समझदार को इशारा - असग़र वजाहत का यात्रा संस्मरण

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चलते तो अच्छा था ईरान और आज़रबाईजान के यात्रा संस्मरण - असग़र वजाहत अनुक्रम यहाँ देखें अध्याय 5 समझदार को इशारा तेहरान...


चलते तो अच्छा था

ईरान और आज़रबाईजान के यात्रा संस्मरण

- असग़र वजाहत

अनुक्रम यहाँ देखें

अध्याय 5


समझदार को इशारा

तेहरान विश्वविद्यालय की तरफ़ मुंह करके खड़े हो जायें तो दाहिनी तरफ़ इन्क्लाबे-इस्लामी सड़क पर ही कुछ आगे चल कर एक कई मंज़िला गोल-सी इमारत है जिसे 'थियेटर सेंटर' The centre for dramatic Arts कहते हैं। यहां आने से पहले ही यह पता था कि ईरान, खासकर तेहरान में थियेटर का बड़ा ज़ोर है और वहां नाटक वालों से ज़रूर मिलना चाहिए। मोनी ने नाहीद के ज़िम्मे यह भारी काम डाला था कि मुझे 'थियेटर सेंटर' दिखाये। नाहीद अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी है और फिलहाल एक अखबार में किसी अच्छी नौकरी की तलाश में है।

थियेटर सेंटर की काफ़ी बड़ी और प्रभावशाली इमारत है। बताया गया कि यह इस्लामी क्रांति आने से कुछ साल पहले ही बनी थी। ईरान में रंगमंच का इतिहास बहुत पुराना है। 'कॉमिक इंअरटेनमेण्ट' पर केन्द्रित नाट्य विधाएं ईरान में इस्लाम आने से पहले प्रचलित थीं जिन्हें 'बक्फालबाज़ी', 'तख्त हाउज़ी', 'सियाहबाज़ी', 'ख्यालबाज़ी', 'ख़ेमाशबाज़ी' के नाम दिए गए थे। इन सबकी अपनी-अपनी विशेषताएं हैं। इसके अतिरिक्त 'कठपुतली' का तमाशा भी ईरान की लोकनाट्य शैलियों में है। इन लोक नाट्य शैलियों की कथावस्तु घरेलू झगड़े, प्रेमियों का संघर्ष, धनवान और गरीब की लड़ाई आदि हुआ करते थे। प्राय: नाटक लिखे हुए नहीं होते थे और इनका प्रमुख उद्देश्य समाज व्यवस्था की आलोचना करना और मखौल उड़ाना ही होता था। इस्लाम आने के बाद कर्बला की घटना पर आधारित नाटक 'ताज़िया' का दौर शुरू हुआ और धीरे-धीरे उसका महत्व बढ़ता चला गया। आज मोहर्रम के दस दिन ईरान के हर शहर, कस्बे और गांव में 'ताज़िया' खेला जाता है जिसमें स्थानीय लोग कलाकारों के रूप में भाग लेते हैं और इमाम हुसैन के साथ कर्बला के मैदान में घटी घटनाओं को मंच पर प्रस्तुत किया जाता है।

आधुनिक ईरानी नाटक कुछ उसी दौर में है जिस दौर में हमारा नाटक है। 'थियेटर सेंटर' थियेटर संबंधी कई सेवाएं देता है। यहां प्रदर्शन होते हैं, रिहर्सल होते हैं, वर्कशाप होती हैं, कोर्स चलते हैं। थियेटर पर सेमीनार होते हैं। थियेटर का अभिलेखागार है और कुल मिलाकर ईरान में थियेटर की सबसे बड़ी और शायद अकेली संस्था है।

इमारत की चक्करदार सीढ़ियों और गैलरियों में पिछले शताब्दी के थियेटर के पोस्टर, अभिनेताओं के चित्र, अखबार की कतरनें नुमाइश के लिए लगी है। इन्हें देखना रोचक इसलिए है कि इस्लामी क्रांति का प्रभाव इन पर भी दिखाई पड़ता है। हम लोग इन चित्रों को देखते चक्करदार सीढ़ियां चढ़ते उतरते वहां पहुंचे जहां नाहीद का जानने वाला ग्रुप अभ्यास ‘रिहर्सल' कर रहा था। निर्देशक को देखकर हबीब तनवीर की याद आ गयी। वैसा ही चेहरा, वैसे ही बाल और उसी तरह का समर्पण। लड़के लड़कियां मंच पर रिहर्सल कर रहे थे। लड़कियां यहां भी अपने सिर ढंके हुए थीं। बताया गया कि नाटक की विषय वस्तु इस्लाम-पूर्व समय की कोई ईरानी गाथा है। पात्रों की वेशभूषा देखने और नाटक के स्वरूप से भी लग रहा था इसका संबंध किसी प्राचीन गाथा से ही हो सकता है। निर्देशक महोदय स्वयं भी भूमिका कर रहे थे। वे विशेष रूप से 'एक्रोबेटिक' किस्म का काम करने में बड़े दक्ष लग रहे थे। उनका शरीर दुबला पतला और बहुत फुर्तीला लग रहा था। लड़कियां पता क्यों, लगा कि लड़कों से अच्छा अभिनय कर रही थीं। मुख्य भूमिकाएं भी लड़कियों की थी। इस्लामपूर्व की ईरानी कथा पर आधारित नाटक में लड़कियां वर्तमान इस्लामी युग के ईरानी कानून के अनुसार सिर ढंके हुए थीं बहरहाल राजनैतिक इच्छा या राजहट सबसे बड़ा हट होता है, यह सब जानते हैं।

रिहर्सल क्या पूरा नाटक देखकर हम बाहर निकले। मैं चाहता था कि नाहीद इतना समय दे कि मैं उनको चाय पिलाने के बहाने खुद चाय पी सकूं पर युवा पीढ़ी की नाहीद यह चाहती थी कि मैं जितना ज्यादा देख सकूं उतना अच्छा है। हम एक दूसरे नाटक का रिहर्सल देखने गये। यह नाटक अत्याधुनिक 'निरर्थक थिएटर' जैसा था। बीच मंच पर एक लंबी सी मेज़ रखी थी। उसके ऊपर एक साइकिल लटक रही थी। मेज़ के दूसरे सिरे पर कुछ बड़े-बड़े फुटबाल लटक रहे थे। कुछ अभिनेता ओर अभिनेत्रियां संगीत (पाश्चात्य) के साथ अपने शरीर को अलग-अलग दिशाओं में, अलग-अलग ढंग से तोड़-मरोड़ ओर मटका, लचका, घुमा, फिरा, गिरा, उठा, लिटा, सिटा रहे थे। कुछ अभिनेता मेज़ के नीचे थे। यही कर रहे थे। एक लड़की साइकिल का एक पहिया नचा रही थी और उस पर कभी-कभी अपने पूरे शरीर को घुमा रही थी। तेज़ संगीत के साथ प्रकाश भी कई-कई रंगों में और कई-कई तरह से आ जा रहा था। सभी पसीने-पसीने थे। इस कड़े अभ्यास में उनका शरीर मेज़, कुर्सी, साइकिल, पहिये, गेंदों से रगड़ता था और निश्चय ही लंबे समय तक यह करते रहने में बहुत मेहनत लग रही होगी। पर हम लगातार बीस मिनट तक बिना रुके ये सब देखते हैं। अचानक मेरे दिमाग में यह ख्याल आया कि यह निरर्थकता कहीं 'सार्थकता' के ऊपर व्यंग्य और विरोध तो नहीं है। अब मैं नाटक को दूसरे ढंग से देखने लगा और मेरे ऊपर उसके अर्थ खुलने लगे। कहीं ये 'थेरेपी' तो नहीं है? नाटक तो वैसे ही 'थेरेपी' कहलाता है। बहरहाल सवाल अनेक हैं और समझने वालों को इशारा काफ़ी है।

सीढ़ियों से नहीं लिफ्ट से हम ऊपर आये कैंटीन में गये चाय पीने लगे। ईरानी चाय के साथ दूध नहीं पीते, चाय में शक्कर नहीं डालते बल्कि शक्कर का एक डला (क्यूब) मुंह में रख कर चाय घूंट लेते हैं। यही तरीक़ा जारी रहता है। इसका अभ्यास करना पड़ता है। आज मेरा चौथा दिन है इसलिए कुछ संकट है। वैसे भी बिना दूध की चाय, बिना नींबू डाले कुछ ख़ास ही लगती है।

मुख्य हाल में नाटक चल रहा है। हमारे पास टिकट नहीं है। नाहीद कहती है कि मैं अगर कुछ झलकियां देखना चाहूं तो वह कोशिश कर सकती है-

हां हां क्यों नहीं।

कुछ देर बाद हम चोरों की तरह मुख्यहाल में घुसते हैं। मुझे डर नहीं अगर बिना टिकट पकड़ लिए गये तो क्या होगा। यह लड़की सुलटेगी। बैठ गये। सामने मंच के दाहिनी बायीं तरफ़ धार्मिक नेताओं के चित्र लगे थे।

मंच बहुत बड़ा था। उसको खानों (हिस्सों) में बांट दिया गया था। ऐसा लगता था जैसी बहुत बड़ी-बड़ी कबूतरों की काबुकें हैं। हर ख़ाने में दो पात्र थे। घर या जहां भी वे हैं, उसका सेट था। कभी प्रकाश एक ख़ाने पर पड़ता था तो वहां बैठे पात्र संवाद बोलने लगते थे। बाकी ख़ानों के पात्र खामोशी से अंधेरे में बैठ रहते थे, पर दिखाई देते रहते थे। नाहीद ने बताया कि ये सब पात्र एक ही परिवार के हैं और कहानी उन सबके बीच घूमती रहती है। बात कुछ-कुछ समझ में आने लगी। अभिनय का स्तर अच्छा था। कहना चाहिए बहुत अच्छा था। प्रकाश व्यवस्था, मंच सज्जा तकनीकी दृष्टि से मैं कोई कमी न निकाल सका।

थियेटर के चायखाने के बाहर किताबों की दुकान थी। वहां नाहीद मुझे किताबें दिखाने लगी। ईरान के एक प्रसिद्ध नाटककार निर्देशक बहज़ाद के नाटक दिखाये और बताया बहज़ाद इस्लामपूर्व ईरान की कथाओं को अपने नाटकों का आधार बनाते हैं। दिमाग़ में फिर घंटी बजने लगी। यह नाटक ख़त्म होने की घंटी नहीं थी। यह जानने की घंटी थी कि अभी जो रिहर्सल देखे उनमें से एक इस्लामपूर्व कथा पर आधारित था। दूसरा भी निश्चय रूप से इस्लामी मूल्यों पर आधारित नाटक नहीं था। तीसरे बहज़ाद साहब से परिचय हुआ जो इस्लामी पूर्व कथानक चुनते हैं।

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समझदार को इशारा - असग़र वजाहत का यात्रा संस्मरण
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रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2007/04/asghar-wazahat-ka-iraan-yatra-sansmaran_27.html
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