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अभिषेक श्रीवास्तव की दो कविताएँ


कविता

नए साल का शोकगीत-1

  • अभिषेक श्रीवास्तव

यह नए साल का जश्न है!

दिल्ली से लेकर गोवा तक

टाइम्स स्क्वेयर पर उछलता-कूदता

शराब में डूबा

यह जश्न

नए साल का है!

हम भी शामिल हैं

इस जश्न में,

अखबारों ने

टीवी ने

बनाया हमें हिस्सा

नए साल का।


अमरीका का जश्न है यह,

भारत का जश्न है यह,

कुर्दों का जश्न है यह,

यह

शियाओं का जश्न है।


दुनिया भर में

आज ईद का जश्न है,

जिसकी सुबह

रंग गई खून से

उस शख्स के

जिसने मनाया जश्न

फांसी का...

कह गया

फांसी के तख्ते से-

'राष्ट्र की विजय होगी'।


अमरीका ने मनाया

'राष्ट्र की विजय' का जश्न,

पूरी दुनिया ने मनाया

अमरीका की विजय का जश्न,

और हमने यह जश्न इसलिए मनाया

कि हम नहीं जानते

क्या है

हमारा राष्ट्र....

राष्ट्रीयताओं का संघर्ष क्या होता है।

तो सबने मनाया जश्न...

हमने-

सद्दाम ने-

अमरीका ने-

भारत ने-

पूरी दुनिया ने-

वजह जो भी रही हो

ईद...?

नया साल...?

फांसी...?

या

कुछ और...?

हंस रही है,

खूब

हमारा यह जश्न देख

जॉर्डन में पनाह पाई

पत्नी सद्दाम की

इराक की

अपदस्थ

पहली महिला।


वह जानती है, कि

अमरीकी राष्ट्रवाद का जश्न

टाइम्स स्क्वेयर से लेकर कनॉट प्लेस

वाया बग़दाद...

अन्य राष्ट्रों की मौत का है पैग़ाम!


और

उसका जश्न यही है,

कि

बुरी ख़बर पहुंच चुकी है हम तक

और डूबे हैं हम

अपनी-अपनी

शराब भरी प्यालियों में...

कहती है वह

बार-बार

यह जश्न की रात है

यह मौत का पैग़ाम है!!!


नए साल का शोकगीत-2

30 दिसम्बर, 2006

सुबह 8.30 बजे

अता हो चुकी

पहली नमाज़

ईद की...

लौट रहे हैं अपने घरों को

नमाज़ी

जो ख़ुदा के रहम से

अब तक बचे हैं।


सोया है ख़ुदा

चैन से...

छुटियां हैं बड़े दिन की

और

टेक्सास का गुदगुदा गद्दा

उसके नीचे,

जैसे होती हैं और चीज़ें

पी.ए. से लेकर राष्ट्राध्यक्षों तक,

सब।


वह जानता है

एक नमाज़ी की फरियाद

आज पूरी नहीं होगी

क्योंकि नहीं पहना उसने नक़ाब

दिखा देना चाहता है

दुनिया को

वह नीचे नहीं किसी से।


बुदबुदाता है ख़ुदा

सपने में

'यह ख़ुदा की नाफ़रमानी है

इसकी सज़ा ज़रूर मिलेगी'

फांसी!!!

और सपना

सच हो जाता है।


**-**

रचनाकार - अभिषेक श्रीवास्तव का अपना चिट्ठा है - जनपथ

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1 टिप्पणियाँ

  1. आभार, इतनी गंभीर कविताओं से पतिचित कराने के लिये।

    *** राजीव रंजन प्रसाद

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