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भाषा और साम्राज्य का कदमताल


आलेख


- मनोज सिंह

हिंदुस्तान में भारतीय लेखक व उनके लेखन की विवेचना करें तो हिंदी के साहित्यकार अंग्रेजी वालों से हर तरह से पिछड़ते नजर आते हैं। योग्यता व ज्ञान में कोई भी अंतर न होते हुए भी वे उतने चर्चित और सफल नहीं हो पाते जितने कि अंग्रेजी भाषा के तथाकथित भारतीय रचनाकार। पैसा, शोहरत, ग्लैमर, पॉवर हर फ्रंट पर देशी भाषाएँ एक विदेशी से हारती हुई दिखाई देती है। जबकि अधिकांश भारतीय भाषाएँ अत्यंत प्राचीन, समृध्द व सशक्त हैं और उनका साहित्य लोक संस्कृति में रचा बसा है। कहने को तो शासन और संविधान पूरी तरह से हिंदी के साथ है परंतु फिर भी यह स्थिति कैसे और क्यूं?

कारण कई गिनाए जा सकते हैं, विश्लेषण का दृष्टिकोण भी भिन्न-भिन्न हो सकता है। लंबे-लंबे लेखों, उबाऊ भाषणों व नीरस गोष्ठियों में दोषारोपण और वाद-विवाद भी खूब किया जा सकता है। परंतु असल बात बड़ी सीधी-सी है कि हुकूमत जिसके हाथ में होगी भाषा उसी की शासन करेगी। मगर फिर इसी संदर्भ में सवाल उठता है कि देश की आजादी के तकरीबन साठ वर्ष बाद भी यह स्थिति कैसे? तो क्या भारत भाषा की दृष्टि से आजाद नहीं? शायद नहीं। आश्चर्य इस बात का होता है कि ऐसी स्थिति पूर्व में कभी नहीं हुई। देश जब भी बाहरी शक्तियों के अधीन हुआ तब-तब ही विदेशी भाषा का शासन आया अन्यथा स्वतंत्र देश की भाषा सदा स्वदेशी रही।

इतिहास पर नजर डालें तो मुगलकाल में अरबी-फारसी हिंदुस्तान में पहुंचकर शासन की भाषा बनी। धीरे-धीरे लोक प्रचलन में आईं और फिर उसने स्थानीय भाषा के साथ मिलकर अपने भारतीय रूपांतरण उर्दू के माध्यम से सालों साल राज किया। समय के साथ ये हमारी संस्कृति से ऐसी घुल-मिल गयी कि इसमें कभी भी परायेपन की बू नहीं आयी। इसे एक सकारात्मक उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है। इसका सीधा-सा अर्थ निकलता है कि शासन के स्थायी समाधान के लिए स्थानीय भाषा का होना अनिवार्य नहीं तो फायदेमंद जरूर होता है। मगर इसी संदर्भ में आगे एक बात और, जिस पर गौर किया जाना चाहिए कि मुगलकाल की समाप्ति के पश्चात उर्दू का वर्चस्व कम होता चला गया और आज इसकी अवस्था किसी से छिपी हुई नहीं है।

विश्व इतिहास को देखें तो जहां-जहां फ्रांस और जर्मनी का साम्राज्य पहुंचा वहां फ्रेंच व जर्मन भाषा, साहित्य व सभ्यता भी पहुंची। वहीं अंग्रेजों द्वारा विश्व के अधिकांश भाग पर राज करने से अंग्रेजी का सर्वाधिक विस्तार हुआ। लेकिन अंग्रेजों के इसी सिद्धांत के कारण वे सदैव, हर जगह, विदेशी कहलाये और अंग्रेजी का विरोध होता रहा। कुछ वीरान और अति पिछड़े द्वीपों को छोड़ दें जहां अंग्रेज खुद बस गए अन्यथा वे हर जगह सिर्फ शासक बने। इसका कारण है, जब भाषा विदेशी उपयोग की जाती है तो उसे अलग दृष्टिकोण से लिया जाता है और शासन विदेशी कहलाता है। उपरोक्त उदाहरणों से एक बात साफ है कि साम्राज्य और भाषा साथ-साथ चलते हैं, साथ-साथ विस्तार पाते हैं, एक-दूसरे के सहयोग से अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाओं को अमली जामा पहनाते हैं।

जहां साम्राज्य पहुंचता है वहां उसकी भाषा भी पहुंच जाती है और जहां भाषा पहुँचती है वहां उसके संदर्भित साम्राज्य को पहुंचने में आसानी होती है। संक्षिप्त में, हर साम्राज्य की भाषा होती है और हर भाषा का साम्राज्य। परंतु साथ ही इस बात को भी सिद्ध किया जा सकता हैं कि लोकजन की भाषाएँ सदैव जिंदा रहती हैं। चूंकि ये भावनाओं व संस्कारों से जुड़कर हृदय में निवास करती हैं। ये दीगर बात है कि वो शासक की भाषा के साथ निरंतर लेन-देन करती रहती हैं। और इस तरह से सांस लेते हुए और अधिक परिपक्व होती चली जाती हैं। और ऐसा ही कुछ बाहर से आने वाली भाषा के साथ भी होता है। आज हिंदी ने अरबी-फारसी से लेकर अंग्रेजी तक से खूब शब्द लिये तो उन्हें भरपूर दिये भी।

शासन से जुड़ी भाषा का अधिक महत्वपूर्ण बनना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। रोटी, कपड़ा, मकान और व्यवस्था से जुड़े होने से इनका वर्चस्व लाजिमी है। मगर शासक के लिए सामान्य जनता को उसी की भाषा में समझाना, संचालित और नियंत्रित करना, अनुशासित बनाना आसान होता है। अवाम भी अपनी भाषा बोलने वाले को अपना और खुद को स्वतंत्र महसूस करता है जबकि विदेशी भाषा के माध्यम से शासन करने वाले शासक को विदेशी और शासित को गुलाम करार दिया जाता है।

भाषा एक अहम माध्यम है जिसके जरिए भावनाएं प्रवाहित और संप्रेषित होती हैं। तभी शासक या तो लोकजन की भाषा बोलते हैं या फिर अपनी भाषा को किसी न किसी तरह जनता पर थोप देते हैं। आवश्यक है। अन्यथा संपर्क व संबंध टूटने पर आम लोगों द्वारा शासक को उखाड़ फेंक देने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

मगर क्या वजह है जो वर्तमान में भारत की स्थिति थोड़ी भिन्न है। ब्रिटिश शासन काल में अंग्रेजी भाषा के माध्यम से शासन का कारण समझ आता है मगर उसके प्रभाव का आज तक निरंतर जारी रहना, बात गले नहीं उतरती। असल में हिंदुस्तान का पढ़ा-लिखा नागरिक जो कि शासक वर्ग भी है, स्वाभाविक रूप से है तो अल्पसंख्या में, मगर दुर्भाग्य वश वो सिर्फ अंग्रेजी का ज्ञानी है, वो अंग्रेजी में पढ़ता है, अंग्रेजी में बोलता है और अंग्रेजी में ही सुनना पसंद करता है। यह उच्च वर्ग आम जनता से दूर और अवाम को अंदर से पसंद नहीं करता। वह उससे एक सुनिश्चित दूरी बनाये रखना चाहता है। जिसके लिए वह अंग्रेजी को एक प्रतीक, एक आवरण, एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है। यह प्रबुद्ध वर्ग हिंदी से, हिंदी बोलने वाले से, सच पूछिए तो नफरत की हद तक घृणा करता है। और यही बात, अंग्रेजी के लेखकों में, अंग्रेजी बुद्धिजीवी वर्ग में, उनके लेखन में, उनकी व्यक्तिगत चर्चाओं में, उनकी सोच में, उनके व्यवहार में भी झलकती है।

अब चूंकि देश का पढ़ा-लिखा वर्ग सिर्फ अंग्रेजी ही जानता है तो अंग्रेजी लेखन का अधिक चर्चा होना स्वाभाविक है। और फिर यही वर्ग समृध्द भी है, चर्चित भी है, ताकतवर भी है, तो पैसा और ग्लैमर का यहां होना सामान्य बात है। और इसीलिए अंग्रेजी साहित्यकार अधिक पॉपुलर रहते हैं। अन्य भाषा की जानकार स्थानीय जनता गरीब है और वो दैनिक जीवन में संघर्षरत है। उसके पास पढ़ने पढ़ाने के लिए न तो वक्त होता है न ही पैसा। चिंतन और दर्शन खाली पेट नहीं होते और मनोरंजन के लिए उसके पास और दूसरे सरल सुलभ साधन उपलब्ध होते हैं। और इसीलिए हिंदी साहित्यकार को अपना पाठक नहीं मिल पाता और वो चर्चा में नहीं आ पाता। परिणामस्वरूप पैसे से भी गरीब रह जाता है।

इसे देखकर यही निष्कर्ष निकलता है कि आज भी भारत मानसिक रूप से अंग्रेजी का गुलाम है और इसे भाषा के साम्राज्यवाद के रूप में देखा जा सकता है। इसे पश्चिमी संस्कृति के साम्राज्य विस्तार के रूप में भी लिया जा सकता है। इंडिया के अंग्रेजी साहित्यकारों को विदेशों में जब-जब विभिन्न उपाधियों एवं पुरस्कारों से नवाजा जाता है तो उनकी हिंदुस्तान में अच्छी चर्चा होती है। जिससे भाषा और अधिक प्रचलन में आती है। अंग्रेजी के प्रति आकर्षण बढ़ता है। और कई बार ऐसा भी महसूस होता है कि हिंदुस्तानी अंग्रेजी लेखकों को पश्चिमी मुल्कों द्वारा जान-बूझकर प्रोत्साहित किया जाता है अन्यथा मुल्कराज आनंद से लेकर सलमान रुश्दी या अरुंधति राय तक में ऐसी कोई विशिष्टता दिखाई नहीं देती जो हिंदी लेखकों में न हो।

साथ ही पश्चिमी देशों में अंग्रेजी के ऐसे कई लेखक हैं जो इन सबसे भिन्न और कहीं आगे दिखाई देते हैं। फिर भी उनकी अपेक्षा हमारे अंग्रेजी लेखकों को मिलने वाला अतिरिक्त सम्मान, मन में संशय पैदा करता है। इस घटनाक्रम को फैशन और सौंदर्य प्रसाधन विक्रेताओं की सोची-समझी रणनीति वाले उदाहरणों से भी समझा जा सकता है। जिनके द्वारा हिंदुस्तान की नारियां अचानक विश्व सुंदरी घोषित की जाने लगी थीं और भारत में कंपनियों का बाजार स्थापित होने पर फिर पिछड़ने भी लगीं।

रचनाकार संपर्क -

मनोज सिंह

425/3, सेक्टर 30-ए, चंडीगढ़

http://www.manojsingh.com

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