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संस्मरण : दुनिया गोल है - किश्त 2

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  - सोमेश शेखर चन्द्र   मैंने, जब चारों तरफ का इलाका करीब-करीब देख लिया था तो राँची के उत्तर जोन्हाफल के पहले, सड़क के पश्चिम, लेफसर गांव...

 

- सोमेश शेखर चन्द्र

 

somesh मैंने, जब चारों तरफ का इलाका करीब-करीब देख लिया था तो राँची के उत्तर जोन्हाफल के पहले, सड़क के पश्चिम, लेफसर गांव जो लंबाई में बसा है, उसके अंतिम छोर पर मुंडा लोगों की बस्ती है, वहाँ गया। गाँव के लोगों को इकट्ठा करके अपना परिचय दिया और विस्तार से उन्हें अपनी योजना के बारे में बताया। उन्हें मैंने यह भी बताया कि अगर आप लोग मुझे यहाँ रोकना चाहेंगे तो यहीं रुककर मैं एक आश्रम बनाऊँगा। आप लोगों के बच्चे को पढ़ाऊँगा। आपके जीवन स्तर में सुधार आए इसके लिए मेरे पास जो साधन है उससे गाँव के पीछे जो नदी बहती है उसमें इंजन लगाकर आपके खेतों के लिए सिंचाई की व्यवस्था करुंगा। पानी हो जाने पर आप लोग अपने खेतों में तरह तरह की सब्जियाँ उगाकर तथा ऊसर बंजर जमीन में फलदार वृक्ष लगाकर अच्छी पैदावार ले सकेंगे। अच्छी नस्ल की भेड़, बकरियाँ मुर्गियां और सुवरों का वैज्ञानिक तरीके से पालन करके आप इससे अच्छी आमदनी ले सकेंगे। तमाम तरह की जड़ी बूटियाँ जिनकी बाजार में अच्छी माँग है तथा काफी ऊँचे दाम पर बिकती हैं उनकी भी पैदावार अपने खेतों में करके आप लोग अच्छा पैसा कमा सकेंगे।

मेरा यह प्रस्ताव लोगों को काफी पसंद आया था। वहाँ उपस्थित सभी लोग, एक स्वर से मुझे वही रूक जाने का आग्रह किए थे। उन लोगों ने मुझे, मेरा आश्रम बनाने के लिए गाँव से सटे पश्चिम, खाली पड़ी एक जमीन दिखाया था जो उन्हीं लोगों की थी। जमीन काफी लंबी चौड़ी थी और मेरी जरूरत के हिसाब से काफी थी। अपनी योजना के मुताबिक उसमें मैं अपना आश्रम, बच्चों के लिए स्कूल, वैज्ञानिक तरीके से भेड़, बकरियाँ, मुर्ग़ी सूअर पालने के लिए बाड़े तथा जो लोग दूसरे गाँवों से सीखने के लिए यहाँ आएँ उनके ठहरने और सीखने के लिए अलग से घर बनाने लायक वहाँ पर्याप्त जगह थी।

अपनी योजना के प्रति, गाँव वालों का उत्साह देखकर और मुझे वहाँ रोक लेने के उनके आग्रह पर मैं बड़ा खुश हुआ था। लेकिन मेरे सामने एक बड़ी समस्या यह थी कि जो कुछ मैं करना चाहता था उसका मेरे पास कोई अनुभव नहीं था। इसलिए अपनी योजना पर तत्काल काम शुरू करने के लिए मैं गाँव की नदी में इंजन लगाकर उनके खेतों में पानी पहुंचाने की व्यवस्था तथा गाय, भैंस, सूअर, मुर्ग़ी व भेड़ बकरियों के वैज्ञानिक ढंग से पालन की दिशा में काम शुरू करने के लिए उस क्षेत्र के अनगड़ा ब्लाक के विशेषज्ञता प्राप्त लोगों की मदद लेने के लिए वहाँ गया था। गाँवों के समग्र विकास और वहाँ के लोगों की माली हालत अच्छी बनाने के लिए, गाय, बैल, भैंस सूअर मुर्ग़ी, मधुमक्खी पालन तथा कुटीर उद्योग लगाने के लिए, ब्लाक के माध्यम से सरकार तमाम तरह की योजनाएं चलाने के साथ गाँव के लोगों को सब्सिडी तथा कम व्याज पर ऋण देकर धन भी मुहैया कराती है। सारे काम वैज्ञानिक ढंग से हो इसके लिए वहाँ पर विभिन्न गतिविधियों में माहिर और उच्च शिक्षा प्राप्त स्टाफ भी तैनात रखती है। मैं यह सोचकर अनगड़ा ब्लाक गया कि यहाँ के विभिन्न विषयों में माहिर लोगों को बुलाकर उनकी देखरेख में अपना कार्य शुरू करवाऊँगा। मुझे उम्मीद थी कि ब्लाक वाले मेरा समर्पण और उद्देश्य जानकर, मेरे काम में मेरी भरपूर मदद करेंगे। वे न सिर्फ गाँव के लिए चलाई जाने वाली तमाम स्कीमों के जरिए जिसमें मछली पालन, पशुपालन, दुग्ध उद्योग तथा गाँव के जितने कुटीर उद्योग है उसमें अपना भरपूर सहयोग करेंगे बल्कि यह सारा काम अपने कुशल देखरेख में करने में मेरी मदद करेंगे।

बिहार और झारखंड में ब्लाक वालों के जिम्मे न सिर्फ गाँव के विकास से संबंधित सारी जिम्मेदारी होती है बल्कि अपने क्षेत्र के कानून व्यवस्था देखने का भार भी थोड़ा बहुत उन्हीं के जिम्मे होता है। जिस दिन मैं वहाँ गया उस दिन माकपा (माले) के कार्यकर्ता गाँव के लोगों को इकट्ठा करके ब्लाक के बाहर नारे लगा रहे थे। ब्लाक के सभी स्टाफ अपनी सीट छोड़ बाहर खुले में धूप सेंक रहे थे और नारेबाजी करते लोगों के विषय में बातें करने में मशगूल थे। जिस किसी से मैं बात करना चाहता वह मुझे एक दफा ऊपर से नीचे तक देखता और मेरी उपेक्षा करके पुन: गप्पें लड़ाने में जुट जाता। एक आदमी मुझसे बड़ी मुश्किल से बात किया तो उसने मुझे बताया कि फलां अधिकारी से, इसके लिए, आपको बात करना होगा। बताते समय उसने मुझे कईयों दफा ऊपर से नीचे तक सशंकित नजरों से देखा था। ऐसा शायद उसने इसलिए किया हो कि मेरा चेहरा उसके लिए एकदम नया था। हालांकि मुझे देखकर उसके चेहरे पर कोई परेशानी या असहज होने का भाव नहीं था। उसने मुझे यह भी बताया कि जिन साहब से आपका काम बनना है वे आज फील्ड में गए हैं। वे कल ही दफ्तर आएँगे इसलिए आप कल ही आइए।

जैसा उसने मुझे बताया था दूसरे दिन मैं फिर ब्लाक गया था। ब्लाक में यद्यपि कि स्टाफ क्वार्टर बने हुए हैं लेकिन वहाँ बहुत कम लोग रहते हैं। ज्यादातर लोग राँची में रहते हैं और वही से रोज आना जाना करते है। इसलिए उस दिन भी साढ़े ग्यारह बाहर बजे तक लोग आ ही रहे थे। उस दिन ब्लाक में कोई हल्ला हंगामा नहीं था। मैं ब्लाक के बाहर खड़ा उन साहब का इंतजार करता रहा था। जो लोग पहुँचे भी थे उनमें से ज्यादातर अपनी सीटों पर नहीं बैठे थे। वे लोग या तो बाहर खुले में धूप सेंकते हुए आपस में गप्पें लड़ा रहे थे या रोड के दूसरी तरफ की चाय की गुमटी के बाहर खड़े चाय पीते हुए मामलेदारी में मशगूल थे। सुबह दस बजे से उन साहब का इंतजार करते तीन बज गए थे, लेकिन तब तक वे दफ्तर नहीं पहुँचे थे। साढ़े तीन बजे के बाद जब वे पहुँचे, तो उन्हें काफी लोग घेर लिए थे। उन्हें कही और भी तुरंत जाने की जल्दी थी इसलिए अपने को घेर कर रखे लोगों से किसी तरह जान छुड़ाकर, वे बाहर से ही भाग लिए थे। इसलिए उस दिन उनसे, मेरी मुलाकात नहीं हो सकी थी। ब्लाक ही नहीं भारत के दूसरे दफ़्तरों में भी जैसी कार्य सभ्यता है उसे किसी को बताने की जरूरत नहीं है। यहाँ जो भी काम होता है उसमें बिचौलिए और दलालों की खास भूमिका होती है। उनके माध्यम से जाइए आपका काम हो जाएगा। इसके अलावे यहाँ के कर्मी और अधिकारी पत्थर की चलती फिरती मूर्ति होते है। उनको किसी तरह की जिम्मेदारी या जवाब देही या किस काम के लिए वहाँ बैठाए गए हैं इससे कोई मतलब नहीं है। उनकी आचार संहिता में जो कुछ भी लिखा हो लेकिन वे अपना हर काम अपने ढंग और मर्जी से करते है। यही हाल दिल्ली तक है। जरूरी से जरूरी फाइलें एक विभाग से दूसरे और तीसरे और चौथे में पहुंचने में सालों लग जाते हैं। आम नागरिक सोचे कि दरख्वास्त देकर अपनी फरियाद साहब तक पहुँचा दें और उसका काम हो जाए ऐसा कभी होता ही नहीं। दरख्वास्त देने के बाद बाबू और चपरासी के सामने हाथ जोड़ने घिघियाने और सबको नेग नहछू देने के बाद, महीनों उसके पीछे जूते घिसाई करेगा, इसके बावजूद उसका काम हो जाएगा तय नहीं होता। हाँ अगर कोई रसूख वाला नेता, या क्रिमिनल दफ्तर में पहुँच जाए तो सारा विभाग उसकी खैरख्वाही ही में जुट जाएगा। दिल्ली के कोई कोई मिनिस्टर तक स्वीकार करते है कि फाइलों का निपटान उनके बस का नहीं है। कारण है लाल फीता साही।

एक ऑस्ट्रेलियन लड़की अपने संस्मरण में यहाँ के अधिकारियों के काम के तौर तरीक़ों के बारे में लिखा है कि यहाँ के अधिकारी नियम कानून के मामले में तो बुद्ध की तरह हैं लेकिन अगर कोई रसूख और जुगाड़ वाला आदमी पहुँच जाए तो वे कुर्सी छोड़कर उठ खड़े होंगे और अपनी पैंट नीचे खिसकाते हुए चूतड़ पर हाथ रखकर उसके सामने झुक झुक जाएँगे। वह लड़की, भारत अपने किसी ऑस्ट्रेलियन मंगेतर के पास आई थी, दोनों यहीं शादी करना चाहते थे। उसके वीजा की अवधि खत्म हो रही थी उसी को बढ़वाने के लिए वह वीजा अधिकारी के पास अपनी फरियाद लेकर पहुँची थी। वहाँ के अधिकारी से जब वह मिली तो वह उससे बड़े उल्टे, पुल्टे और वाहियात के सवाल पूछे थे इसके बाद उसने उसे अपनी औकात दिखाते हुए उसकी दरख्वास्त रिजेक्ट कर दिया था। जब वही लड़की किसी रसूख वाले आदमी को लेकर उस अधिकारी के पास दोबारा गई तो वही अधिकारी अपनी खीसें निपोरते हुए सफाई देने लग गया था कि मैडम ने मेरे कहने का गलत अर्थ लगाया था मैंने उन्हें ऐसा तो नहीं कहा था। और वही अधिकारी दौड़ दौड़कर, अपने हाथों, सारा काम करके, लड़की का वीजा बढ़ाकर, पाँच मिनट के अंदर उसे पकड़ा दिया था।

अनगड़ा ब्लाक मैं लगातार पाँच छ: दिनों तक जाता रहा था और लोग मुझे इसके या उसके पास दौड़ाते रहे थे। उनके दौड़ाने और टरकाने की प्रवृत्ति देख मैं समझ गया था कि यहाँ से मुझे किसी भी तरह की मदद की उम्मीद करना बेकार है। इसके बाद मैं अपने इसी काम के लिए कॉके कृषि विद्यालय गया था। वहाँ मेरे एक पूर्व परिचित सी.एम.पी. सिंह थे। एक दिन की मुलाकात में उनसे मेरा परिचय था। उनके एक भाई राँची जेल में जेलर थे। इसी नाते वे मुझे एक दिन अपने साथ राँची जेल दिखाने ले गए थे। जिस समय की यह बात है उस समय वे युवा थे और कृषि विद्यालय में प्रोफेसर पद पर कार्यरत थे। उनसे मिले लंबा अरसा गुजर चुका था इसलिए मुझे संदेह था कि वे मुझे पहचानेंगे भी या नहीं। उनके घर जाकर इनसे मिला था और उनके साथ जेल घूमने का जिक्र किया था तो वे मुझे पहचान गए थे। अब वे विद्यालय के किसी ऊँचे पोस्ट पर पहुँच चुके थे। जब तक मैं उन्हें, अपना घर बार छोड़कर, समाज सेवा में अपना शेष जीवन बिताने और अपनी योजना के बारे में बताता रहा था तब तक तो वे मुझे बड़ी आजिजी से सुनते रहे थे लेकिन जब मैं उनके पास पहुँचने का अपना उद्देश्य और, अपनी उम्मीद की बात उनसे कहा था तो जल्दी में होने की बात कहकर वे उठ खड़े हुए थे। जाते जाते वे मुझसे कहते गए थे कि आज तो मैं जल्दी में हूँ आप किसी फुर्सत के दिन आइए तो आपसे पूरी बात हो, और मेरे लायक जो हो सकेगा आपकी मदद करूँगा। मैंने उनसे कहा कि मैं आपसे रुपया पैसा नहीं चाहता। गाँव में वैज्ञानिक तरीके से अपने काम को अंजाम दे सकूँ इसके लिए मुझे आपकी मदद की जरूरत है। इस पर, उन्होंने मुझे, विद्यालय के दफ्तर में तैनात एक अधिकारी से मिल लेने की सलाह देकर वहाँ से चल दिए थे।

मैं उस अधिकारी के पास गया, और चंद्रेश्वर बाबू का हवाला देकर अपने उद्देश्य के बारे में उसे बताया तो उसने मुझे एक पुरानी डायरी और ढेर सारा लिटरेचर खरीद लेने को कहा था। सबकी कीमत वसूलने के बाद उसने मुझे बताया था कि इसमें आपके जरूरत की सारी सामग्री उपलब्ध है। दफ्तर से डायरी और लिटरेचर का पुलिंदा लेकर मैं बाहर आ गया था। चन्द्रेश्वर बाबू और उस अधिकारी का व्यवहार देख मैं समझ गया था कि लोगों को मेरी योजना और उद्देश्य में कोई दिलचस्पी नहीं है इसलिए मैं दोबारा उनके पास नहीं गया था।

वहाँ से निकलकर मैं बगल में ही वेटरनरी कालेज है, वहाँ चला गया था। मैकालेज के उस हिस्से में जहाँ उन्नत किस्म की भेड़ बकरियाँ, मुर्गियाँ और सूअरें रखी गई थी उनके बाड़ों में घूम-घूम कर देख समझ रहा था कि लोग उन्हें पालते और रखते कैसे हैं। जब मैं वहाँ घूम रहा था तो मुझे वहाँ एक शर्मा जी भेंटा गए थे। उस समय वे किसी एन.जी.ओ. संस्था के माध्यम से लाए गए, बीस पचीस की संख्या में गाँव के औरत मर्दों को भेड़, बकरियों, मुर्गियों और सुवरों के शेडों में घुमा घुमाकर, उन्हें उनके वैज्ञानिक तरीके से पालन से लेकर भोजन, स्वास्थ्य और रोग बीमारी के लक्षण और बीमार पड़ने पर क्या करना चाहिए जैसी बातें विस्तार से समझा रहे थे। दरअसल शर्मा जी इसी कालेज के प्रोफेसर के पद से रिटायर होने के बाद एन.जी.ओ. तथा दूसरी संस्थाओं के कंसलटेंट बनकर उन्हें अपनी सेवा देते थे। इससे उनका समय भी कट जाता था और थोड़ी बहुत आय भी हो जाती थी।

शर्मा जी मुझे अपने काम के लिए बड़ा फिट आदमी लगे थे। उनका काम खत्म होने के बाद मैं उनको पकड़ा था। उन्हें अपना उद्देश्य बताया था तो वे मुझे लेकर अपने घर बौरिया चले आए थे। वहाँ बैठकर मैं उन्हें अपना सारा वृत्तांत सुनाया था, और साथ ही यह भी बताया था कि मैं अपने काम को अंजाम देने के लिए लेफसर गाँव के मुंडा लोगों की एक बस्ती में अपना आश्रम बनाकर, मेरे पास जो लाख दो लाख रूपए है उसे गाँव वालों पर खर्च करके उनकी उन्नति के लिए काम शुरू करना चाहता हूँ। क्या काम करूँगा, अपनी सारी योजना उन्हें विस्तार से सुनाकर, अपने इस काम में उनके सहयोग की याचना किया था। शर्माजी, मेरी पूरी कहानी सुनने के बाद थोड़ी देर तक चुप बैठे कुछ सोच रहे थे उसके बाद, उन्होंने मुझे एक किस्सा सुनाया था। किस्सा कुछ यूँ था कि एक जमीनदार थे। उनके गाँव में एक अच्छा नचनिया रहता था। नचनिया चाहता था कि मैं अपनी नाच का हुनर जमीनदार साहब को दिखाऊँ। इसके पीछे, मंशा उसकी यह थी कि जमीनदार साहब के यहाँ नाच का प्रोग्राम हो जाने पर, उसका न सिर्फ इलाके में अच्छा नाम होगा बल्कि यदि जमीनदार साहब को उसकी नाच पसंद आ गई, तो वे उसे, इकरार और इनाम भी अच्छा देंगे। अपने इस उद्देश्य को पूरा करने की गरज से एक दिन नचनियाँ जमीनदार साहब के पास पहुँचा और उनसे अपनी नाच देख लेने की विनती किया। लेकिन जमीनदार साहब को उसकी नाच में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसे टरकाने के लिए वे कोई न कोई बहाना करके उसे फिर फिर आने को कहते रहे थे। जिस दिन वे उसे बुलाते नचनियाँ उनके दरबार में पहुँच जाता। कई दिन दौड़ाने के बाद जब जमीनदार साहब ने देखा कि इतना टरकाने के बाद भी नचनियाँ समझने को तैयार नहीं है तो आजिज़ आकर उन्होंने एक दिन उसके नाच का प्रोग्राम रख दिया था। निर्धारित दिन वह अपने तमाम तामझाम के साथ जमीनदार साहब के यहाँ पहुँचा और अपना नाच करने लगा। लेकिन जमीनदार साहब उसका नाच देखने नहीं पहुँचे थे।

शर्मा जी इसे सरपेंचवा का नाच नाम दिए थे या और कुछ ठीक ठीक मुझे याद नहीं है। यह किस्सा सुनाकर उन्होंने मुझसे स्पष्ट कहा था कि आप जो करने की ठान रखे हैं वह ठीक सरपेंचवा की नाच जैसा ही है और इसका हश्र भी ऐसा ही होगा। शर्मा जी काफी उम्रदराज आदमी थे और दुनिया के बारे में उनका अच्छा अनुभव भी था। उन्होंने मुझे समझाया कि आप रिटायर होने के बाद जो दो चार पैसे रखे हैं उसे इस तरह फेंकें नहीं, पैसा आदमी का और खासकर इस उम्र में, उसका बहुत बड़ा संबल होता है। खर्च हो जाने पर फिर कभी वह वापस नहीं आता। छूँछा होने पर, अपनी ज़रूरतों के लिए अपने बच्चों के सामने हाथ पसारना बड़ा दुखदाई होता है। शर्मा जी ने मुझसे कहा कि आप इस काम में जल्दबाजी नहीं करिए। पहले वहाँ के लोगों को समझिए। आप उनके लिए जिस उत्साह से काम करना चाहते हैं उसी उत्साह, मेहनत और लगन से वे भी उसे करेंगे और करेंगे भी तो जो उपज या चीज वे पैदा करेंगे उसकी खपत कहाँ होगी। उसे वहाँ पहुँचाया कैसे जाएगा जैसी बातों पर ठीक तरह से सोच विचार कर लीजिए तब कुछ करिए। क्योंकि आप यहाँ के लोगों को जानते नहीं है। उनके लिए, आपके पहले, कइयों स्वयंसेवी संस्थाओं और सरकार की तरफ से बहुत कुछ किया गया है लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात ही रहा है।

शर्मा जी ने अंत में मुझे सलाह दिया कि अगर आपको उनके लिए कुछ करना ही है तो सरकार की तरफ से जो तमाम योजनाएँ हैं वह सब उनके यहाँ ले जाइए और उसके जरिए उनकी ऐसी मदद करिए कि उन्हें लगे कि इस सबके प्रति वे जबाबदेह हैं। सरकारी तंत्र में कैसा मकड़जाल है उसके बारे में विस्तार से बताकर उन्होंने मुझे सुझाव दिया था कि उनका इस क्षेत्र के दफ्तरों से लेकर विभिन्न तबके के लोगों में अच्छी पैठ है। वे कइयों एन.जी.ओ. के कंसल्टेंट भी हैं। यदि कुछ निर्धारित राशि कंसल्टेंसी के लिए मैं उन्हें दूँ तो वे मेरी संस्था की स्थापना में मदद करने से लेकर समय-समय पर वाजिब सलाह देने के साथ जरूरत पड़ने पर संबंधित लोगों से मुझे मिलवाने या खुद मिलकर मेरा काम करवाने में पूरा सहयोग करेंगे।

शर्माजी ने जो कुछ मुझे समझाया था सब बड़ी व्यवहारिक बातें थी और उनकी बातें मुझे काफी जंची थी। इसलिए अपने रूपयों से पाइप और डीजल इंजन खरीद कर लेफसर गाँव के बगल, बहती नदी से, वहाँ के खेतों में पानी लाकर सिंचाई की तुरंत व्यवस्था करने की अपनी योजना को मैं थोड़े दिनों के लिए स्थगित कर दिया था। हो न हो गाँव के लोग, मेरी बात और योजना से प्रभावित होकर, मुझे वहाँ रोक लेने तथा आश्रम के लिए जमीन देने के लिए राजी हो गए हों लेकिन बाद में कोई उन्हें समझा दिया या उनमें आपस में ही किसी बात को लेकर मतभेद हो गया और वे अपनी बात से पलट गए तो मेरा सारा किया धरा और खर्च बेकार हो जाएगा। इसलिए मैं थोड़े दिन इंतजार करके यह देख लेना चाहता था कि लोग अपनी बात पर अटल रहते है या नहीं?

गाँव वालों से मेरा संपर्क बना रहे इसके लिए मैं उनके बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया था। बच्चों के पढ़ने लिखने के लिए राँची से मैं कुछ किताबें पेंसिल, रबड़, कापियाँ, स्लेटें और चाक खरीदकर बच्चों में बाँट दिया था। सुबह दस बजे मैं लेफसर गाँव पहुँचता और बच्चों को इकट्ठा करके उन्हें गिनती पहाड़ा तथा क, ख, ग, घ लिखना पढ़ना सिखाने लग गया था। तीन चार दिनों तक तो वहाँ बीस पच्चीस की संख्या में मुंडा लोगों के बच्चे मेरी कक्षा में आते और मन लगाकर पढ़ना लिखना सीखते रहे थे। मैं वहाँ रात रूकता नहीं था। सुबह आठ बजे राँची से लेफसर के लिए बस पकड़ता और दस साढ़े दस बजे तक लेफसर गाँव पहुँच जाता। मैं जब वहाँ पहुँचता तो, बच्चे मेरा बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे होते। सुखलनाथ मुंडा के पक्के घर के बरामदे में मेरी कक्षाएँ चलती थी। पढ़ाने के बाद मैं बच्चों को थोड़ा दौड़ धूप का खेल खेलवाता। तीन चार दिनों तक तो मेरी कक्षाएँ बड़े सुचारू रूप से चली लेकिन इसके बाद एक दिन जब मैं गाँव पहुँचा तो देखा वहाँ कोई बच्चा मौजूद ही नहीं है। मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ। आज गाँव में कुछ हो गया है क्या? किसी अनहोनी के घटने की आशंका से ग्रस्त मैं हकीकत जानने के लिए इधर उधर किसी को अभी तलाश ही रहा था, तो देखा कुछ बच्चे दीवाल और बगल के टपरे की ओर से हुलक हुलक कर मुझे देख रहे है। मैं उनकी तरफ देखता तो वे दीवाल के पीछे छुप जाते और खी खी करके हंसने लगते। उन्हें ऐसा करते देख एक मास्टर की तरह डाँटते हुए, मैं उन्हें पढ़ने के लिए बुलाया तो सबके सब वहाँ से भाग खड़े हुए थे। उनका यह व्यवहार देख मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ था। आखिर कारण क्या है कि जो बच्चे इसके पहले मेरे पहुँचने का बड़ी बेसब्री से इंतजार करते बैठे रहते थे वे आज मेरे बुलाने पर भी नहीं आ रहे हैं? उनके माँ बाप जो दूसरे दिनों मुझे देखकर मुसकुरा दिया करते थे वे भी सामने पड़ने पर मुझसे कतरिया जाते या मेरी उपेक्षा करते हुए वहाँ से आगे बढ़ जाते।

बरामदे में एक चौकी पड़ी थी उस पर मैं बैठ गया था और इस नई स्थिति के बारे में सोच ही रहा था कि गाँव की, आम औरत मरद से एकदम अलग तरह की काफी लंबी और मोटी, मर्द की देह और आवाज वाली सॉवले रंग की एक औरत वहाँ प्रकट हुई थी और मुंडारी भाषा में जोर जोर से मुझसे पूछने लगी थी हम मौगी सबके भी पढ़इबे की? (तू यहाँ हम औरतों को भी पढ़ाएगा क्या) यानी कि तू गाँव की औरतों के फेर में यहाँ आया है कहने का मतलब था उसका। इसके बाद वह बड़ी देर तक इसी तरह अपने हाथ झमका झमका कर ऊँची आवाज में पता नहीं क्या क्या बोलती रही थी। मैं उसकी बातें समझ तो नहीं पाया था लेकिन उसकी शुरू की बात सुनकर एक बात तो मेरी समझ में आ गया था कि वह मुझे गालियाँ दे देकर कुछ कह रही है। उसकी देह की भाषा, मुखमुद्रा और आवाज देख सुनकर मैं जान गया था कि गाँव वालों को उनके बीच मेरी दखल बर्दाश्त नहीं है। जब वह औरत उसी मुद्रा, आवाज और रौ में काफी देर तक बोल चुकी तो एक आदमी मेरे पास आया था और उसने मुझसे, सुखलनाथ मुंडा नामक एक आदमी से, जो उसी गाँव का था और कोआपरेटिव जैसी किसी संस्था में गाँव से कुछ दूर पर काम करता था उससे मिल लेने के लिए कहा था।

मैं उस औरत के व्यवहार से न सिर्फ भयभीत था बल्कि व्यथित भी था। भयभीत मैं इसलिए था कि वहाँ मैं किसी को जानता तक नहीं था इसलिए डर मुझे इस बात की लगी थी कि यदि कहीं गाँव वाले मुझे पर अचानक टूट पड़े तो अपनी मदद के लिए मैं किसी को गुहार भी नहीं सकूँगा। दूसरे मैं ऐसी जगह फंसा खड़ा था जहाँ से भाग निकलने का कोई उपाय भी नहीं था। और व्यथित मैं इस बात पर था कि गाँव वालों ने ही मुझसे वहाँ रूकने का आग्रह किया था इसीलिए मैं वहाँ रूका था। उन्हें अब वहाँ मेरा रूकना पसंद नहीं था तो वे सीधा मुझसे कह देते इसके लिए इतना बड़ा बवंडर खड़ा करने की क्या जरूरत थी? खैर जब उस आदमी ने मुझे सुखलनाथ मुंडा से मिलने के लिए कहा था तो मेरी जान में जान आ गई थी। मैं चाहता तो सुखलनाथ से मिले बगैर अपने घर आ जाता लेकिन मैं कायरों की तरह भागना नहीं चाहता था। इसलिए जिस जगह का पता देकर उस आदमी ने मुझे सुखलनाथ से मिलने को कहा था मैं उसी दिन वही से उसके पास पहुँचकर उससे मिलने के लिए चल पड़ा था।

सुखलनाथ गाँव से काफी दूर एक कोआपरेटिव जैसी संस्था में चपरासी या ऐसा ही कुछ था। मुंडा बस्ती में शायद वही सबसे ज्यादा पढ़ा और समझदार था। वह निहायत शरीफ और अच्छा आदमी था। सुखलनाथ से मिलकर मैंने उसे बताया कि गाँव के एक आदमी ने मुझे आपसे मिल लेने को कहा है इसीलिए मैं आपके पास आया हूँ। इस बीच मुझे आया देख, एक आदमी, जो चेहरे मोहरे से उसी क्षेत्र का लगता था और उसी कोआपरेटिव में कोई बाबू या साहब के पद पर कार्यरत रहा होगा, वह भी हम लोगों के पास आकर खड़ा हो गया था। साफ सफ्फाक, देखने में खूबसूरत, करीब पच्चीस साल की उम्र का, एक और लड़का जो किसी स्वयंसेवी संस्था से जुड़ा था वह भी वहाँ आ गया था। सुखलनाथ ने शायद उन्हें मेरे बारे में ढेर सारी बातें बता रखा था। थोड़ी देर हमारी बातें सुनने के बाद उस आदमी ने मुझसे पूछा, था “सुना हूँ आपने अपना घर बार छोड़ गाँव में रहकर लोगों की सेवा करने का ब्रत ले रखा है?” उसने मुझसे यह बात पूछने की गरज से नहीं बल्कि व्यंग के तौर पर पूछा था।

जी ई ऽ ऽ ......... है तो मेरा ऐसा ही कुछ विचार.....।

लेकिन इससे आपको क्या फायदा होगा? उस आदमी के चेहरे पर अब शरारत उतर आई थी और वह कुछ कटखना भी हो उठा था। उसके चेहरे पर लिपटी शरारत और बातों में घुले कटाक्ष से मैं तिलमिला उठा था। ऐसा है भाई साहब कि पृथ्वी की हवा और पानी में एक कीड़ा होता है वह कीड़ा जिसके दिमाग में घुस जाता है वह इसी तरह की पागल हरकते करने लग जाता है। समझिए वही कीड़ा मेरे दिमाग में भी घुस गया है और इसी के चलते मैं अपना घर बार छोड़कर इस जंगल में भटकने के लिए आ गया हूँ। लेकिन फिर मुझे ख्याल आया था कि मैं जैसा जबाब, और जिस लहजे मैं उस आदमी को दिया हूँ, ऐसा मुझे नहीं बोलना चाहिए था। इसलिए अपने को तथा अपनी बात दोनों को संभालने के लिए मैं उसे समझाना शुरू किया था, कि भाई साहब, यह सब करने के पीछे मेरा स्वार्थ बस इतना भर है कि इससे मेरा समय, किसी अच्छे काम में बीतेगा और मेरे काम से किसी एक भी आदमी की गृहस्थी सुधर गई या कोई एक भी बच्चा मुंडा बस्ती से पढ़ लिखकर, अच्छी जगह पहुँच गया तो मैं अपने को धन्य समझूँगा।

सुखलनाथ हम दोनों के बीच उतर आई कड़ुवाहट देख, बड़ा असहज हो उठा था। दूसरा लड़का जो स्वयंसेवी संस्था से जुड़ा था वह मेरी बात सुनकर काफी प्रभावित हुआ था। उसने कहा, सर आप बहुत अच्छा उद्देश्य लेकर घर से निकले हैं। इस काम में अगर आपको, मुझसे किसी तरह के सहयोग की दरकार होगी तो आप मुझसे जरूर कहिएगा।

सुखलनाथ ने मुझसे ज्यादा बात नहीं किया था। उसने मुझसे सिर्फ इतना ही कहा था कि गाँव के आगे, मुखिया जी का घर है उनके घर जाकर आप उनसे मिल लीजिए। मुखिया जी का जो नाम उसने मुझे बताया था इस समय मुझे याद नहीं है। उनका मकान अमरूद बगान से और थोड़ा आगे रोड के किनारे था। जैसा सुखलनाथ ने कहा था मैं दूसरे दिन मुखिया जी के घर उनसे मिलने पहुँच गया था।

मुखिया जी बड़े भले और सज्जन आदमी थे। वे अच्छा पढ़े लिखे थे और उस क्षेत्र के लोगों में उनकी अच्छी प्रतिष्ठा था। सड़क के किनारे ही लंबी चौड़ी जगह में पक्का मकान था उनका। बड़े काश्तकार भी थे वे। उस समय उनके यहाँ गाँव के कइयों मजदूर धान की मड़ाई में जुटे हुए थे। दरअसल मैं, मुखिया जी, जैसे, क्षेत्र के प्रतिष्ठित लोगों से पहले ही मिलना चाहता था लेकिन जानकारी न होने के चलते उनसे नहीं मिल सका था। और यह सोचकर कि समाजसेवा जैसे अच्छे काम में भला किसी को क्या ऐतराज होगा? जो भी मेरे काम के बारे में सुनेगा वही मेरी प्रशंसा और मुझसे सहयोग करेगा, इसलिए मैं अपना काम शुरू करने के पहले, क्षेत्र के प्रतिष्ठित लोगों से मिलने जैसी महत्वपूर्ण बात को उतना तवज्जो नहीं दिया था।

मुखिया जी के घर पहुँचा, तो देखा वे सज्जन भी वहाँ बैठे हुए थे, जो मुझसे कल, ऐसा काम करने के पीछे, मुझे होने वाले फायदे के बारे में पूछे थे। मुखिया जी के यहाँ सरकारी विभाग के और भी दो तीन लोग बैठे हुए थे। मुखिया जी को मैं विस्तार से अपना परिचय देने के बाद राँची आने का अपना उद्देश्य और अपनी वृहद् योजना के बारे में बताया था। अपनी उसी योजना पर काम करने के लिए मैं लेफसर गाँव की मुंडा बस्ती में, शुरू किए गए अपने कार्यक्रम और योजना के विषय में भी उन्हें विस्तार से जानकारी दिया था। उन्हें यह भी बताया था कि मैं आपसे पहले ही मिलना चाहता था लेकिन इस क्षेत्र का तथा यहाँ के लोगों के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी इसलिए आपसे नहीं मिल सका। मुंडा गाँव के सुखलनाथ ने मुझे आपसे मिल लेने के लिए कहा है। इसीलिए मैं यहाँ आया हूँ।

मुखिया जी मेरे बारे में जानकर, तथा मेरे उद्देश्य और योजना का पूरा विवरण सुनकर बड़ा खुश हुए थे। लेकिन जिस तरह, मेरी कथा सुनने के बाद, शर्माजी ने मुझे अपनी योजना पर आगे बढ़ने के पहले, ढेर सारी बातों से सचेत रहने को कहा था, मुखिया जी भी बिना कोई भूमिका बाँधे, और लाग लपेट के, स्पष्ट शब्दों में मुझसे कहा था कि आपका उद्देश्य, आपकी योजना और लोगों के बीच काम करने की आपकी लगन, नि:संदेह बड़ी अच्छी और ऊँचे दर्जे की है लेकिन आप यहाँ के लोगों को जानते नहीं हैं। यहाँ पर इसके पहले कइयों स्वयंसेवी संस्थाएँ और सरकार, यहाँ के लोगों के उत्थान के लिए, तरह तरह की योजनाएँ लेकर आ चुकी है लेकिन इन लोगों में कोई सुधार नहीं कर सकी। उन्होंने मुझे ऐसी कइयों योजनाओं और संस्थाओं और लोगों के नाम गिनाए थे, जो मेरे पहले वहाँ के लोगों के बीच रहकर काम कर चुके थे और उनकी काहिली और उदासीनता के चलते असफल होकर वापस लौट गए थे। साहब यहाँ के लोग बड़े ईजी गोइंग लोग है। इसे आप उनकी काहिली भी कह सकते हैं। इनकी सबसे बड़ी कमजोरी हँड़िया और दारू है। हंडिया और दारू इनके रिवाजों और परंपराओं में है। इनके औरत मर्द और बच्चे प्राय: सभी पीते हैं। दिनभर में इनके खाने का जुगाड़ हो जाए बस इतना भर ही ए सोचते हैं। जंगल की लकड़ी, इनकी भेड़, बकरियों सुवरों और मुर्गे, मुर्गियों से, इनका उतना काम चल जाता है। इनकी औरतें बाहर जाकर या यहाँ वहाँ से खट खटाकर कुछ कमा लाती है इससे इनका खाना चल जाता है। सदियों से जैसा इनके पुरखे रहते आए हैं वैसा ही ए रहना भी पसंद करते हैं। इसलिए आप इनके लिए जितना भी सिर पटक लें, वे न तो अपनी आदत छोड़ेंगे और न ही अपनी काहिली ही छोड़ेंगे। इतना मुझे सुनाकर मुखिया जी चुप हो गए थे। तो आपकी राय यह है कि मैं अपनी योजना में आगे न बढ़ूँ? मैंने मुखिया जी से प्रश्न किया था। दरअसल उस समय मुझमें अपनी योजना और उद्देश्य को लेकर अपने काम में सफल होने का इतना विश्वास भरा हुआ था या इसे मेरा जुनून भी कह सकते हैं कि मैं मुखिया जी की बात से अपने को सहमत नहीं कर पाया था। इन लोगों के बीच रहकर मैं इनको सुधार न सकूँ ठीक है, लेकिन इनके बच्चों को तो मैं सुधार ही सकता हूँ मैंने ऐसा सोचा था उस समय। मेरे कहने का मतलब, आपको यह काम करने से मना करना नहीं है लेकिन जो काम करिए सोच समझ कर करिए बस इतना ही मैं आपसे कहना चाहता हूँ मेरे प्रश्न के जवाब में मुखिया जी ने सलाह के तौर पर मुझसे बस इतना भर कहा था।

यही बात शर्मा जी ने मुझे समझाया था और वही बात अब मुखिया जी मुझे स्पष्ट शब्दों में समझा रहे थे। मुखिया जी की बात मैं इस बिना पर समझने से इनकार कर दिया था कि गाँव वालों के कहने के चलते मुखिया जी मुझे वहाँ रूकने नहीं देना चाहते, इसलिए वे मुझसे इस तरह की बातें कर रहे हैं। मुखिया जी के कहने से नहीं बल्कि मुंडा बस्ती के लोग मुझे स्वीकार करने को तैयार नहीं थे ऐसे में जबर्दस्ती मेरे वहाँ रूकने का कोई औचित्य नहीं था। मैं वापस सुखलनाथ मुंडा के पास गया था। उसे बताया था कि मैं तुम्हारे पास यह बताने आया हूँ कि मैं यह गाँव छोड़कर भाग नहीं रहा हूँ। मेरे चले जाने का मतलब, आप लोग और गाँव वाले; यह न लगा लें कि एक आदमी हम लोगों के बीच वेष बदलकर हमें ठगने आया था और उसने जब देखा कि यहाँ उसकी दाल नहीं गलेगी तो वह यहाँ से भाग खड़ा हुआ था। मैं तुम्हें यहाँ यह बताने आया हूँ, कि गाँव वाले नहीं चाहते कि मैं उनके बीच में रहकर अपना काम करूँ इसलिए मैं इस गाँव को छोड़ रहा हूँ।

लेफसर गाँव छोड़ने के बाद मैं दूसरे किसी गाँव में ठहरने के लिए घूमना शुरू कर दिया था। राँची से मिनी बस में बैठकर पूरब की तरफ जा रहा था तो एक सोलह सत्रह साल का आदिवासी लड़का मेरी बगल की सीट पर आकर बैठ गया था। बस जब कुछ दूर चली तो मैंने उससे उसके गंतव्य के बारे में पूछा था। उसने मुझे बताया कि वह जिलिंग सेरेंग गाँव जा रहा है। वह वहीं का रहने वाला था। देखने में वह काफी सीधा और शरीफ था। राँची के किसी कालेज में, बी.ए. में पढ़ता था। उसे अपना परिचय देकर मैंने उसे बताया था कि मैं यहाँ के किसी गाँव में रूककर वहाँ के लोगों की सेवा करने के उद्देश्य से गाँवों का भ्रमण कर रहा हूँ। जहाँ के लोग मुझे अपने यहाँ रोक लेंगे मैं वही रूक जाऊँगा और वहीं अपना काम शुरू कर दूँगा। इतना उसे बताने के बाद मैंने उससे पूछा कि क्या मैं तुम्हारे गाँव चलूँ? मैं जिस लहजे में उससे पूछा था वह मुझे ना नहीं कर पाया था। इस तरह मैं उसके साथ लग लिया था और उसके घर जिलिगसेरेंग आ गया था।

लड़के का घर, दूसरे आदिवासियों की तरह ही मिट्टी और खपड़े का काफी साफ सुथरा और लिपा पुता था। उसके घर के मुख्य दरवाजे पर किवॉड़ नहीं लगा था। घर के भीतर तो मैं नहीं गया, लेकिन जब उसके घर के मुख्यद्वार पर किवॉड़ नहीं था तो भीतर की कोठलियों में भी किवॉड़ नहीं होगा ऐसा मैंने अनुमान लगाया था। एक प्लास्टिक की कुर्सी घर से निकालकर, उसने मुझे बाहर पेड़ की छाँव में बैठाकर, प्लेट में तीन चार बिस्कुट और गिलास में पानी, पीने के लिए दिया था। आम आदिवासियों की तरह, उसने भी सूअर, बकरियाँ और मुर्गियाँ पाल रखा था जो उसके घर के बाहर घूम रही थी। उस गाँव का पानी बड़ा मीठा था। पानी पीकर मैंने उससे कहा था कि अगर वह गाँव के लोगों को बुला सके तो बुला दे मैं उनसे मिलकर अपने उद्देश्य के बारे में कुछ बातें करना चाहता हूँ। वह गाँव में लोगों को बुलाने के लिए गया था लेकिन धनकटिया का समय था इसलिए गाँव के ज्यादातर लोग अपने खेतों में धान काटने गए थे। कुछ लोग दूसरे कामों के सिलसिले में बाहर गए हुए थे, इसलिए मुझसे मिलने कोई नहीं आया। उसने मुझे गाँव के ही एक प्रतिष्ठित आदमी का नाम बताया जो शायद उस गाँव का मुखिया था और उससे मिलने की सलाह दिया था। जैसा लड़के ने बताया था मैं उस आदमी का घर खोजते-खोजते उसके पास गया था। नाम उसका बांगड़ या ऐसे ही कुछ था। उम्र उसकी तीस साल के करीब रही होगी। बांगड़ पढ़ा लिखा तथा सुसभ्य और निहायत शरीफ आदमी था। मैं उससे मिला और अपना परिचय देकर विस्तार से अपनी योजना और जिलिंग सेरैंग आने का अपना उद्देश्य बताया तो वह काफी प्रभावित हुआ। उसने मुझे अगले दिन आने को कहा था। ऐसा उसने इसलिए कहा था कि वह इस बीच इस विषय पर गाँव के दूसरे लोगों से बातें करके उनसे उनकी राय और रजामंदी लेना चाहता था। जैसा उसने मुझसे कहा था मैं दूसरे दिन फिर सिलिंग सेरेंग जाकर उससे मिला तो उसने मुझे बताया कि गाँव के लोग इस बात के लिए राजी नहीं है। मैं वहाँ से वापस लौट आया था।

दूसरे दिन राजा पड़ाव से आगे चमघट्टी नाम का एक गाँव पड़ता है वहाँ गया। यह गाँव मुख्य सड़क से पूरब लंबाई में दूर तक बसा है। इस गाँव में संथाल, महतो, मुंडा ओरांव जातियाँ बसती है और सबकी अपनी छोटी छोटी बस्तियाँ हैं। इस गाँव के पूरब एक नदी बहती है। मैं बस्ती में घूमते घूमते बसंत मुंडा नाम के एक तीस बत्तीस साल के आदमी के दरवाजे पर पहुँचकर रूक गया था। उस समय बसंत अपने घर के बगल के सब्जियों के खेत में सिंचाई कर रहा था। उसके घर के सामने तीन चार छोटे बच्चे खेल रहे थे और पत्नी उसकी चांपाकल पर कपड़े धो रही थी। मैंने एक बच्चे से पूछा कि बेटे पापा कहाँ है? तो बच्चे खेलना बंद करके मुझे कुतूहल से देखते खड़े हो गए थे। बच्चों से पूछ-परख करता देख बसंत की पत्नी चांपाकल से उठकर मेरे पास आ गई थी। कहिए किसे खोज रहे है? मैंने उसे बताया कि मैं कुछ काम से यहाँ आया हूँ, आप इस घर के मालिक को बुला दे उनसे मैं कुछ जरूरी बातें करना चाहता हूँ। उसने मुझे बताया था कि वे वहाँ खेत में पानी दे रहे हैं वहीं जाकर उनसे मिल लीजिए।

बसंत से बात करने पर मुझे पता चला कि वह पढ़ा लिखा सरल और व्यवहार कुशल आदमी है। मैं उसे अपनी योजना और वहाँ आने का अपना उद्देश्य बताकर, उससे अपने काम में उसकी मदद माँगा तो उसने मुझे बताया कि जो काम आप करना चाहते हैं वही काम यहाँ एक स्वयंसेवी संस्था पहले से ही कर रही है। बसंत के घर के दक्षिण कुछ दूर पर संस्था, बीस बाई बीस फुट का एक कमरा, अपने मशरफ के लिए बना रखा था। हालांकि संस्था के लोग वहाँ कम ही आते थे। उस संस्था के अलावे जैवियर राँची वालों ने गाँव के खेतों में पानी का प्रबंध करने के लिए, गाँव से ही थोड़ी दूर पर बहती नदी से पाइप बिछाकर पानी लाने की व्यवस्था किया हुआ था। लेकिन डीजल आदि का पैसा कौन दे और उसके रखरखाव की जहमत कौन मोल ले, इसके चलते डीजल इंजन और पाइप बसंत के घर पर ही रखा हुआ था। बसंत अपने घर में अच्छी नस्ल की सूअरें और बकरियाँ पाल रखी थीं जो काफी मोटी तगड़ी थीं लेकिन गाँव में अच्छे भोजन, दवा दारू और वैज्ञानिक ढंग से देख रेख के अभाव में उनके पालने में बड़ी दिक्कतें थी बसंत ने मुझे बताया था। रोग बीमारी उन्हें बड़ी जल्दी पकड़ लेती है इसलिए उनमें से कई मर जाती हैं। चमघट्टी गाँव में एक स्वयंसेवी संस्था पहले से ही काम कर रही थी इसलिए मेरे वहाँ रूकने का कोई औचित्य नहीं था और मैं वापस आया गया था।

दूसरे दिन मैं फिर चमघट्टी गया। सोचा वहाँ से दूर और गहरे जंगल के किसी गाँव में जाऊँ। जिस बस में मैं बैठा था उसी में बारह चौदह साल की उम्र के बीच की आठ दस लड़कियाँ, ओ स्कूल से पढ़कर घर लौट रही थी, वे भी बैठी हुई थीं। वे चमघट्टी के पहले, घने जंगल के पास उतरने लगी तो मैं भी उनके साथ वहीं उतर गया था। उनसे पूछने पर पता चला कि उनका गाँव वहाँ से काफी दूर जंगल में है। मैं उनके साथ हो लिया था। लड़कियाँ मुझ अजनबी के उनके साथ लग जाने से काफी डरी हुई थी लेकिन कुछ दूर जाने के बाद ही वे सहज हो गई थी। मैं उनसे उनके स्कूल और पढ़ाई की बातें करते चल रहा था। जंगल के बीच से दो तीन नाले और नदी पारकर उनके गाँव पहुँचा तो उन लड़कियों में से एक की माँ टीले पर खड़ी हमें देख रही थी। मैं सीधा उस औरत के पास चला गया था और उससे अपनी योजना और गाँव में आने का अपना उद्देश्य बताकर वहाँ के बुजुर्गों और गाँव के लोगों से मिलने की अपनी इच्छा जाहिर की तो उसने मुझे बताया कि इस समय गाँव में लोग गोबर्धन पूजा मना रहे है। यहाँ कोई त्योहार या उत्सव मनाने का मतलब था छक कर हड़िया पीना। (यहाँ के स्थानीय लोग चावल पकाकर उसकी माँड में कुछ नशीली जड़ी बूटी मिलाकर उसे सड़ाते हैं उसे पीने से काफी नशा होता है) औरत ने मुझे बताया था कि इस समय तो लोग नशे में है ऐसी हालत में उनसे मिलने से कोई लाभ नहीं होगा। मैं समझता था त्यौहार शायद एक दिन का होगा इसलिए मैंने उससे पूछा था, कल आऊँ? उसने मुझे बताया कि ऐसा सात आठ दिनों तक चलेगा इसलिए उसके बाद ही आइए तो ठीक रहेगा। वह औरत गोबर की ढेर में केचुएँ डालकर उससे जैविक खाद तैयार करती थीं। यह काम, उसे किसी स्वयं सेवी संस्था की तरफ से ट्रेनिंग देकर, करने को सिखाया गया था। जैविक खाद उतनी ही प्रभावशाली होती है जितनी रासायनिक खाद। इस खाद को खेतों में डालने से न सिर्फ अच्छी उपज मिलती है बल्कि रासायनिक खादों के प्रयोग से होने वाले तमाम तरह के दुष्प्रभावों से भी मुक्त होती है।

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क्रमशः अगले अंकों में जारी...

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रचनाकार संपर्क:

आर. ए. मिश्र,

2284/4 शास्त्री नगर,

सुलतानपुर, उप्र पिन - 228001

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टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 1
  1. बेनामी2:59 am

    Shreeman Mishrajee ke is contribution ka ant agar sukhad aur safal hota to bahut achcha lagta.

    Unka anubhav bahut sahee hai, aur spast shabdon main unhoney pichdey warg ke logon ki kahilta ko dikhaya hai.

    जवाब देंहटाएं
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रचनाकार: संस्मरण : दुनिया गोल है - किश्त 2
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