रचनाकार.ऑर्ग की विशाल लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

शिव-पार्वती का संगमः उत्तर-दक्षिण का सांस्कृतिक मिलन

(रुक्ष्मणि पटेल)
आलेख

- प्रा.रुक्ष्मणि पटेल

सागर-सेवित, मेघ-मेखलित यात्रा-विवरण अज्ञेय की प्रसिद्ध पुस्तक अरे यायावर, रहेगा याद का एक अंश है जिसमें उन्होंने भारत-भ्रमण के विशिष्ट अनुभवों को अभिव्यक्त किया है।

अज्ञेय जी यह बताते हैं कि कालिदास ने कुमारसंभव की रचना करने के पूर्व समुद्रों को हिमालय के साथ जोड़ दिया है। भारत का काव्य-चित्र प्रस्तुत करते हुए हम भी उत्तर में हिमाद्रि तुंग श्रृंग और दक्षिण में तट-प्रक्षालन करते हुए महासागर की बात करते हैं। किन्तु यह उत्तर-दक्षिण को जोड़ना नहीं है, अलग करना है। जबकि कालिदास का हिमालय महासागरों में अवगाहन करके निकला है। सागर भी महान है जो हिमालय के पाँव पखारने झुकता है और हिमालय भी महान है जो मानो उसे क्रीड़ा-सहचर बना कर अंक भेंट लेता है। इस प्रकार शिव और सती, पिनाकी और गिरिजा, पर्वतों का तपस्यारत योगी और अंतरीप की तपस्विनी कुमारिका के महा-मिलन का वर्णन किया है, जिससे कुमार का जन्म हुआ होगा। यह मिलन सिर्फ शिव-पार्वती का ही नहीं है, उत्तर और दक्षिण का भी है।

दो परमशक्तियों के संगम में जन्म लेगा एक परम योद्धा (कार्तिकेय), जो दानवी सत्ता के आतंक से दैवी व्यवस्था को मुक्त करेगा- यह मिथक, यह पौराणिक संदर्भ हमें श्रद्धा से भर देता है। क्योंकि हमारे भीतर भी तो वही महामिलन उस भव्य अवतरण की भूमिका प्रस्तुत कर रहा है जिसके द्वारा निश्चय ही आसुरी सत्ता की पराजय होगी और दैव साधना की विजय होगी। यह मिलन-गाथा एक नया सायुज्य-उत्तर और दक्षिण भारत पा कर, एक नई अर्थवत्ता पा लेती है। उत्तर और दक्षिण भारत की संस्कृतियों मिलकर भारत की एक अखंड सास्कृतिकता प्रकट हो सकती है।

अज्ञेय का संबंध जिन प्राचीन स्थलों और पुरावशेषों से रहा है, वे सभी स्थलादि शिव और पार्वती के पौराणिक संदर्भ से जुड़े हैं और आश्चर्य की बात यह है कि भारतीय जन-मानस की सही और अधिक गहरी पहचान शिव-पार्वती के पुराण मिथक के सहारे होती रहती है। शिव-भक्ति के मिथक के क्षेत्र का कोई भी नया उन्मेष भारत की अधिक गहरी पहचान कराता है, भारत के मानस की कोई नई झाँकी शिव-भक्ति के मिथक की रहस्य सत्ता का नया आभास दे जाती है...-इसका कारण यह भी है कि अज्ञेय की यात्रा तपस्विनी कुमारी और योगीश्वर शिव के महा-मिलन पथ का अऩुधावन करती रही है। अज्ञेय ने जिस पहाड़ पर निवास और सागर की समीपता चाही, उनके भीतर शिव-पार्वती का असीम मिलन हमेशा स्पंदित होता रहा है। वैसे अज्ञेय की यात्रा वस्तुतः दक्षिण-उत्तर की रही है। जिनके साथ शिव-पार्वती की अनंत कथा जुड़ी है। हिमालय का तो कण-कण शिव-पार्वती से जुड़ा है ही, और कन्याकुमारी के साथ भी। कुमारी-तीर्थ (शायद कन्याकुमारी) के साथ तपस्विनी पार्वती की वर प्रतीक्षा की कथाएँ भी जुड़ी हैं, जो शिव और सती को, सागर और हिमालय को, दक्षिण-उत्तर को एक सूत्र में बाँध देती है। सागर-लहरियों की अनवरत हलचल मानो कुमारी के अटूट विश्वास की आवृत्ति की गूँज है, जिसे सुनकर हिमालय से उठकर वह महायोगी (शिव) एक दिन अवश्य आयेगा।

इस प्रकार शिव-पार्वती के युग्म ने लोक-मानस में गहराई से अपना घर बना लिया है। और वहाँ तेजस् (सती) और कारुण्य (शिव) के संगम की प्रतिष्ठा जीवन के गंभीर सत्य के रूप में हुई है। वत्सल करुणता की मूर्ति पार्वती दीन-दुनिया की ओर से मध्यस्थता और निवेदन करती है और शिव स्मितपूर्वक द्रवित हो जाते हैं। अतः शिव-पार्वती का युगल चित्र स्निग्ध रूप में हमारे सामने आता है।

*******

रचनाकार संपर्क -

-- प्रा.रुक्ष्मणि पटेल

हिंदी विभाग, वनराज कॉलेज

धरमपुर,जि.वलसाड-396050

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.