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सुकेश साहनी की लघुकथाएँ.

 

महत्त्वपूर्ण कड़ी चाणक्य गुरू

बालक , अभिभावक और शिक्षक के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है । शिक्षा की कोई भी विधि -प्रविधि ,पाठ्यक्रम-पाठ्यचर्या लागू करने से पहले बच्चे को समझना होगा । कोई भी तौर-तरीका बच्चे से ऊपर नहीं है और न हो सकता है । कोई भी व्यक्ति या संस्था इसके ऊपर नहीं है ,वरन् इसके लिए है । यह बात सदैव ध्यान में रखनी होगी । श्री सुकेश साहनी ने शिक्षा-जगत पर कई महत्त्वपूर्ण लघुकथाएँ लिखी हैं ;जिनमें से कुछ यहाँ दी जा रही हैं । ये लघुकथाएँ हमारी आँखें खोलने का काम करती हैं एवं शिक्षा के लिए हमारी अव्यावहारिक कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगाती हैँ ।
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प्रस्तुति : रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

1-मैं कैसे पढ़ूँ ?


पूरे घर में मुर्दनी छा गई थी। माँ के कमरे के बाहर सिर पर हाथ रखकर बैठी उदास दाई माँ---रो-रोकर थक चुकी माँ के पास चुपचाप बैठी गाँव की औरतें । सफेद कपड़े में लिपटे गुड्डे के शव को हाथों में उठाए पिताजी को उसने पहली बार रोते देखा था----
शुचि!टीचर की कठोर आवाज़ से मस्तिष्क में दौड़ रही घटनाओं की रील कट गई और वह हड़बड़ा कर खड़ी हो गई।
तुम्हारा ध्यान किधर है? मैं क्या पढ़ा रही थी----बोलो?” वह घबरा गई। पूरी क्लास में सभी उसे देख रहे थे।
बोलो!टीचर उसके बिल्कुल पास आ गई।
भगवान ने बच्चा वापस ले लिया----।मारे डर के मुँह से बस इतना ही निकल सका ।
कुछ बच्चे खी-खी कर हँसने लगे। टीचर का गुस्सा सातवें आसमान को छूने लगा।
स्टैंड अप आन द बैंच !
वह चुपचाप बैंच पर खड़ी हो गई। उसने सोचा--- ये सब हँस क्यों रहे हैं, माँ-पिताजी, सभी तो रोये थे-यहाँ तक कि दूध वाला और रिक्शेवाला भी बच्चे के बारे में सुनकर उदास हो गए थे और उससे कुछ अधिक ही प्यार से पेश आए थे। वह ब्लैक-बोर्ड पर टकटकी लगाए थी, जहाँ उसे माँ के बगल में लेटा प्यारा-सा बच्चा दिखाई दे रहा था । हँसते हुए पिताजी ने गुड्डे को उसकी नन्हीं बाँहों में दे दिया था। कितनी खुश थी वह!
टू प्लस-फाइव-कितने हुए?” टीचर बच्चों से पूछ रही थी ।
शुचि के जी में आया कि टीचर दीदी से पूछे जब भगवान ने गुड्डे को वापस ही लेना था तो फिर दिया ही क्यों था? उसकी आँखें डबडबा गईं। सफेद कपड़े में लिपटा गुड्डे का शव उसकी आँखों के आगे घूम रहा था। इस दफा टीचर उसी से पूछ रही थी । उसने ध्यान से ब्लैक-बोर्ड की ओर देखा। उसे लगा ब्लैक-बोर्ड भी गुड्डे के शव पर लिपटे कपड़े की तरह सफेद रंग का हो गया है। उसे टीचर दीदी पर गुस्सा आया । सफेद बोर्ड पर सफेद चाक से लिखे को भला वह कैसे पढ़े?
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2-पिंजरे

उसके कदमों की आहट से चौंककर नीलू ने आँखें खोलीं, उसे पहनाकर धीरे से दुम हिलाई और फिर निश्चिन्त होकर आँखें बंद कर लीं। चारों पिल्ले एक दूसरे पर गिरते पड़ते माँ की छाती से दूध पी रहे थे। वह मंत्रमुग्ध-सा उन्हें देखता रहा।
नीलू के प्यारे-प्यारे पिल्लों के बारे में सोचते हुए वह सड़क पर आ गया। सड़क पर पड़ा टिन का खाली डिब्बा उसके जूते की ठोकर से खड़खड़ाता हुआ दूर जा गिरा । वह खिलखिलाकर हँसा। उसने इस क्रिया को दोहराया, तभी उसे पिछली रात माँ द्वारा सुनाई गई कहानी याद आ गई, जिसमें एक पेड़ एक धोबी से बोलता है, “धोबिया, वे धोबिया! आम ना तोड़----” उसने सड़क के दोनों ओर शान से खड़े पेड़ों की ओर हैरानी से देखते हुए सोचा---पेड़ कैसे बोलते होंगे,---कितना अच्छा होता अगर कोई पेड़ मुझसे भी बात करता! पेड़ पर बैठे एक बंदर ने उसकी ओर देखकर मुँह बनाया और फिर डाल पर उलटा लटक गया। यह देखकर वह ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा।
खुद को स्कूल के सामने खड़ा पाकर वह चौंक पड़ा। घर से स्कूल तक का लम्बा रास्ता इतनी जल्दी तय हो गया, उसे हैरानी हुई । पहली बार उसे पीठ पर टँगे भारी बस्ते का ध्यान आया। उसे गहरी उदासी ने घेर लिया। तभी पेड़ पर कोयल कुहकी। उसने हसरतभरी नज़र कोयल पर डाली और फिर मरी-मरी चाल से अपनी कक्षा की ओर चल दिया।
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३-शिक्षाकाल

“सर,मे आय कम इन?” उसने डरते-डरते पूछा।
“आज फिर लेट? चलो, जाकर अपनी सीट पर खड़े हो जाओ।
वह तीर की तरह अपनी सीट की ओर बढ़ा----
“रुको!” टीचर का कठोर स्वर उसके कानों में बजा और उसके पैर वहीं जड़ हो गए। तेजी से नज़दीक आते कदमों की आवाज़, “जेब में क्या है? निकालो ।”
कक्षा में सभी की नज़रें उसकी ठसाठस भरी जेबों पर टिक गई। वह एक-एक करके जेब से सामान निकालने लगा----कंचे,तरह-तरह के पत्थर, पत्र-पत्रिकाओं से काटे गए कागज़ों के रंगीन टुकड़े, टूटा हुआ इलैक्ट्रिक टैस्टर, कुछ जंग खाए पेंच-पुर्जे---
“और क्या-क्या है? तलाशी दो।” उनके सख्त हाथ उसकी नन्हीं जेबें टटोलने लगे। तलाशी लेते उनके हाथ गर्दन से सिर की ओर बढ़ रहे थे, “यहाँ क्या छिपा रखा है?” उनकी सख्त अंगुलियां खोपड़ी को छेदकर अब उसके मस्तिष्क को टटोल रहीं थीं ।
वह दर्द से चीख पड़ा और उसकी आँख खुल गई।
“क्या हुआ बेटा?”माँ ने घबराकर पूछा ।
“माँ, पेट में बहुत दर्द हैं” वह पहली बार माँ से झूठ बोला, “आज मैं स्कूल नहीं जाऊँगा ।”
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4-बोंजाई




मम्मी जाने दो न !मिक्की ने छटपटाते हुए कहा, “ मैदान में सभी बच्चे तो खेल रहे हैं!
कहा न, नहीं जाना ! उन गंदे बच्चों के साथ खेलोगे?”
मम्मी ----वे गंदे नहीं हैं”, फ़िर कुछ सोचते हुए बोला, “ अच्छा---घर के बाहर सेठ अंकल के बरामदे में तो खेलने दो—“
नहीं---सामने बिजी रोड है, किसी गाड़ी की चपेट में आ जाओगे।मिसेज आनंद ने निर्णायक स्वर में कहा, “ तुम्हें ढेरों गेम्स लाकर दिए हैं, कमरे में बैठकर उनसे खेलो ।
मिक्की !ड्राइंग रूम से मिस्टर आनंद ने आवाज दी।
जी ---पापा।
कम हियर----।
ड्राइंग रूम के बाहर मिक्की ठिठक गया। भीतर पापा के मित्र बैठे हुए थे। वह दाँतों से नाखून काटते हुए पसीने-पसीने हो गया।
उसने झिझकते हुए ड्राइंग रूम में प्रवेश किया।
माय---सन!आनंद साहब ने अपने दोस्त को गर्व से बताया।
हैलो यंग मैन,” उनके मित्र ने कहा,” हाऊ आर यू?”
ज---जा---जी ई!मिक्की हकलाकर रह गया। उसे पापा पर बहुत गुस्सा आया- क्या वह कोई नुमाइश की चीज है, जो हर मिलने वाले से उसका इस तरह परिचय करवाया जाता है ।
मिस्टर आनंद फ़िर अपने मित्र के साथ बातों में व्यस्त हो गए थे। गमले में सजाए गए नींबू के बोंजाई के पास खड़ा मिक्की खिड़की से बाहर मैदान में क्रिकेट खेल रहे बच्चों को एकटक देख रहा था

5-ग्रहण

“पापा राहुल कह रहा था कि आज तीन बजे---” विक्की ने बताना चाहा ।
“चुपचाप पढ़ो!” उन्होंने अखबार से नजरें हटाए बिना कहा, “पढ़ाई के समय बातचीत बिल्कुल बंद !”
“पापा कितने बज गए?” थोड़ी देर बाद विक्की ने पूछा।
“तुम्हारा मन पढ़ाई में क्यों नहीं लगता? क्या ऊटपटांग सोचते रहते हो? मन लगाकर पढ़ाई करो, नहीं तो मुझसे पिट जाओगे।”
विक्की ने नजरें पुस्तक में गड़ा दीं ।

“पापा! अचानक इतना अँधेरा क्यों हों गया है?” विक्की ने खिड़की से बाहर ख़ुले आसमान को एकटक देख़ते हुए हैरानी से पूछा। अभी शाम भी नहीं हुई है और आसमान में बादल भी नहीं हैं! राहुल कह रहा था---”
“विक्की!!” वे गुस्से में बोले-ढेर सारा होमवर्क पड़ा है और तुम एक पाठ में ही अटके हो!”
“पापा, बाहर इतना अँधेरा---” उसने कहना चाहा ।
“अँधेरा लग रहा है तो मैं लाइट जलाए देता हूँ। पाँच मिनट में पाठ याद न हुआ, तो मैं तुम्हारे साथ सुलूक करता हूँ?”
विक्की सहम गया। वह ज़ोर-ज़ोर से याद करने लगा, “सूर्य और पृथ्वी के बीच में चंद्रमा आ जाने से सूर्यग्रहण होता है---सूर्य और पृथ्वी के बीच---”
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2 टिप्पणियाँ

  1. कटाक्ष करती सुन्दर कथायें. बधाई प्रस्तुत करने के लिये.

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  2. सुकेश जी अच्छे कथाकार हैं। उनकी कई लघु कथाएं अन्यत्र पढ़ चुका हूं। प्रस्तुत कथाएं दिल को छू लेती हैं।

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