ज़िन्दगी एक सफर है सुहाना..

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यात्रा वृत्तांत आंखन देखी (अमरीका मेरी निगाहों से) ( अनुक्रम यहाँ देखें ) - डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ज़िन्दगी एक सफर है सुहा...

यात्रा वृत्तांत


आंखन देखी (अमरीका मेरी निगाहों से)

(अनुक्रम यहाँ देखें)

- डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

ज़िन्दगी एक सफर है सुहाना..

भारत में पिछले कुछ वर्षों में सड़कों की दशा में काफी सुधार हुआ है. लेकिन इसी के साथ यह कहने वालों की संख्या भी कम नहीं है कि इन उम्दा सड़कों ने दुर्घटनाओं को बढावा दिया है. सड़क अच्छी है इसलिए आप गाड़ी तेज़ चलाते हैं, इसलिये दुर्घटनाएं ज़्यादा होती हैं.

पहली बार अमरीका आया तो यहां दोनों बातें देखकर डरा. बहुत अच्छी, साफ-सुथरी, खूब चौड़ी सड़कें, जिन पर कोई गड्ढा तो दूर खरोंच तक ढूंढे से भी न मिले, और उन पर बहुत तेज़ गति से भागती गाड़ियां. 100 मील (यहां माप का पैमाना मील है, किलोमीटर नहीं. मील यानि 1.6 किलोमीटर. 100 मील माने 160 किलोमीटर) प्रति घण्टा की रफ्तार को सामान्य औसत माना जा सकता है. हाइवे पर 120-130 मील की रफ्तार भी हो सकती है, और व्यस्त मार्गों पर 60-70 मील की. तो, इन दो चीज़ों से तो दुर्घटनाएं बहुत ज़्यादा होनी चाहिये. कुछ धुकधुकी भी हुई. अपनी जान किसे प्यारी नहीं होती ! लेकिन धीरे-धीरे आश्वस्ति होने लगी. ऐसा नहीं है कि यहां दुर्घटनाएं नहीं होतीं. पर अगर अनुपात में देखें तो भारत की तुलना में बहुत कम. जितनी होती हैं, उन्हें भी कम करने के लिये सतत प्रयास किये जाते हैं.

कैसी है अमरीका की सड़क यातायात व्यवस्था?

सड़कें बहुत चौड़ी और साफ-सुथरी हैं, यह मैं पहले कह चुका हूँ. जहां तक सम्भव होता है, सड़कों पर यातायात को एक तरफा रखा जाता है यानि जाने वाली सड़क अलग, आने वाली अलग. सड़कों पर लेन सूचक अंकन बहुत स्पष्ट होता है. लेन अंकन अक्सर तो धातु की चौकोर डिब्बियों से होता है जो रात को चमकती भी हैं. कहां मुड़ना है, और कहां नहीं मुड़ना है यह भी स्पष्ट रूप से अंकित होता है. इस अंकन का उल्लंघन कभी कोई नहीं करता. ट्रैफिक लाइट्स हमारे यहां की लाइट्स की तुलना में ज़्यादा ऊंचाई पर होती हैं. सड़क के बीच में, ऊपर से नीचे को झूलती हुई. इसलिये ज़्यादा दूर से दिखाई दे जाती हैं.लाल लाइट पर गाड़ी न रूके, यह हो ही नहीं सकता. फिर भी, व्यस्त मार्गों पर वीडियो कैमरे भी लगे होते हैं जो उल्लंघनकर्त्ता की फोटो ले लेते हैं. उन मार्गों पर, जहां दो सड़कों के मिलने की वजह से टी (T) बनता है, मुख्य मार्ग पर आकर मिलने वाली जगह से ठीक पहले STOP का लाल चिह्न होता है, और यातायात हो या न हो, आपको रूकना ही होता है. अगर न रुके, निश्चय मानिये, आपको 'टिकिट' मिल जायेगा. टिकिट से तत्काल तो आपकी जेब हल्की होती ही है, इसके दूरगामी परिणाम भी हो सकते हैं. आपको खराब ड्राइवर माना जा कर आपसे अधिक इंश्योरेंस प्रीमियम वसूल किया जा सकता है. ट्रैफिक पुलिस अक्सर सड़कों के किनारों पर 'छिपी' रहती है और किसी भी तरह का उल्लंघन करते ही प्रकट हो कर अपनी बिजली चमकाती, सायरन बजाती गाड़ी आपके आगे ले आती है. आपको रोका जाता है, और पूरे आदर से (पुलिस और आपको आदर दे- इट हैप्पन्स ओनली इन अमरीका !) टिकिट थमा दिया जाता है. न कोई कहता है कि एस पी साहब मेरे दोस्त हैं, या थानेदार साहब अंकल हैं, न कोई सेलफोन दिखाकर बेचारे सिपाही को आतंकित करता है! कानून का पालन तो होना ही है. आम नागरिक जानता है कि उसने कोई गलती की है तो सज़ा तो मिलनी ही है, और इसलिये कोई जान बूझकर गलती नहीं करता. क्या हुआ जो रात के ढाई बजे हैं और सड़क एकदम सूनी है. लाल बत्ती पर या स्टॉप चिह्न पर तो रुकना ही है. क्या हुआ जो अपने गंतव्य वाले एक्ज़िट (Exit) से बीस कदम आगे निकल गये, गाड़ी घुमा लेते हैं. नहीं. बीस मील का चक्कर पड़े तो पड़े, सही तरह से ही लौटेंगे. हमारे साथ कई बार हुआ. मेरे भारतीय मन ने सोचा, ज़रूर ऐसा कर लेंगे, पर किसी ने नहीं किया.

सड़कों पर सारे चिह्न, सारे संकेत, सारे निर्देश बहुत स्पष्टता से और निश्चित तौर पर अंकित होते हैं. किस लेन से बांये मुड़ना है और किस लेन से नहीं मुड़ना है, किस लेन पर एक्ज़िट लेना ही है, और किस लेन से एक्ज़िट नहीं लिया जा सकता है, कहां दांये या बांये नहीं मुड़ना है - यह सब साफ साफ अंकित होता है. हर कहीं गाड़ी खड़ी कर लेने की आज़ादी नहीं है. बल्कि हाइवे पर तो यह तक अंकित होता है कि रुकने की अगली जगह 40 मील बाद है, और हर 2-3 मील बाद विश्राम स्थल की घटी हुई शेष दूरी की सूचना अंकित होती है. हाइवे पर हर कहीं तो रुका नहीं जा सकता, इसलिये हर 40 मील के बाद 'रेस्ट एरिया' निर्मित कर दिये गए हैं जिन तक पहुंचने के लिये हाइवे से बाहर निकलना होता है. इन विश्राम स्थलों पर पर्याप्त पार्किंग स्थल, छोटा-सा जलपान गृह, स्वच्छ शौचालय आदि होते हैं. कुत्तों को शौच करवाने तक की अलग से निर्धारित जगह होती है. जलपान गृह में अक्सर उष्ण पेय निःशुल्क होता है. आप अपनी इच्छा या क्षमतानुसार राशि डिब्बे में डाल सकते हैं.

सभी सड़कों पर, बावज़ूद गाड़ियों की रेलमपेल के, दो गाड़ियों के बीच खासा फासला रहता है. यह इसलिये ज़रूरी भी है कि गाड़ियां बहुत तेज़ रफ्तार से चलती हैं. अगर फासला न हो.... पर सावधानी सारी बरती जाती है. कोई भी वाहन चालक बगैर संकेत दिये अपनी लेन नहीं बदलता है. अगर बदल ले, अमरीका में तो राम का नाम ज़रा ज्यादा ही जल्दी सत्य हो सकता है. वाहन चालक हॉर्न का इस्तेमाल लगभग नहीं के बराबर करते हैं. अगर किसी ने आपके लिये हॉर्न बजाया है तो यह बहुत गम्भीर बात है. आपको शर्मिन्दा होना चाहिये. भारत की तरह डिपर देने का चलन भी नहीं है. केवल मुड़ने की सूचना देने वाली लाइट्स का प्रयोग होता है.

सड़क पर सिर्फ कारें ही दीखती हैं. किसम किसम की. भारत वाली विविधता यहां नहीं है कि एक ही सड़क पर सुअर, बकरी, पैदल चलता आदमी, रेंगता अपाहिज भिखारी, साइकिल, साइकिल रिक्शा, थ्री व्हीलर, ऊंट गाड़ी, स्कूटर, मोटर साइकिल, मारुति 800, मर्सीडीज़, ट्रक सभी के दर्शन एक साथ हो जाएं! इस विविधता के कारण यातायात की जटिलताएं बढती हैं. सड़क पर बढती जनसंख्या का दबाव तो है ही. अमरीका में यह सब नहीं है, इसलिए मामला आसान है. यहां तक कि भारी ट्रक वगैरह भी आम रास्तों पर नहीं दीखते. कभी कभार सिटी बस ज़रूर दीखती है, लगभग खाली! मज़ा यह कि लोग उसके आगे (बाकायदा जगह बनी होती है) अपनी साइकिल तक लटका लेते हैं. सिटी बस मे गंतव्य सूचक जो बोर्ड लगा होता है वह प्रायः इलेक्ट्रोनिक होता है. जगह-जगह ऐसे स्थल भी बने होते हैं जिन्हें 'पार्क एण्ड राइड' कहा जाता है. आप अपनी कार पार्क करें और बस में बैठकर चले जाएं. यह कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे हमारे जयपुर में नारायण सिंह सर्कल पर है. फर्क इतना है कि वहां दुपहिया वाहन खड़े किये जाते हैं, यहां चौपहिया.

सड़क पर आदमी कम ही नज़र आता है. मतलब - गाड़ी के बाहर आदमी. कहीं-कहीं फुटपाथ (यहां साइडवाक) पर चलते युवा या शोल्डर (सड़क का किनारा) पर साइकल दौड़ाते (अलग तरह का हेल्मेट लगाये) इक्का-दुक्का आदमी-औरत या साइडवाक पर ही स्केट बोर्ड पर दौड़ते किशोर ही नज़र आते हैं. वाहन चालक पैदल या साइकल सवार को विशेष अहमियत देते हैं. अगर आप पैदल हैं और सड़क पार कर रहे हैं तो ट्रैफिक को रुकना ही है. मुझे तो यह देखकर नीरज की एक बहुत पुरानी कविता याद हो आई जिसका शीर्षक 'राज मार्ग के पथिक से' या ऐसा ही कुछ था. कविता राज मार्ग पर वाहनों के बीच डरे-सहमे पथिक को सम्बोधित है और इसमें कवि एक ऐसे भविष्य की कल्पना करता है जब पथिक निडर होकर राज मार्ग पर चल सकेगा. वह बच्चों को भी आश्वस्ति देता है कि वे भी सड़क पर खेल सकेंगे. नीरज का यह सपना अमरीका में हक़ीकत के लिबास में देखने को मिला, जहां बच्चे सड़क पर स्केट्स पर दौड़ते हैं और पैदल चलने वाला इस बात से आशंकित नहीं होता कि कोई तेज़ रफ्तार गाड़ी उसे परलोक पहुंचा देगी. वैसे, यहां पैदल चलने वालों के लिए सड़क पार करने के निर्धारित स्थान होते हैं और उनके प्रारम्भ स्थल पर एक खास तरह का बटन लगा होता है, जिसे दबाने पर यातायात रोकने वाली लाल बत्ती जल उठती है. महत्वपूर्ण बात यह कि अगर कोई अचानक भी किसी विवशता से सड़क पार करे तो उसके लिये यातायात थम जाता है. दुकानों, शॉपिंग माल्स आदि से बाहर निकल कर जब आप पार्किंग स्थल तक जाते हैं तब भी आपको पैदल देख, वाहन आपको सुरक्षित सड़क पार करने देने के लिए थमे रहते हैं. यह बात नियम से बाहर यहां की संस्कृति का ही हिस्सा बन गई है.

गैस स्टेशन इफरात से हैं. गैस माने पैट्रोल. गैस है भी सस्ती. लगभग 2.18 डॉलर प्रति गैलन. करीब 26.00 रूपया प्रति लिटर. गैस एकाधिक किस्मों में मिलती है, उनकी दरें भी अलग-अलग होती हैं. इसीलिए मैंने औसत शब्द का प्रयोग किया है. हम जिस राज्य वाशिंगटन में रहे वहां गैस आपको खुद भरनी होती है. पर कुछ अन्य राज्यों में इसके विपरीत वाली व्यवस्था है. वहां आप चाहें तो भी खुद गैस नहीं भर सकते. गैस स्टेशन का कर्मचारी ही यह काम करेगा. गैस स्टेशनों पर पोचा नुमा चीज़ें पड़ी रहती हैं जिन से आप खुद अपनी कार के शीशे वगैरह साफ कर सकते हैं. हर गैस स्टेशन पर एक अच्छा खासा स्टोर भी होता है जो अमरीकियों की खाने-पीने की तलब पूरी करता है. खाने पीने का तो जैसे अमरीकियों को जुनून ही है. गैस स्टेशनों पर बीयर भी मिल जाती है. वहां सशुल्क और निःशुल्क दोनों तरह के अखबार भी मिल जाते हैं.

कार में सीट बेल्ट लगाना ज़रूरी होता है. आगे बैठने वालों के लिये ही नहीं, पीछे बैठने वाले सभी लोगों के लिए भी. एक बहुत खास बात यह कि बच्चे को, चाहे वह कितना ही छोटा (एकदम नवजात भी) क्यों न हो, अलग कार सीट में ही बिठाना पड़ता है, और यह कार सीट पीछे ही लगती है. ज़ाहिर है, यह प्रावधान भावी पीढ़ी की ज़िन्दगी की अहमियत को समझ कर किया गया है. कार सीट में, और वह भी पीछे होने से, बच्चा ज़्यादा सुरक्षित रहता है. जब आप नवजात शिशु के लिए कार सीट खरीद कर अपनी कार में लगाते हैं तो अस्पताल यह जांच भी करता है कि सीट ठीक से लगाई गई है या नहीं. बच्चे को सीट में बिठाना ही पर्याप्त नहीं है, उसे बेल्ट से बांधा जाना भी उतना ही ज़रूरी है. सीट में बिठाने वाला यह प्रावधान बच्चे के 6 वर्ष या 60 पाउण्ड वज़न का हो जाने तक लागू रहता है. कारों की पार्किंग की समुचित व्यवस्था होती है. पार्किंग स्थल निर्धारित होते हैं, हर गाड़ी के लिए अलग से अंकन होता है और लोग उस अंकन का ध्यान रख कर ही अपनी गाड़ी पार्क करते हैं. गाड़ियों की बहुलता की वजह से पार्किंग की जगह का टोटा पड़ने लगा है, पर इस समस्या के समाधान भी निकाले जा रहे हैं. बहु मंज़िला पार्किंग आम है. व्यस्त सड़कों के किनारे भी मीटर आधारित पार्किंग का प्रावधान होता है. आप पैसे डाल कर निश्चित समय के लिये अपनी गाड़ी पार्क कर सकते हैं. अन्यत्र भी, जहां स्थानाभाव होता है, सशुल्क पार्किंग का ही प्रावधान होता है. बड़े व्यापारिक संस्थान अपने ग्राहकों के लिए अलग से आरक्षित पार्किंग स्थल भी उपलब्ध कराते हैं. जगह-जगह इस आशय के बोर्ड लगे रहते हैं कि अनधिकृत रूप से पार्क की गई गाड़ी आप ही के व्यय पर उठा कर ले जाई जाएगी. मैंने देखा कि गाड़ियों की इतनी इफरात के बाद भी पार्क करने या पार्क की हुई गाड़ी निकालने में कोई दिक़्क़त दरपेश नहीं आती, क्योंकि हर आदमी नियम और निर्देश का अक्षरशः पालन करता है.

ऐसा नहीं है कि यहां सड़क दुर्घटनाएं नहीं होती हैं. ऑटोमोबाइल असोसिएशन ऑफ अमरीका की एक ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि सड़क पर डाल दिये गये कबाड़-कूड़े की वजह से ही साल में 25,000 दुर्घटनाएं हो जाती हैं और इनमें कम से कम 90 लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं. गैर-ज़िम्मेदार लोग कहां नहीं होते ? यहां भी हैं. उनकी गैर-ज़िम्मेदारी और वाहन की तेज़ गति का मिश्रण घातक बन जाये तो क्या आश्चर्य? एक दिन पढा कि वेब वाट्सन नाम की 55 वर्षीय महिला अपने काम से घर लौट रही थी कि उनकी कार के आगे जाते वाहन से सड़क पर पड़ा एक सात पाउण्ड वज़न का धातु का टुकड़ा उछला और उनकी कार के विण्डस्क्रीन को तोड़ता हुआ उनके चेहरे की सारी हड्डियां चकनाचूर कर गया. बेचारी वेब कार को ब्रेक भी नहीं लगा पाईं. कार सीधी एक खाई में जा गिरी. 14 इंच लम्बा, 3 इंच चौडा और 1 इंच मोटा यह धातु का घातक टुकड़ा , शायद किसी ट्रक से गिर गया था. कुछ ऐसे ही घटनाक्रम में कुछ समय पहले वाशिंगटन विश्वविद्यालय की एक 24 वर्षीय स्नातक मारिया फेडेरिकी का मस्तिष्क व चेहरा गम्भीर रूप से आहत हो गया था.

ये दो उदाहरण महज़ यह बताने को कि दुर्घटनाएं यहां भी होती हैं, पर अगर हम भारत के लिहाज़ से सोचें तो यह कि इतने वाहनों गुणा इतनी तेज़ गति के कारण जितनी होनी चाहिये, उससे बहुत कम. यह भी कि हर दुर्घटना को बहुत गम्भीरता से लिया जाता है. अगर दो गाड़ियां थोड़ी-सी भी भिड़ जाएं तो एम्बुलेंस, पुलिस, राहत टीम सब कुछ चन्द ही पलों में मौका-ए-वारदात पर हाज़िर हो जाते हैं. पहला काम होता है आहत को राहत पहुंचाने का. बाकी सब उसके बाद. दुर्घटना के कारणों की गम्भीर पड़ताल की जाती है, उन पर विस्तृत शोध किये जाते हैं और शोध के निष्कर्षों पर अमल किया जाता है.

भारत में अभी गति का वैसा बुखार नहीं है जैसा अमरीका में है. सच तो यह भी है कि न हमारी सड़कें इस काबिल हैं, न गाड़ियां . जगह-जगह टूटी-फूटी सड़क पर हल्की-फुल्की मारुति 800 को आप किस रफ्तार से भगा लेंगे? 40-50-60, हद से हद 80-90 किलोमीटर प्रति घण्टा. सड़क एकदम सही हो तो भी इससे तेज़ रफ्तार पर तो आपकी गाड़ी झूमने लगेगी. यानि हमारी समस्या अभी गति-जन्य नहीं है. अगर लोगों को सड़क व्यवहार की समुचित शिक्षा दी जाए तो भारत में सड़क यातायात का सुधार कोई मुश्किल काम नहीं है. लोग सड़क पर सही व्यवहार करें इसके लिये दो बातें हो सकती हैं. एक, सही व्यवहार क्या है, यह लोगों को बताया जाए, और दो, गलत व्यवहार करने पर समुचित दण्ड दिया जाए. बहुत सारी गलतियों के मूल में अज्ञान या अपर्याप्त सूचना भी होती है. अमरीका के यातायात को देख इन बातों का महत्व समझ में आता है. अगर सावधानी हो तो सुरक्षा हो ही जाती है. दुर्घटना तो होती ही तब है जब सावधानी हटती है.

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(शेष अगले अंक में जारी....)

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रचनाकार: ज़िन्दगी एक सफर है सुहाना..
ज़िन्दगी एक सफर है सुहाना..
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