माइकल मूर : असहमति में उठा हाथ

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यात्रा वृत्तांत आंखन देखी (अमरीका मेरी निगाहों से) ( अनुक्रम यहाँ देखें ) - डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल 6 माइकल मूर : असहमति मे...

यात्रा वृत्तांत


आंखन देखी (अमरीका मेरी निगाहों से)


(अनुक्रम यहाँ देखें)


- डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल


6 माइकल मूर : असहमति में उठा हाथ

इन दिनों माइकल मूर अमरीका में सर्वाधिक चर्चित नामों में से है. टाइम पत्रिका ने भी उन्हें अपने आवरण(12 जुलाई,2004) पर जगह दी है. सारे देश में उनके विचारों को लेकर तीव्र बहस हो रही है. बहस के मूल में है उनकी ताज़ा फिल्म – ‘फारेनहाइट 9/11’. 9/11 का मतलब है ग्यारह सितम्बर. अमरीका में महीना पहले लिखा जाता है, तारीख बाद में.पाठकों को स्मरण ही होगा कि ग्यारह सितम्बर को न्यूयार्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हुआ था. उस घटना ने अमेरिका को हिलाकर रख दिया था.

23 अप्रेल 1954 को जन्मे माइकल मूर एक फिल्म निर्देशक, लेखक, निर्माता, अभिनेता और कुछ हद तक एक्टिविस्ट हैं. उनकी एक टीवी सिरीज़ ' टी वी नेशन' अमरीका में काफी चर्चित व लोकप्रिय रही है. 'ड्यूड, व्हेयर इज़ माई कण्ट्री' और 'स्टुपिड व्हाइट मेन' किताबों ने अमेरिका के बौद्धिक जगत में तीव्र उत्तेजना पैदा की थी. अब माइकल की ताज़ा फिल्म न केवल सिनेमाघरों में भारी भीड़ आकर्षित कर रही है, इसने जैसे पूरे अमरीका को ही दो भागों में बांट दिया है. वे जो माइकल के साथ हैं, एक तरफ हैं और इस फिल्म पर तारीफों के फूल बरसा रहे हैं. दूसरी तरफ वे हैं जो माइकल के लिये अपनी गालियों का पूरा खज़ाना खोले हुए हैं और इस फिल्म को बेहद फूहड़, गैर-कलात्मक और झूठ का पुलिन्दा बता रहे हैं.

इस फिल्म में राष्ट्रपति बुश की इराक़ विषयक नीतियों का खुला विरोध है. उन पर आरोप लगाया गया है कि उन्होने 11 सितम्बर की घटना का बहाना बनाकर इराक़ पर हमला किया. फिल्म बुश की कार्यप्रणाली का खुला विरोध करती है. इसके लिये जो प्रसंग उठाये गये हैं वे वास्तविक हैं. इसीलिये यह फिल्म डॉक्यूमेण्ट्री है.

फारनहाइट 9/11 116 मिनिट अवधि की डॉक्यूमेण्ट्री फिल्म है. इस फिल्म ने अपनी जमात की फिल्मों में सफलता के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर नये झंडे गाडे हैं. कान फिल्म समरोह में इस फिल्म ने अपनी श्रेणी की 17 फिल्मों को पछाड़ कर सर्वश्रेष्ठ फिल्म का 'पाम डो' पुरस्कार जीता तथा अमरीका में रिलीज़ होने के पहले तीन दिनों में दो करोड़ से ज्यादा की कमाई की. यों अमरीका में इस तरह की डॉक्यूमेण्ट्री फिल्मों का खासा प्रचलन है. हाल ही में ' सुपरसाइज़ मी' जो फास्ट फूड के विरोध में थी और 'विण्ड माइग्रेशन' जो पर्यावरण सँरक्षणके पक्ष में थी, भी खासी लोकप्रिय रही हैं. लेकिन अमरीका में बॉक्स ऑफिस पर इतनी सफल होने वाली यह पहली डॉक्यूमेण्ट्री है. इस फिल्म को इसकी राजनीतिक प्रकृति के कारण यहां की वाल्ट डिज़्नी कम्पनी रिलीज़ करने से मना कर चुकी थी लेकिन अब अपनी सफलता के कारण यह अपनी श्रेणी की पहली फिल्म बन गयी है.

फिल्म के सर्वाधिक विवादास्पद एवं चर्चित प्रसंगों में से एक में राष्ट्रपति बुश को 11 सितम्बर को फ्लोरिडा के एक एलीमेंट्री स्कूल में दिखाया गया है. वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से दो विमान टकरा चुके हैं. बुश दूसरी कक्षा के बच्चों को ' मेरी प्यारी बक़री' सुना रहे हैं. तभी उनके चीफ ऑफ स्टाफ एंड्र्यू कार्ड आते है, और उनके कान में कुछ कहते हैं. हमें बाद में पता चलता है कि कार्ड ने बुश को बताया है कि अमरीका पर हमला हुआ है. राष्ट्रपति जड़वत हैं. फिल्म की गति धीमी होती है, जिससे उनकी एक-एक हरकत उभरती है. करीब सात मिनिट बुश कक्षा में ही रहते हैं. इसके बाद वे अपने स्टाफ से ' हमले' के बारे में चर्चा करने जाते हैं.

ग्यारह सितम्बर की घटना की पड़ताल करने वाले आयोग की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि उस अवधि में पेंटागन से कोई सम्पर्क नहीं किया गया. राष्ट्रपति के क़ाफिले ने 9.35 पर स्कूल से प्रयाण किया तथा 9.45 पर राष्ट्रपति ने पहली बार अपने उप राष्ट्रपति से बात की.

यह फिल्म राष्ट्रपति बुश तथा बिन लादेन के परिवार के बीच भी एक नापाक रिश्ते की तरफ इशारा करती है. कुछ ऐसा आभास दिया जाता है कि बुश के टेक्सास एयर नेशनल गार्ड ज़माने के एक दोस्त जेम्स बाथ के माध्यम से बिन लादेन परिवार का धन बुश की असफल तेल खुदाई कम्पनी आर्बस्टो एनर्जी में लगाया गया.

मूर ने बुश और लादेन परिवारों की नज़दीकी के लिये वाशिंगटन स्थित इक्विटी फर्म कार्लाइल में उनके साझा हितों की तरफ भी संकेत किया है. राष्ट्रपति बुश के पिता इस कार्लाइल ग्रुप के एड्वाइज़र भी रहे हैं. लेकिन जानकारों के अनुसार, यह प्रसंग बहुत प्रामाणिक नहीं है.

मूर ने वाशिंगटन पोस्ट के हवाले से यह कहा है कि राष्ट्रपति बुश ने अपने कार्यकाल के प्रथम आठ माह का 42 प्रतिशत समय छुट्टियां बिताने में ही व्यतीत किया. राष्ट्रपति के समर्थकों ने इस आरोप का खंडन यह कह कर किया है कि बुश ने इस दौरान भी अपने सहायकों से मीटिंगें कर के राज्यकार्य किया. बहस इस बात पर भी है राष्ट्रपति ने 42 प्रतिशत समय छुट्टियों में बिताया या 39 प्रतिशत. कोई ताज़्ज़ुब नहीं अगर हम भारतीयों को इस पर नेहरु लोहिया की प्रसिद्ध बहस की याद आ जाये.

माइकल ने इस बात पर कड़ी आपत्ति की है कि 11 सितम्बर के बहाने से बुश प्रशासन ने अमरीकी नागरिकों को उनकी कुछेक नागरिक स्वाधीनताएं तज़ देने के लिये प्रेरित किया. मूर ने अमरीकी कांग्रेस की इस बात के लिये भी निंदा की है कि उसने बगैर पढे ही 'यू एस ए पैट्रियाटिक एक्ट' के नाम से जाने जाते आतंकवाद विरोधी बिल को तुरत फुरत पारित कर दिया.

अब यह तो कैसे पता चले कि बिल को पढ़ा गया या नहीं, पर यह प्रमाण-सिद्ध है कि इसे कुछ ज्यादा ही जल्दबाजी में पारित किया गया. यह बिल सरकार को लोगों पर निगाह रखने, आप्रवासियों को बन्दी बनाने या देश से बाहर निकाल देने जैसे अधिकार देता है. यहीं यह उल्लेख कर देना भी उचित होगा कि माइकल मूर अपनी वेबसाइट पर इस बिल के विरोध में जनमत जगाते हैं. वे जगह-जगह भाषण देकर भी यह काम करते हैं.

अपने विभिन्न रूपों में माइकल अमरीकी सत्ता तंत्र की बहुत सारी परतें खोलते हैं. अपनी किताब 'स्टुपिड व्हाइट मेन' में, तथा इस फिल्म में भी, वे यह बताकर चौंकाते हैं कि 11 सितम्बर के बाद अमरीकी वायुयानों में सुरक्षा जांच कड़ी कर दी गई थी. यात्रियों के पास कोई भी खतरनाक चीज़ नहीं रहे, इस प्रयास में उनसे बुनाई की सलाई, कपडा सीने की सुई,लिफाफा खोलने वाले चाकू तक रखवा लिये जाने लगे. लेकिन, मूर आश्चर्य और क्षोभ के साथ बताते हैं कि इन सब निषिद्ध सामानों में सिगरेट लाइटर नहीं था. और वह भी तब जब कि ज्यादातर उड़ानें धूम्रपान रहित होती हैं. आप किसी भी उड़ान पर सिगरेट लाइटर ले जा सकते थे. क्यों ? मूर बताते हैं कि हालांकि प्रतिबंधित सामान की सूची में लाइटर था, पर जब वह सूची अनुमोदन के लिये व्हाइट हाउस भेजी गयी तो तम्बाकू उद्योग लाबी हरकत में आई और उसी के दबाव में आकर व्हाइट हाउस ने इस असल खतरनाक चीज़ को सूची से हटा दिया ताकि हवाई जहाज़ से उतरते ही यात्री अपनी प्रिय सिगरेट का कश लगा सके और तम्बाकू उद्योग को कोई नुकसान न हो.

माइकल मूर ने इस फिल्म में हास्य-व्यंग्य, कथा, सम्वेदना,भावुकता, अल्पकथन, बड्बोलापन- सभी का ब-खूबी इस्तेमाल किया है. फिल्म की सफलता ने इसके दुश्मनों की एक लम्बी क़तार ही खडी कर दी है. फिल्म की सफलता से क्षुब्ध हो कर यहां के एक दक्षिणपंथी फिल्मकार माइक विल्सन ने एक जवाबी डाक्यूमेंण्ट्री बनाने की घोषणा की है, जिसका शीर्षक होगा- 'माइकल मूर हेट्स अमरीका'. एक सुपरिचित विज्ञान कथाकार रे ब्रेडवरी यह कहते हुये इसका विरोध कर रहे हैं कि मूर ने उनकी एक विज्ञान कथा - 'फारनहाइट 45' के शीर्षक को चुराया है. यहां पाठकों को यह याद दिलाना उचित होगा कि 45 डिग्री फारनहाइट पर किताबें जल सकती हैं. रे महाशय ने 1953 में प्रकाशित तथा बहु चर्चित रहे इस उपन्यास में एक ऐसे चिंताजनक भविष्य की कल्पना की थी जहां एक फायरमेन घरों तथा पुस्तकालयों को इस खयाल से जलाता है कि लोग स्वतंत्र रूप से सोच न सकें. मूर ने अपनी इस फिल्म में फारनहाइट 9/11 उस तापमान को कहा है जहां स्वाधीनता जलने लगती है.

यह अमरीका में चुनाव वर्ष है. इस कारण यहां इस फिल्म का विशेष महत्व हो गया है. यहां इस बात को लेकर भी बहुत चर्चा है कि यह फिल्म जन-चेतना को जगाने या जनमत को ढालने में कितनी सफल होगी. अगर फिल्म बॉक्स ऑफिस पर पिट गई होती तो ये सवाल नहीं उठते, पर फिल्म की सफलता ने एक साथ ही बहुत सारे सवाल खड़े कर दिये हैं.

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी....)

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रचनाकार: माइकल मूर : असहमति में उठा हाथ
माइकल मूर : असहमति में उठा हाथ
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