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नजीब महफूज: सैटनिक वर्सेस, रुश्दी से पहले

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- विजय शर्मा वैष्णव और द्वैत दर्शन मे विश्वास रखने वाले वेल्लमकोंडा रामराय कवि आदि शंकराचार्य से इतनी घृणा करते कि उनकी पुस्तक तक स्पर...


- विजय शर्मा

वैष्णव और द्वैत दर्शन मे विश्वास रखने वाले वेल्लमकोंडा रामराय कवि आदि शंकराचार्य से इतनी घृणा करते कि उनकी पुस्तक तक स्पर्श करने को तैयार न थे, पढ़ना तो दूर की बात थी. एक बार उनके एक मित्र ने शंकराचार्य की एक पुस्तक बलपूर्वक उन्हें थमा दी और उसे पढ़ने के लिए बाध्य किया. रामराय कवि ने शंकर की कोई पुस्तक कभी नहीं पढ़ी थी. उन्होंने पढ़ना प्रारम्भ किया परंतु बिना स्पर्श किए. घृणा के कारण वे दूर से एक छड़ी की सहायता से पुस्तक के पन्ने पलटते और पढ़ते जाते. लेकिन ज्यों-ज्यों वे पढ़ते गए चकित होते गए. प्रभावित होते गए. डूबते गए. और पढ़ते गए. जल्दी ही उन्होंने छड़ी को दर किनार किया और पुस्तक हाथ में उठा ली अब वे हाथ से पन्ने पलट रहे थे. पुस्तक समाप्त होने तक रामराय कवि पूरी तरह परिवर्तित हो चुके थे. उन्होंने शंकर की प्रत्येक पुस्तक खोज निकाली और उनका अध्ययन किया, इतना ही नहीं उन्होंने शंकराचार्य के दर्शन की प्रशंसा और व्याख्या में एक सौ पुस्तकें लिखीं. एक से बढ़ कर एक पुस्तक. बहुत कम वय में गुजरने के पूर्व उन्होंने ये प्रत्येक अनूठी पुस्तकें रचीं.

लेकिन कितने लोग हैं जो जिस पुस्तक से घृणा करते हैं उसे पलटने का कष्ट करते हैं? भले ही छड़ी की सहायता से. पुस्तक को प्रतिबंधित करने से पहले उसे पढ़ने की जहमत उठाते हैं? अक्सर धार्मिक कठमुल्ला पुस्तक को बिना पढ़े (उनकी आंखों पर पट्टी बँधी होती है. पढ़ भी लेंगे तो समझ लेंगे इसमें शक है) किताब को प्रतिबंधित करने का नारा लगाने लगते हैं. इतना ही नहीं वे लेखक को मार डालने का फतवा भी जारी कर देते हैं. फरवरी 1989 में अयातुल्ला खुमैनी ने यही किया. सल्मान रुश्दी की किताब 'सैटनिक वर्सेस' को इस्लाम धर्म, पैगम्बर मुहम्मद और कुरान आदि के खिलाफ घोषित करते हुए रुश्दी के लिए फतवा जारी कर दिया. इस पर नॉर्मन मैलर ने कहा था, 'खुमैनी ने हमें अपने नाजुक धर्म शब्दों की शक्ति में पुन: विश्वास हासिल करने का अवसर दिया है. ' बाद में जब रुश्दी ने इस्लाम को पुन: स्वीकार करते हुए एक तरह से माफी माँग ली और किताब को उस रूप में भविष्य में न प्रकाशित कराने का वायदा किया तब भी फतवा न हटा. और तो और खुमैनी के गुजरने के बाद उनके वारिस ने फतवा जारी रखते हुए उसे और दृढ़ता प्रदान कर दी. खुमैनी आध्यात्मिक नेता थे और उनकी बात को कोई काट नहीं सकता है.

रुश्दी के फ़तवे की पूरी दुनिया में खूब चर्चा हुई. बच्चा-बच्चा इस बात को जानता है परंतु बहुत से पढ़े-लिखे और साहित्य प्रेमी, खासतौर से हिन्दी साहित्य प्रेमी शायद नहीं जानते हैं कि 1989 से बहुत पहले एक और लेखक की एक किताब को लेकर धामक कठमुल्लाओं ने ऐसा ही हंगामा किया था. लेखक थे मिस्र (इजिप्ट) के नजीब महफूज और 1959 में लिखी पुस्तक थी 'औलादो हार्रतुना' (चिल्ड्रेन ऑफ गेबेलावी).

वैसे तो जिन किताबों को प्रतिबंधित करने की माँग समय-समय पर उठती रही है उनकी फेहरिस्त बड़ी लम्बी है. यूलीसेस (जेम्स जॉयस), लीव्स ऑफ ग्रास (वॉल्ट विटमैन), रूसोज कंफेशंस (रूसो), कॉल ऑफ द वाइल्ड, द आयरन हील (जैक लंडन), फ्रेंकनस्टीन (मेरी शेली), ब्लैक ब्युटी (अन्ना सीवेल), सिविल डिसओबिडियंस (थोरो), लेडी चैतर्लीज लवर (डी एच लॉरेंस), गॉन विथ द विंड (मार्गरेट मिशेल), साइलेस माइनर (जॉर्ज इलिएट), द अरबियन नाइट्स. और तो और सऊदी अरब में तो बाइबिल नहीं बाँटी जा सकती है. एक समय था जब सोवियत यूनियन में बाइबिल और कुरान दोनों प्रतिबंधित थी. भारत में भी समय-समय पर किताबें प्रतिबंधित होती रही हैं.

परंतु महफूज और रुश्दी की किताब का यहाँ एक संग जिक्र करने का खास मकसद है. महफूज ने अपनी किताब 'औलादो हार्रतुना' (चिल्ड्रन ऑफ गेबेलारी) में मानवता के इतिहास को प्रारम्भ से लेकर बीसवीं सदी के पाँचवे दशक तक को समेटने का प्रयास किया है. 1959 में आए उपन्यास की कथावस्तु बिल्कुल भिन्न है. यह कैरो के एक उपनगर के बच्चों और उनकी कठिनाइयों की शुरुआत से सृष्टि की कहानी है. इसमें उन्होंने इस्लाम से जुडे कई मिथकों को प्रतीकवादी शैली में आम चरित्रों के रूप में प्रस्तुत किया है. कुरान और हदीस का सहारा लिया है. इसमें कुरान के 114 सूरा की भाँति 114 चैप्टर हैं. उपन्यास के चरित्र धामक चरित्रों से मिलते-जुलते हैं. एडम और इव, मोसेस, जीसेस, मोहम्मद, इदरिस, जाबाल, कासिम आदि और बहुत से दूसरे लोगों के साथ इसमें आधुनिक वैज्ञानिक भी छद्म वेश में उपस्थित हैं. स्वयं गेबेलावी अल्लाह सिरजनहार से मिलता-जुलता है. इस कहानी के कुछ बासिन्दे स्थानीय प्रमुख (राजनीति) का अनुगमन करते हैं तो कुछ उच्च आदर्शों (धर्म) की ओर रास्ता लेते हैं. इसमें मनुष्य की अनवरत खोज, आध्यात्मिक मूल्यों के विषय को उन्होंने अपनी कथावस्तु बनाया है. इसमें दिखाया गया है कि असल में ये वैज्ञानिक ही हैं जो आदिम पिता गेबेलावी (ईश्वर) की मौत के जिम्मेदार हैं. इसमें चित्रित किया गया है कि प्रेम के पारस (अमृत) और विस्फोटक को आधुनिक विज्ञान का मनुष्य एक जैसी दक्षता से मिलाता है. वह गॉड की मृत्यु का जिम्मेदार है परंतु स्वयं भी नष्ट होता है. उन्होंने दिखाया है कि अच्छाई और बुराई के लिए अलग नियम हैं, उनके टकराव, उससे उत्पन्न तनाव का इसमें चित्रण हुआ है. नई परिस्थितियों में नए तनाव को झेलते हुए व्यक्ति का चित्रण है. इसके बावजूद उपन्यास के अंत में आशा की किरण है. जिस तरह से महफूज ने उच्च स्तर की बातों को इस किताब में चित्रित किया है वह परम्परावादी लोगों के गले नहीं उतरी और यह किताब उनके अपने देश में प्रकाशित न हो सकी. परंतु अन्य देशों में इसका प्रकाशन हुआ. उपन्यास को जलाया गया और सडकों पर रैलियाँ निकाली गई और महफूज को इस्लाम का दुश्मन करार दिया गया. 'औलादो हार्रतुना' ने उनके जीवन को उलट-पुलट दिया. उनको मुल्क की संस्कृति व मजहब के लिए खतरनाक सिद्ध किया जाने लगा. जब धर्म के ठेकेदार उनके विरुद्ध थे देश के अधिकाँश बुद्धिजीवी भी उनसे कट गए इससे उनको कितनी पीडा हुई होगी इसका अनुमान लगाया जा सकता है. पर वे हारे नहीं, न ही उन्होंने लिखना बन्द किया. जिनका जमीर जागा होता है वे बिगाड़ के डर से ईमान की बात कहना नहीं छोड़ देते हैं. नजीब ऐसे ही जागे हुए जमीर के लेखकों में से थे.

जब पहले-पहल यह उपन्यास काहिरा (कैरो) के प्रमुख पत्र 'अल अहराम' (द पिरामिडस) में धारावाहिक प्रकाशित होने लगा इस्लामिक यूनिवसटी अल अजहर के नेता, धर्म और नैतिकता के ठेकेदारों ने किताब को धर्म पर आघात मान कर किताब और लेखक के खिलाफ नारे लगाए और किताब को प्रतिबंधित करना चाहा. पर न तो आधिकारिक बन्दिश लगी न ही धारावाहिक का प्रकाशन रुका. 1988 में सलमान रुश्दी की किताब द सैटेनिक वर्सेस के फतवा के दौरान पुन: महफूज की इस किताब को लेकर गरमागरम बहस उठी. अचानक महफूज ने पाया कि उन्हें एक विदेशी लेखक के साथ खडा कर दिया गया है. जबकि दोनों लेखकों और दोनों की किताबों में कोई समानता ना थी. महफूज स्वयं इस्लाम को मानने वाले हैं, नैतिकता का पालन करने वाले. रुश्दी इंग्लिश में लिखते हैं महफूज अरबी में. एक बहुत पहले प्रवासी बन गया और उसने दूसरे देशाेंं की नागरिकता भी ले ली, जबकि महफूज ने शायद ही कभी अपना वतन याँ यू कहें अपना जन्म स्थान छोड़ा. लेकिन कट्टरवादियों ने दोनों को एक मान लिया. महफूज ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मानवता का पवित्र अधिकार मानते हुए रुश्दी के बचाव में 2 मार्च 1989 को अल अहराम न्यूजपेपर में वक्तव्य दिया. बस फिर क्या था महफूज के दुश्मनों ने दोनों किताबों को एक ही पलडे पर रख कर महफूज के लिए भी उसी फतवे की माँग शुरु कर दी जो सल्मान रुश्दी के लिए जारी किया गया था.

इस दौरान नजीब महफूज ने अपना विचार इन शब्दों में रखा: ''मैं खुमैनी के सल्मान रुश्दी को मारने के फतवा की भर्त्सना करता हूँ क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों का उलंघन है और इस्लाम पर प्रहार है'' अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संबंध में उनका कहना है कि इसे पवित्र माना जाए. विचार केवल प्रति-विचार के रूप में ही सुधारे जा सकते हैं. उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास करते हुए भी सामाजिक शांति को उससे ऊ पर स्थान दिया. उनका मानना है कि लोग तर्क और विचार की रोशनी को बुझा देना चाहते हैं. अभिव्यक्ति की आजादी की हर हाल में रक्षा होनी चाहिए और किसी विचार को अगर परास्त या दुरुस्त करना है, तो बलपूर्वक नहीं बल्कि प्रतिरोधी विचारों के द्वारा ही ऐसा किया जा सकता है.

पर इससे उनके विरोधी ठंडे नहीं पडे. वे अपने आप को बहुत अकेला महसूस करते थे. शायद सच्चाई का पक्ष लेने वाले की यही नियति होती है. सल्मान रुश्दी ने फतवा से बचने के लिए ना मालूम अपने कितने ठिकाने बदले. देश बदले. पर जहाँ भी रहे उस देश की सरकार ने उनकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए. उन्होंने स्वयं भी सुरक्षा के कठोर नियमों का पालन किया. रुश्दी के जीवन में इस दौरान कई बदलाव आए. उनके इस अनिश्चित जीवन से तंग आकर उनकी पत्नी उन्हें छोड़ गई पर लिखना उन्होंने जारी रखा. मिस्र की सरकार ने भी कट्टरवादियों के 'काफिर' की सुरक्षा की पेशकश की परंतु महफूज ने इसे कभी स्वीकार न किया. और अपना जीवन सामान्य चर्या से चलाते रहे, दोस्तों के साथ बैठते रहे. उन्होंने लिखना जारी रखा और एक दिन इसी गुट के एक धर्मांध ने उन पर हमला कर दिया और इससे साहित्य जगत का कितना नुकसान हुआ इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है.

गुंटर ग्रास अपने नोबेल भाषण में कहते हैं कि वे किताब जलाने वालों के देश से आते हैं. ग्रास अपने भाषण में पहले पूछते हैं कि क्या है जो किताब और उसके साथ लेखक को इतना खतरनाक बना देता है कि उसे समाप्त करने के उपाय किए जाते हैं? वे आगे स्वयं ही उत्तर भी देते हैं वे कहते हैं कि लेखक सत्य की खोज में गड़े मुर्दे उखाडता है, वह शल्य चिकित्सा करता है और इस सिलसिले में घाव को खोलता है. बन्द दरवाजों के पीछे झाँकता है अतीत की शांति भंग करता है. उसके लिए कुछ भी ऐसा पवित्र नहीं है जिसपर वह प्रश्न नहीं उठाता हो चाहे वह पूँजीवाद हो अथवा कोई और वाद या फिर राजाओं की जीत. और यही उसे कुछ लोगों की नजरों में खटका देता है यहाँ तक कि अपराधी बना देता है. मेरी समझ में नहीं आता है किताब जला कर लोग क्या सिद्ध करना चाहते हैं. खैर मेरी समझ में बहुत सी बातें नहीं आती हैं. लेकिन इतना जरूर जानती समझती हूँ कि किताब वही जला सकता है जो मानवता की इस अमूल्य विरासत की कद्र करना नहीं जानता है. गुंटर ग्रास व्यंग्य कर रहे हैं अपने देशवासियों पर. वैसे हमारा देश भी कुछ कम नहीं है किताब जला कर यहाँ के लोग (कुछ थोड़े से) भी अपनी बहादुरी दिखाने की कोशिश करते हैं. शायद कुछ लोगों के लिए किताब जलाना या उसे प्रतिबंधित करने के लिए शोर- शराबा, हंगामा करना एक फैशन है. हमारे यहाँ भी नजीब की मृत्यु पर साहित्य जगत में खास सुनगुन नहीं हुई. पत्र-पत्रिकाएँ भी अपने हितों को बचा कर चलती हैं.

सुकरात को बिना कुछ लिखे ही जहर का प्याला पीना पड़ा. कितने ही जर्मन, इटैलियन, स्पैनिश, और पुर्तगाली लेखकों को अपनी भाषा और अपना वतन छोड़ना पड़ा. नामालूम रूस और चीन के कितने लेखक आतंक का शिकार हुए. 1995 में नाइजीरियन लेखक केन सारोवीवा और उनके समर्थकों को फाँसी की सजा सुना दी गई और मार डाला गया. उनकी खता थी कि उन्होंने अपने देश में व्याप्त बुराइयों के विषय में लिखने की हिमाकत की थी. दूर क्यों जाएँ बगल के बांग्ला देश की तस्लीमा नसरीन अपने लेखन के कारण देश के कठमुल्लाओं की नजरों में चढ़ गईं, उन्हें अपना वतन छोड़ना पड़ा. महफूज को भी सत्य की कीमत चुकानी पड़ी. वे कहते हैं कि सत्य की खोज उन्हें लिखने को उकसाती है.

नोबेल एकेडमी के प्रजेंटेशन भाषण में प्रोफेसर स्टूर एलेन ने कहा: ''1911 में 10 दिसम्बर को जिस दिन उस वर्ष का साहित्य का पुरस्कार मौरिस मीटयरलिंक को यहाँ स्टॉकहोम में किंग गॉस्टव्स पाँचवें के हाथों मिला उसके दूसरे दिन काहिरा में नजीब का जन्म हुआ. '' कैरो में 11 दिसम्बर 1911 में जन्मे नजीब महफूज ने सत्रह साल की उम्र से ही लिखना प्रारम्भ कर दिया था. उनका पहला उपन्यास 'अबोस अल-अकदर' (आयरनी ऑफ वैल्यूज) 1939 में प्रकाशित हुआ. द्वितीय महायुद्ध 1939-1945 के बीच उन्होंने तीन उपन्यास लिखे. उनके ज्यादातर उपन्यास मिस्र के इतिहास पर आधारित हैं पर चरित्र अतीत से वर्तमान में बिना किसी रोकटोक के आते-जाते रहते हैं. जुलाई 1952 में होने वाली मिस्र क्रांति के पूर्व उनके दस और उपन्यास लिखे जा चुके थे. इसके बाद उन्होंने काफी समय तक लिखना बन्द कर दिया. हालाँकि उनका एक उपन्यास 1953 में पुन: प्रकाशित हुआ. 1957 में प्रकाशित मिस्र त्रयी ने उन्हें सम्पूर्ण अरब दुनिया में चचत कर दिया. खूब शौहरत दी. यह त्रयी थी 'बैनुल-कसरैन' (बिटवीन द पैलेसेस), 'कसरुस्शौक' (पैलेस ऑफ लाँगिंग), 'अस्सुकरिय': (शुगरहाउस). उनकी उपन्यास त्रयी आत्मकथात्मक तत्वों से भरी है. इसके केंद्र में एक परिवार है. इसमें 1910 से लेकर 1950 तक इस परिवार में होने वाली तब्दीलियों का चित्रण है. इसी के साथ इसमें बौद्धिक, सामाजिक तथा राजनीतिक परिस्थितियों का भी चित्रण है. उनकी इस किताब ने उनके देश पर काफी प्रभाव डाला. जो उनके देश की तत्कालीन स्थिति को समझने में सहायक है.

यहाँ पर मिस्र की थोड़ी सी जानकारी अन्यथा न होगी. इस्लाम मिश्र का ऑफीसियल धर्म है. और 90% लोग सुन्नी मुसलमान हैं. यहाँ 7% जनता इसाईयत के कोप्टिक चर्च से जुड़ी है और 3% प्रतिशत लोग ग्रीक ऑर्थाडॉक्स, रोमन कैथोलिक, अरमेनियन तथा विभिन्न प्रोटेस्टेंट चर्च को मानने वाले हैं एक बहुत छोटे सी आबादी यहूदियों की भी है. अरबी यहाँ की राष्ट्रीय, बोलचाल और ऑफिस की भाषा है. वैसे पढ़े लिखे लोग इंग्लिश और फ्रेंच भी बोलते हैं. यहाँ की 70 से ज्यादा प्रतिशत आबादी शिक्षित है.

पिछली सदी के पाँचवें दशक में राजतंत्र का तख्ता उलट गया. गमाल अब्दल नासर ने मिलिट्री की सहायता से मिस्र का राजनीति तंत्र बदल दिया. नासर ने मिस्र को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराया. दो साल के अन्दर नासर स्वयं राष्ट्रपति बन बैठे. वे अरब देशों का एकीकरण करना चाहते थे, उन्होंने अरब समाजवाद का भी स्वप्न देखा. हालाँकि यह कामयाब न हो सका. 1958 में मिस्र और सीरिया ने मिल कर यूनाइटेड अरब रिपब्लिक की स्थापना की. 1961 में ही इससे सीरिया हट गया परंतु 1971 तक मिस्र इसी नाम का प्रयोग करता रहा. 1970 में नासर की मृत्यु के बाद उनकी विरासत अनवर अल सादात ने सम्भाल ली. सदात के इजराइल संबंधों को कट्टरपंथी इस्लाम वालों ने कभी स्वीकार नहीं किया. उन्होंने मुस्लिम कृट्टरपंथियों को तोडने के लिए गिरफ्तारियाँ शुरु कीं और प्रेस को प्रतिबंधित किया. कट्टरपन्थी उन्हें सदा इस्लाम का द्रोही मानते रहे. 1981 में मिलिट्री ऑफीसरों ने सदात की हत्या करा दी और वाइस प्रेसीडेंट हुस्ने मुबारक ने कमान सम्भाली. 1993 में 29 अतिवादियों को फाँसी दे दी गई. 1992 में इस्लामिक कट्टरवादियों ने सरकारी अफसरों, क्रिश्चियन, पर्यटकों, बुरका न पहनने वाली औरतों को अपना निशाना बनाना शुरु किया. और यह अभी भी जारी है. 1995 में कट्टरवादियों ने हुस्ने मुबारक की हत्या का प्रयास किया. ये कट्टरवादी समय-समय पर निर्दोष जनता और पर्यटकों की हत्या करके आतंक फैलाते रहते हैं. सन 2000 में मिस्र में स्त्रियों के अधिकारों में कानून द्वारा थोड़ा इजाफा हुआ है. इन्हीं कट्टरपंथियों ने 1994 में महफूज पर हमला किया था.

फिर जब महफूज ने दोबारा लिखना प्रारम्भ किया तो उनकी शैली बदल चुकी थी. वे नए ढंग से लिखने लगे. 1959 में 'द चिल्ड्रेन ऑफ गेबेलावी' के साथ उन्होंने नए ढंग में लिखना शुरु किया. यह काफी जटिल चित्रण वाला उपन्यास है अक्सर राजनीतिक फैसलों को रूपक कथा तथा प्रतीकवाद के रूप में ढालते हुए. इस दूसरे दौर में उन्होंने 'द थीफ एंड द डॉग्स' (1961), 'ऑटम क्वायल' (1962) लिखा, 1966 में लिखा 'ए हाउस ऑन द नाइल' महफूज के खजाने का एक और रत्न है इसमें उन्होंने मिथिकल वार्तालापों को यथार्थ और भ्रम के कगार पर रखा है. इसके साथ ही यह किताब उनके देश के बौद्धिक पर्यावरण पर टिप्पणी भी करती है. यह उपन्यास 'स्मॉल टॉक ऑन द नाइल' 'चिटचैट ऑन द नाइल', 'ए हाउस ऑन द नाइल' के नाम से भी जाना जाता है. इसके हाउसबोट का संवाद और जीवंत बहस सामाजिक भूमिकाओं के विषय के लिए मंच प्रदान करता है. यहाँ हम एक युवा जोड़े से मिलते हैं जो पिरामिड के ब्लॉक्स में अपनी सेज बिछा रहें हैं. (1966) तथा 'मीरामार' (1962) जैसे उपन्यास और कई कहानी संकलन आए. इन्होंने अपना कैरो का घर शायद ही कभी छोड़ा है. और कैरो ही इनकी उपन्यासों, कहानियों और नाटकों की रंगभूमि रहा है.

दो हजार साल पहले तक का अरबी साहित्य का इतिहास स्पष्ट रूप से मिलता है. बहुत समय तक अन्य देशों के साहित्य की भाँति यहाँ भी साहित्य की प्रमुख विधा काव्य ही थी. लेकिन इसके साथ ही यहाँ मौखिक वर्णन की एक प्राचीन और समृद्ध परम्परा मिलती है. भारतीय, ईरानी और ईराकी मूल की बहुत सारी कहानियों का एक संकलन 'द अरेबियन नाइट्स' के नाम से मिस्र में मिलता है. इसकी कहानियाँ विकसित कहानियों की श्रेणी की हैं. आज भी मिस्र में कहानी कहने, सुनने की प्रथा जीवित है. जनता के बीच कहानी कहना युगों-युगों से एक सांस्कृतिक विरासत के रूप में कायम है. उपन्यास अन्य देशों के साहित्य की तरह ही यहाँ भी एक नई विधा है, आधुनिक युग दुनिया के जिस साहित्य में भी उपन्यास का विकास हुआ उसके पीछे कुछ खास बातें रहीं हैं, मसलन: 19 वीं सदी में यूरोपीय साहित्य में उपन्यास विधा के विकास का प्रभाव, 19 वीं में प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना और अखबारों का उदय (अधिकतर उपन्यास पहले अखबारों में धारावाहिक के रूप में प्रकाशित होते थे), जनता का शिक्षित होना तथा साक्षरता का प्रसार, 19 वीं सदी में विदेशी शक्तियों के शोषण से मुक्ति एवं अंतरराष्ट्रीय ज्ञान से लैस बौद्धिक वर्ग का उदय. मिस्र में भी इन्हीं शर्तों पर उपन्यास का उदय हुआ.

मिस्र के प्रारम्भिक उपन्यासकार जिन्होंने इस विधा को दिशा-दशा प्रदान की उनमें सबसे पहला नाम मुहम्मद हुसैन हेकल (18881956) का आता है. इनका 1912 में प्रकाशित 'जैनब' उपन्यास अरबी का पहला मुकम्मल उपन्यास माना जाता है. परंतु इनके सबसे काबिल उत्तराधिकारी का जन्म तब हुआ जब ये अस्त हो रहे थे. महफूज को इनका उत्तराधिकारी माना जाता है जिन्होंने अरबी उपन्यास को बुलन्दी पर पहुँचाया. उसे इतना प्रौढ़ बनाया कि वह नोबेल पुरस्कार का हकदार बना.

अरबी उपन्यास को जिन शुरुआती उपन्यासकारों ने मजबूती प्रदान की उनमें इब्राहिम अल मैजिनी (18901949), ताहा हुसैन (18891973), महमूद ताहिर (18941954) और तौफीक अल हकिम (18981987) के नाम आदर से लिए जाते हैं. अरबी साहित्य में उपन्यास तात्कालिक घटना है तकरीबन महफूज के समय की. वे उसे प्रौढ़ता की ऊँचाइयों पर पहुँचाते हैं. विभिन्नता और आंशिक रूप से प्रयोगात्मक उपन्यासों की रचना करके. ये उपन्यास मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद से रूपक तथा रहस्य-मीमांसा की बनावट तक जाते हैं. उनके साहित्य की एक विशेषता है अतीत से वर्तमान तक के समय की प्रस्तुति.

महफूज की शिक्षा प्रथम किंग फाउद यूनिवसटी (आज की कैरो यूनिवसटी) में हुई. उनके पिता सिविल सर्विस में निम्न श्रेणी के अधिकारी थे. महफूज सात भाई बहनों में सबसे छोटे थे. हाई स्कूल तक पहुँचते-पहुँचते उन्होंने मध्यकालीन एवं अरबी साहित्य का अच्छा खासा ज्ञान प्राप्त कर लिया था. यूनिवसटी में फिलॉसफी पढ़ने के दौरान ही वे प्रोफेशनल जरनल्स में आलेख लिखने लगे थे. अपनी इंग्लिश सुधारने के लिए उन्होंने जेम्स बैकी के 'एन्शियंट इजिप्ट' का 1932 में अरबी में 'मिस्र अल-कदीम' नाम से अनुवाद कर डाला. ग्रेजुएशन पूरा होते ही छ: साल के भीतर उन्होंने 80 कहानियाँ लिख डाली. 1972 तक महफूज सिविल सर्वेंट थे. पहले मिनिस्ट्री ऑफ मोर्टमैन एंडोवमेंट्स, फिर ब्यूरो ऑफ आर्ट के सेंसरशिप के निदेशक, फाउंडेशन फोर द सपोर्ट ऑफ द सिनेमा के निदेशक और अंत में मिनिस्ट्री ऑफ कल्चर में कल्चर अफेयर्स के कंसल्टेंट के रूप में. ब्यूरोक्रेसी से निवृत्त होते ही सृजन की धारा और तेजी से प्रवाहित होने लगी. इस बार प्रयोग ज्यादा होने लगे. उनके तीस उपन्यास, सौ से ऊ पर कहानियाँ और दो सौ से ऊ पर लेख हैं. उनके आधे से ज्यादा उपन्यास फिल्म में परिवर्तित हो चुके हैं. फिल्में जो पूरी अरबीभाषा-भाषी प्रदेशों (फिल्म निर्माण की संख्या की दृष्टि से मिस्र का भारत और हॉलीवुड के बाद दुनिया में तीसरा स्थान है) में दिखाई जाती हैं. उनके हर उपन्यास का प्रकाशन मिस्र में एक सांस्कृतिक घटना होती थी और गिब्राल्टर से लेकर खाड़ी तक कोई भी साहित्यिक चर्चा उनके नाम के बिना पूरी नहीं हो सकती है. फिर भी बदकिस्मती है कि अरबी दुनिया के बाहर बहुत कम जोग उन्हें जानते हैं.

जब उन्हें 1988 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ तो प्रेस रिलीज में कहा गया, 'स्वीडिस एकेडमी पहली बार एक मिस्र निवासी को पुरस्कृत कर रही है'. ये साहित्य के लिए नोबेल पाने वाले अरबी भाषा के भी प्रथम व्यक्ति हैं. अधिकतर पुरस्कार बहुत देर से मिलते हैं कई बार तो महत्वपूर्ण रचनाकारों को पुरस्कार मिल ही नहीं पाता है. जब महफूज को नोबेल पुरस्कार मिला वे पचास वर्षों से लिख रहे थे और उनकी उम्र 77 साल थी. नोबेल समिति ने अपनी विज्ञप्ति में कहा कि वे आज भी अध्यवसायी हैं. अरबी भाषा में उपन्यास विधा के उत्थान में उनका महत्वपूर्ण योगदान है. इसके साथ ही उनका कार्य हम सबको भी संबोधित है.

उनका 'ए विस्पर ऑफ मैडनेस' 1938 में प्रकाशित हुआ. मिनिस्ट्री ऑफ रिलीजियस अफेयर्स में काम करते हुए 1939 से 1954 तक उन्होंमे एक योजना के तहत तीन भागों में फराओ काल को उपन्यासों में समेटा. इसके बाद उन्होंने इस प्रोजेक्ट से हाथ खींच लिए और सामाजिक यथार्थवादी उपन्यासों की ओर मुड गए. इसके साथ ही वे मिस्र की फिल्म इंड्रस्ट्री के लिए स्क्रीनप्ले भी लिखने लगे. मिस्र की राजशाही का तख्ता 1952 में पलटने के बाद बदली हुई राजनैतिक परिस्थितियों में उनकी 'कैरो त्रयी' खूब सफल रही. और जब नवें दशक में उनका इंग्लिश अनुवाद आया तो दुनिया के अन्य मुल्कों में उनकी शौहरत फैली, उनके अपने देश में एक बार फिर से तीनों उपन्यासों की प्रसिद्धि हुई. उपन्यास त्रयी में नायक कमाल अस्तित्व के गूढ प्रश्नों से जूझता है. महफूज ने स्ट्रीम ऑफ कॉन्शसनेस तकनीक के प्रयोग भी किए और एब्सर्ड साहित्य पर भी अपनी कलम आजमाई. उनके पहले के उपन्यास प्राचीन मिस्र के फराओ के वातावरण में स्थित हैं परंतु उनमें आज के समाज पर भी दृष्टि है. काहिरा पर आधारित उनके उपन्यासों में वातावरण आधुनिक काल का है.

वृन्दावन लाल वर्मा, आचार्य चतुर्सेन शात्री, प्रियंवद की भाँति नजीब को भी इतिहास से खास लगाव रहा है. महफूज के उपन्यासों में इतिहास का विशेष महत्व है. उन्होंने अपनी कलम के कमाल से इतिहास के निर्जीव चरित्रों को सजीवता प्रदान की है. वे इतिहास की बारीकियों के बीच समकालीन राजनीतिक सामाजिक परिस्थितियों से कथानक को पिरोते चलते हैं. 1939 में रचा उनका 'अबास अल-अकदर' प्राचीन मिस्र की शौर्य गाथा पर आधारित है. इस उपन्यास का मूल नाम हिकमत कूफू था जिसका अनुवाद कूफू का ज्ञान हो सकता है. यह फराओ चौथे साम्राज्य 2680 ई. पू. था और इसे एक भविष्यवक्त्ता ने कहा था कि उसकी मृत्यु के बाद उसके बेटे को राजगद्दी नहीं मिलेगी. गद्दी रा (सूर्य देवता) के मन्दिर के प्रमुख पुजारी के बेटे देफेत को मिलेगी. फराओ भविष्य को मोडने का हर संभव प्रयास करता है. इस कथा में इडीपस और मोसेस के भाग्य की तरह ही पेचीदगी है. भाग्य के साथ छेडछाड के सारे प्रयत्न असफल होते हैं. बाद में जब महफूज सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों को उठाते हैं तब भी उनका भाग्य और नियति में यह विश्वास अंत तक कायम रहता है. पर वे कर्म को छोड़ने की बात नहीं कहते हैं कर्म के महत्व, प्रश्न करने के अधिकार को भी प्रदर्शित करते हैं. इस दृष्टि से वे भारतीय जीवन दर्शन के काफी निकट हैं शायद यह पूरे पौरस्त्य दर्शन की खासियत है कर्म के साथ भाग्य और नियति पर विश्वास. प्राचीन मिस्र के बहाने वे तात्कालिक मिस्र के उत्थान, राष्ट्रवाद, स्वतंत्रता के लिए संघर्ष, आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति करते हैं. 1945 में 'खान अल-खलीली' के साथ वे अतीत से अपने युग की ओर लौटते हैं.

उनका 'अमाम अल अर्श' (बीफोर द थ्रोन) 1983 में प्रकाशित हुआ. अर्श खुदा के तख्त को कहते हैं. इसमें उन्होंने अनोखी शैली अपनाई है. इसमें मिस्र के विभिन्न युगों के लीडर, मिस्र के सभी शासक एक कोर्ट में जमा है और उनका मुकदमा चल रहा है. इस कोर्ट में सूर्य देवता ओसिरिस सिहासन पर बैठा है. देवी आइसिस और उनका बेटा गरुड मुखी होरस दोनों ओर बैठे उनकी सहायता कर रहे हैं. पाँच हजार साल पहले के मिस्र के संस्थापक मेनेस (अजिस फराओ ने उच्च और ननिम्न मिसे को मिला कर एक किया था) से लेकर ओटोमन से लेकर अनवर अल सदात तक सब उपस्थित हैं. इसमें अरबिक पूर्व और इस्लामिक इतिहास, आधुनिक राजनीति सबको प्रस्तुत किया गया है. लेखक प्राचीन काहिरा के नागरिक के नाते मुस्लिम दुनिया में सम्पूर्ण अरब आन्दोलन पर प्रश्न खड़े करता है. अपने आप को दो सभ्यताओं की औलाद मानने वाले महफूज के लिए मिस्र और इस्लाम दोनों सभ्यताएँ महत्वपूर्ण हैं.

इस भरे हुए कोर्ट में कवि, सूफी, औरतें, सम्राट, फराओ, राष्ट्रपति, सबको बोलने और सुनने सुनाने का हक है. सब बोल रहें हैं आरोप प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं. बहस चल रही है. परीक्षण और सुनवाई हो रही है. यहाँ हिट्टीज के खिलाफ माँग उठ रही है. फराओ रामसेस द्वितीय अपने बहुत बाद के क्रांतिकारी नासर की प्रशंसा करता है. साथ ही वह नासर को मिस्र को महत्वहीन बना देने का दोषी भी करार देता है मेनेस नसर को अरब में मिला देने का अपराधी कहता है. बारी आने पर नासर अपने उत्तराधिकारी अनवर अल सदात को मिस्र को ओपेन डोर पॉलिसी के लिए दोषी ठहराता है. इस नीति के कारण मिस्र अमेरिका के प्रभाव में आ गया और पूँजीवाद इस पर छा गया, भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया. अपने बचाव में सदात तर्क देता है. बहस के दौरान दोनों नेताओं की खूब मट्टी पलीद होती है. परंतु सदात के बचाव के लिए प्रसिद्ध फराओ एखेनाटेन आ जाता है. जबकि योद्धा फराओ रामसेस द्वितीय नासर का पक्ष लेता है. नेफेटटी भी आती है. अपने मरे हुए पति को वह अगले जीवन में पाने की इच्छा जाहिर करती है. कोर्ट में प्रश्न उठता है कि इन फराओ, सम्राटों और राष्ट्रपतियों ने सामान्य जनता के लिए क्या किया है? बाद में मेरीअमन बताता है कि उसके मन में केवल एक ईश्वर के सूक्त और नेफेटटी की सुन्दरता की प्रशंसा का भाव बढ़ रहा है.

इसी तरह 'टीचिंग ऑफ चेती' में वे बारहवें साम्राज्य से कथावस्तु उठाते हैं इसमें किताबों को जीवन के उच्च मूल्यों से जोड़ा गया है और उच्च मूल्यों को जीवन के लिए उतना ही आवश्यक बताया गया है जितना जीवन के लिए पानी महत्वपूर्ण होता है. साहित्य के लिए अरबी में अदब शब्द का प्रयोग होता है जिसका मूल अर्थ उच्च संस्कृति यानी अच्छा व्यवहार होता है. शुरु में रुमानियात (उपन्यास) भी अदब की शिक्षा के लिए विकसित हुए थे. महफूज की सर्वोत्तम कहानियाँ कैरो के मध्यम वर्ग के लिए लिखी गई हैं. और चूँकि उनकी रचनाएँ कई स्तर पर व्याख्यायित की जा सकती हैं वे कला के दायरे में आती हैं.

1985 में आने वाली उनकी किताब 'अल-ए'इश फिल-हकीका' (ड्वेलर इन ट्रूथ) एखनाटन पर आधारित है. यह उनका एक बेहतरीन उपन्यास है. इसमें वे कई वाचकों की शैली को पुन: अपनाते हैं और एखनाटन की पहचान की विख्यात पहेली को प्रस्तुत करते हैं. इस फराओ ने सूर्य और अपने पूर्वज तूतनखामन की प्रशंसा में बहुत सुन्दर सूक्त रचे थे. वह अपनी समस्त उपासना सूर्य मंडल एटन, सूर्य देवता जिसकी रश्मियाँ जो हथेलियों पर बने ऑंख ''जीवन शक्ति'' के चिह्न पर समाप्त होती हैं को समाप्त करता है. एटन प्राचीन सूर्य देवता का प्रतीक है जो सर्वशक्तिमान और सार्वभौमिक देव माना जाता है. राजा स्वयं अपना नाम बदल कर एखनाटेन (जो एटन के लिए उपयोगी है) रख लेता है और अपने नए देश को अखेटएटन, ''एटन का क्षितिज'' नाम देता है.

1947 में लिखे उपन्यास 'जकाक अल मिदक' ('मिदक ऐली) में गली को उन्होंने एक स्टेज की तरह सजाया है जिसमें रंगबिरंगे लोग हैं. मिदक ऐली का वर्णन प्यारा और पारदर्शी है. यह बहुरंगी भीड़ मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद को प्रस्तुत करती है. हालाँकि मिदक ऐली अपने आसपास के कार्यकलापों से दूर पूरे एकाकीपन में रहती है, यह अपनी एक खास और अनोखी हलचल से भरी हुई है. इस उपन्यास में मिस्र की राजधानी काहिरा का परिवेश, वहाँ की गलियाँ, जीवन शैली, रिश्ते और संस्कृति सभी कुछ जीवंत हो कर सामने आ जाते हैं. इनमें उन्होंने परम्परावादी अरब शहरी जीवन का चित्रण किया है. मूल रूप से इसकी जड़ें सम्पूर्ण जीवन से जुड़ी हैं फिर भी एक ही साथ यह गए जमाने के बहुत सारे रहस्यों को भी सीने पर रखे हुए है. इसके चित्रण का एक नमूना देखना अन्यथा न होगा, 'सूरज डूबने लगा है' और मिदक ऐली भूरी छटा की चमक में छिप रही है. अंधेरा विशाल था क्योंकि यह तीन दीवारों के मध्य एक जाल की तरह था. यह समतल रूप से सनादीकिया स्ट्रीट से उठा. इसके एक ओर एक दुकान, एक कैफे और एक बेकरी है, दूसरी तरफ एक दूसरी दुकान और ऑफिस. यह अचानक समाप्त हो जाती है, जैसे इसकी प्राचीन ख्याति समाप्त हो गई, दो साथ के घरों के संग, हरेक तीन मंजिला है.

'दिन का शोरगुल अब शांत हो गया है और शाम की आवाजें सुनाई पडने लगी हैं, एक फुसफुसाहट यहाँ, एक वहाँ': ''भीतर आओ; हमारे शाम के मिलने का वक्त हो गया है''. ''चाचा कामिल, उठो और अपनी दुकान बन्द करो! '' ''संकेर! हुक्के का पानी बदलो. '' ''जादा! चूह्ला ठंडा करो. '' ''यह हशीश मेरे कलेजे में लगती है. '' ''अगर पिछले पाँच साल से हम ब्लैक आउट और हवाई हमले का आतंक में हैं तो यह केवल हमारी कमजोरी के कारण. ''

'फिर भी गली के मुहाने पर दाहिनी ओर की मिठाई बेचने वाले चचा कामिल की और बाएँ ओर की नाई की दुकान सूर्यास्त के थोड़ी देर बाद तक खुली रहती है. यह चचा कामिल की आदत और अधिकार है कि वे अपनी दुकान के सामने कुर्सी डाल कर उस पर सो जाते हैं अपनी गोद में... वे वहाँ तब तक रहते हैं जब तक कि कोई ग्राहक उन्हें न पुकारे अथवा नाई अब्बास उन्हें तंग करता हुआ जगा न दे. वे काफी तगड़े आदमी है, उनका लबादा उनकी तने जैसी टाँगों को दिखाता है उनका पिछवाड़ा मस्जिद के गुम्बद की तरह बड़ा और गोल है जिसका बीच का हिस्सा कुर्सी पर रहता है बाकी इसके किनारों से बाहर फैला पड़ता है. उनकी तोंद तुम्बे जैसी है और उनकी छातियाँ बड़ी उभरी हुई हैं. गर्दन तो दिखती ही नहीं है. उनके कंधों और फूले हुए लाल और गोल चेहरे के बीच सांस लेने के बीच गायब हो जाती है. नतीजतन फलक पर मुश्किल से एक लकीर दिखती है लगता है उनकी न तो नाक है न ऑंखें. इस सबके ऊ पर उनका छोटा, गंजा सर है जिसका रंग उनकी पीले पर चमकीली चमडी से अलग नहीं है. वे सदा हाँफता रहते हैं और सांस फूली रहती है मानो अभी अभी रेस दौड कर आ रहे हों. वह शायद ही कभी मिठाई बेचने का काम पूरा कर पाते है उससे पहले नींद आ जाती है. लोग उन्हें कहते हैं कि वे जल्द ही मर जाएंगे क्योंकि चर्बी उनके दिल पर चढ़ रही है. वे इस बात से हमेशा राजी होते है. पर मौत उसका क्या नुकसान कर पाएगी जो सदा एक लम्बी नींद में है? '

'नाई की दुकान छोटी है फिर भी गली में खास मानी जाती है. इसमें एक आईना है और एक कुर्सी तथा नाई के काम के औजार. नाई दरमियाने कद का आदमी है, पीले रंग का थोड़ा भारी. उसकी ऑंखें जरा उभरी हुई हैं और भूरी चमडी के बावजूद उसके लहरदार बाल पीले रंग के हैं. वह सूट पहनता है और कभी बिना एप्रन के बाहर नहीं जाता है; शायद ज्यादा फैशनेबल हेयरड्रेसर्स की नकल में. एक गली का सरल भाषा में जीता जागता वर्णन.

उन्हें एक पत्रकार ने बताया था कि जब उनके नाम की घोषणा नोबेल पुरस्कार के लिए हुई तो सन्नाटा छा गया. क्योंकि उनके अपने देश के बाहर उन्हें बहुत कम लोग जानते थे. हिन्दी वालों का भी दुर्भाग्य है कि अधिकाँश लोग उनके नाम और काम से परिचित नहीं हैं. जबकि हमारे देश में अरबी जानने वालों की कमी नहीं है. मैं अपने एक उर्दु दाँ मित्र से बात कर रही थी उनके अनुसार उर्दु वाले भी महफूज के जानिब कुछ खास नहीं जानते हैं. हाँ भाषाओं को लेकर जो आइसोलेशन की स्थिति है और अनुवाद को दोयम दर्जे का कार्य मानने की हठधर्मी है वह इसका कारण अवश्य है. हर भाषा-भाषी यह गलतफहमी पाले हुए है कि बस उसकी भाषा और उसका साहित्य महान है. या फिर शायद जानबूझ कर उनका बॉयकॉट कर रखा है. उनकी मृत्यु पर हिन्दी की अधिकाँश पत्रिकाएँ चुप्पी साधे रहीं. कुछ एक पत्रिकाओं ने एक पंक्ति में सूचना मात्र दी.

जहाँ पाब्लो नेरुदा अपनी जन्मभूमि को स्वतंत्र कराने के लिए देश-विदेश भटकते रहे, दुनिया-जहान की खाक छानी, लम्बी-लम्बी यात्राएँ कीं वहीं महफूज ने अपनी धरती पर रह कर ही वहाँ का चित्रण किया. उन्होंने अपना जन्म स्थान कैरो एकाध अनिवार्यता के अलावा कभी नहीं छोड़ा. उन्होंने कभी लम्बी-लम्बी यात्राएँ नहीं कीं और तो और वे अपने घर से बाहर निकलना भी शायद ही कभी पसन्द करते थे. वे पैदल चलना पसन्द करते थे और हर शुक्रवार को खास तौर पर अपने दोस्तों से मिलने कैफे में अवश्य जाते थे. समय के इतने पाबन्द थे कि सबको मालूम था कि वे शुक्रवार को शाम साढे छ: बजे घर से निकलते हैं और इसी का फायदा उठाते हुए कट्टरवादियों ने उन पर हमला किया था.

मिस्र और अरबीदेशों के बाहर बहुत कम लोग महफूज और उनके काम से परिचित थे अत: अपने नोबेल भाषण में बहुत विनीत हो कर वे अपना परिचय देते हैं. यह परिचय वे अपने जन्म और कार्य के लेखाजोखा से नहीं देते हैं. उनका यह भाषण उच्च स्तर के साहित्य का एक नायाब नमूना है. वे कहते हैं, ''मैं दो सभ्यताओं के मिलन का पुत्र हूँ. '' इन सभ्यताओं का इतिहास के किसी मोड पर कभी मिलन हुआ था. इनमें से एक फराओ कालीन सभ्यता सात हजार साल पुरानी सभ्यता है और दूसरी इस्लामिक एक हजार चार सौ साल पुरानी सभ्यता. वे आगे कहते हैं कि इन दोनों सभ्यताओं से आप विद्वत जन परिचित हैं परंतु फिर से याद दिलाने में कोई हानि नहीं है.

अपने नोबेल भाषण में आगे वे फराओ सभ्यता की इमारतों और लड़ाइयों की बात वे नहीं करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि इस बीते हुए गर्व की बात करना आज के आधुनिक युग में खास मायने नहीं रखता है. न ही वे बात करते हैं कि पहले-पहल कैसे खुदा के अस्तित्व की ओर इसने गाइड किया और मनुष्य के चेतन में उतरा. वे पैगम्बर मोहम्मद की बात नहीं बताते हैं. न ही इस महान सभ्यता में हुई साहित्य, वास्तुकला और चमत्कारों पिरामिडों या फिनिक्स और कारनाक की बातें करते हैं. वे ऐतिहासिक दस्तावेज से उठा कर एक घटना सुनाते हैं जिसमें उनके कथाकार बनने के बीज छुपे हुए थे. बताते हैं कि फराओ को अपने हरम की छ: औरतों और उनके कोर्ट के कुछ आदमियों के पापपूर्ण संबंधों की जानकारी हुई. उस काल के नियमानुसार इन लोगों को समाप्त कर दिया जाना चाहिए था. परंतु उसने ऐसा नहीं किया बल्कि कानून के जानकारों के सामने समस्या रख कर उन्हें इसकी खोजबीन करने के लिए कहा. वह सच्चाई जानना चाहता था ताकि वह न्याय कर सके. सच्चाई जानने की यही ललक महफूज के लेखन का रहस्य है. फराओ का यह व्यवहार महफूज की नजरों में एक साम्राज्य कायम करने या पिरामिडों का निर्माण करने से बढ़ कर है. यह उस सभ्यता की उच्चता को दर्शाता है. वे कहते हैं वह सभ्यता समाप्त हो गई. एक दिन महान पिरामिड भी समाप्त हो जाएँगे परंतु जब तक मनुष्य के पास चिंतनशील मस्तिष्क और एक जाग्रत चेतना है तब तक सत्य और न्याय जीवित रहेंगे. इनके लिए मनुष्य की खोज जारी रहेगी.

इसी तरह वे इस्लामिक सभ्यता के सिद्धांतों स्वतंत्रता, समानता और माफी की बात नहीं करते हैं न ही पैगम्बर मोहम्मद की महानता की बात करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि दुनिया के चिंतनशील लोग पैगम्बर मोहम्मद को महान मानते हैं. न ही वे इस्लाम के विस्तृत फैलाव की बात करते हैं. वे इस सभ्यता के एक लक्षण को संक्षेप में बताते हैं: इस्लाम ने बीजान्टियम के विरुद्ध अपनी जीतों में से एक में युद्ध बन्दियों को प्राचीन यूनानी दर्शन, मेडिसीन तथा गणित की किताबों के बदले वापस कर दिया था. यह मनुष्य के अन्दर ज्ञान के प्रति जो अथाह चाहत है, जिज्ञासा है, उसका प्रतीक है. यद्यपि जिसने यह माँगा वो ईमान लाने वाला और जो माँगा गया वो एक पैगन संस्कृति का उत्पाद्य था. वे इसे अपना भाग्य मानते हैं कि वे इन दो सभ्यताओं के मिलन से बनी सभ्यता में जन्मे और उन्होंने इसका दूध पिया और इसके साहित्य एवं कला से उनका पोषण हुआ. इसके साथ ही वे कहते हैं कि उन्होंने पश्चिमी जगत की समृद्ध और आकर्षक संस्कृति की सुधा को भी पिया है. वे कहते हैं कि इन्हीं सबकी प्रेरणा और खुद अपनी उत्कंठा से शब्द उनसे निसृत होते रहते हैं.

आगे वे अपने भाषण में कहते हैं, आप लोगों को आश्चर्य हो रहा होगा कि यह तीसरी दुनिया से आया व्यक्ति कहानियाँ लिखने के लिए भला कैसे मानसिक शांति रखता होगा? वे कहते हैं कि आप बिल्कुल सही सोच रहे हैं. वे उस दुनिया से आते हैं जो अपना ॠ ण चुकाने के चक्कर में भुखमरी के कगार पर है. इसके कुछ लोग एशिया में बाढ़ में नष्ट हो जाते हैं. कुछ दूसरे अफ्रीका में अकाल में नष्ट होते हैं. दक्षिणी अफ्रीका में लाखों लोग मानव अधिकारों के युग में सामान्य मानव अधिकारों से भी वंचित हैं, मानो वे मनुष्यों की गिनती में आते ही नहीं हैं. वेस्ट बैंक और गाजा में अपने बाप दादा और परदादा की अपनी ही जमीन पर बेदखल हैं ये लोग. वे आदि मानव द्वारा प्राप्त प्रथम अधिकार उनकी जमीन को दूसरे भी उनकी ही स्वीकार करें की माँग कर रहे हैं. उनको अपनी इस साहस पूर्ण माँग के लिए बदले में क्या दिया गया? आदमी, औरत, जवान और बच्चों सबको तोड़ना. गोलियों से भूनना, उनके घरों को नष्ट करना, जेलखानों और कैम्प्स में यातना देना. गुस्से और दु:ख से भरे हुए 150 मिलियन अरब हैं. जो जो लोग शांति अमन और न्याय की ख्वाहिश रखते हैं वे कहते हैं कि यदि उनके द्वारा इन लोगों को अकाल से नहीं बचाया गया तो यह सारे क्षेत्र के लिए खतरा है. भूखा आदमी कितना खतरनाक हो सकता है यह सर्वविदित है. और अगर एक पूरी कौम भूखी हो तो खतरे की गम्भीरता का अन्दाजा लगाया जा सकता है.

इतनी विपदाओं वाले क्षेत्र से आने पर भी वे लिखने के लिए मानसिक शांति कैसे जुटा लेते हैं इस बारे में वे कहते हैं कि 'सौभाग्य से कला बहुत विशाल हृदय और सहानुभूति रखने वाली है. ' जैसे यह प्रसन्न रहने वालों पर कृपा करती है वैसे ही यह अभागों को छोड़ नहीं देती है. यह दोनों को ही जो उनके हृदय में उमड़-घुमड़ रहा होता है उसे अभिव्यक्त करने देती है. सभ्यता के इतिहास के इस निर्णायक क्षण में यह अविश्वसनीय और अस्वीकार्य है कि मानवता की सिसकियाँ शून्य में समाप्त हो जाएँ. इसमें शक नहीं कि मानवता प्रौढ़ हो गई है और हमारा युग महाशक्तियों से अपेक्षाओं के बीच प्रवेश कर रहा है. वे विज्ञान की सकारात्मक उपलब्धियों को याद करते हुए कहते हैं कि मनुष्य का मस्तिष्क अब नष्ट करने और एनीलिहिलेशन के सारे कारणों को समाप्त कर डालने में लगा है. और जैसे वैज्ञानिक इंड्रस्ट्रीयल पर्यावरण प्रदूषण को साफ करने में लगे हैं बौद्धिक लोगों को मानवता के नैतिक प्रदूषण की सफाई में लगना है. वैसे ही बौद्धिक लोगों का आह्वान करते हुए कहते हैं यह हमारा अधिकार और कर्तव्य दोनों है कि हम सभ्य देशों और उनके अर्थशास्त्रियों से वह कदम उठाने को कहे जो उन्हें इस युग के केंद्र में ला दे.

वे अपने नोबेल भाषण में यह भी कहते हैं कि प्राचीन काल में प्रत्येक राजा केवल अपने लोगों की भलाई के काम करता था. दूसरे शत्रु माने जाते थे या शोषण का वायस माने जाते थे. अपनी सर्वोच्चता और निजी गौरव के अलावा किसी और बात की इज्जत न थी. केवल व्यक्तिगत ख्याति और उच्चता को मूल्य दिया जाता था. इस बात को सिद्ध करने के लिए बहुत सी नैतिक बातों, आदर्शों और मूल्यों को नष्ट कर दिया जाता था, अनेक अनैतिक साधन न्यायसंगत माने जाते थे, बहुत से लोगों को नष्ट होना पड़ता था. झूठ, मक्कारी, षडयंत्र, क्रूरता सब तब ज्ञान और महानता के लक्षण माने जाते थे. आज इस विचार को जड़ से ही बदलने की जरूरत है. आज एक सभ्य लीडर की महानता की माप उसके वैश्विक दृष्टिकोण और उसकी समस्त मानवता के प्रति उत्तरदायित्व की भावना से होनी चाहिए. आज के युग में विकसित देश और तीसरी दुनिया एक परिवार है. प्रत्येक मनुष्य ने जो ज्ञान, बुद्धि और सभ्यता पाई है उसके अनुसार उस पर इस बात की जिम्मेदारी है. मैं अपने कर्तव्य की सीमा का उल्लंघन नहीं कर रहा होऊँगा यदि मैं तीसरी दुनिया की ओर से कहूँ कि हमारी बदहाली के दर्शक मात्र न बने रहें. अपने स्तर के अनुकूल भूमिका निभाएं. दुनिया के चारों कोनों में मनुष्य की बात तो छोड़ ही दीजिए जानवर, पेड़-पौधे तक के प्रति कोई गलत काम न हो, आप यह देखें आपके उच्च स्थान से यह आपका दायित्य है. देशों और नेताओं की बड़ी-बड़ी बातों, वायदों और योजनाओं के खोखलेपन की याद दिलाते हुए वे कहते हैं कि बातें बहुत हो लीं, अब काम करने का समय है. हमने बहुत कहा. अब काम करने का वक्त आ गया है.

वे कहते हैं कि यह समय है जब लुटेरेपन और अनाधिकार के युग को समाप्त किया जाए. हम उस युग में हैं जब लीडर्स पूरे ग्लोब के लिए जिम्मेदार हैं. दक्षिण अफ्रीका के गुलामों को बचाओ. अफ्रीका के भूख से मरने वालों को बचाओ! पैलेस्टिनियन को बूलेट्स और दमन से बचाओ! न, इजराइल के लोगों को उनकी महान आध्यात्मिक विरासत को नापाक करने से बचाओ! जो आथक कानून की कठोरता से ॠ ण में दबे हुए हैं उन्हें बचाओ! उनका ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करो कि उनका दायित्व मनुष्य के प्रति पहले हो उस विज्ञान के कानून के प्रति नहीं जिसका समय बीत चुका है. वे मनुष्यता के उत्थान के प्रति चिंतित हैं. अपने इस नोबेल भाषण वे न केवल मिस्र की नुमाइन्दगी करते हैं वरन पूरी तीसरी दुनिया के नुमाइन्दे बन कर उभरते हैं. इस भाषण को पढ़ने से महफूज की तस्वीर घर के बडे-बूढे के रूप में उभरती है जो परिवार के भविष्य को ले कर चिंतित है. परिवार की भलाई चाहता है. परिवार के हालात से वह चिंतित है परंतु निराश नहीं. यह बात दीगर है कि इस बुजुर्ग का परिवार बहुत फैला हुआ, बड़ा विशाल है. इनका परिवार न केवल उनका अपना शहर, अपना देश है वरन पूरी मनुष्यता है.

महफूज निराशावादी नहीं हैं. वैसे कई बार उनपर यह आरोप लगता रहा है. उन्होंने खुद कहा है 'यदि मैं निराशावादी था तो मैंने लिखा नहीं होता. ' वे अपने नोबेल भाषण में कहते हैं कि हमारे चारों ओर जो चल रहा है उसके बावजूद वे अंत तक आशान्वित हैं. वे कांट की तरह नहीं कह रहे हैं कि दूसरे लोक में अच्छाई की जीत होगी. अच्छाई की विजय नित्य हो रही है. ऐसा भी हो सकता है कि बुराई हमारी सोच से अधिक कमजोर है. यह हमारी नजरों के सामने की सच्चाई है. अगर जीत अच्छाई के पक्ष में न होती तो ऐसा कैसे होता कि जानवरों और कीडों, प्राकृतिक विपदाओं, भय और अहम्मन्यता के बावजूद झुंड-के-झुंड घुमक्कड़ लोग बढ़ रहें हैं, विकास कर रहे हैं. ये कभी भी राष्ट्र नहीं गठित कर पाते, सृजन और अन्वेषण में उत्कृष्ट नहीं हो पाते, बाह्य जगत को जीत नहीं पाते, और मानव अधिकारों की घोषणा नहीं कर पाते. सच्चाई यह है कि बुराई एक उद्दाम, तुमुल, प्रबल, ऊधमी, प्रचंड, भ्रष्ट, बहकाने वाली चीज है. और आदमी खुशी से ज्यादा उसे याद रखता है जो उसे आघात पहुँचाता है. वे कहते हैं कि उनके महान कवि अबुल अल्ल अल मारी सही थे जब उन्होंने कहा: 'मृत्यु के क्षण का एक दु:ख जन्म के समय के हजार गुना खुशी से बढ़ कर है. '

फिर वे कहते हैं कि उन्हें लगता है कि उन्होंने सबकी शांति भंग कर दी है. परंतु तीसरी दुनिया से आने वाले व्यक्ति से आप क्या अपेक्षा करते हैं? जो सभ्यता विज्ञान, साहित्य और उदात्त मानवीय मूल्यों से निर्मित है अगर उनके सामने नहीं तो इसके अलावा मनुष्य की कराह, विलाप के लिए और कहाँ स्थान है? वे पश्चिमी समाज को ईसा मसीह के बलिदान की याद दिलाते हुए अपील करते हैं कि क्या इस आशा से कि माफी मिलेगी उसने एक दिन अपनी सम्पत्ति को भलाई की सेवा के लिए समर्पित नहीं कर दिया था? वे तीसरी दुनिया की संतान के रूप में योग्य, सभ्य लोगों से उसी के कदमों पर चलने की माँग कर रहें हैं, उसी की तरह व्यवहार की माँग कर रहे हैं उसी के विजन पर ध्यान लगाने को कह रहे हैं.

यहाँ एक आदमी है जो बार-बार कह रहा है, शक्तिशाली, सक्षम लोगों से कह रहा है कि मानवता को नष्ट होने से बचा लो. अपने नोबेल भाषण में हेरॉल्ड पिंटर अमेरिका और इंग्लैंड को सीधे-सीधे दोषी ठहराते हुए उन्हें सजा देने की बात कह रहे हैं लोगों से कह रहे हैं कि एकजुट हो जाओ और अत्याचारी से उसके कार्यों का हिसाब माँगो, उन्हें सजा दो. वे क्रांति का बिगुल बजा रहें हैं. महफूज विनती कर रहें हैं. शक्तिशाली देश के नेताओं से अपील कर रहे हैं. दोनों एक ही बात कह रहें हैं पर दोनों के बात को कहने का अन्दाज जुदा है. दोनों की संस्कृति का अंतर है. दोनों के सामाजीकरण की भिन्नता है. यह दोनों के व्यक्तित्व का अंतर है.

14 अक्टूबर 1994 शुक्रवार सरे शाम महफूज कैरो के एक कैफे कसर अल नील में अपने दोस्तों से मिलने के लिए जा रहे थे. यह साप्ताहिक मिलन उनके जीवन का प्रमुख अंग था. वे बराबर वहाँ जाते थे. और अक्सर पैदल जाते थे उस दिन संयोग से उनका एक डॉक्टर मित्र उन्हें अपनी कार में ले जाने आया था. ज्योंही वे अपने घर से बाहर निकल कर कार में बैठे कार की खिड़की से किसी ने भीतर हाथ डाला. महफूज ने सोचा कि उनका कोई प्रशंसक है उन्होंने हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ बाहर निकाला तभी उस व्यक्ति ने अपने हाथ में पकड़े चाकू से उनकी गर्दन पर वार कर दिया. शुक्र है उस दिन उनका डॉक्टर दोस्त उनके संग था और दूसरी बात यह अच्छी हुए कि अस्पताल पास था. सो कुछ ही मिनटों में देश के बेहतरीन सर्जक उनको बचाने में सफल हो गए परंतु काफी नुकसान हो चुका था. उनकी दाहिनी बाँह जो पचास सालों से लिख रही थी, चालीस के करीब उपन्यास और साढ़े तीन सौ से ज्यादा कहानियाँ जिसने रची थी और पाँच नाटक लिखे थे लकवे का शिकार हो चुकी थी गले की एक ऐसी नस कट गई थी कि उनके आजीवन इस स्थिति से उबरने के कोई लक्षण न थे. परंतु दृढ़ इच्छा शक्ति और लगातार इलाज से वे पुन: लिखने लगे पहले बच्चों जैसी लिखावट में फिर थोड़ी अच्छी लिखावट पर पहले जैसा कभी न लिख सके. उनकी बड़ी स्पष्ट लिखावट जिससे उनके दोस्त परिचित थे वह नहीं लौट पाई. हाँ इस बीच उनके प्रशंसक और एक दोस्त लेखक और पत्रकार मोहम्मद सलमावी ने उनकी बहुत सहायता की. मोहम्मद सलमावी ने ही उनका नोबेल भाषण भी पढ़ा था. वे स्वयं न जा सके थे.

उन दिनों मिस्र की पुलिस कट्टरपंथियों के पीछे पड़ी थी. उन कट्टरपंथियों के पीछे जो इस्लाम के नाम पर आतंक फैला रहे थे. अपने समाप्त होते प्रभाव से खिसिया कर वे किसी भी तरह कोई भी कार्य करके अपना अस्तित्व सिद्ध करना चाहते थे. इस लिए उन्होंने आतंक का नया दौर चला रखा था. और अपनी ओर ध्यानाकर्षण का इससे अच्छा और महफूज से कौन-सा निशाना हो सकता था. महफूज का सम्मान था, वे पूरे अरब जगत में जाने जाते थे और नोबेल पुरस्कार के कारण अन्य देशों में भी उनकी ख्याति थी. उन पर आक्रमण करके ये आतंकवादी अपना प्रभुत्व तो स्थापित करना ही चाहते थे साथ ही समस्त विश्व का ध्यान भी अपनी ओर खींचना चाहते थे. महफूज ने अपने लिए किसी भी सुरक्षा का प्रबंध करने से सदा इंकार किया और सबसे बड़ी बात थी महफूज तक पहुँचना आसान था. यह बात जग जाहिर थी कि वे हर शुक्रवार संध्या साढे छ: बजे घर से निकलते हैं. उनकी लोकप्रियता ऐसी थी कि लोग रात भर अस्पताल में खड़े रहे. उनकी हालत की जानकारी पाने को बेचैन भीड़. और उन्होने भी पहला काम किया लोगों को धन्यवाद देना और कहना कि वे ठीक हैं. उनकी जान बच गई थी पर वे पूरी तौर पर ठीक नहीं थे. लकवे का शिकार हो गया था उनका शरीर, वे लिख नहीं सकते थे और यदि एक लेखक लिख नहीं सकता है तो वह क्या करेगा? एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, ''अगर लिखने की तलब कभी मुझे छोड़ गई तो उस दिन को मैं चाहता हूँ कि वह मेरा अंतिम दिन हो.' महफूज ने बहुत मशक्कत की. 83 बरस की उम्र में वे फिर से लिखना सीखने लगे. उन्होंने फिर लिखा. छोटी-छोटी कहानियाँ जो वे आधे घंटे में लिख लेते थे और एकाध नहीं बल्कि सत्तर से ऊ पर कहानियाँ लिखीं. मोहम्मद सलमावी के अनुसार जापानी हाइकू कविता की भाँति ये कहानियाँ छोटे-छोटे कीमती रत्न हैं. एक व्यक्ति के द्वारा आतंकवादियों को इससे बढ़ कर दिया गया मुँहतोड़ उत्तर क्या हो सकता है.

वे बीस साल से 'अल अहराम' अखबार में लगातार साप्ताहिक कॉलम लिख रहे थे अब उन्होंने इसे साक्षात्कार का रूप दे देने का सुझाव दिया और इसके लिए उनके दोस्त सलमावी उनसे कुछ पूछते और वे जो उत्तर देते वही इस कॉलम की सामग्री बनता. यह सिलसिला एकाध साल नहीं बल्कि पूरे सात साल चला और उनका कॉलम प्रकाशित होता रहा. हाँ अब वे जिद करके अपना और अपने दोस्त दोनों का नाम इसमें दिलवाते थे. यह हर बृहस्पतिवार को अल अहराम के अरबी और इंग्लिश दोनों एडीशन में प्रकाशित होता था. और इस तरह महफूज का इजिप्ट के प्रमुख पत्र 'अल अहराम' में साप्ताहिक कॉलम और अन्य लेखन जारी रहा. उनके इस पत्रकार और लेखक मित्र ने इन मूल्यवान बातचीत (इसके इंग्लिश वाले भाग से) में से कुछ नायाब नमूने चुन कर 2001 में महफूज के 90 वें जन्मदिन पर एक संग्रह प्रकाशित करवाया.

अधजल गगरी छलकती है पर महफूज जैसे व्यक्ति को नोबेल पुरस्कार मिलने से व्यक्तिगत जीवन में कोई खास फर्क नहीं पड़ता है. जब उनसे नोबेल पुरस्कार के विषय में पूछा गया तो उनका उत्तर था, ' एक व्यक्ति के रूप में मैं जो हूँ उससे नोबेल पुरस्कार से कोई अंतर नहीं पड़ता है. हाँ पुरस्कार में सम्मानित होने का गर्व है. लेकिन एक पुरस्कृत व्यक्ति सबसे पहले एक लेखक है. नोबेल पुरस्कार शून्य में से एक लेखक का निर्माण नहीं करता है. व्यक्ति को जो भी उसकी अपनी प्रतिभा और क्षमता हैं उन पर ही निर्भर करना पड़ता है. पुरस्कार व्यक्ति के कार्य और उसके मूल्य को पहचान देता है. कभी-कभी महान लेखक इस तरह से नहीं पहचाने जाते हैं. जब मैं अमेरिका के महान नाटककार ऑर्दर मिलर से मिला उन्होंने बताया कि नोबेल एक एक्सीडेंट है जो किसी लेखक के संग हो सकता है. '

'हालाँकि कभी-कभी पुरस्कार प्राप्तकर्ता विशिष्ट नहीं होता है. उनकी चमक क्षणिक होती है, जल्द ही वे उसी गुमनामी में खो जाते हैं जिसमें वे पहले रह रहे होते हैं. ऐसा नहीं है कि लेखक में प्रतिभा की कमी होती है, शायद यह आंशिक रूप से साहित्यिक अभिरूचि में बदलाव के कारण होता है. धुन सनक बदलती रहती है जो कल पापुलर था आज नहीं है. बहुत से महान लेखक अपनी जीवन कल में नहीं पढ़े जाते हैं कारण मात्र इतना है कि उस काल में कोई और विधा कोई और शैली प्रचलित थी. फिर जब पुन: रूचि बदलती है ऐसे लेखक पढ़े जाते हैं और उनके लेखन की शक्ति से लोग चकित होते हैं ऐसी डिसकवरी या रिडिसकवरी शायद लेखक के लिए उसका आनन्द उठाने के लिए बहुत देर हो चुकी होती है. इस दृष्टि से साहित्यिक पुरस्कार कम प्रसिद्ध लेखकों को उनके अज्ञात से निकाल कर उन्हें पहचान की चमक में डूबने का मौका दे सकते हैं. '

जब महफूज से पूछा गया कि विचार क्या है? तो उनका उत्तर था, ' मेरे लिए उपन्यास एक कहानी है जिसके द्वारा चरित्र प्रस्तुत किए जाते हैं. भले ही कहानी और चरित्र सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, रोमांटिक, या राजनैतिक समस्या की रूपरेखा में आए. जहाँ तक मैं जानता हूँ उपन्यास के पीछे विचार अवश्य होता है. लोग कहते हैं कि इसमें अब बदलाव आ गया है. आज टेक्स्ट अपने आप में ही महत्वपूर्ण बात है. ऐसा कैसे हो सकता है? दुर्भाग्य से मैं नहीं जानता, क्योंकि मैं काफी समय से पढ़ने के आनन्द से कट गया हूँ. जहाँ तक मेरा संबंध है आज भी मेरे लिए उपन्यास एक विचार है और एक प्लॉट तथा चरित्र. मैं एक ऐसे उपन्यास को धारण कर सकता हूँ जिसमें कहानी नहीं कही जाएगी, एक स्थिति होगी, जिसमें घटनाएँ एकल पैटर्न में नहीं विकसित होंगी. मैं ऐसे उपन्यास की भी कल्पना कर सकता हूँ जो बिना चरित्रों के होगा. जिसमें ऐसे होंगे लोग कोई जिनका मनोवैज्ञानिक आयाम नहीं होगा और कोई चारित्रिक विशेषता नहीं होगी. फिर भी मैं सोच भी नहीं सकता हूँ कि बिना विचार के उपन्यास हो सकता है, जब तक कि हम मिस्ट्री नॉवेल्स की बात न कर रहें हों. '

फिर वे साहित्यिक रचना और गैर साहित्यिक रचना का फर्क साफ तौर पर बताते हैं, 'साहित्यिक कार्य बहुत अलग होता है, उतना ही जितना अंतर क्राइम एंड पनिशमेंट तथा मर्डर ऑन द ओरियंट एक्सप्रेस में है. इसीलिए अगाथा क्रिस्टी की किताब अंत में अपराधी को पकड़ने और रहस्य को सुलझाने में होती है जबकि दस्तॉवस्की उस घटना को अपना प्रारम्भिक बिन्दु बना सकते हैं. '

पाठक के विषय में महफूज का विचार है कि किसी भी लेखक का अंतिम लक्ष्य बौद्धिक और सामान्य दोनों प्रकार के पाठक को संतुष्ट करना होना चाहिए. शैक्सपीयर के चरित्र भले ही विद्वानों के अध्ययन के पात्र हों परंतु वे सभ्य और अशिक्षित दोनों को स्पर्श करते है और यही उसकी सार्वभौमिक अपील का रहस्य है. लेखक का नया अप्रोच अपने आप में प्रशंसनीय हो सकता है परंतु औसत पाठक के लिए कठिन हो जाता है. पाठक लेखक के अप्रोच से परिचित नहीं होता है अत: वे उसकी प्रशंसा करने से चूक जाता है. इसका यह अर्थ नहीं है कि सारे बेस्ट सेलर उच्च क्वालिटी के होते हैं. परंतु महफूज का पक्का विश्वास है कि मास अपील के लिए सस्ते हथकंडे नहीं अपनाने चाहिए जैसा कि लबादा और चाकू रहस्य कथाएँ, हॉरर स्टोरीज और पोर्नोग्राफी होते हैं.

वे कहते हैं, 'मैं जब लिखता हूँ मुझे लगता है मैं स्वयं को सम्बोधित कर रहा हूँ. एक लेखक को कभी नहीं लग रहा है कि वह सीधे जनता से बात कर रहा है. हालाँकि यह मानी बात है कि जनता सदा उसके दिमाग में रहती है. यदि पाठक ही एकमात्र लेखक की चिंता है तो वह बहुत कुछ बलि चढ़ा कर बहुत कम पाएगा. जब एक लेखक हाथ में कलम उठाता है उसे केवल अपने सामने के कार्य के विषय में, अपने बारे में सोचना चाहिए और सम्भवत: अपने जैसे एक दूसरे, अपने जुड़वाँ पाठक को ही ध्यान में रखना चहिए. यदि इतना कर लिया तो उसे इंतजार और सर्वोत्तम की आशा करनी चाहिए. '

जब उनसे आज के साहित्य पर प्रश्न किया गया तो उनका कहना था कि कुछ लोग कहते हैं कि कला और साहित्य ज्यादा-से-ज्यादा धूमिल और अस्पष्ट होता जा रहा है. जैसे कि बहुत सी पेंटिंग्स और बहुत सारे म्युजिकल कम्पोजीसन केवल विशेषज्ञों के पल्ले ही पड़ते हैं. यह अस्पष्टता कई कारणों से हो सकती है. विचारों की प्रक्रिया में ही कठिनाई जहाँ लेखक कोई खास जटिल विचार प्रस्तुत करना चाहता है. इस सन्दर्भ में पाठक को विशेष प्रयत्न करके उसे समझने का प्रयास करना चाहिए. शायद एक बार पढ़ना काफी न होगा या फिर समीक्षा और व्याख्या के साथ पढ़ना होगा. यह अस्पष्टता उनके लिए स्वाभाविक है जो ऐसे साहित्य के पाठक नहीं हैं जा पाठक से विशिष्टता की माँग करता है. संगीत के विषय में भी यही बात है. अगर आप बिथोवन पहली बार सुनते हैं तो आपको उसके विभिन्न सुर-तान-ताल जानने समझने के लिए उसकी सिम्फनी को पढ़ना भी होगा. इनको समझने के लिए पृष्ठभूमि होनी अनिवार्य है. वे चाहते हैं कि पाठक भी लेखक के स्तर तक उठे, स्वयं को साहित्यिक कृति के रसास्वादन के लिए तैयार करे. साहित्य की समझ के लिए स्वयं को प्रशिक्षित करे, अपने आप में साहित्यिक अभिरूचि जाग्रत करे. मुझे यहाँ कुछ दिन पूर्व हो रही बातचीत में प्रियंवद की इसी तरह की टिप्पणी याद आ रही है उन्होंने भी कहा था कि जैसे लोग स्वयं को विज्ञान, गणित और अन्य विषयों के लिए तैयार करते हैं, ट्यूटर रखते हैं ऐसे ही उन्हें साहित्य के लिए भी मेहनत करके खुद को तैयार करना चाहिए.

इसके साथ ही महफूज लेखक को भी सावधान करते हैं. यह कारण है लेखक का परिपक्व न होना. कई मामलों में अस्पष्टता लेखक की गलती होती है. लेखक विचार को स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत करने में समर्थ नहीं होता है. अधकचरी तकनीक भी प्रवाह को बाधित करती है. इन दोनों कारणों के अलावा एक और तीसरा कारण हो सकता है. वे इसको भी बताते हैं. यह तीसरा कारण लेखक के लिए श्रेय नहीं होता है पर बहुत से लेखक इसी को अपना प्रेय बना लेते हैं. तीसरे तरह का तत्व इनमें से सबसे खराब है. अपने काम को जानबूझ कर अस्पष्टता में लपेटकर प्रस्तुत करना और इस गलतफहमी में रहना कि पाठक इस अस्पष्टता से प्रभावित होगा.

नजीब महफूज ने एक लम्बा जीवन जिया और अंत तक सक्रिय रहे. उन्होंने राजनैतिक, सामाजिक, अथक और साहित्य तथा कला एवं अन्य क्षेत्रों में बहुत से उतार चढ़ाव देखे, बहुत सारे परिवर्तन देखे. उनकी खासियत थी कि वे सदा इनको सूक्ष्मता से देखते रहे और कभी इनके साथ, कभी वक्त से आगे का लेखन करते रहे. उन्होंने अपने लेखन के द्वारा सामाजिक क्रांति का प्रयास किया है. जब मिस्र में फिल्मों का दौर आया तो वे फिल्म से जुडे. वे फाउंडेशन फोर द सपोर्ट ऑफ स सिनेमा के निर्देशक थे. मिस्र के बहुत से लोग महफूज की कहानियों को फिल्म के माध्यम से जानते हैं. इस नई विधा और नए माध्यम ने अभिव्यक्ति, चिंतन और सृजनात्मकता के नए रास्ते खोले. और साहित्य, कला और समाज को प्रभावित किया. महफूज ने मिस्र फिल्म इंडस्ट्री में एक अधिकारी और पटकथा लेखक के रूप में सक्रिय रूप से भाग लिया. वे अरब दुनिया में फिल्म के आधुनिकीकरण का हिस्सा रहे हैं. उनके लेखन का विकास लगातार विकसित होते नए माध्यमों, मैगजींस, दैनिक अखबार के साथ होता गया. वे कैरो के 1875 में स्थापित राष्ट्रीय न्यूजपेपर 'अल अहराम' में निरंतर लिखते रहे.

नोबेल पुरस्कार मिलने पर महफूज जितने खुश थे उतने ही आश्चर्यचकित भी. उन्होंने कभी उम्मीद न की थी कि उन्हें ये पुरस्कार मिलेगा. उनके जीवनकाल में यह एनाटोल फ्रांस, बर्नार्ड शॉ, अर्नेस्ट हेमिंग्वे और विलियम फॉक्नर जैसे सर्वोच्च लेखकों को मिला था. उन्होंने सुना था कि शायद अरब लेखक को किसी दिन मिले, पर मिलेगा इसमें शक था. वैसे अब्बास मोहम्मद एलअक्काद ने 20 साल पहले महफूज को इस पुरस्कार के लिए नामित किया था. इस पुरस्कार ने उन्हें और जिम्मेदार लेखक बना दिया. उन्हें निरंतर लिखने के लिए प्रेरणा दी. परंतु इसके साथ ही उन्हें अफसोस है कि बदकिस्मती से उन्हें यह तब मिला जब वे काफी उम्र पार कर चुके थे और इसकी प्राप्ति के बाद वे ज्यादा न लिख सके. इसके बाद उन्होंने केवल 'क्कोज ऑफ एन ऑटॉबाईग्राफी' और 'ड्रीम्स ऑफ रिक्युपरेशन' (हमले के बाद स्वास्थ्य लाभ के दौरान) लिखा. उनका उपन्यास 'कुश्तमुर' उन्होंने पुरस्कार से पहले लिखा था हालाँकि यह प्रकाशित बाद में हुआ. पुरस्कार के कारण निजी जीवन में होने वाले परिवर्तन की कामना उन्होंने न की थी. साक्षात्कारों और मीडिया की चकाचौंध उनकी आदत में शुमार न थी. वे एकांत में, शांति से काम करना पसन्द करते थे. नकीब एल-मैनफालौती, ताहा हुसैन तथा एक-अक्काद जैसे तत्कालीन अरब के लेखकों से प्रभावित और प्रेरित थे. जब उनसे पूछा गया कि पुरस्कार के बाद उनके जीवन में सबसे महत्वपूर्ण क्या घटा तो वे अपने गले को दिखाते हुए कहते हैं यह (गले पर हमले के निशान). परंतु राष्ट्र और लोगों ने जो प्रतिक्रिया और प्रेम दिखाया उससे वे विगलित थे. सरल और मजाकिया इतने कि एक बार उन्होंने कहा कि वे लिखते हैं क्योंकि उनकी दो बेटियाँ हैं और जिन्हें हाई हील्ड शूज चाहिए होते हैं. नोबेल पुरस्कार लेने भी वे स्वयं न जा सके. उनके एवज में उनकी बेटियाँ ओम कलसूम नजीब महफूज तथा फातिमा नजीब महफूफ गई थीं.

उनकी कहानियों में भी हमें अस्तित्ववाद की महत्वपूर्ण चिंतनधारा मिलती है: तर्क बनाम ईश्वर पर आस्था इस अनिर्वचनीय दुनिया में प्रेम ताकत की एक सोते के रूप में, बौद्धिक नजरिए की सीमाएँ और विकल्प, एक व्यक्ति का अस्तित्व संबंधी संघर्ष आदि, आदि. महफूज एक कमाल के कहानीकार हैं. 1973 में आए कहानी संग्रह 'गॉड्स र्वल्ड' की चुनिन्दा कहानियों में इसकी एक झलक मिलती है. अस्तित्व के प्रश्नों को उन्होंने किस तेवर के साथ रखा है और जो उत्तर प्रस्तुत किए हैं वे भी काबिले तारीफ हैं. महफूज ने द अरेबियन नाइट्स की तर्ज पर 1982 में 'लैली अल्फ लैला' (अरेबियन नाइट्स एंड डेज) लिखा. इसमें उन्होंने एक ऐसी शैली का प्रयोग किया है जहाँ तत्कालीन समाज और राजनीति से सम्बंधित पहेलियाँ हैं खास तौर पर प्रेसीडेंट सदात की खुली नीतियों के सन्दर्भ में. इसमें परम्परागत शासक, प्रजा और राह दिखने वाले रहस्यमय व्यक्तित्व का उपयोग किया गया है जिनके अर्थ बहुआयामी हो सकते हैं. अधिकाँशत: ये कहानियाँ अच्छाई और बुराई, सही गलत, सत्य और धोखा आदि से जुड़ी हैं जो इन्हें सार्वभौमिकता प्रदान करती हैं. जैसा कि परम्परा सदा करती है ये कहानियाँ हमें स्वप्न दिखाती हैं और कायदा सिखाती हैं. अंतत: इस कहानी संग्रह का शास्त्रीय नीतिकथाओं की भाँति एक नैतिक स्तर है. परंतु लेखक कहीं भी नैतिकता नहीं झाड़ता है उसके अन्दर लेखकीय दायित्व है वह यह कार्य एक मिशन के तहत करता है. एक तरह से उम्र के इस मोड पर महफूज प्राचीन मिस्र के लेखकों का आदर प्राप्त करते हैं.

महफूज के बहुत से उपन्यासों में औरतें मुख्य भूमिका निभाती हैं. महफूज ने कुछ बेजोड़ नारी चरित्र प्रस्तुत किए हैं. उन्होंने अपने कई उपन्यासों में वेश्याओं, नर्तकियों व अन्य सामाजिक रूप से पतित मानी जाने वाली और निम्न तबके की स्त्रियों को लेकर बड़ा सहानुभूतिपूर्ण और सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है. महफूज अपने स्त्री पात्रों में कल्पना की उडान नहीं भरते हैं वे यथार्थ जीवन की उपज हैं. परिस्थितियों के कुचक्र व षडयंत्रों के बीच भयानक कष्टों भरे जीवन में उनके स्त्री पात्र कमजोरी और बेबसी का ही नहीं बल्कि अत्यधिक दृढ़ता व बुद्धिमानी का परिचय देते हैं. वे भरसक यथार्थ का सामना करती हैं. पश्चिमी आलोचकों का कहना है कि कई बार प्रमुख उपन्यास औरतों के इर्द गिर्द बुने जाते हैं और वे सफल भी होते हैं. मिस्र में भी ऐसे उपन्यास रचे गए. महफूज के कई उपन्यासों में वैश्या एवं निम्न वर्ग की औरतें मजबूत और बुद्धिमान चरित्र के रूप में उभरी हैं. माँ और अन्य औरतें भक्ति, लगाव, और देखभाल के अपने अदृश्य जाल के द्वारा पुरुषों के बिखरे और उथल-पुथल वाली दुनिया को समेटे रखती हैं उन्हें जीने का सहारा देती हैं. लेखक की सहानुभूति दबे कुचले, शोषित और कमजोर पर प्यारे लोगों के प्रति है. औरतें अक्सर परिस्थिति के क्रूर दुष्चक्र में फँसी होती हैं, दोषी करार दी जाती हैं और मखौल की शिकार होती हैं. औरतें और बहुत से पुरुष भी उनके उपन्यासों में शोषित के रूप में आते हैं.

1943 में आए उनके दूसरे ऐतिहासिक उपन्यास में भी नारी प्रमुख भूमिका में है. इस उपन्यास का नाम प्राचीन मिस्र की एक तवायफ रदुबीस के नाम 'रदुबीस' पर है. वह फराओ मेरनेर द्वितीय की प्रेमिका और रखैल थी. उपन्यास उन दोनों के प्रेम और रोमांस पर आधारित है. ऐतिहासिक तौर पर इस फराओ के बारे में विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है. मात्र इतना ही पता चलता है कि छठे साम्राज्य के अंत में इस फराओ ने एक वर्ष के लिए शासन किया था और उस काल में निटोक्रिस नाम की एक अपूर्व सुन्दरी रानी थी. पर लेखक ने अपनी कल्पना की स्वतंत्र उडान से इस दैहिक प्रेम को आध्यात्मिक प्रेम का जामा पहनाया है. यहाँ तक की देवता भी उनके प्रेम को स्वीकृति देते हैं और अपनी सारी बाधाएँ हटा लेते हैं. दोनों का प्रेम देवताओं के प्रतिरोध की सीमाओं के पार चला जाता है. अंत में फराओ देश की सयाहता से इस गजब की औरत का समारोह मनाता है जिसने अपनी दैविक शक्तियों के द्वारा फराओ के दिल को जीत लिया था.

1948 में उन्होंने 'अल-सरब' (द मिराज) में माँ का एक खास चरित्र रचा है. इसमें मातृत्व भाव, माँ के प्रेम और इडिपस कॉम्प्लेक्स माँ के प्रति लगाव को अपना प्रमुख और भावातिरेक को केंद्र बनाया है. यह एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास है. एक माँ अपने पति के जाने के बाद अपने बेटे को नहीं जाने देती है. वह अपने बेटे का लालन-पालन करती है वही इस उपन्यास का नायक है. वह माँ की ऑंखों का तारा है. उसका अस्वाभाविक लाड़ प्यार बेटे के व्यक्तित्व के विकास में बाधक बन जाता है. जब वह बड़ा हो रहा था उसे भरपूर प्यार मिलता है. वह स्कूल और यूनिवर्सिटी में दु:खी रहता है, खैर उसे एक सरकारी नौकरी मिल जाती है. वह विवाह करता है परंतु अपनी पत्नी से अच्छा सम्बंध कायम नहीं कर पाता है. पत्नी भी हरजाई निकल जाती है उसका किसी और से प्रेम चल रहा होता है. और वह हमल गिराने के दौरान मर जाती है. वह कहीं भी स्वाभाविक रिश्ते कायम नहीं कर पाता है. हर मोर्चे पर परास्त होने के लिए जब वह अपनी माँ को जिम्मेदार ठहरता है और उपन्यास के अंत में जब वह अपनी माँ से विद्रोह की हिम्मत करता है, उसे उल्टा-सीधा कहता है, पहली बार उससे बहस करता है तो माँ सदमें को बर्दाश्त नहीं कर पाती और हृदय गति रुक जाने से मर जाती है. इसमें भी पहले की तरह भाग्य, नियति और स्वतंत्र इच्छा शक्ति जैसे मुद्दे अपना सर उठाते हैं लेकिन लेखक उनका कोई उत्तर प्रस्तुत नहीं करता है. भाग्य, विधि, नियति को लेकर कहीं भी वे अपराध का अनुभव नहीं करते हैं यह उनके कार्य में बार-बार आने वाली (लीफ मोटिव) विशेषता है.

औरत उनकी 'मिदक ऐली' में भी है. मिदक ऐली द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान को प्रस्तुत करता है इसमें भी एक निम्न वर्ग की स्त्री है जिससे नाई अब्बास प्रेम करता है, जिसके लिए ब्रिटिश सैनिक भी लालायित हैं. और अंत में नाई उनकी जलन का शिकार होता है, वह नष्ट हो जाता है और यह औरत शरीर का व्यापार करने गली में उतर आती है.

1967 में आई रचना की कथाभूमि बीसवी सदी के पाँचवें दशक में जाहिरा नामक एक नौकरानी के इर्द-गिर्द घूमती है. वह अपने आसपास के बहुतेरे आदमियों के ध्यानाकर्षण का केंद्र है. भिन्न वाचक भिन्न-भिन्न तरीके से उसके बारे में बातें बताते हैं. ये विभिन्न बातें तत्कालीन सामाजिक और राजनैतिक विद्रोही समय को परिलक्षित करती हैं. इसकी कथावस्तु बहुत जटिल है. परंतु रचनाकार पाठक की समझ पर इसे विश्लेषित करने का कार्य छोड़ देता है, वह स्वयं समझाने या कुँजी देने का काम नहीं करता है.

नजीब महफूज स्वयं को दो सभ्यताओं दो संस्कृतियों से उत्पन्न मानते हैं इसीलिए मुसलमान होते हुए भी वे अपनी रचनाओं में बार-बार प्राचीन मिस्र की ओर लौट जाते हैं. उनका मानना है कि इस्लाम बाद में आया तो हम उससे पहले के इतिहास को सिर्फ इसलिए नकार नहीं सकते हैं क्योंकि वह इस्लाम की बातों से इत्तेफाक नहीं रखता है. वे प्राचीन मिस्र को भी अपना मानते हैं असल में वहीं से वे अपनी शुरुआत मानते हैं. उनके उपन्यासों का प्रारम्भ प्राचीन मिस्र के इतिहास को खंगालने से होता है. बाद की रचनाएँ जब वे सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों की ओर मुड़ गए तब भी उन्हें अपनी रचनाओं के लिए प्राचीन मिस्र से सामग्री और शक्ति प्राप्त होती रही. उनकी नजर बराबर अपने देश की विभिन्न गतिविधियों पर टिकी रही.

महफूज के लेखन को स्पष्ट रूप से तीन भागों में बाँटा जाता है. मसलन ऐतिहासिक, यथार्थवादी तथा आध्यात्मिक-रहस्यवादी. यह अनजाने में बिना किसी कारण के नहीं हुआ है. परंतु उनके साहित्य में मनुष्य जीवन अंत:सलिला के रूप में चलता है और उसे रेखांकित भी किया जाता रहा है. महफूज ने अपने कई उपन्यासों में प्राचीन मिस्र के साम्राज्यों व राजाओं की कहानियाँ लिखीं लेकिन विभिन्न साम्राज्यों व उपनिवेशवाद से मिस्र की स्वाधीनता, राष्ट्रीय चेतना के विकास व आम जनजीवन का यथार्थपरक वर्णन भी किया है. महफूज ने कथानक में साधारण स्त्री पुरुषों और उनकी सहज स्वाभाविक आकांक्षाओं, सुख-दु:ख, आशा-आकांक्षा, प्रेम-घृणा, लालसा, यौनेच्छा, राग-द्वेष और आत्मिक परितुष्टि को अपना विषय बनाया है. मनुष्य की उम्मीदों-नाउम्मीदों, आस्था-अनास्था, उसकी छटपटाहट वाणी दी है. उन्होंने उपन्यास के कथानक और शैली दोनों में खूब जम कर प्रयोग किए हैं. पर उनकी सबसे बड़ी विशेषता है किस्सागोई.

नोबेल एकेडमी के प्रजेंटेशन भाषण में प्रोफेसर स्टूर एलेन ने कहा था, ''एक जीवंत समाज के लिए अत्यावश्यक है कि वह अपने लेखक को गम्भीरता से ले. महफूज के लिखे को गहनता से पढ़ना होगा क्योंकि लेखक ने अपने आसपास की दुनिया पर एक समर्पित लेखक की तरह भविष्यवाणी की है अपने लम्बे लेखकीय जीवन में उन्होंने बहुत से सामाजिक परिवर्तन देखे हैं और उनका कार्य असाधारण रूप से बड़ी संख्या में है. ' जब महफूज से पूछा गया कि नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद उनके कार्य का मिस्र के साहित्य पर क्या असर पड़ा है? तो वे बहुत विनम्र हो कर कहते हैं कि इसका उत्तर आलोचकों पर छोड़ दिया जाना चाहिए. केवल वे ही बतला सकते हैं कि मेरे लेखन का अरबी साहित्य पर असर पड़ा है या नहीं. हाँ उन्हें नोबेल पुरस्कार का एक प्रभाव अवश्य नजर आता है वह यह कि पुरस्कार के बाद अरबी साहित्य का अन्य भाषाओं में अनुवाद होने लगा. उन्होंने यह भी सुना था कि रूसी और जर्मन लोगों ने जो उस बरस फ्रेंकफर्ट विश्व पुस्तक मेले का आयोजन कर रहे थे मिस्र वालों को इसमें भाग लेने के लिए बुलाया. पहली बार बाहर के देशों में अन्य भाषा-भाषियों में मिस्र के आधुनिक लेखन के प्रति उत्सुकता जागी. हमारे देश और हमारी भाषाओं में अभी यह काम होना बाकी है. अभी तक की मेरी जानकारी में हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं में महफूज का कार्य उपलब्ध नहीं है. इसके लिए अरबी और हिन्दी दोनों भाषाओं को जानने वालों को आगे आना होगा. इंग्लिश में भी नजीब महफूज का काफी काम उपलब्ध है वहाँ से भी अनुवाद हो सकता है. हालाँकि अनुवाद से अनुवाद करने पर काफी कुछ नष्ट हो जाता है. फिर भी यदि हम यह कार्य कर सकें तो इसमें शक नहीं कि यह हमारे साहित्य को समृद्धि प्रदान करेगा. यही उनको हमारी उचित श्रद्धांजलि होगी.

नजीब नागुइब महफूज का इंतकाल 30 अगस्त 2006 को हुआ. वे पंचानवे वर्ष के थे. यह आलेख उनको श्रद्धांजलि देने का एक अदना-सा प्रयास है.

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रचनाकार संपर्क :

* विजय शर्मा, 151 न्यू बाराद्वारी, जमशेद्पुर 831001. फोन: 0657 - 2436251 ई.-संपर्कः vijshain@yahoo.com

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टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 3
  1. गत वर्ष नगीब महफ़ूज़ की 'कायरो ट्रिलजी' के एक उपन्यास 'मिडाक एली' को पढने का मौका मिला. जीवन की ऊष्मा से खदबदाता हुआ एक अद्भुत संसार बसा है काहिरा की इन गलियों में . भारत के अनुभवों के बहुत निकट का संसार .

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  2. बदकिस्मती है कि अरबी दुनिया के बाहर बहुत कम जोग उन्हें जानते हैं.
    मैं भी नहीं जानता था। आश्चर्य है इनके बारे में मुझे कहीं और पढ़ने को क्यों नहीं मिला।

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रचनाकार: नजीब महफूज: सैटनिक वर्सेस, रुश्दी से पहले
नजीब महफूज: सैटनिक वर्सेस, रुश्दी से पहले
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