रचनाकार.ऑर्ग की विशाल लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

समधी समधन-रिश्ते ही रिश्ते-मिल तो लैं


व्यंग्य

समधी समधन-रिश्ते ही रिश्ते-मिल तो लैं

-वीरेन्द्र जैन

समाजशास्त्री अर्थशास्त्री व राजनेताओं की जुबान यह कहते-कहते नहीं घिसती कि भारत एक कृषिप्रधान देश है, पर क्षमा करें मैं इससे सहमत नहीं हूं। दरअसल भारत एक रिश्ता प्रधान देश है। इस शस्य श्यामला भूमि पर रिश्तों की फसल लहलहाती है जिसे काटने के चक्कर में अपने अमर भाई के कहने पर अमिताभ तक किसान बन जाते हैं और शस्य श्यामलाहिल्स पर पत्नियां पति की सहायता के लिए नोट गिनने की मशीनें खरीदती हैं।

दीवारों दीवारों पर 'रिश्ते ही रिश्ते -मिल तो लैं' लिखा हुआ आपने किसी दूसरे देश की दीवारों पर नहीं देखा होगा। यह संदेश नये रिश्ते बनाने के लिए है जबकि हमारे यहां पुराने रिश्ते ही इतने हैं जो हमें विदेशियों की तुलना में अधिक उदार होने के गुण द्वारा गौरवान्वित होने का अवसर देते हैं । विदेशी तो मदर फादर ब्रदर सिस्टर अंकल आंटी तक ही सीमित हैं और ग्रान्ड फादर ग्रान्ड मदर भी मदर फादर के ही ऐसे एक्सटेंशन लगते हें जैसे सुपर रिन या न्यू लक्स हों। पर हमारे यहां के फूफा फूफी मौसा मौसी ताउ ताई ससुर बहू सास दामाद मामा भान्जा साली जीजा भाभी देवर ननद ननदोई साला सलहज नाती पोता और ना जाने कितने अनगिनित रिश्ते ही रिश्ते हैं, जिनमें से ज्यादातर के बारे में तो कहना ही पड़ता है कि मिल तो लें।

हमारे धर्मप्राण देश में जो रिश्ते होते हैं, वे दो तरह के होते हैं। एक रिश्ता तो धर्म का होता है व दूसरा अधर्म का होता है। जो रिश्ते सगे होते हैं वे अधर्म के होते हैं और जो रिश्ते मान्यता पर आधारित होते हैं वे धर्म के रिश्ते होते हैं जैसे धर्मपुत्र धर्मपिता आदि। बस इसमें धर्म पत्नी ही एकमात्र अपवाद होती है और सगी पत्नी को धर्म पत्नी कहा जाता है। हो सकता है कि यह नामकरण भी किसी ने बहुत सोच समझ कर किया हो।

वैसे तो हमारे यहां जो रिश्ते ही रिश्ते होते हैं उनमें माताएं ही कई होती हैं जैसे धरती माता, गंगामाता गौमाता, गीतामाता तुलसीमाता, भारतमाता और इनके साथ बन्दरमामा चन्दामामा होते हैं। जब मामा हैं तो मौसी भी होना चाहिये। और होना क्या चाहिये हैं भी- बिल्ली मौसी। यही हाल पिताओं का भी है । नगरपालिका के अध्यक्ष को नगरपिता कहा जाता है तो गांधी जी को राष्ट्रपिता कहा जाता है। पिताजी के साथ चाचा भी चाहिये जिसके लिए नेहरू चाचा मौजूद हैं। किसी जमाने में ताऊ की भूमिका चौधरी देवीलाल ने निबाही। बहिन मायावती से राखी बंधवाने वाले लालजी टंडन ने कंस देवकी जैसा भाई बहिन का रिश्ता निभाया ही था। पर भाई सारे के सारे बम्बई - न न क्षमा करें, मुम्बई शिफ्ट हो गये हैं और यूपी से भइया लोगों को भी बुला लिया है। उमाभारती कैमरे के सामने बुरा-भला कहने के बाद अटलबिहारी व अडवाणीजी को पिता समान बतलाती हैं। और कभी हत्या कराने का आरोप लगाने के बाद शिवराजसिंह चौहान को बड़ा भाई बतलाती हैं।

अब ये जो रिश्तों की फौज हमारे यहां है उसमें अगर नये आयाम और जुड़ रहे हों तो क्या आश्चर्य है! वसुंधरा राजे सिंधिया ने दस-बीस गुर्जरों का वध करवाने के बाद अपने 'समधी' को घर पर बुलाकर उनकी 'बेटी' के हाथ से रोटी खिलवायी हो तो आंदोलन को तो रिश्तों के कुण्ड में होम होना लाजिमी ही था। आखिर कोई अपनी बेटी के घर पर रोटी खाकर इतनी कीमत भी नहीं देगा!

जो राजनीति कर रहे हों वे करते रहें हम लोग तो रिश्तेदारी निभा रहे हैं। अब कोई हमारे ऊपर भाई-भतीजावाद का आरोप लगाता है तो हमें गर्व होता है। रिश्ते ही रिश्ते- मिल तो लैं।


रचनाकार संपर्क :

वीरेन्द्र जैन

21 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र

फोन 9425674629

Tag ,,,

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.