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देश में बड़ा दम, वंदे मातरम

vande mataram

-सलीम खान

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जंग की वजह पूछे जाने पर चर्चिल ने कहा कि सभी युद्ध बेवजह और बेमकसद होते हैं। वज़ह और मकसद सोचने का माद्‌दा हो तो तर्कहीन युद्ध कभी नहीं हो। जीवन तर्क है और जंग तर्कहीनता। आतंक वाद भी बेवज़ह और बेमकसद है। कुछ दिन और रेंग सकता है परन्तु ये लड़ाई हम जीत गये हैं। ये कोई नजूमी या भविष्यवक्ता की बात नहीं है और किसी आलसी का आधी रात को देखा ख्वाब भी नहीं है। इसके ठोस आधार हैं इसमें शामिल लोकल लोगों का पश्चाताप जो मुंबई बम धमाकों के फैसले के समय उभरकर सामने आ रहा है कि हर मुज़रिम ने अफसोस ज़ाहिर करते हुए इसमें बरगलाए जाने की खता को माना है। उनकी जहालत और मुफलिसी का फायदा उठाया गया है। इन धमाकों का सबसे ज्यादा असर आवाम की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है और अब वह आजिज आ गया है। हमारी जीत का यकीन इसलिए भी है कि इन बम धमाकों के बाद मुल्क में कोई कौमी दंगे नहीं हुए। आतंकवादियों को मुगालता था कि देश बिखर जायेगा परन्तु हुआ ठीक इसके उलटा और हमारी एकता तथा भीतरी ताकत उभरकर आई।

हिन्दुस्तान का वज़ूद इसके रीति-रिवाजों से दमकता है। इसकी मेहमाननवाजी बेमिसाल है और मेहमान को ईश्वर का दर्जा दिया गया है। इस बात पर मुझे एक पुरानी कहानी याद आ रही है। एक बादशाह को घोड़े का बहुत शौक था और उसके अस्तबल में बहुत अच्छी नस्ल के शानदार कई घोड़े थे। एक दिन शिकार पर जाते हुए उसने एक घुड़सवाल नौजवान को देखा और उसके घोड़े पर आशिक हो गए। कलंदर नामक उस नौजवान को तलब किया गया। उस नौजवान को भी अपने घोड़े से बेइंतहा मोहब्बत थी। कलंदर ने कहा कि दुनियाभर की दौलत भी मिलें तो वह अपना घोड़ा नहीं बेचेगा। बादशाह को परेशान देखकर उसके वज़ीर ने कहा कि कलंदर मेहमान को ईश्वर मानता है। आप भेष बदलकर जाएं तो आपकी मुराद पूरी हो सकती है। बादशाह ने वैसा ही किया और तीन दिन तक उसके घर रहे। रुखसत लेते समय कलंदर ने उनसे कहा कि अगर मेज़बानी में कोई कमी रह गई हो तो उसे माफ कर दें और उसने यह भी पूछा कि वह अपने मेहमान के लिए क्या कर सकता है। मेहमान के लिबास में आए बादशाह ने उससे घोड़ा मांगा। कलंदर ने अपने करम ठोके और नीचे बैठ गया। बाद शाह हैरान थे। कलंदर ने कहा कि उनके आने पर उसके घर में खिलाने को कुछ नहीं था और मेहमान की खिदमत उसका फर्ज है। उसने घोड़ा मारकर उन्हें खिला दिया।

मेहमान नवाज़ी के इस देश में आतंकवादी मेहमान बनकर आते हैं और धोखा देते हैं। हिन्दुस्तान के रीति-रिवाज और संस्कारों की दुनिया में कोई सानी नहीं। मुंबई में रेल धमाकों के समय सभी धर्मों के आम आदमी ने घायलों की मदद की और अमन पसंद आम आदमी का चेहरा भीड़ में उभरकर सामने आया। अब वह भीड़ का हिस्सा या जूनियर कलाकार नहीं है वरन्‌ राष्ट्र का नायक है। देश में है, वंदे मातरम्‌। सुलेमान ने बेसाख्ता कहा कि बात में है दम, वंदे मातरम्‌। मैं जब भी सोचता हूं या लिखने बैठता हूं, यह अदृश्य आम आदमी मेरे सामने बैठा सा महसूस होता है। मैं घर या अपने फार्म हाउस के किसी भी कोने में लिखने बैठूं यह आम आदमी मेरे सामने होता है। मुझे घूरता है, डांटता है, मेरे लिखे हुए की धज्जियां उड़ा देता है और कभी-कभी मेरी तारीफ भी करता है। कभी इसका नाम सुलेमान होता है, कभी अन्ना, कभी भाई, कभी सांई, कभी भजनसिंह तो कभी बाबू मोशाय। न जाने कब और कैसे ये मेरी रुह का हिस्सा हो गया । शायद यह मेरी तरह सभी लेखकों, संपादकों और फिल्मकारों के जेहन में मौज़ूद है। इस बेचारे को नेता अपने पास नहीं आने देते। किसी भी तानाशाह या हाकिम को आम आदमी की ताकत का अंदाजा नहीं होता, और न ही आम आदमी को अपनी ताकत का अहसास होता है।

सुलेमान भी आम आदमी है ओर आप उसे अच्छी तरह जानते हैं। कभी उसने एक प्लंबर की शक्ल में आपका नल सुधारा है तो कभी इलेक्टीशियन की शक्ल में फयूज जोड़ा है तो कभी रिक्शे में आपको घर छोड़ा है। जिस तरह वह आपको हर मोहल्ले और नुक्कड़ में किसी न किसी रूप में मिलता है, उस तरह उसकी बदनसीबी कभी-कभी उसे मुल्क के दुश्मनों से मिला देती है। आतंकवाद अंदरुनी मदद के बिना कामयाब नहीं हो सकता। लालच देकर लोकल आदमी की मदद ये दरिंदे हासिल करते हैं और कई बार उसे शहादत की अफीम भी चटा देते हैं। अब वह आम आदमी समझ गया है कि यह लड़ाई सच्चाई की लड़ाई नहीं वरन्‌ सिर्फ ज़हालत, पैसे और नफरत की लड़ाई हैं। इसमें कोई शहादत नहीं है। दरअसल यह नाम सुलेमान मेरे जहन में फिल्मकार मनमोहन देसाई के कारण आया। देसाई ने आम दर्शक का नाम सुलेमान रखा था। उसका अकीदा था कि फिल्म आलोचक की राय से नहीं चलती, आम आदमी की पसंद से चलती है। नामहीन, चेहराविहिन आम आदमी के नुमाइंदे को सुलेमान इसलिए भी कहता हूं कि मैं इस नाम के एक शख्स से मिल चुका हूं।

सुलेमान के पिता कब्र खोदने का काम करते थे और उसकी पत्नी उसका साथ देती थी। धूल, मिट्‌टी और धूप में साल दर साल कब्र खोदते-खोदते वे बीमार पड़ गए। उनका छह साल का इकलौता बेटा सुलेमान कब्रगाह में ही खेलता था और पासही मस्जिद के अहाते में बैठे कबूतरों से उनकी दोस्ती थी। मुफलिसी और थकान से चूर मां-बाप की मौत के बाद अनाथ सुलेमान को बाबूलाल सुतार की मां ने अपने बच्चे की तरह पाला। बाबू लाल के दो बड़े भाई नकली शराब के शिकार हुए थे। एक ही दिन घर से दो जवान बेटों की अर्थी उठी थी और गम के इस बोझ को वही औरत उठा सकती है जो अपने बच्चों का बोझ नौ महीने उठाती है। मां ने सुलेमान और बाबूलाल से यह वादा लिया कि वह शराब कभी नहीं पिएंगे। सुलेमान ने इस वादे को ताउम्र निभाया परंतु बढ़ई के काम को कला के दर्जे तक पहुंचाने वाला बाबूलाल, उन दिनों पीता था जब उसके पास काम नहीं होता था। बाबुलाल और सुलेमान को घर की गाड़ी खींचते एक अरसा गुज़र गया। एक दिन किसी वारदात की जांच के सिलसिले में उसे थाने में तलब किया गया। रात का वक्त था और इंसपेक्टर रूआब खान शराब पी रहे थे। वे शायद बीबी से झगड़ा करके आए थे। सुलेमान ने बेअदब अर्ज किया कि वह एक गरीब मुसलमान है और इस वारदात से उसका कोई ताल्लुक नहीं है। इंस्पेक्टर ने पूछा-कलमा पढ़ना आता है, नमाज़ अदा करते हो। कुरान पढ़ते हो ? सुलेमान ने कहा, हुज़ूर मैं अनपढ़ हूं। कोई बुरा काम नहीं करता, शराब नहीं पीता। इंस्पेक्टर हत्थे से उखड़ गया और उसने सुलेमान को थप्पड़ मारा और कहा, सूअर ताना मारता है, तंग करता है। बंद कर दो साले को। बेगुनाह सुलेमान हवालात में पड़ा रहा। बाबूलाल और उसकी मां ने किसी तरह पैसे इक ट्‌ठे करके उसे रिहा कराया। इस तरह सुलेमान का नाम बेवज़ह ही रिकार्ड में आ गया और उसे बार-बार थाने बुलाया जाने लगा।

परेशान सुलेमान ने मां से इज़ाजत लेकर मुंबई में भाग्य आजमाने का फैसला किया। सुलेमान के पास जायदाद के नाम पर चंद कबूतर थे, जिन्हें वह प्यार करता था। उसने उन्हें दानापानी खिलाकर उड़ा दिया। पांच साल तक वह मुंबई में छोटे-मोटे काम करके गुज़ारा करता रहा। एक दिन उसे खत मिला कि बाबूलाल नहीं रहा। वह फूट फूटकर रोया और मां के गमका ख्याल ने उसे जड़ से हिला दिया। वह तीन बेटे खो चुकी और चौथा समुद्र के किनारे बसे मुंबई में इंसानों की रेलमपेल में खो सा गया है। ग़म कामारा बदहवास सुलेमान दरख्त से सूखे हुए पत्ते के मानिंद गिरा और हवा के रुख पर चलते हुए एक अजनबी से टकराया जिसने उसकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया जो दरअसल हाथ नहीं, एक पंजा था जिसने उसकी मुफलिसी और जहालत को इस तरह जकड़ा, कि सुलेमान उस पकड़ से बाहर तो निकला मगर पांच साल की जेल काटने के बाद। वह जिन लोगों के बीच उठने बैठने लगा, उन लोगों के पास जाने कहां से बेशुमार दौलत आती थी। सुलेमान के हालत भी बदले परन्तु उन्होंने उसका दिमाग भी बदला। एक दिन गेट-वे ऑफ इंडिया के पास एक बम धमाकों का हुआ जिसमें कितने बेगुनाह इनसानों की जान गई ये तो सुलेमान ने नहीं देखा मगर दूसरे दिन अखबार में उस जगह मरे हुए सैकड़ों कबूतर की तस्वीर देखकर उसकी छाती फट गई और वह पागलों की तरह चिल्लाने लगा वह अपना आपा खो चुका था। वह चीखने लगाकि बेरहम दरिंदों इन मासूम परिंदों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था। इन्होंने कौन सी मस्जिद तोड़ी थी ? वह बदहवासी के इसी आलम में सीधा पुलिस स्टेशन पहुंचा और उसने सब कुछ उगल दिया। उसके कुछ साथी पकड़े गए और कुछ भाग गए।

जेल में बिताए पांच सालों में जेल की तकलीफ से ज्यादा पश्चाताप ने उसे तोड़ दिया। इस तरह तिल-तिल बिखरने में कोई बात थी। जो उसे जिंदा रखे थी। ज़ेल से निकलकर सुलेमान सीधा अपनी मां के पास पहुंचा। उसकी मां उसे गले लगाने के लिए आगे बढ़ी। तो सुले मान पीछे हटा और उसने कहा-मां मुझे मत छुना मुझे छूकर अपने हाथ गंदे नहीं करना। सुलेमान ने खिड़की से उस कब्रस्तान को देखा जहां उसका बचपन बीता था। उसने कहां मां मुझे दफन मत करना, मैने इस मिट्‌टी का कर्ज अदा नहीं किया। मैं इस काबिल नहीं कि देश की मिट्‌टी मुझ पर जाया जाएं। मैं उस मिट्‌टी का हकदार मुस्त हिक नहीं हूं। मेरी लाश कहीं फेंक देना जहां चील कौवे खा जाएं। बची हुई ज़िंदगी तेरे कदमों में गुजार दूंगा। वह मां के कदमों की ओर बढ़ा, खांसने लगा और उसने दम तोड़ दिया। मां की आंख से आंसू झरने लगे। मां ने आकाश की ओर देखा। एक कबूतर उड़ रहा था। मां बुदबुदाई उड़ जा मेरे बेटे जा। ये दुनिया गंदी हो गयी है। मेरे कानों में गूंजा इस मुल्क में बड़ा है दम, वंदे मातरम्‌‌।

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(सलीम खान फ़िल्मी दुनिया के जानेमाने लेखक हैं. आलेख साभार हम समवेत )

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