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अंतरिक्ष : अनंत में अस्तित्वहीनता

आलेख

 

अनंत में अस्तित्वहीनता

- मनोज सिंह

अंतरिक्ष से हम बहुत हद तक अनजान हैं। जितना हम अब तक समझ पाये हैं, उस हिसाब से भी देखें तो कितना विशाल ब्रह्मांड है हमारा, जहां असंख्य बड़े-बड़े तारे और अनगिनत आकाशगंगायें हैं। इनके बीच उपस्थित हमारा सूर्य और उसका छोटा-सा सौरमंडल। जिसमें फिर दूसरे ग्रहों की अपेक्षा हमारी पृथ्वी थोड़ी छोटी ही है। इसी पृथ्वी के छोटे से हिस्से में एक देश, भारत मेरी मातृभूमि। सौ करोड़ की आबादी और जिनके लिए बसाये गये लाखों गांव, कस्बे, शहर व महानगर। इन्हीं सैकड़ों नगरों में एक नया शहर चंडीगढ़। अभी छोटा ही है। मगर कोठियों व बिल्डिंगों की संख्या हजारों में पहुंच रही है। इन्हीं में से एक इमारत की दूसरी मंजिल पर स्थित फ्लैट के छोटे से अध्ययन कक्ष में बैठकर जब मैं अपने आपको देखता व सोचता हूं तो मुझे अस्तित्वहीनता का आभास होता है।

छोटी उम्र से ही आकाश और तारे मुझे आकर्षित तो करते हैं मगर फिर जल्द ही बेचैन भी करने लगते हैं। रात के अंधेरे में, छत पर लेटे-लेटे, साफ आसमान को एकटक नजर से निरंतर देखने पर अचानक असंख्य तारों के बीच पाकर अजीब-सा डर लगने लगता है। यह दृश्य अत्यंत भयानक होता है। यकीन न हो तो एक बार जरूर देखें, मगर एकाग्रता से। मैं तो अकसर आसमान में कुछ ढूँढना शुरू कर देता हूं। और फिर बार-बार एक ही सवाल बचपन से अनायास उभरता है कि इस आकाश का कहां जाकर अंत होगा? बालक मन अक्सर कहता कि जब दादा-दादी के गांव की सीमा पर दीवार खड़ी थी, ट्रेन मुंबई में जाकर खत्म हो जाती है, शहर की भी सीमाएं होती हैं, घर भी तो चारों ओर से बाउंडरी वॉल से घिरा होता है, देश की भी तो सीमा सुनिश्चित है, तो फिर आकाश की भी तो कोई न कोई सीमा होगी? मगर फिर उत्तर न मिलने पर जिज्ञासा वश अपने आप से ही वाद-विवाद कर बैठता हूं कि अगर कहीं अंत होगा भी तो फिर उसके बाद क्या होगा? गांव, शहर, घर, देश, ट्रेन सभी की सीमाओं के बाहर तो कुछ न कुछ है, ठीक इसी तरह आकाश की सीमा के पार भी कुछ न कुछ होना चाहिए। क्या पानी ही पानी है? नहीं, पथरीली जमीन होगी? या आग ही आग? या फिर हवा ही हवा? कहीं शून्य तो नहीं? या फिर कुछ और? इसके आगे कल्पना तुरंत उड़ान भरने का प्रयास करती। और फिर अगला प्रश्न जल्द ही उभरकर आता, जो भी कुछ होगा उसका भी तो कहीं न कहीं अंत होगा? और अगर होगा तो फिर उसके बाद क्या? और फिर यह क्रम चलता रहता, जिसका जवाब मिले न मिले, यह अंत में अनंत की परिभाषा जरूर सुनिश्चित कर जाता।

बड़े होने पर रोटी-दाल और तेरे-मेरे के चक्कर में उलझकर उपरोक्त सवालों को उभरने का वक्त व मौका ही नहीं मिलता, ऊपर से मस्तिष्क अपने सीमित ज्ञान से जबरन संतुष्ट करवाकर इस जिज्ञासा को शांत ही नहीं दबा भी देता है। परंतु आज भी जब कभी यह प्रश्न उठता है तो फिर मन को जड़ से हिलाकर ही दम लेता है। आंखें बंद करने पर घबराहट होने लगती है, अकेलापन महसूस होता है, सब कुछ व्यर्थ और खाली लगता है, तुरंत आंखें खोलनी पड़ती है फिर भी चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा लगता है। इसी तरह की कल्पना, विचार बनकर शायद किसी और लेख में, किसी और संदर्भ में, किसी और तरह से पहले भी आये हों। परंतु आज यह एक बार फिर अपने आपको अपने आपसे पूछने के लिए मजबूर कर रहे हैं और फिर जवाब न मिलने पर तंग कर रहे हैं। आप भी सोचिए, जवाब ढूंढिये। धर्मग्रंथों को पलटिये, विज्ञान को खोजिए। दार्शनिक, वैज्ञानिक, धर्म गुरुओं से पूछिए। बस एक बात का ध्यान रखें कि कोई शब्दों में आपको घुमाने का प्रयास न करे। सीधा-सीधा जवाब हो और अगर मिल जाये तो मुझे जरूर बतायें, दुनिया को बतायें। मुझे मालूम है कि इसका कोई जवाब उपलब्ध नहीं है। शायद इसीलिए बनाने वाले ने हमें दैनिक जीवन में उलझाकर ठीक ही किया, नहीं तो हम सब पागल हो जाते।

हर बार की तरह इस बार भी घर के अंदर चींटियों का अस्तित्व भरी गर्मी में अचानक उभर आया था। कतारबद्ध, अनुशासित, निरंतर कार्य करते हुए, इनका झुंड पता नहीं कहां से आता है और कहां पर चलता चला जाता है। एक के पीछे एक। मनुष्य ने उनकी चौकसी करते हुए, निरंतर देखते व अध्ययन से इनकी बहुत सारी जानकारियां इकट्ठी कर ली हैं। अपनी खोज और विज्ञान से सुनिश्चित भी कर दिया कि यह देख नहीं सकतीं। शायद स्पर्श व गंध से काम चलाती हैं। मगर मन में एक सवाल उठता है कि हो सकता है उन्हें देखने की आवश्यकता ही नहीं हो या फिर उनके लिए देखने की परिभाषा ही भिन्न हो। हम मनुष्यों में भी तो ऐसी कई प्राकृतिक शक्तियां व गुण नहीं हैं जो दूसरी प्रजातियों में है। मसलन उड़ना, पानी में रहना, अंधेरे में देखना, सूंघकर खोजना। ये तो उदाहरण हैं जो हम देख रहे हैं, हमें मालूम है, हम जानते हैं। कुछ ऐसे गुण भी तो हो सकते हैं जिन्हें हम नहीं जानते और जो अन्य में हो। और ऐसा भी तो हो सकता है कि दूसरे जानवर जानते हो कि यह शक्ति मनुष्य में नहीं। बहरहाल, यह सुनिश्चित है कि चींटियों की अपनी अलग दुनिया होगी। उनके अपने विचार, भावनाएं, दृष्टि, ज्ञान और उनका अपना विज्ञान होगा। तो सवाल उठता है कि उनके लिए यह दुनिया कैसी होगी? उनकी कल्पना व समझने की परिभाषा को भिन्न मान लें तो इस दुनिया के अस्तित्व का, उनके मतानुसार आकार-प्रकार, रूप-स्वरूप कैसा होगा? यह कितनी बड़ी होगी? वो इन संदर्भों में क्या सोचती होंगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि एक दीवार से निकल कर दूसरी दीवार पर पहुंचने पर उन्हें दूसरे शहर पहुंच जाने जैसा आभास होता हो। बागीचे के बाद, बगल का मकान उनके लिए दूसरे देश पर जाने के समान हो। ऐसे में हो सकता है कि घर के सामने फैले खेत उनके लिए अनंत की परिभाषा बन जाते हों। जो फिर उनकी कल्पना से बाहर की बात हो। और फिर दूर किसी झाड़ियों या पेड़ पर पहुँचते ही उन्हें दूसरे ग्रह में पहुंच जाने जैसा लगता हो।

चींटियों के संदर्भ में ऐसी अवस्था है तो कई इनसे भी छोटे हैं, उनकी दुनिया के बारे में सोचना बड़ा मुश्किल है। भैंस हो या हमारा सिर, उसके बालों में पैदा होने वाले जुएं, उनके लिए हमारा खुद का शरीर एक ग्रह से कम नहीं होना चाहिए। दूसरे के सिर पर पहुंचने पर उन्हें दूसरी दुनिया में पहुंचने जैसा आभास होता होगा। और वह इतनी ही दुनिया को देखकर प्रसन्न हो जाते होंगे। जबकि हमें पता है कि दुनिया इससे आगे है। समुद्र में ऐसी कई प्रजातियां रहती हैं जिनके लिए पानी ही सारा संसार है। उसके बाहर की दुनिया उनके कल्पना के बाहर की चीज है। चूंकि वे बाहर निकलने पर मर जाती हैं, इसीलिए बाहर की दुनिया का अस्तित्व उनके लिए अकल्पनीय है। जबकि हमें मालूम है कि पानी के बाहर भी एक संसार है। कहीं ऐसा ही हमारे साथ भी तो नहीं? कहीं हम सब भी अपने-अपने कुएं में ही मेंढक की तरह तो नहीं रहते, जहां हमारी दृष्टि, विचार व कल्पनाएं कुएं की दीवारों से टकराकर लौट आती हैं। जबकि दुनिया हर कुएं से बाहर भी होती है। कल्पना करें, आपको अस्तित्वहीनता का आभास होगा। हो सकता है थोड़ी बेचैनी हो, जो फिर बेवजह पनप रहे अहं को कुछ हद तक शांत कर तुरंत आनंद देगी व हल्का कर देगी। मगर मेरे जिज्ञासु मन में एक सवाल फिर उठ रहा है कि मेरे कुएं के बाहर जो कुछ भी है, कहीं वो भी तो दूसरा कुआं नहीं? और अगर हां तो उसके बाद क्या?

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रचनाकार संपर्क:

-मनोज सिंह

425/3, सेक्टर 30-ए, चंडीगढ़

http://www.manojsingh.com

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