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पानी बिलकुल नहीं है


व्यंग्य कविता

पानी

वीरेन्द्र जैन


पानी नहीं है

पानी बिल्कुल नहीं है

सिविल लाइन के लिए भी पानी नहीं है

पुलिस थाने के लिए भी पानी नहीं है


सारे के सारे व्यापारिक समीकरण बदल रहे हैं

दूध में मिलाने के लिए भी पानी नहीं है

आज हमारे पास पानी का बिल आया है

नगरपालिका ने जिस पर डाकटिकिट आलपिन से लगाया है


क्योंकि पानी नहीं है

पानी बिल्कुल नहीं है

उसके पास दूध तो है

पर गाय के पास भी पानी नहीं है


पुलिस

प्रशासन

सेना

यहां तक कि न्याय के पास भी पानी नहीं है


नेता के मुखड़े पर भी पानी नहीं है

सारे नल व्यवस्था की आंख हो रहे हैं

जहां जनता के दुखड़े पर भी पानी नहीं है


धर्म के पास भी पानी नहीं है

और डूब मरने के लिए

शर्म के पास भी पानी नहीं है

हमारी नगरपालिका इतनी जजबाती है


कि गर्मियों में लोग टोंटी के पास बैठ जाते हैं

उसमें से हवा आती है

हाँ, पानी आ सकता है अगर बादल गरजें

हाँ पानी आ सकता है


अगर बिजलियाँ चमकें

हाँ पानी आ सकता है

अगर हवा थम जाये

हाँ पानी आ सकता है


अगर आदमी मेघराग गाये

कोशिश करके तो देखो आपका क्या जायेगा

अब तो पानी ऐसे ही आयेगा, ऐसे ही आयेगा


रचनाका संपर्क - वीरेन्द्र जैन
21 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र


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8 टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही सुंदर रचना ....कड़वी सच्चाई को दर्शाती
    ....बधाई

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  2. कविता सुन्दर है पर क्या पानी के लिये विरेन्द्र जैन जी से संपर्क करना है:)

    जवाब देंहटाएं
  3. सर जी अब तो आंखो का पानी सूखने की बारी है... मेरी कविता पर आपका आर्शिवाद अच्छा लगा। उम्मीद है मिलता रहेगा।

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  4. बहुत सही । शरद जोशी की रचना याद आई, जिसे वो मज़े लेकर सुनाते थे-- नल है मगर पानी नहीं है

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  5. पानी ने पानी-पानी कर दिया। आज के जीवन की वास्तविक स्थिति को व्यक्त करती सुंदर रचना।

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  6. रवि जी..
    इतना गंभीर व्यंग्य पढवाने का आभार।

    "अगर आदमी मेघराग गाये कोशिश करके तो देखो"

    वाह..

    *** राजीव रंजन प्रसाद

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  7. बस आंखों का पानी बाकी़ रह गया है अब तो.
    वह भी सूख जाएगा.रिश्तों में जिस तरह का रूखापन लाये हैं हम..सो कोई कोर-कसर बाक़ी नहीं कि हम अपनी इसी पूरी धरती को बंजर होता देखें.इस पानी की बर्बादी में मीडिया को भी एक अपनी ख़बरों में एक प्रयोग करना चाहिये.होता ये है कि जैसे दो-तीन दिन तक लगातार पानी गिरा हैड-लाइन बन जाती है..रतलाम ज़िले में झमाझम
    बारिश.इससे आम आदमी समझता है कि लो पूरी हो गई पानी की आपूर्ति.मेरा सुझाव यह है कि अखबार वर्षा के बारे मे झूठ लिखें.यदि 40 बारिश हो जाए तो लिखें 20 इंच बारिश हुई.आदमी का ये ईमानदार झूठ बडा़ करामाती साबित हो सकता है.इससे आदमी सहम जाएगा और कम करेगा पानी को बर्बाद....चेतो सब मिल चेतो...फ़िर ये न कहना...एक था राजा..एक थी रानी...कल न कहना एक था पानी.

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