उसी आशीष की करतूतें उसे जंगल के हिंस्र पशुओं के जैसी लग रही थी।

मैथिली¸ आशीष¸ माँजी और पिछला वक्त चीख चीखकए अरण्या के कानों में गर्म सीसा ऊँड़ेल रहा था¸ जात¸ नीची जात।

तो क्या आशीष भी इसी लिये ...

"ऊफ! मैं क्या करूँ? रूआँसी हो चुकी अरण्या के हाथ स्वभावगत ऊपर देखकर जुड़ा गए।

वही ईश्वर जो जन्म देता है¸ उसी के इन्सानों ने बनाई जात को ढोकर जनम भर से चली आ रही अरण्या उसी से न्याय की भीख माँगने चली थी।

जाने कब नींद लगी उसे। अजीब से सपनों और दृष्टांतों के बाद सुबह उठी हुई आत की टसुए बहाती स्त्री नहीं रह गई थी। आज उसके सामने एक लक्ष्य था। अपनी "जात" दिखाने का। बीते कल की मीठी यादें और आनेवाले कल के मधुर स्वप्न अपनी आँखों से उतारकर रख दिये है उसने।

किसी को भी कानोंकान खबर नहीं हुई। अरण्या अणिमा से मिलने जाती रही। रोज। पहले तो उसे देखकर उसकी बातें और भविष्य की योजनाएँ सुनकर अणिमा असंभव...असंभव से भाव लाती रही थी चेहरे पर। फिर दृढ़ निश्चयी अरण्या के आगे उसने घुटने टेक दिये।

छ: महीने के बीतर ही आशीष के सारे ऑफिशियल कॉन्टॅक्टस गुपचुप अरण्या का फेवर करने लगे। घर के सभी आने जाने वाले लोगों का रूख अरण्या की ओर नरम होता गया।

घर की चौखट में कैद रहने वाली नीची जात की बेचारी सी लड़की अचानक मुखर¸ सहृदय और जेन्टलवूमन पर्सनालिटी की कहलाने लगी। घर से बेखबर आशीष इसे अरण्या का "चेन्ज ऑफ बिहेवियर ड्‌यू टू अनअवॉइडेबल सरकम्स्टांसेस" मानता रहा।

तब तक¸ जब तक रजिस्टर्ड डाक से उसके पास एक पत्र नहीं आ गया।

"प्रिय आशीष !

मुझसे पत्र पाकर हैरानी तो जरूर होगी। काफी कोशिश की कि आप मिले तो बात करूँ लेकिन स्थिती इतनी जटिल है कि मेरा आपसे समय लेकर मिलना भी संभव नहीं है।

इन दिनों में पता नहीं आपने नोटिस किया भी या नहीं लेकिन मैंने काफी कुछ बदल दिया है। न सिर्फ खुद को वरन्‌ अपने आस पास के सभी को। अब मैं आपकी डिपेन्डेन्ट वाईफ नहीं बल्कि "औदार्य इन्डस्ट्रीज प्राईवेट लिमिटेड के एम डी की हैसियत से ये पत्र आपको लिख रही हूँ। आपके लीगल एडवाईजर मिस्टर प्रधान और चार्टर्ड एकाउंटेंट मिस्टर वर्मा अब मेरे मुलाजिम है।

और आज का दिन आपके घर में मेरा आखरी दिन था। क्योंकि उस दिन क्लब मेंबरशिप पेपर्स पर साईन करते समय आप म्युच्युअल डिवोर्स पेपर्स पर भी साईन कर चुके है। बेटा भी अब मेरा है। "लीगली।"

अब सभी को घर में यही चर्चा करने में आनंद आएगा कि इतना वैभव और इतनी ऊँची लाईफस्टाईल मैं सहन नहीं कर पाई और अंत में मैंने अपनी जात दिखा ही दी।

मुझे सिर्फ इतना ही कहना है कि तुम तथाकथित उच्चवर्ग के मनुष्य तो अपनी ओछी और गिरी हुई हरकतों से जानवरों को भी पीछे छोड़ देते हो। तुम्हारा धर्म स्वार्थ है और जात पैसा। फिर आज ये वाली हो या कल वो।

तुमसे तो मेरी जात अच्छी है। कम से कम इन्सानों में तो हूँ। आज मेरा इस जेल में जानवरों के बीच का जीवन समाप्त हुआ। अपने सारे बंधन तोड़कर मैं सहर्ष अपनी जात में शामिल हो रही हूँ।

अरण्या"

बस थोड़ी देर तक हतप्रभ रहने के बाद आशीष ने दाँई ओर मुड़कर आवाज दी¸ "बाहर आ जाओ रीटा ऽऽ! कोई नहीं¸ बस पोस्टमॅन था...।"

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1 टिप्पणियाँ

  1. रवि भाई

    कहानियाँ पसंद आई. इनकी ईबुक का प्रबंध किया जाये, अगर आप और अंतरा जी उचित समझे.

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