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वीरेन्द्र जैन की चार व्यंग्य रचनाएँ

 

-वीरेन्द्र जैन

Virendra Jain

1 - चंदा वसूलने वालों से प्रार्थना

 

हे चंदायाचक,

तुम्हें (दूर से ही) प्रणाम है।

तुम हमारे घर और दुकान पर पधारे तथा साथ में कुछ ऐसे लोगों को भी साथ में लेकर आए जिनके आगे हमारी बोलती बंद हो जाती है। ऐसे अघोषित आपत्तिकाल एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन पर बयान देने के लिए कोई भी मानव अधिकार आयोग कही भी सक्रिय नहीं है। आपके नक्कारखाने में मेरी तूती की आवाज को कोई सुनने वाला नहीं।

आप धर्मध्वजा के वाहक हैं एवं मैं उस महिला तस्लीमा नसरीन जैसा भी सबल नहीं हूं कि धर्म के नाम पर होने वाले किसी भी किस्म के पांखडों का मुखर प्रतिवाद कर सकूँ। धर्म के नाम पर या राष्ट्रीयता के नाम पर कही पर भी झंडा फहराने के लिए आप आजाद हैं और वह भी विशेष रूप से विवादास्पद स्थानों पर झंडा फहराने या धर्म-ध्वजा ठोंकने से आपकी राष्ट्रीयता और धार्मिकता मजबूत होती हैं। आप किसी भी दिन इस देश के बुद्विजीवियों, पत्रकारों, लेखकों और कलाकारों की खोपड़ी पर धार्मिक व राष्ट्रीय झंडे को ठोकेंगे और उनकी कराह के विरोध में उन पर एक लात जमाकर कहेंगे कि देशद्रोही धर्म और राष्ट्रीयता का विरोध करता हैं, तुझे तो बंगाल की खाड़ी में फेंक देगे।

हे प्रभो, आप जो कुछ कर रहे हैं उसे धर्म कह रहे हैं। आप विश्व के प्राचीनतम धर्म के वारिस होने का दावा करते हैं, भले ही जो कुछ आप आज कर रहे हैं धर्म के नाम वैसा किए जाने के प्रमाण आज से बीस वर्ष पूर्व भी प्राप्त नहीं होते हों। ऐसा करने के लिए आप हमारे पास साधिकार चंदा मांगने आये। आप धर्म करेंगे तो आपका स्थान स्वर्ग में सुरक्षित रहेगा। मेरे पैसे पर आप स्वर्ग में अपना आरक्षण करा रहे हैं ओर मेरे लिए जीते जी नर्क तैयार कर रहे हैं।

मान्यवर, आपने उत्सव का कार्यक्रम बनाया, तब हमें नहीं पूछा। आपने समिति का निर्माण किया तब हमें नहीं पूछा। आप अध्यक्ष बन गए, सचिव बन गए, कोषाध्यक्ष बन गए तब भी हमें नहीं पूछा। हमारा धार्मिक कर्तव्य केवल चंदा देने तक सीमित हैं और आपका अध्यक्ष तथा सचिव पद प्राप्त करने के लिए है। आप अपने कार्यक्रम में सत्तारूढ़ दल के नेताओं, मंत्रियों, आई-ए-एस- अधिकारियों एवं कष्ट पहुँचाने की क्षमता रखने वाले निरीक्षकों को आमंत्रित करेंगे, मेरे पैसे पर खरीदी हुई पुष्प मालाओं से आप उनका अभिनंदन करेंगे, फोटो खिचवाएंगे तथा हम ताली बजाएंगे। यह हमारा धार्मिक कर्तव्य हैं और वह आपका।

आपके संबंध ऊपर तक बनेंगे और आपको सामाजिक आर्थिक लाभ देंगे पर आपके उत्सवों के कोलाहल से मेरे बच्चे अध्ययन से वंचित रहेंगे तथा उनका कैरियर नष्ट होगा। ऐसा होने से आपके पहुँचवाले बच्चों को और अधिक सुविधा होगी। आपके फोटो अखबारों में छपेंगे जिससे आपका प्रचार होगा, आप चुनाव जीतेंगे, पद प्राप्त करेंगे, जिससे हमें पददलित कर सकें।

हमने जब प्लेग की आशंका में अपने पड़ोस को सामूहिक श्रमदान से सफाई का अनुरोध किया था तो आप मेरे ऊपर मुस्कराए थे तथा आपके चम्मचों ने मेरे उपर खिलखिलाकर मेरी खिल्ली उड़ाई थी। मैं शर्मिंदगी के महासागर में डूब गया था। तरस खाकर पत्नी ने मेरे नहाने के पानी में दो-तीन बूंदे डिटोल डालने की अनुकंपा की थी। वह एक बूंद डिटोल की कंजूसी करती हैं, तुम 501/- रूपये वसूल रहे हो।

महामहिम, तुम्हें महंगाई की फिक्र नहीं हैं क्योंकि तुम उससे लाभान्वित हो, तुम्हें मिलावट की चिंता नहीं हैं क्योंकि वह तुम तक नहीं पहुँचती। आर्थिक भ्रष्टाचार व सामाजिक शोषण के प्रति तुम उदासीन हो, सरकारी कार्यालयों में तुम्हारा प्रभाव हैं तथा नौकरशाही के भ्रष्टाचार से तुम मुक्त हो। उत्सव आयोजनों में हमारे पैसे से आमंत्रित अतिथियों को तुमने समुचित प्रभावित कर रखा है। वे तुम्हारा कार्य तुरंत कर देते हैं।

धर्म की करूणा, दया, सच्चाई, प्रेम, सहायता, सहयोग, आभार, कृपा आपमें से सब गायब है। आपकी तरेरी हुई आँखें, ऐंठी हुई मूंछें, भुजाओं पर खेलती हुई मछलियों, मुक्का ठोकती मुट्ठियों तथा पीसे हुए दांत आपकी मुद्राओं का निर्माण करते हैं। इसके साथ साथ मेरी धर्मभीरूता, अदृश्य का आतंक तथा उसके साथ आपके धार्मिक सबंधों का डर मुझे अपने बच्चों का पेट काटकर अपनी कमाई को आपको सौंप देने को बाध्य करते हैं।

हैं राष्ट्र हितैषी, तुम नगर के प्रमुख मार्गों पर अस्थाई अतिक्रमण करके सैकड़ों मार्ग अवरूद्व करने जा रहे हो। जिससे मार्ग बदलने के कारण जाम लग जाने से लाखों लीटर पेट्रोल, जिसकों आयात करने के लिए हमें विदेशी मुद्रा फूंकनी पड़ती हैं, फुंक जाता है। आपके इस अभियान से दफ्तरों, अदालतों और अस्पताल जाने वालों को आपके धर्म से कितनी सहानुभूति मिल रही है? काश, आपने इसका सर्वेक्षण कराया होता !

अशिक्षित महिलाएं, रिटायर्ड वृद्व, निठल्ले प्रौढ़ तथा बेरोजगार दिशाहीन युवकों के बल पर चल रहा है आपका धर्मोत्सव।

आप ले जाइए और यदि भगवान से आपके सीधे संबंध हों तो कृपया मेरे लिए एक प्रार्थना अवश्य कीजिए कि मुझमें तस्लीमा नसरीन जैसा आत्मबल पैदा हो। मुझ केंचुए को एक रीढ़ प्रदान करने की कृपा करें हे प्रभु!

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2-धर्म में धन

इन दिनों अपराध की सर्वाधिक सूचनाएं उन क्षेत्रों से आ रही हैं जिन्हें समाज में धार्मिक संस्थाएं माना जाता है। इन संस्थाओं पर आम लोगों का विश्वास बना हुआ है जिसका दुरुपयोग लगातार हो रहा है। धर्म के इस अपराधीकरण के पीछे धार्मिक संस्थाओं के साथ धन का जुड़ाव है।

एक दार्शनिक के अनुसार यदि कोई व्यक्ति शाम के खाने की भी चिंता करता है तो वह सन्यासी नहीं हो सकता क्योंकि उसकी चिंता उसके ईश्वर में अविश्वास की सूचना देती है। जो तथाकथित सन्यासी धन जोड़ता है वह सामान्यजन ही है जो भिन्न रूप धारण किये हुये फिरता है और वह विशिष्ट सम्मान का अधिकारी नहीं हो सकता। इसीलिये सन्यास लेने वाले को घर छोड़ना होता था,जिसका अर्थ अपनी बनाई सुरक्षा से ईश्वर की शरण या सुरक्षा में जाना होता था।

पर आज का सन्यासी घर छोड़ता है और आश्रम बनाने लगता है। आश्रम में भी वे ही ईंटें, वही पत्थर,सीमेंट, लोहा,संगमरमर लगता है जो घर में लगता है। उसे भी वे ही आर्कीटैक्ट, इंजीनियर और मजदूर तैयार करते हैं। फिर घर और आश्रम में फर्क क्या हुआ। घर के साथ साथ व्यक्ति धन सम्पत्ति भी छोड़ता है और परिवार भी छोड़ता है पर शिष्य शिष्याएं बनाने की फिकर में लगा रहता है। असल में यह अपने वर्तमान से घबरा कर अपनी वृत्तियों का नाम परिवर्तन भर है। ऐसा करके वह सारी दुनिया को तो धोखा देता ही है साथ में अपने आप को भी धोखा देता है।

आज के इन आश्रमों के पास अटूट धन सम्पत्ति है और उनका संचालन सीधे मठ के महंत बाबाओं के हाथ में है जो घर परिवार का त्याग कर आने के नाम पर अपनी विशिष्ट स्थिति बनाये हुये हैं और कई मामलों में तो वे बकायदा मुकदमे भी लड़ रहे हैं। अगर यह सम्पत्ति उनके चरणों में प्रसाद की तरह चढ़ा दी गयी है तो वे उसे प्रसाद की तरह बांट क्यों नहीं देते। आश्रम के संत सुरक्षा की दृष्टि से ही बैंक खाता नहीं खोलते अपितु वे फिक्सड डिपाजिट में और म्यूचल फन्ड में इनवैस्ट करते हैं। उनके पास उक्त धन को समाज हित में लगाने की कोई तात्कालिक योजना नहीं होती फिर भी वे उसे ग्रहण कर संग्रहीत करते हैं। आज के आश्रमों में घट रही अपराध घटनाओं के पीछे इसी संग्रहीत धन की विशिष्ट भूमिका है।

आश्रमों की घटनाओं के पीछे दूसरा सबसे बड़ा कारण ब्रम्हचर्य का झूठा मुखौटा है। वे अपने आप को ब्रम्हचारी दर्शाते हैं पर वे यथार्थ में ब्रम्हचर्य को उपलब्ध नहीं हुये होते हैं। केवल आश्रम और उसके धन पर अधिकार करने के जिये वे उसका आवरण ओढ़े रहते हैं। यह ऐसा ही है जैसे कोई झूठे प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी करता हो। ये ही कमजोरियां समय समय पर सामने आती रहती हैं।

सरकार द्वारा आश्रमों को दिये गये दानों पर आयकर में छूट देना एक बड़ी भूल है। इसने आश्रमों के चरित्रों को बदल कर रख दिया है। यदि यह छूट देने वाले यह समझते हों कि उनने अपनी ओर से कोई बड़ा धार्मिक कार्य कर दिया है तो यह भी एक बड़ी भूल है। जो पैसा कोई व्यक्ति धार्मिक कार्य के लिये देना चाहता था उसमें से आधा हिस्सा तो वह टैक्स बचा व उसका आर्थिक लाभ प्राप्त कर उसे अधार्मिक कार्य में बदल लेता है। इसका दोष तो उसे ही लगेगा जो किसी भ्रम में यह सुविधा दे रहा है। अब कम से कम इसमें यह शर्त जोड़ी जा सकती है कि उक्त राशि को आवश्यक रूप से सम्बन्धित वर्ष में खर्च होना चाहिये अन्यथा उसे प्रधानमंत्री कोष के लिये वापिस ले ली जायेगी। कैसी अधार्मिक और अमानवीय स्थिति है कि अरबों रूपयों का जमा कोष रखने वाले व दान दाताओं को लाखों का टैक्स लाभ दिलाने वाले धार्मिक संस्थान भी भूकंप, बाढ, आकाल, साम्प्रदायिक हिंसा, दुर्घटनाओं आदि के लिये एक कौड़ी भी खर्च करने की जरूरत नहीं समझते और फिर भी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सरकार उनके कोषों में वृद्धि के लिये उन्हें धन दिलाने में जुटी है और यह भी नहीं पूछना चाहती कि वे इस धन का कब क्या करने जा रहे हैं जबकि किसी सांस्कृतिक संस्था को छोटी सी राशि उपलब्ध कराने पर उससे पचासों तरह के सवाल किये जाते हैं।

इन धार्मिक संस्थाओं को मिलने वाला यह पैसा देश में कानून और व्यवस्था के लिये भी संकट पैदा करता रहता है। स्वर्ण मन्दिर में आतंकवादियों ने छुप कर न केवल देश को बड़ी क्षति पहुंचायी है अपितु स्वर्णमन्दिर और बलिदानी सिख कौम के सम्मान को भी नुकसान पहुंचाया है। अयोध्या के मठों से लेकर कई मुस्लिम धार्मिक संस्थाओं तक अपराधी तत्व इन स्थानों में ज्ञात और अज्ञात रूप में रहते हैं। इसी पैसे के कारण धर्मस्थलों में सशस्त्र गार्ड ही नहीं रहते अपितु धर्मप्रमुख भी लाइसेंस और गैर लाइसैंसधारी हथियार रखने लगे हैं जिनका उपयोग अब आम होता जा रहा है। सबसे बुरी बात तो यह है कि आवश्यक जांच के लिये पुलिस के जाने पर सदैव धार्मिक भावनाएं ठेस पाती हैं किंतु अपराधियों के वहां रहने और पाये जाने पर धार्मिक भावनाओं को कोई ठेस नहीं लगती। कुल मिलाकर धार्मिक संस्थान अर्थ के उस जाल में उलझ कर बर्बाद हो रहे हैं जिसके खिलाफ वे अस्तित्व में आये थे उन्हें इस जाल से निकालने में प्रत्येक उस व्यक्ति के साथ सरकार को भी अपनी सही भूमिका का निर्वाह करना चाहिये।

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3 - घर और आश्रम

घर, घर होता है। आश्रम, आश्रम होता है, घर आश्रम नहीं हो सकता। आश्रम में घर हो सकता है पर कहा नहीं जा सकता।-

लोग घर छोड़कर आश्रम बनाते है, इसलिए आश्रम को घर की अगली सीढ़ी मानते हैं पर इसके लिए घर नाम की पहली सीढ़ी छोड़ना आवश्यक होता है, जिसको छोड़कर ही अगली सीढ़ी पर पहुँचा जा सकता है। कई लोग घर के बिना ही आश्रम में पहुँच जाते है पर उस आश्रम को अनाथ आश्रम कहते है, इसलिए आमतौर पर लोग पहले घर बनाते हैं फिर उसे छोड़ते है, तब आश्रम बनाते है।

घर में कमरे होते हैं, रसोई होती है, शौचालय होता है, आश्रम में भी कमरे होते हैं, रसोई होती है, शौचालय होता है। पहले के आश्रमों में शौचालय नहीं होते थे। आश्रमवासी शरीर के बाहर निकलने वाले पदार्थ खुली हवा में विसर्जित करते थे, चाहे वे ठोस, द्रव या गैस यानी पदार्थ की किसी भी अवस्था में क्यों न हों। आजकल के आश्रमों में शौचालयों की भी व्यवस्था होती है अर्थात समस्त कार्य छुपकर किए जा सकते है।

घर जमीन पर बनता है, आश्रम भी जमीन पर बनता है।

घर बनाने की जमीन को खरीदा जाता है, उसकी रजिस्ट्री को संभाल कर रखा जाता है जरूरत होने पर उसका डायवर्सन कराया जाता है जिसको कराने के लिए नीचे से ऊपर तक रिश्वत देनी होती है। फिर नगरपालिका से नक्शा पास कराना होता है, वह भी मुफ्त में नहीं होता।

आश्रम को जमीन के लिए ऐसा कुछ भी नहीं करना होता है ’सबै भूमि गोपाल’ की और ‘यतो धर्म: ततो जय:’ वाले सिद्वान्त से किसी भी खाली जमीन पर काम प्रारंभ कर देना होता है। आश्रम के लिए इस दुनियादारी के कानून नहीं चलते। भगवा वस्त्रधारी सीधा परमपिता अर्थात बापों के बाप से जुड़ा होता है। वह जानता है कि बाल ठाकरे, इमाम बुखारी और भिंडरावालें के घर इस देश का कानून पानी भरता है। धर्म के नाम पर इस देश के नेता की घिग्धी बॅध जाती है, इसलिए इस देश में आश्रम बनाना अधिक सरल है।

सरकारी कर्मचारी जानते हैं कि जनता के काम में जितना व्यवधान पैदा करो उतने ही पैसे मिलते हैं। आज देश के सारे कार्यालयों में कार्य- व्यवधान के कारखाने चल रहे हैं। इसके कारण इस देश के बहुत सारे लोग जो घर बनाना चाहते थे उन्होंने तंग आकर घर को छोड़ आश्रम बना लेना अधिक उचित समझा है। ऐसे लोग घर बनाने की वासना से भरे हुए लोग हैं पर विवशतावश आश्रम बनाने को मजबूर हो गए हैं।

वे आश्रम बनाते हैं पर भीतर घर बनाते रहते हैं। ऊपर से वह आश्रम दिखता है पर भीतर भीतर एक घर, घर करता रहता है। सरकार से, समाज से, व्यवस्था से, सुरक्षा के लिए वह आश्रम होता है पर सुख के लिए सुविधा के लिए, निश्चितता के लिए वह घर होता है। घर रूपी सियार आश्रम रूपी शेर की खाल ओढ़े रहता है।

आश्रमरूपी रजाई में घर रूपी देह गर्माती रहती है।

घर अचल होता है, पर उसे चलाना होता है। इसके लिए गृहस्वामी को धनोपार्जन करना होता है जो अधिकांशत: मेहनत से ही प्राप्त होता है। आश्रम को अचल नहीं होना चाहिए पर होता वह भी अचल ही है और उसे भी चलाना होता है। पर आश्रम श्रम से नहीं, दान से चलता है (हो सकता है कि आश्रम, अश्रम का ही अपभ्रंश हो) यह दान भिक्षुक की मुद्रा में हाथ नीचे करके नहीं लिया जाता है। यह दान तो स्वत: ही चरणों में आ जाता है। केवल थोड़ी-सी कला और वैराग्य भाव का प्रदर्शन करना होता है। पूर्वजों का प्रताप है कि उन्होंने अपने वंशजों को इतना धर्मभीरू बना दिया जाता है कि वे अपने घर को खतरे में डालकर भी आश्रम के अंदर चल रहे घर को मजबूत करते हैं- शायद इस भ्रम में मरने के बाद उन्हें स्वर्ग में अच्छे किस्म का घर मिलेगा!

घर में बच्चे होते हैं, परिवार होता है जो सब मिलकर घरबार कहलाता है। आश्रम में भी बच्चे होते हैं, आश्रमवासी होते हैं जिन्हें शिष्य कहा जाता है। दोनों के साथ सुख दु:ख समान रूप से जुड़ा रहता है। घरों में रहने वाले वाले लोग नशा करते है। वे शराब, भॉग, गाँजा, चरस, सिगरेट तम्बाकू आदि का सेवन करते है पर आश्रमवासी शराब नहीं पीते तथा सिगरेट से भी परहेज करते हैं।

घरों में नारियों को सम्मान मिलता है पर आश्रमों में नारियों को ‘अच्छी’ नजरों से नहीं देखा जाता है।

आधिपत्य और अधिकार के मुकदमे आश्रम पर भी चलते हैं, उसके भी वारिस होते हैं तथा हर आश्रम में एक घर, घर-घर करता है। पर यह बात अधिक लोगों को नहीं बताना चाहिए अन्यथा वे आश्रम की सेवा करने की जगह अपने ही घर की सेवा करने लगेंगे।

वैसे सच्चाई यह है कि आशंकाओं के वश जहाँ पर भी भविष्य की सुरक्षा का वर्तमान में इंतजाम होता है वह घर ही हो सकता है, आश्रम नहीं।

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4 - धरम का सिपाही

मैं मानता हूं कि आपने कोई फौजी प्रशिक्षण नहीं लिया, आप ए-के- 47 थ्री नाट थ्री तो क्या चिड़ीमार बंदूक का ट्रिगर दबाने का मौका भी नहीं पा सके, फिर भी आपको सिपाही बना दिया गया है, उनके आँकड़ों में आपकी भर्ती दर्ज है। आप कह सकते हैं कि आप तो कभी कोई लड़ाई नहीं लड़े। पर सिपाही भी कहां रोज रोज लड़ते हैं। वह तो पूरी जिन्दगी में एकाध बार ही ऐसे मौके आते हैं, जब सिपाहियों को लड़ाइयों में झोंका जाता है सो आप भी उनके ईधन में दर्ज हैं। मौका आएगा तो आपको उकसाकर आपका उचित इस्तेमाल किया जाएगा।

आप अपनी वर्दियां पहिले से ही सिलवाए बैठे हैं। ये वर्दियों आम फौजी की वर्दी से थोड़ी- सी भिन्न हैं पर चूंकि आप सिपाही भी थोड़े भिन्न किस्म के हैं, अत: आपकी वर्दी भी भिन्न ही होगी। आपकी वर्दी में शामिल हैं चोटियां, जनेऊ, धोतियां, कलाइयों पर बंधे रंगीन डोरे, अंगूठियां, मालाएं, तिलक, गंडे, ताबीज, कड़े, पगड़ी, दाढ़ी, गोल टोपियां, तहमदें, क्रास, चोगे, बुरके, बिंदिया, सिंदूर आदि- आदि। इन वर्दियों का चुनाव करके आप अपनी बटालियन चुन लेते हैं कि आपको किसी रक्षा के लिए अपना पवित्र बलिदान देना हैं जिसके लिए आपकी गिनती पहले ही कर ली गई हैं।

हमारे पवित्र और महान जगद्‌गुरू देश में महलों, किलों, मानस्तंभो से कही अधिक संख्या में मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरूद्वारे मिलते हैं जो गाढ़ी, पतली या हवाई कैसी भी कमाई पर स्थापित होते चलते और रक्षित होते हैं। प्राथमिक रूप से इनमें लूटा गया, चुराया गया या टेक्स चोरी से बचाया गया धन ही लगाया गया होता है।। धार्मिक यात्राएं या धार्मिक स्थलों का निर्माण शोषण के लिए सबसे बड़ा प्रेरणास्त्रोत होता है। चंबल के मंदिरों में चढ़े सभी बड़े बड़े पीतल के घंटे डाकुओं द्वारा ही चढ़ाए गए होते हैं।

धर्मो के पंडे- पुजारियों द्वारा नर्क के क्रूरतम कष्टों को आँखों देखा हाल सुनाने के आंतकवाद- भर से काम नहीं चलता अपितु स्वर्ग के काल्पनिक सुखों का भी लालच साथ ही साथ चलता है। यह तरकीब सिपाहियों की भर्ती के विज्ञापन का काम देती है, आदमी तुरंत ही धर्म का सिपाही बन जाता हैं। अपनी फौज को देखकर किसे आनंद नहीं आता ! धर्म के सेनापतियों के सीने गर्व से फूल जाते हैं। अपनी सेना को प्रदशर्त करने के लिए वे शोभायात्रा निकालते हैं, यह उनकी 26 जनवरी होती है। फौज से आंतकित जनमानस अपनी गांठ ढीली करने में देर नहीं करता, वह पुजारी की झोली पर झोली भरता जाता है। प्रभु की पूजा के नाम से पुजारी मंदिर में ही रहने लगते हैं। पुजारी की पूजा के लिए उसका परिवार मंदिर में रहना शुरू कर देता हैं प्रभु को कृपा से मंदिर में ही उसकी परिवारवृद्वि स्वभाविक ढंग से होती रहती है। भक्तगणों से बचे हुए समस्त स्थान और समय का उपयोग पुजारी और उसका परिवार करता है। बच्चों के बच्चे होते रहते हैं व एक दिन पुजारी का परिवार संयुक्त परिवार में बदल जाता है। जेठानी के बच्चे के द्वारा मंदिर अहाते में की गई टट्‌टी को देवरानी साफ करने लगती है। प्रभु के समक्ष ही भाभी देवर के कान में तेल डालकर, चिकोटी काटकर चली जाती है।

लक्ष्मी के नोट- अवतार की प्रतीक्षा में मंदिर में दुकानें निकलवाई जाती हैं, आसपास की जमीन पर प्रभु के नाम से अतिक्रमण किया जाता है, विरोध करने वालों से निपटने लिए हम आप जैसे सिपाही विद्यमान रहते हैं। पुजारी की इच्छाएं धर्म होती हैं, उसकी इच्छा में बाधा स्वरूप आने वाली कोई भी वस्तु धर्म का विरोध कहलाती हैं। खंभे से सीधे तार डाल कर मुफ्त बिजली का हीटर जलता है। शासन के आतताइयों से सुरक्षा को हम- आप जैसे सिपाही विद्यमान हैं। पुजारी के हितों की रक्षा में जो खून नहीं खोलता वह खून नहीं, पानी होता हैं। पुजारी ठेके लेते हैं, पुजारी व्यवसाय करते हैं, पुजारी दलाली करते हैं, पुजारी चोरी करते हैं पर पुजारी की सुरक्षा को हम- आप जैसे सिपाही सदैव तत्पर हैं, स्थाई भर्ती हैं, हमारी, हम कभी रिटायर होने वाले नहीं हैं। एक पुकार आएगी और हम दौड़ पड़ेंगे, लाठी, बल्लम, त्रिशूल, तलवार लेकर। धर्म का प्रतीक महंत और हम धर्म के सिपाही इस धर्म की रक्षा करेंगे तभी धर्म हमारी रक्षा कर पाएगा।

फौजों को निरंतर परेड करवाई जाती हैं उसका एकमात्र उद्‌देश्य उन्होंने अनुशासन में रखना और आदेश पर काम करना सिखाना होता हैं। हमसे भी जय बुलवाई जाती हैं, एक लाइन में लगाके नमाज पढ़ाई जाती है ताकि हमारा सिपाही रूपी अनुशासन बना रहे। अपना भला बुरा सोचने का मौका न मिले अब जंगलों, पर्वतों की ओर पलायन करने के लिए प्रेरित नहीं किया जाता, क्योंकि अगर सिपाही ही भाग गए तो धर्म की धोती में लिपटे पुजारी के स्वार्थ की रक्षा कैसे होगी।

महंत चुनाव लड़ेगे, विधानसभा जाएंगे, सांसद जाएंगे, खेत कब्जाएंगे, मकान कब्जाएंगे, औरतें कब्जाएंगे पर मंहत की रक्षा हम करेगें, हम सिपाही हैं, आप सिपाही हैं, सब सिपाही हें। ये बात अलग हैं कि हम अपनी रक्षा स्वंय नहीं कर पाते पर धर्म की रक्षा करते हैं। हमारी मजदूरी मार ली जाती हैं, हम कुछ नहीं कर पाते, हम पर मंहगाई थोप दी जाती हैं, टेक्सों की मार पड़ती हैं बैरोजगारी होती हैं, हम निरीह होते हैं, पर धर्म की रक्षा के सिपाही हैं। माथे पर रंग लगाके, भभूत लगाके दौड़ पड़ते हैं स्वर्गरूपी मेडल लेने के लिए। जब पुजारी भरपेट पूड़ी, खीर, मिठाई खाकर तोंद पर हाथ फेरता हुआ झरोखों से नल पर पानी के लिए झगड़ती औरतों की देह निहार रहा होता हैं हम सिपाही की तरह धर्म के लिए लड़ रहे होते हैं, एक शीतयुद्व।

आवाज़ आने भर की देर है आपको अटेंशन होते देर नहीं लगेगी।

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संपर्क :

---- वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल म-प्र-

फोन 9425674629

फोन 0755-2602432

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