''अकाल में कलाओं का विकास''

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- सीताराम गुप्ता होरेस ने कहा है कि ''प्रतिकूल या विषम परिस्थितियाँ प्रतिभा को प्रकट करती हैं तथा समृद्धि इसका लोप''। सामा...

- सीताराम गुप्ता

sitaram gupta होरेस ने कहा है कि ''प्रतिकूल या विषम परिस्थितियाँ प्रतिभा को प्रकट करती हैं तथा समृद्धि इसका लोप''। सामान्य व्यक्ति इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर सकता और इसीलिए वह सामान्य रह जाता है आगे नहीं बढ़ पाता। सफल व्यक्ति वह है जो विषमताओं में भी अवसर खोज लेता है। वस्तुत: जीवन की हर समस्या किसी बड़े लाभ के लिए अवसर का आधार प्रस्तुत करती है। यह बात केवल व्यक्ति के संदर्भ में ही नहीं अपितु समाज, राष्ट्र तथा विश्व के संदर्भ में भी उतनी ही सटीक लगती है। यह तो हुआ आर्थिक या व्यावसायिक पहलू लेकिन विषम या प्रतिकूल परिस्थितियाँ उत्तम साहित्य, संस्कृति और विभिन्न कलाओं के विकास के लिए भी कम उपयोगी आधार प्रस्तुत नहीं करतीं।

 

समस्याएँ या कठिनाइयाँ जीवन का स्वाभाविक क्रम है। ये समस्याएँ प्राकृतिक भी हो सकती हैं और मनुष्य निर्मित भी। अकाल, बाढ़, भूकंप, महामारी, जंगलों की आग, ज्वालामुखी विस्फोट, तूफान और अब अंत में प्रचंड सूनामी लहरों का ताण्डव आदि न जाने कितनी प्राकृतिक आपदाओं से मनुष्य अपने आरंभिक काल से ही दो-चार होता रहा है। आज वैज्ञानिक प्रगति के युग में असावधनीवश भी अनेक आपदाएँ देखी जा सकती हैं। एयरक्रैश, रेल, बस या अन्य साधनों की दुर्घटनाएँ, गैसों का रिसाव, बड़ी बिल्डिंगों तथा औद्योगिक इकाइयों में आग व विस्फोट तथा और न जाने कितनी तरह की दूसरी दुर्घटनाएँ घटित होती ही रहती है।

 

दूसरे विश्वयुद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए बम प्रहारों को कौन भूल सकता है लेकिन विध्वंस के मलबे से एक नये शक्तिशाली, प्रगतिशील और विकसित औद्योगिक जापान का उदय हुआ। खूबसूरत टाइटैनिक के जलसमाधि लेने से इस क्षेत्र की उन्नति पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ा अपितु टाइटैनिक से अच्छे जलयान तैयार किये गए। किसी भी स्पेसशटल के दुर्घटनाग्रस्त या नष्ट होने से अंतरिक्ष कार्यक्रमों में और तेजी ही आई है।

 

सुनामी हादसे को ही लीजिए। इसकी विनाशलीला जहाँ हमें भविष्य के प्रति आशंकित और आतंकित करती है, एक अनजाने भय में जकड़ती है, वहीं कुछ लोग इसमें अपार संभावनाएँ भी तलाशते हैं। एक बात तो निश्चित है कि पूरे घटनाक्रम ने सारे भेद-भाव भुलाकर एक बार तो सारे विश्व को नजदीक ला ही दिया है। संभव है यही संदेश देने के लिए प्रकृति ने इतनी बड़ी विनाशलीला रची हो। वैसे भी संसार के समस्त लोगों की सामूहिक सोच का ही परिणाम होती हैं प्राकृतिक आपदाएँ। जब सामूहिक सोच अत्यंत विकृत होकर सघन हो जाती है तब प्रकृति व्यग्र होकर इस प्रकार की आपदाओं को अंजाम देने के लिए विवश हो जाती है। यदि इन घटनाओं के पीछे छुपे संदेश को हम देख सकें और उस पर अमल कर सकें तो संभव है इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति ही न हो। अब यही अमल कई रूपों में प्रकट होगा। कहीं सुनामी पीड़ितों के लिए करुणा के रूप में कहीं सहायता के रूप में तो कहीं विकास योजनाओं द्वारा निर्माण के रूप में। सोच में यही सकारात्मक परिवर्तन कला है और जो घटित हो चुका है वह सृजन की प्रसव-पीड़ा। प्रसव-पीड़ा के बाद नया सृजन अवश्यंभावी है।

 

यदि मनुष्य, समाज या राष्ट्र चाहे तो विनाश को विकास में तथा अकाल को कला में परिवर्तित करना असंभव नहीं। विश्व के तमाम देशों में जहाँ भी प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं वहाँ की सरकारें तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए नये-नये विकास कार्यों की शुरूआत करती हैं। यदि हम इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो हमें ऐसे असंख्य उदाहरण देखने को मिलते हैं जब प्रतिकूल परिस्थितियों में रोजगार के साथ-साथ कलाओं की भी उन्नति हुई विशेष रूप से स्थापत्य कला की।

 

नवाबों का शहर लखनऊ और लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा इसका जीता जागता उदाहरण है। बड़ा इमामबाड़ा जिसे भूल-भुलैया के नाम से भी जाना जाता है स्थापत्य का अद्वितीय नमूना है। इस मशहूर इमामबाड़े का निर्माण सन् 1784 में हुआ और निर्माण कराया लखनऊ के तत्कालीन नवाब आसफुद्दौला ने। आसफुद्दौला एक रहमदिल इंसान और दानी व्यक्ति भी थे। कहते हैं आसफुद्दौला ख़रबूजों में मोती भर-भर कर ग़रीबों में तक्सीम किया करते थे। उनकी इसी फितरत के कारण लखनऊ में एक कहावत मशहूर हो गई थी कि ''जिसको न दे मौला उसको दे आसफुद्दौला।'' इन्हीं आसफुद्दौला ने बड़े इमामबाड़े का निर्माण करवाया था।

 

बड़े इमामबाड़े के निर्माण की पृष्ठभूमि ये है कि आसफुद्दौला के शासनकाल में अवध में एक बार भीषण अकाल पड़ा। लोगों को रोजगार मुहैया कराने के मकसद से इस अज़ीम इमारत की तामीर शुरू की गई। इमारत की तामीर का काम दिन-रात चौबीसों घंटे चलता था ताकि रात में वे शरीफ लोग भी यहाँ काम कर सकें जो दिन के उजाले में ऐसा काम करने में शर्म महसूस करते थे। लखनऊ ठहरा नवाबों का शहर। कोई बड़ा नवाब तो कोई छोटा नवाब। अब नवाब साहब दिन में मजदूरी करने से तो रहे। हाँ, रात की बात अलग है। तो सब लोगों के रोजगार का ध्यान करके ही निर्माण कार्य रात-दिन चालू रखा गया।

 

अपनी विशिष्ट बनावट और विशालता के लिए प्रसिद्ध इस भवन का नक्शा बनाया था ईरान के एक वास्तुशिल्पी मुहम्मद किफायतुल्लाह ने। इसके स्तंभहीन मेहराबदार विशाल कक्ष के बीचोंबीच स्थित है आसफुद्दौला की मजार और ऊपरी मंजिल पर भूल-भुलैया। भूल-भुलैया में असंख्य दरवाजे हैं और प्रवेश करने के बाद लोग अक्सर रास्ता भूल जाते हैं इसी कारण इसका नाम पड़ गया भूल-भुलैया। इमामबाड़े की दीवारों की मोटाई सोलह फिट है। इसी से पूरी इमारत की विशालता का अंदाजा लगाया जा सकता है और ये अंदाजा भी कि कितने लोगों को इससे रोजगार मिला होगा।

 

ताजमहल और मुग़लकालीन दूसरी इमारतों के निर्माण में भी कम लोगों को रोजगार नहीं मिला होगा? ताजमहल के निर्माण में ही बीस हजार लोगों ने बीस साल तक कार्य किया तब कहीं जाकर यह विश्व प्रसिद्ध मकबरा अस्तित्व में आया। लेकिन ताजमहल को वो सम्मान प्राप्त नहीं जो इमामबाड़े या इसी तरह की दूसरी इमारतों को प्राप्त है क्योंकि ताजमहल के निर्माण का उद्देश्य व्यक्तिगत प्रेम की अभिव्यक्ति और स्वयं के अहम् की तुष्टि ही रहा है। ताजमहल देखने के बाद तभी सुमित्रानंदन पंत ने कहा है :

 

हाय! मृत्यु का ऐसा अमर अपार्थिव पूजन?
जब विष्ण्ण निर्जीव पड़ा हो जग का जीवन!

 

'साहिर' लुधियानवी भी अपनी प्रेमिका से ताजमहल पर मिलने की बजाय कहीं और मिलने को कहते हैं क्योंकि :

 

इक शहनशाह ने दौलत का सहारा लेकर,
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मजाक

मेरी महबूब! कहीं और मिलाकर मुझसे।

 

कहने का अर्थ ये है कि एक शाहकार के रूप में ताजमहल की प्रशंसा तो की जा सकती है ताजमहल के निर्माण की नहीं।

 

लखनऊ में बड़े इमामबाड़े के निर्माण के लगभग एक शताब्दी बाद ऐसा ही एक निर्माण पुणे में हुआ और यह था सन् 1892 में आगाख़ाँ पैलेस का निर्माण। आग़ाख़ाँ पैलेस का निर्माण सुल्तान मुहम्मदशाह आग़ाख़ाँ तृतीय ने अपने निवास के रूप में करवाया था। बाद में 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में गाँधी जी और कस्तूरबा के साथ महादेव भाई देसाई, सरोजिनी नायडू तथा मीराबेन ;मैडलीन स्लेड, आदि स्वतंत्रता सैनानियों को यहाँ नशरबंदी की हालत में रखा गया था। इसी दौरान यहाँ पर महादेव भाई देसाई और कुछ समय बाद कस्तूरबा का देहांत हो गया और आग़ाख़ाँ साहब ने उनके दाह-संस्कार के स्थान पर उनकी समाधियाँ निर्मित कराईं।

 

आग़ाख़ाँ तृतीय ईरान के ख़ोजा इस्माइली संप्रदाय के 48वें आध्यात्मिक गुरु थे। वे अपने मत के प्रचार के लिए भारत और पुणे में आते रहते थे। पुणे में उन्होंने अपने निवास स्थान के रूप में इस पैलेस का निर्माण करवाया लेकिन निर्माण के पीछे एक अन्य उद्देश्य भी रहा है। उन दिनों उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में इस पूरे क्षेत्र में अनेक बार अकाल पड़ा और महामारियाँ फैलीं। वस्तुत: लोगों को रोजगार देने के उद्देश्य से ही इस विशाल प्रासाद का निर्माण प्रारंभ कराया गया था। इसके बनने में पाँच वर्ष का समय लगा तथा हजारों लोगों को यहाँ काम दिया गया। इस प्रासाद के निर्माण पर उस समय बारह लाख रुपये खर्च हुए।

 

वर्ष 1894 में वहीं पुणे में लोकमान्य तिलक ने जनजागरण तथा राष्ट्रीय जागरण हेतु गणेशोत्सव तथा शिवाजी उत्सव मनाने की शुरूआत की। तिलक ने धर्म के माध्यम से सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना का विकास किया। वही कार्य आग़ाख़ाँ साहब ने भी किया। निर्माण कार्य प्रारंभ कर अकाल और दुर्दशाग्रस्त मानवता को राहत पहुँचाई। वस्तुत: अकाल, महामारी अथवा अन्य प्राकृतिक आपदाओं के समय लोगों की सहायता करना ही सच्चा धर्म हो सकता है। और यदि इन प्रतिकूल परिस्थितियों का उपयोग धर्म प्रचार के उद्देश्य से किया जाता है तो वह धर्म ही नहीं है। सभी मतों और सिद्धान्तों को एक ओर रखकर मानव मात्र की सेवा ही सच्चा धर्म हो सकता है। इसी उद्देश्य से किये गए निर्माण कार्य कला के उत्कृष्ट नमूने भी अवश्य होंगे।

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सीताराम गुप्ता

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रचनाकार: ''अकाल में कलाओं का विकास''
''अकाल में कलाओं का विकास''
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