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राहुल उपाध्याय की चंद फ़्यूज़न कविताएँ

image

(राहुल उपाध्याय )

कुलदीप

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ये कुलदीप ये cool dude
कमाल का इनका attitude


गुलाब जामुन और चाँकलेट
आलू पराठा और ऑमलेट
ये है इनके pet food
ये कुलदीप ये cool dude ...


पढ़ते लिखते दिन और रात
अव्वल आते हर जमात
काश ये होते इतने good
ये कुलदीप ये cool dude ...


संगीत इनका धूम-धड़ाक
बात करते तू-तड़ाक
behavior
इनका very crude
ये कुलदीप ये cool dude ...


सुबह से हो जाता शुरू
TV
जो इनका है गुरू
मार्गदर्शक इनका hollywood
ये कुलदीप ये cool dude ...


दिल को लगे ठेस सी
देख के इनकी प्रेयसी
लोग कहते हम हैं prude
ये कुलदीप ये cool dude ...


नाम के होते हैं parents
जो pay करते हैं इनके rent
और बदले में चाहे gratitude
ये कुलदीप ये cool dude ...


कपड़े इनके कटे-फ़टे
दुनिया से रहते कटे-कटे
डाल के सर पे अपने hood
ये कुलदीप ये cool dude ...


आने-जाने पे नहीं है रोक
खाने-पीने पे नहीं है रोक
फिर भी मांगे और latitude
ये कुलदीप ये cool dude ...

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21 वीं सदी


डूबते को तिनका नहीं 'lifeguard' चाहिये
'graduate' को नौकरी ही नहीं 'green card' चाहिये


खुशीयाँ मिलती थी कभी शाबाशी से
हर किसी को अब 'monetary reward' चाहिये


जो करते हैं दावा हमारी हिफ़ाज़त का
उन्हे अपनी ही हिफ़ाज़त के लिये 'bodyguard' चाहिये


घर बसाना इतना आसान नहीं इन दिनों
कलेजा पत्थर का और हाथ में 'credit card' चाहिये


'blog, email' और 'groups' के ज़माने में
भुला दिये गये हैं वो जिन्हे सिर्फ़ 'postcard' चाहिये

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भद्रलोक


गम गलत करने को 'कोक' हैं पीते
कुछ इस तरह भद्रलोक हैं जीते


जहॉ भी जाते
VEGETARIAN
ही खाते
और WATER WITHOUT ICE हैं पीते
कुछ इस तरह ...


चाहे पीले आम का रस
चाहे पीले संतरे का रस
जीवन तो बस नीरस हैं जीते
कुछ इस तरह ...


मिलेंगी दुल्हन
तो मिटेंगी उलझन
इसी आस में कई सावन हैं बीते
कुछ इस तरह ...


कर के मंदिरों के दर्शन
करा के घर में कीर्तन
समझते हैं खुद को ईश्वर के चहीते
कुछ इस तरह ...


न दुनिया की समझ
न अपनो की परख
सब कुछ हार के भी ये हैं जीते
कुछ इस तरह ...

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क़हर


पहले भी बरसा था क़हर
अस्त व्यस्त था सारा शहर
आज फिर बरसा है क़हर
अस्त व्यस्त है सारा शहर


बदला किसी से लेने से
सज़ा किसी को देने से
मतलब नहीं निकलेगा
पत्थर नहीं पिघलेगा


जब तक है इधर और उधर
मेरा ज़हर तेरा ज़हर
बुरा है कौन, भला है कौन?
सच की राह पर चला है कौन


मुक़म्मल नहीं है कोई भी
महफ़ूज़ नहीं है कोई भी
चाहे लगा हो नगर नगर
पहरा कड़ा आठों पहर


न कोई समझा है न समझेगा
व्यर्थ तर्क वितर्क में उलझेगा
झगड़ा नहीं किसी दल का है
मसला नहीं आजकल का है


सदियाँ गयी हैं गुज़र
हुई नहीं अभी तक सहर
नज़र जाती है जिधर
आँख जाती है सिहर


जो भी जितना शूर है
वो भी उतना क्रूर है
ताज हैं जिनके सर पर
ढाते हैं वो भी क़हर


आशा की किरण तब फूटेंगी
सदियों की नींद तब टूटेंगी
ताजा हवा फिर आऐंगी
दीवारें जब गिर जाऐंगी


होगा घर जब एक घर
न तेरा घर न मेरा घर

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ला-इलाज मर्ज़


 

बाबुल चाहे सुदामा हो
ससुराल चाहे सुहाना हो
नया रिश्ता जोड़ने पर
अपना घर छोड़ने पर
दुल्हन जो होती है
दो आँसू तो रोती है


और इधर हर एक को खुशी होती है
जब मातृभूमि संतान अपना खोती है
क्यूं देश छोड़ने की
इतनी सशक्त अभिलाषा है?


क्या देश में
सचमुच इतनी निराशा है?
जाने कब क्या हो गया
वजूद जो था खो गया
ज़मीर जो था सो गया
लकवा जैसे हो गया


भेड़-चाल की दुनिया में
देश अपना छोड़ दिया
धनाड्यों की सेवा में
नाम अपना जोड़ दिया
अपनी समृद्ध संस्क्रिति से
अपनी मधुर मातृभाषा से
मुख अपना मोड़ लिया


माँ बाप का दिया हुआ
नाम तक छोड़ दिया
घर छोड़ा
देश छोड़ा
सारे संस्कार छोड़े
स्वार्थ के पीछे-पीछे
कुछ इतना तेज दौड़े
कि न कोई संगी-साथी है
न कोई अपना है


मिलियन्स बन जाए
यहीं एक सपना है
करते-धरते अपनी मर्जी हैं
पक्के मतलबी और गर्जी हैं
उसूल तो अव्वल थे ही नहीं
और हैं अगर तो वो फ़र्जी है


पैसों के पुजारी बने
स्टाँक्स के जुआरी बने
दोनों हाथ कमाते हैं
फिर भी क्यूं उधारी बने?
किसी बात की कमी नहीं
फिर क्यूं चिंताग्रस्त हैं?


खाने-पीने को बहुत हैं
फिर क्यूं रहते त्रस्त हैं?
इन सब को देखते हुए
उठते कुछ प्रश्न हैं


पैसा कमाना क्या कुकर्म है?
आखिर इसमें क्या जुर्म है?
जुर्म नहीं, यह रोग है
विलास भोगी जो लोग है
'पेरासाईट' की फ़ेहरिश्त में
नाम उनके दर्ज है


पद-पैसो के पीछे भागना
एक ला-इलाज मर्ज़ है

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HYPOCRISY


 

1
न मांग में सिन्दूर है
न गले में मंगल-सूत्र है
और शिकायत ये
कि भारतीय संस्कृति
स्वीकारता नहीं सुपुत्र है


2
मेरा ये विचार है
कि भारत का विकास हो
सम्पन्न हो खुशहाल हो
रोजी-रोटी सबके पास हो
सुनते ही कि DOLLAR गिर गया
सारा बुखार उतर गया
इन्तज़ार है उस दिन का
जब एक DOLLAR में
मिलते रुपये पचास हो


3
भई सच पूछो तो
AMERICA में भेद-भाव है
और उपर से झेलने
अनगिनत उतार-चढ़ाव है
जो नौकरी आज है वो कल नहीं
चिन्ता रहती है हर पल यही
अब तो भारत में भी नौकरिया ढेर हैं
और मां-बाप के भी कबर में पैर है
सोचता हूं हिन्दुस्तान में बस जाऊ
बस पहले AMERICAN CITIZEN बन जाऊं


4
दस SECOND के दर्शन से
भाग्य हमारे खुल जाएंगे
नदी के ठन्डे पानी से
पाप हमारे धुल जाएंगे
पंडित और पुजारी
जो हमें ये समझाते हैं
नदी-मन्दिर छोड़ के
खुद ही भाग जाते हैं
AMERICA के MAKESHIFT मन्दिर में
GREENCARD-धारी पुजारी बन जाते हैं

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संपर्क : रचनाकार राहुल उपाध्याय का परिचय व अन्य रचनाएँ देखें उनके हिन्दी चिट्ठे बस शब्द और उधेड़बुन में

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5 टिप्पणियाँ

  1. हिंदी में अन्ग्रेज़ी हिज्जों का इस्तेमाल कर कृपया अपनी लिपि का सत्यानाश करने की कोशिश न करें.

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत खूब्……भाव अमूल्य हैं……।

    जवाब देंहटाएं
  3. हिंदी में अंग्रेजी के शब्द भण्डार में सेंध लगाकर आपने हिंदी को समृद्ध ही किया है. अंग्रेजी को इसी तरह खाली करते रहिए. एक दिन वो फ़कीर हो जायेगी और हिंदी रानी, महारानी. उसी दिन की प्रतीक्षा है. बधाई.

    अविनाश वाचस्पति

    जवाब देंहटाएं
  4. ईष्ट देव जी, अविनाश जी,

    फ़्यूजन का अर्थ ही यही है. प्रयोगधर्मी रचनाएँ आलोचनाओं का शिकार बनती ही हैं.

    आप देखेंगे कि 'कुलदीप कूल ड्यूड' में सुंदरता देवनागरी और रोमन लिपि के सम्मिश्रण के कारण बढ़ गई है.

    और, ऐसे प्रयोग नए नहीं है. समाचार पत्रों में, दैनिक भास्कर में तो शीर्षक रविवारी भास्कर में Sunday लिखा हुआ आता है!

    वैश्विकता से आप बच नहीं सकते.
    -रविरतलामी

    जवाब देंहटाएं
  5. hindi me aapne likha kya khub hai
    ab to english padhkar lagta hai hum bewakooph hai
    hindi me jo mithas hai hame lagta hai aap ko iski pyaas hai.
    are piina to humbhi chahte hai is rus ko par kya kahe,
    english padhkar lagta hai mit gayi ye pyaas hai.


    ravi raj
    (manjil ki talash me)

    जवाब देंहटाएं

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